23/08/2026
गद्दी समाज को आज इल्ज़ाम नहीं, इत्तेहाद की ज़रूरत है
आज हमारे गद्दी समाज के सामने जो हालात हैं, वे बेहद संजीदा और फ़िक्र की बात हैं। ऐसे वक़्त में पूरे समाज को एकजुट होकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे ही कुछ साथी एक-दूसरे पर लांछन लगाने, इल्ज़ाम लगाने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं।
सच्चाई यह है कि मेरी जानकारी में समाज का शायद ही कोई ऐसा शख़्स होगा, जो मौजूदा हालात को देखकर दुखी और परेशान न हो। हर शख़्स अपने-अपने स्तर पर समाज की भलाई के लिए कुछ न कुछ करना चाहता है, लेकिन हालात और मजबूरियाँ हर किसी के सामने अलग-अलग हैं। इसलिए किसी की नीयत पर सवाल उठाना या अपनी बात को सही साबित करने के लिए दूसरे को गलत ठहराना किसी मसले का हल नहीं है।
हमें यह भी समझना होगा कि हर बात के लिए किसी सियासी जमात, रहनुमा या दूसरे शख़्स को ज़िम्मेदार ठहराने से हमारा समाज मज़बूत नहीं होगा। अगर हम आपस में ही बँटे रहेंगे, एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे और हर कोशिश में कमी निकालते रहेंगे, तो फिर पूरे समाज की सामूहिक आवाज़ कौन बनेगा?
हमारे बुज़ुर्गों ने समाज के लिए जिस तरह मेहनत की, संघर्ष किया और समाज को आगे बढ़ाने का रास्ता बनाया, उसे हम कभी नहीं भूल सकते। जिन लोगों ने अपने दौर में समाज के लिए मेहनत और संघर्ष किया, हम उन सभी का दिल से शुक्रिया और एहतराम करते हैं। इसी तरह समाज से जुड़े रहे साबिक़ सांसद और साबिक़ विधायक भी अपने-अपने कार्यकाल में समाज की ख़िदमत और भलाई के लिए कोशिश करते रहे हैं। उनके योगदान और ख़िदमात को तस्लीम करना और उनका एहतराम करना भी हमारी ज़िम्मेदारी है।
लेकिन आज वक़्त की नज़ाकत बेहद संजीदा है। हमें मौजूदा हालात को जज़्बात के बजाय समझदारी और संजीदगी से समझने की ज़रूरत है। जिस तरह की कार्रवाइयाँ और वाक़ियात सामने आ रहे हैं, उनसे समाज का एक बड़ा तबका फ़िक्रमंद और परेशान है। आज मुस्लिम समाज के प्रति जिस तरह का माहौल दिखाई दे रहा है, उसमें हमारे समाज के लोगों को भी कई जगह परेशानियों और कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
साथ ही हमें ख़ुद एहतेसाब भी करना होगा। हमारे समाज के बारे में जो “दबंग” छवि बनी है, उसे सिर्फ़ बाहरी नैरेटिव कहकर नज़रअंदाज़ कर देना भी मुनासिब नहीं होगा। यह छवि काफी हद तक हमारे अपने रवैये, तौर-तरीक़ों और वर्षों में बनी हमारी सामाजिक पहचान से भी जुड़ी हुई है। अगर हमें इस छवि को बदलना है, तो इसकी शुरुआत भी हमें ख़ुद से करनी होगी—क़ानून का एहतराम, प्रशासन के साथ बातचीत, तालीम, सब्र, तहज़ीब और सकारात्मक सामाजिक क़यादत के ज़रिए।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अगर किसी बेगुनाह के साथ ज़ुल्म हो तो हम ख़ामोश रहें। ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ भी बुलंद होनी चाहिए और अपने रवैये में इस्लाह भी होना चाहिए। ये दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं।
सबसे अहम सवाल यह है कि आज भी हम अपने समाज के किसी गाँव, मोहल्ले या घर में बैठकर आपसी इख़्तिलाफ़ात भुलाकर संजीदगी से अपनी समस्याओं पर बातचीत नहीं कर पाते। आपसी हसद, जलन, नफ़रत और एक-दूसरे को पीछे खींचने की सोच हमें अंदर से कमज़ोर कर रही है।
इसलिए आज ज़रूरत किसी एक शख़्स को बड़ा या छोटा साबित करने की नहीं, बल्कि अपने अंदर झाँकने की है। हमें तय करना होगा कि हम आने वाली नस्ल को क्या देना चाहते हैं—आपसी झगड़े और दिखावा, या तालीम, इज़्ज़त, रोज़गार और एक मज़बूत मुस्तक़बिल?
मेरी समाज के तमाम साथियों से पुरख़ुलूस अपील है कि बाहरी दिखावे और आपसी खींचतान से ऊपर उठकर तालीम, शऊर, आर्थिक मजबूती, क़ानून के एहतराम और सामाजिक इत्तेहाद पर तवज्जो दें।
कोई दूसरा हमारी आवाज़ बनने नहीं आएगा। जब तक हम ख़ुद बेदार होकर अपने हक़ूक़ और अपने मुस्तक़बिल के लिए मुत्तहिद नहीं होंगे, तब तक हमारी समस्याएँ बनी रहेंगी।
आज किसी पर इल्ज़ाम लगाने का नहीं, समाज को जोड़ने का वक़्त है।
किसी को नीचा दिखाने का नहीं, एक-दूसरे का हाथ थामने का वक़्त है।
एक-दूसरे को हराने का नहीं, अपनी आने वाली नस्ल को कामयाब बनाने का वक़्त है।
आइए, इख़्तिलाफ़ रखें लेकिन दिलों की दूरियाँ ख़त्म करें। शख़्सियत से ऊपर समाज को रखें। आज के हालात से आगे बढ़कर आने वाली नस्ल के मुस्तक़बिल के लिए काम करें।
अपने बुज़ुर्गों की जद्दोजहद का एहतराम करें। जिन लोगों ने समाज के लिए अपने वक़्त, सामर्थ्य और वसाइल के मुताबिक़ काम किया, उनकी ख़िदमात को तस्लीम करें। साथ ही अपनी कमियों को भी ईमानदारी से पहचानें और उन्हें दूर करने की कोशिश करें।
हमारी पहचान सिर्फ़ “दबंग” छवि से नहीं, बल्कि हमारी तालीम, मेहनत, ईमानदारी, कारोबार, समाजी ख़िदमात, क़ानून के एहतराम और आपसी भाईचारे से होनी चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि किसी भी समाज की असली ताक़त सिर्फ़ तादाद में नहीं होती, बल्कि उसकी इत्तेहाद, तालीम, आर्थिक मज़बूती, समाजी शऊर और सकारात्मक सोच में होती है।
आइए, आज अहद करें—
इत्तेहाद + तालीम + शऊर + आर्थिक मज़बूती + क़ानून का एहतराम + मेहनत = गद्दी समाज की असली तरक़्क़ी।
समाज मज़बूत होगा तो हमारी आवाज़ मज़बूत होगी, और समाज की आने वाली नस्ल मज़बूत होगी तो हमारा मुस्तक़बिल भी मज़बूत होगा।