Hindu Unity Movement

Directions

Hindu Unity Movement Eradicating discrimination on the basis of “Varna & Caste”
to establish equal opportunity amongst every person in any social or religious field.

30/06/2023

!! नमो राघवाय !!Jagadguru Sri Rambhadracharya ji शूद्र वर्ण बहुत पवित्र है जाने कैसेब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र वर्ण को भगवान ने कैसे .....

06/11/2021

कुछ दिनों पहले अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसका विषय था - पूरी दुनिया में मौजूद हिंदुत्व को खत्म करना। सद...

12/09/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारो वर्ण के प्रतीक श्रीराम में वैश्यत्व व शूद्रत्व

मित्रों,

भगवान श्रीराम परमात्मस्वरुप से चारो वर्णों के जनक हैं इस कारण उनमें चारो वर्ण बीजरूप से अवश्य थे|उन्होने राम रूप में अवतार लिया,इसलिए उनके अवताररूप में भी चारो वर्ण होना चाहिए|हमने अपनी पिछली पोस्टों में धर्मशास्त्रों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि मनुष्य रूप में अवतरित दशरथनन्दन श्रीराम को ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण का कैसे कहा जा सकता है|

आज की पोस्ट के माध्यम से हम प्रभु श्रीराम में वैश्यत्व और शूद्रत्व कैसे कहा जा सकता है,धर्मशास्त्रों के आधार पर कहने का प्रयास करेंगे|जिन किन्ही सज्जन को यह पोस्ट पढ़कर त्रुटि लगे वे मेरे माता पिता की भांति इसे बालवचन मानकर विनोद स्वरूप ले लेवें |
श्रीमद् भगवतगीता के अनुसार :-

'' कृषि वाणिज्य गोरक्ष्य वैश्य कर्म स्वभावजम ''
अर्थात कृषि,व्यापार ,गाय की रक्षा वैश्य का स्वाभाविक कर्म है|
वैश्य के लिए यह कत्तई आवश्यक नही है कि वह तीनो कर्म को करता हो,यदि इन तीन में से व्यक्ति स्वभावत: कोई एक भी कर्म करता हो तो उसे वैश्य कहा जायेगा|

रामचरितमानस के अनुसार श्रीराम के अवतार के प्रमुख उद्देश्यों में गायों की रक्षा एक प्रमुख उद्देश्य था|यथा:-
''विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार''
अर्थात श्रीराम ने विप्र,गाय,देवता और सन्त का भला करने( रक्षा) हेतु अवतार लिया|

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि श्रीराम में वैश्यत्व विद्यमान था|
जहाँ तक शूद्रत्व की बात है तो देखिए श्रीराम के शरीर का रंग श्याम(नीला)था|यथा:-

''नीलाम्बुजश्यामल कोमलांगं ''
अथवा
''नील सरोरुह नीलमणि नील नील घनश्याम''
अब जरा हरिवंशपुराण के अनुसार वर्ण व्यवस्था देखिए:-
श्वेतलौहितकैवर्णै: पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणा:|
अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्यमानेन विष्णुना|
ततो वर्णत्वमापन्ना: प्रजालोकचतुर्विधा|
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च महीपते|
साराशंत: हे ब्राह्मण भगवान विष्णु द्वारा चिन्तन करने पर सफेद,लाल,पीले और नीले रंग के चार वर्ण उत्पन्न हुए जो प्रजारूप से क्रमश: ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कहलाए|
इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र का रंग नीला हुआ|श्रीराम का रंग भी तो नीला ही था|
एक अन्य दृष्टि से विचार करें|''शूद्र'' शब्द की व्युतपत्ति 'शूँ, धातु से हुयी है|महर्षि पाणिनि के अनुसार 'शूँ,पावने अर्थात जो पावन करता हो|राम को 'पावनं पावनानाम्'कहा गया है|उनके नाम को भी पावन करने वाला कहा गया है,यथा:-
सुमिरि पवनसुत पावन नामू|अपने बस करि राखे रामू||
उपरोक्त प्रकार से यदि देखा जाए तो श्रीराम में वैश्य और शूद्र वर्ण की विद्यमानता से इन्कार नही किया जा सकता है|

