27/09/2026
तेनज़िन न्यिडोन
धर्मशाला, 25 सितंबर: केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) ने शुक्रवार को जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा लद्दाख की स्थिति की तुलना तिब्बत के भीतर की परिस्थितियों से किए जाने को खारिज कर दिया। CTA ने कहा कि यह तुलना “अनुचित और तथ्यात्मक रूप से गलत” है तथा चीन के औपनिवेशिक शासन के अधीन तिब्बतियों द्वारा सामना की जा रही वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करती।
वांगचुक ने गुरुवार को लेह के NDS ग्राउंड में 24 सितंबर 2025 को लद्दाख में हुई हिंसा की पहली बरसी के अवसर पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की। उस हिंसा में पुलिस की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी। उन्होंने कहा कि लद्दाख ने भारत के साथ रहने का निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है और सम्मानपूर्वक जीवन जीने की उम्मीद थी, लेकिन उनके अनुसार बाद में स्थिति खराब हो गई।
वांगचुक ने कहा, “आज लद्दाख पर ऐसा दमन किया जा रहा है कि मेरी दृष्टि में चीन भी तिब्बत के साथ ऐसा नहीं कर रहा है।”
शुक्रवार को जारी एक बयान में CTA के प्रवक्ता तेनज़िन लेक्शे ने इस तुलना पर आपत्ति जताई और चीन के औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत तिब्बतियों पर जारी दमन को रेखांकित किया।
बयान में कहा गया, “केंद्रीय तिब्बती प्रशासन लद्दाख में हाल ही में दिए गए सोनम वांगचुक के सार्वजनिक भाषण में कही गई उन बातों पर गहरी चिंता व्यक्त करता है, जिनमें उन्होंने लद्दाख की स्थिति की तुलना तिब्बत के भीतर की स्थिति से की।”
CTA ने इस तुलना को “अनुचित और तथ्यात्मक रूप से गलत” बताते हुए कहा कि वांगचुक की टिप्पणियां “तिब्बत के भीतर की वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करतीं।”
बयान में कहा गया, “तिब्बत चीन के अधिनायकवादी शासन के अधीन बना हुआ है, जहां तिब्बतियों को उनके मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यवस्थित दमन का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के उद्देश्य से किए जा रहे उपायों में भी लगातार वृद्धि हो रही है।”
CTA के बयान के बाद लद्दाख में रहने और काम करने वाले कुछ तिब्बती लोगों की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। उनका कहना था कि लद्दाखियों और तिब्बतियों की पीड़ा को किसी क्रम या तुलना में नहीं रखा जाना चाहिए और न ही किसी एक समुदाय के अनुभव को दूसरे समुदाय के अनुभव को कमतर दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
लद्दाख में रहने वाली तिब्बती फिल्म निर्माता त्सेरिंग वांगमो ने इस क्षेत्र से अपने व्यक्तिगत संबंध को स्वीकार करते हुए तिब्बत की स्थिति को लेकर वांगचुक के आकलन पर सवाल उठाया।
वांगमो ने कहा, “मेरा जन्म और पालन-पोषण लद्दाख में हुआ है। लद्दाख मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं लद्दाख से प्रेम करती हूं और इसकी गहराई से चिंता करती हूं।” उन्होंने कहा कि वह “लद्दाख और वहां के लोगों की राजनीतिक स्थिरता तथा आत्मनिर्णय की इच्छा” का समर्थन करती हैं।
इसके बाद उन्होंने लद्दाख में अपने अनुभव और तिब्बत से अपने संबंध के बीच अंतर बताते हुए कहा कि वह लद्दाख में एक राज्यविहीन व्यक्ति के रूप में रहती हैं, क्योंकि उनकी मातृभूमि चीन के नियंत्रण में है।
उन्होंने कहा, “मेरे दादा-दादी, मेरे पिता और मेरे परिवार के अन्य सदस्य निर्वासन में ही गुजर गए, बिना कभी अपनी मातृभूमि लौटने का अधिकार पाए।”
उन्होंने तिब्बती कलाकारों, लेखकों और गायकों पर लगे प्रतिबंधों का भी उल्लेख किया और कहा कि राजनीतिक अभिव्यक्ति के कारण कुछ लोगों को जेल भेजा गया या उनकी आवाज दबा दी गई।
उन्होंने कहा, “स्वतंत्रता की अपनी इच्छाओं को खुलकर व्यक्त करने के अधिकार की तो बात ही छोड़ दीजिए। तिब्बत की स्थिति किसी भी अन्य स्थिति से तुलना योग्य नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा, “जिस प्रकार हर प्रकार का दमन अपने आप में विशिष्ट होता है और उसकी तुलना किसी दूसरे दमन से कभी नहीं की जा सकती।”
कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय एकजुटता का आह्वान करते हुए वांगमो ने कहा:
“केवल एकजुटता के माध्यम से ही हम साझा अनुभवों की बात कर सकते हैं और समानता के बिंदु खोज सकते हैं। लेकिन हमें पीड़ा को इस प्रतियोगिता में कभी नहीं बदलना चाहिए कि किसने अधिक पीड़ा झेली है।”
वांगचुक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मैं आपका सम्मान करती हूं। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि आपके जैसे कद का व्यक्ति इस तरह की टिप्पणी करेगा।”
लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में रहने वाले लद्दाखी गायक तेनज़िन शायन ने भी लद्दाख के लिए वांगचुक की व्यापक मुहिम के प्रति समर्थन व्यक्त किया, लेकिन तिब्बत के बारे में उनकी टिप्पणी पर आपत्ति जताई।
शायन ने कहा, “आज NDS ग्राउंड में का सोनम वांगचुक ने जो कहा, मैं उससे पूरी तरह सहमत हूं और उसका सम्मान करता हूं। लद्दाख के लोगों और उसके भविष्य के लिए निःस्वार्थ रूप से खड़े होने के लिए मैं उनका हृदय से धन्यवाद करता हूं।”
हालांकि, उन्होंने इस सुझाव पर आपत्ति जताई कि चीनी शासन के अधीन तिब्बतियों को महत्वपूर्ण पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती। उन्होंने तिब्बतियों की कैद, आत्मदाह की घटनाओं तथा धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लेख किया।
शायन ने दलाई लामा की तस्वीरों से जुड़े प्रतिबंधों तथा चीनी नीतियों के तहत तिब्बती भाषा, संस्कृति और परंपराओं को लेकर चिंताओं का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, “परम पावन को अपना देश पीछे छोड़कर जाना पड़ा और आज लाखों तिब्बती शरणार्थी हैं, जो लंबे समय से अपने प्रियजनों से अलग हैं।”
लद्दाख के “सपनों और आकांक्षाओं के पूरा होने” की आशा व्यक्त करते हुए शायन ने जोर दिया कि लद्दाख का संघर्ष तिब्बतियों के अनुभव को स्वीकार करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हमें कभी भी किसी दूसरे समुदाय की पीड़ा को कम करके आंकने या उसे खारिज करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।”
उन्होंने कहा, “मैं यह बात सम्मान के साथ कह रहा हूं, लेकिन साथ ही सत्य और गरिमा के प्रति अपनी जिम्मेदारी के साथ भी।”
Source: Phayul https://share.google/DRcjtVYcSCYohOKBU
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