धन्यवाद|

15/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारो वर्ण के प्रतीक श्रीराम में वैश्यत्व व शूद्रत्व

मित्रों,

भगवान श्रीराम परमात्मस्वरुप से चारो वर्णों के जनक हैं इस कारण उनमें चारो वर्ण बीजरूप से अवश्य थे|उन्होने राम रूप में अवतार लिया,इसलिए उनके अवताररूप में भी चारो वर्ण होना चाहिए|हमने अपनी पिछली पोस्टों में धर्मशास्त्रों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि मनुष्य रूप में अवतरित दशरथनन्दन श्रीराम को ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण का कैसे कहा जा सकता है|

आज की पोस्ट के माध्यम से हम प्रभु श्रीराम में वैश्यत्व और शूद्रत्व कैसे कहा जा सकता है,धर्मशास्त्रों के आधार पर कहने का प्रयास करेंगे|जिन किन्ही सज्जन को यह पोस्ट पढ़कर त्रुटि लगे वे मेरे माता पिता की भांति इसे बालवचन मानकर विनोद स्वरूप ले लेवें |

श्रीमद् भगवतगीता के अनुसार :-

'' कृषि वाणिज्य गोरक्ष्य वैश्य कर्म स्वभावजम ''
अर्थात कृषि,व्यापार ,गाय की रक्षा वैश्य का स्वाभाविक कर्म है|
वैश्य के लिए यह कत्तई आवश्यक नही है कि वह तीनो कर्म को करता हो,यदि इन तीन में से व्यक्ति स्वभावत: कोई एक भी कर्म करता हो तो उसे वैश्य कहा जायेगा|

रामचरितमानस के अनुसार श्रीराम के अवतार के प्रमुख उद्देश्यों में गायों की रक्षा एक प्रमुख उद्देश्य था|यथा:-
''विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज अवतार''
अर्थात श्रीराम ने विप्र,गाय,देवता और सन्त का भला करने( रक्षा) हेतु अवतार लिया|

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि श्रीराम में वैश्यत्व विद्यमान था|
जहाँ तक शूद्रत्व की बात है तो देखिए श्रीराम के शरीर का रंग श्याम(नीला)था|यथा:-

''नीलाम्बुजश्यामल कोमलांगं ''
अथवा
''नील सरोरुह नीलमणि नील नील घनश्याम''
अब जरा हरिवंशपुराण के अनुसार वर्ण व्यवस्था देखिए:-
श्वेतलौहितकैवर्णै: पीतैर्नीलैश्च ब्राह्मणा:|
अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्यमानेन विष्णुना|
ततो वर्णत्वमापन्ना: प्रजालोकचतुर्विधा|
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्च महीपते|

साराशंत: हे ब्राह्मण भगवान विष्णु द्वारा चिन्तन करने पर सफेद,लाल,पीले और नीले रंग के चार वर्ण उत्पन्न हुए जो प्रजारूप से क्रमश: ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कहलाए|
इससे यह स्पष्ट होता है कि शूद्र का रंग नीला हुआ|श्रीराम का रंग भी तो नीला ही था|

एक अन्य दृष्टि से विचार करें|''शूद्र'' शब्द की व्युतपत्ति 'शूँ, धातु से हुयी है|महर्षि पाणिनि के अनुसार 'शूँ,पावने अर्थात जो पावन करता हो|राम को 'पावनं पावनानाम्'कहा गया है|उनके नाम को भी पावन करने वाला कहा गया है,यथा:-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू|अपने बस करि राखे रामू||
उपरोक्त प्रकार से यदि देखा जाए तो श्रीराम में वैश्य और शूद्र वर्ण की विद्यमानता से इन्कार नही किया जा सकता है|

धन्यवाद|

10/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

चारों वर्णों के जनक,राम में क्षत्रियत्व

मित्रों,
हमने अपनी पिछली पोस्टों में यह प्रमाणित किया था कि राम परमात्मस्वरूप से चारो वर्णों के जनक हैं,अर्थात चारो वर्ण राम से ही उत्पन्न हुए,इसलिए चारो वर्ण उनमें विद्यमान थे|हमने आपका परिचय इस वास्तविकता से भी कराया कि दशरथसुतराम के रूप में अवतरित श्रीराम में न केवल ब्राह्मण के समस्त शास्त्रोक्त गुण थे बल्कि उनके जन्म के समय जो ग्रह स्थिति थी,उस समय चन्द्रमा कर्क राशि में था इसलिए ज्योतिष के अनुसार उनका वर्ण ब्राह्मण था|

आज की पोस्ट में भगवान श्रीराम में क्षत्रियत्व की विद्यमानता कैसे थी,यह आपके सामने रखा जा रहा है|
सर्वप्रथम तो यह जान लें कि मनुस्मृति के अनुसार :-

सर्ववर्णेषु तुल्य़ांसु पत्नीष्वक्षत योनिषु|
आनुलोम्येन सम्भूता जात्या ग्येयास्त एव ते||

अर्थात सभी वर्णों में सजातीय अक्षत योनि वाली स्त्रियों से अनुलोम विधि से जो संतान होगी वह उसी वर्ण की होगी|
राजा दशरथ और माता कौशल्या का वर्ण क्षत्रिय था इसलिए भगवान राम का वर्ण क्षत्रिय माना गया|

यदि गुण,कर्म और लक्षण की दृष्टि से उनके वर्ण का विचार किया जाय तो आप पायेंगे उनमें क्षत्रिय के भी सारे गुण और कर्म भी विद्यमान थे|इसको इस प्रकार से देखा जा सकता है:-
क्षत्रिय के आवश्यक गुण और कर्म जैसे शास्त्रों में वर्णित हैं वे निम्न प्रकार से हैं :-

श्रीमद् भगवत गीता के अनुसार:-

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्|
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्|

अर्थात शूरवीरता,तेज,धैर्य,चतुरता,सन्मुख युद्ध से न भागना,दान देना,सब पर स्वामिभाव,क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं |

१- श्रीराम की शूरवीरता और धैर्य से युक्त होना:-
सर्वप्रथम तो स्वयं श्रीराम ने स्वयं में इस गुण की विद्यमानता अपने श्रीमुख से लंकाकांड में विभीषणजी से कही है,जब विभीषण रावण के सम्मुख युद्ध में उन्हे पैदल देख राम से संदेह व्यक्त किया कि रावण रथ पर सवार है और आप न तो पगत्राण(जूता)पहने हैं और न रथ पर सवार हैं,जबकि रावण रथ पर आसीन है,युद्ध कैसे जीतेंगे,तब राम जी ने कहा कि मैं जिस रथ पर सवार हूँ ,उसमें शौर्य और धैर्य रूपी पहिया है:-

सौरज धीरज जेहि रथ चाका|
इस प्रकार यह दोनो गुणों की स्वयं में विद्यमानता श्रीराम ने स्वयं बतायी है|

२-श्रीराम का तेजयुक्त होना:-
यद्पि प्रभु श्रीराम को ब्रम्हरूप से परमप्रकाशरूप बार-बार कहा गया गया है,यथा;-
''जगत प्रकास्य प्रकासक रामू'' अर्थात राम परम प्रकाशरूप और जगत के प्रकाशक हैं |

अथवा भगवान शिव द्वारा यह कहा गया है''पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि''अर्थात राम प्रकाश का खजाना हैं |

फिर भी मनुष्यरूप में भी उन परमप्रकाशरूप को उनके गुरु विश्वामित्र द्वारा जो विद्या प्रदान की गयी वह उनके तन में अतुलित बल और तेज प्रकाशित करती थी|यथा:-

तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही|विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही|
जाते लाग न छुधा पिपासा|अतुलित बल तन तेज प्रकासा|
सीतास्वयंवर प्रसंग में जब श्रीराम की धनुषभंग करने को चले तो माता सुनयना को उनकी सामर्थ्य पर शंका होने पर एक चतुर सखी ने उनसे कहा कि:-

बोली चतुर सखी मृदु बानी|तेजवंत लघु गनिअ न रानी|
अर्थात एक चतुर सखी ने सुनयना जी से कहा कि हे रानी राम तेज से युक्त हैं उन्हे छोटा न समझो|

३-श्रीराम में दान और चतुरतारूपी गुण:-रामकथा को यदि जरा भी ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्टरूप से परिलक्षित होता है श्रीराम दान और चतुरतारूप गुण से परिपूर्ण थे|चतुरता के लिए आवश्यक है बुद्धिमान होना|क्यों कि चतुरता तो बुद्धि का एक श्रेष्ठ गुण है|श्रीराम ने स्वयं मे अतितीव्र बुद्धि का होना कहा है|विभीषण को यह बताया कि वे जिस अध्यात्मिक रथ पर सवार है,उसमें दानरूप फरसा है और बुद्धिरूप प्रचंड शक्ति है|यथा:-

''दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा''
४-श्रीराम का युद्ध से न भागने का गुण:-सूर्पणषा की नासिकाभंग के पश्चात जब खर-दूषण ने राम और लक्षमण को नृपबालक जानकर यह सोचकर कि वे वध के योग्य नही हैं,दूत भेजकर श्रीराम से कहलवाया कि सीता देकर जीवन की रक्षा कर चले जाओ तो श्रीराम ने उत्तर दिया कि:-

रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं |एक बार कालहु सन लरहीं |
अर्थात हम बलवान शत्रु देखकर हम डरते नही और काल के सामने होने पर उससे भी युद्ध करते हैं |

राम जी के संपूर्ण चरित्र को देखने से स्पष्ट है कि उन्होने बार-बार शत्रु को अवसर दिया कि शत्रु भूल सुधार ले और युद्ध न करे परन्तु युद्ध सन्मुख होने की अवस्था में युद्ध से हटे नही और न ही कभी युद्ध से पलायन किया|

५- श्रीराम का स्वामिभाव:-यद्यपि यह निर्विवाद है कि श्रीराम सारे जगत के स्वामी हैं|समस्त ऋषिगण ने बार-बार उन्हे स्वामीरूप से संबोधित किया है|उदाहरण के महर्षि अत्रि ने उन्हे संबोधित करते हुए कहा कि:-

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी|कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी|
श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ने भी श्रीराम को संबोधित करते हुए कहा था:-

जे जानहि ते जानहुँ स्वामी|सगुन अगुन उर अंतरजामी|
उन्हे वर देकर अपना स्वामिभाव प्रदर्शित किया|लक्षमण को यह कहते हुये कि मैं भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होता हूँ और|शबरी जी को नवधाभक्ति का उपदेश देते हुए यह कहते हुए कि नौ मे से भक्ति का एक भी रूप रखने वाला मुझे अत्यधिक प्रिय है,अपने स्वामिभाव का ही प्रदर्शन किया और उनके पूरे जीवन में बारंबार इस भाव का प्रदर्शन मिलता है|

मित्रजन,उपरोक्त प्रकार से यह स्पष्ट है प्रभु श्रीराम में एक क्षत्रिय के सम्पूर्ण गुण अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में विद्यमान थे|
अगली पोस्ट में श्रीराम में बाकी दो वर्णो की विद्यमानता से आपका परिचय कराने का प्रयास करूंगा |

धन्यवाद।

08/08/2020

|| Hindu Unity Movement ||

राम में चारो वर्ण व वर्ण से अतीत राम (१)

मित्रों,
भगवान राम के कई रूपों का शास्त्रों में वर्णन मिलता है|उन्हे निराकार निर्गुण,निराकार सगुण,साकार सगुण,पुराण पुरुष व इतिहास पुरुष के रूप में जाना,माना व बखाना गया है|कबीर दास ने उनके चार रूपों को बताया है|यथा :-

एक राम दशरथ का बेटा|एक राम घट घट में बैठा|
एक राम का सकल पसारा|एक राम है सबसे न्यारा|

अर्थात एक राम दशरथ के पुत्र हैं,एक राम प्रत्येक शरीर मे प्रकाशरूप से रहते हैं,एक राम का ही सब कुछ विस्तार है और एक राम इन सबसे परे है|

सन्त श्री गोस्वामी तुलसीदास ने अपने ग्रन्थ रामचरितमानस के माध्यम से यह बताया है कि दशरथ पुत्र राम है ,वही पुराण का भी पुरुष है,जो दशरथ का बेटा है,वही घट-घट में बैठा है,वही सब जगह जगत रूप से विस्तृत है और वही सबसे परे भी|यथा:-

जय जय अविनासी सब घट वासी व्यापक परमानन्दा|
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि प्रगट परावर नाथ|
रघुकुलमणि मम स्वामि सोइ कहि शिव नायउ माथ||
सीयराम मय सब जग जानी|करहु प्रनाम जोरि जुग पानी|
अर्थात हे अविनाशी आपकी जय हो,आप समस्त घटों में वास करते हैं,आप सर्वत्र व्याप्त हैं और परमानन्द स्वरूप हैं, जो पुरुष प्रकाश के समुद्र के रूप में विख्यात है,सबके नाथ के रूप मे प्रगट है वह रघुकुलमणि राम मेरा स्वामी है|(तत्व विज्ञान के अनुसार मूल तत्व पुरुष है,महत, प्रधानादि शेष समस्त तत्व उसी से उत्पन्न हैं,उसी पुरुष को परमात्मा कहा गया है)मैं सारे जगत को सीताराम मय जानकर दोनो हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ| कबीर और तुलसी के राम को भिन्न भिन्न कहने वाले भूल कर रहे हैं|कबीर ने जो ''एक राम''शब्द का प्रयोग किया है|वह महत्वपूर्ण है|

हम विषयान्तर के भय से विस्तार से बचकर यहाँ पर राम को मात्र इतिहास पुरुष के रूप में लेकर चर्चा करेंगे|
मित्रजन,आज जो लिखा जा रहा है,हो सकता है कि वह आपके लिए अद्भुत हो,राम स्वयं अद्भुत हैं |जो भी कहा जाये कम है|

शास्त्रों के अनुसार परमात्मा से ही चारो वर्ण प्रकट हुये हैं| रामचरितमानस के अनुसार विष्णु के अवतार भगवान राम ने स्वयं कहा है कि :-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये|सबते अधिक मनुज मोहि भाये|
अर्थात सभी मुझको प्रिय व सभी मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये हैं|सभी में मनुष्य मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं|
विष्ण के ही अवतार कृष्ण भगवतगीता अ०४श्लोक १३ में कहते हैं कि :-

''चतुर्वर्णेन मया स्रष्टं''
अर्थात कृष्ण कहते हैं कि चारो वर्ण की रचना मेरे द्वारा की गयी है|
हरिवंश पुराण के अनुसार :-
''अभिनिर्वर्तिता वर्णाश्चिन्त्यमानेन विष्णुना,,
अर्थात भगवान विष्णु ने चिंतना से चारो वर्णों की उत्पत्ति की|
वेद में वर्णित पुरुष सूक्त के अनुसार :-
ब्राह्मणो मुखमासीद् बाहु: राजन्य:कृत:|
उरुतदस्य यद्वैश्य पदभ्याम् शूद्रो अजायत्|
अर्थात जिस परमात्मरूप पुरुष का ब्राह्मण मुख हैं,क्षत्रिय जिसकी भुजायें से उत्पन्न हैं,जिसका उदर वैश्य हैं ,जिसके पद से शूद्र हुये हैं|

स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है कि जिस राम से समस्त वर्णों की उत्पत्ति हुयी हो,क्या उसका कोई वर्ण विशेष हो सकता है|बुद्धि यह भी विचार करती है कि जब जीव मनुष्य शरीर धारण करता है तो उसका एक वर्ण होता है,परन्तु जब परमात्मा लोक कल्याण हेतु मनुष्य शरीर धारण करता है,अर्थात अवतार लेता है,तो क्या वह किसी वर्ण विशेष की सीमा से आबद्ध होता है या उसके पार|जब इस प्रश्न का गंभीरता पूर्वक विचार किया तो यह पाया कि भगवान राम को यद्यपि शास्त्रों में राजा दशरथ के कुल में जन्म लेने के कारण,क्षत्रिय कहा गया है,परन्तु भगवान राम स्वयं में चारो वर्ण बीज रूप से विद्यमान थे,और चारो वर्ण प्रगट भी थे|वे चारो वर्णों के कर्ता भी थे और प्रतीक भी|वे चारो वर्णो से अतीत और पार भी थे|
मित्रजन,अगली कुछ पोस्टों के माध्यम से यथा संभव आपके समक्ष यह रखा जायेगा कि भगवान राम में चारो वर्ण अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र कैसे थे|और वे चारो वर्ण से अतीत कैसे|

धन्यवाद|

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Lucknow
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