31/10/2022
पैदल पार पथ तो आप सब जानते ही होंगे। वही अपनी जे़ब्रा क्रॉसिंग।सड़क पर बना वह स्थान जो आज लगभग पूरे विश्व में पैदल चलने वालों को सुरक्षित सड़क पार करने की सुविधा प्रदान करता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं इस की शुरुआत कब और कैसे हुई????
31 अक्टूबर 1951 को आधिकारिक रूप से काली सड़क पर सफेद पट्टी के रूप में ज़ेब्रा क्रॉसिंग को पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित तरीके से रोड पार करने का विशिष्ट तरीका बताया गया।
और इस जेब्रा क्रॉसिंग को , जो पैदल यात्रियों को सड़क पार करने की सुरक्षा प्रदान करती है उसे इस रूप में आने तक बहुत लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1930 के दशक में ब्रिटेन में वाहनों की संख्या कम होने के बावजूद सड़क पर हादसों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। अव्यवस्थित यातायात और बढ़ते जाम से पैदल यात्रियों के लिए सड़क पर चलना बहुत कठिन होता जा रहा था।
इस समस्या से निपटने के लिए पहली बार ब्रिटेन में रोड ट्रैफिक एक्ट 1934 की धारा 18 के अंतर्गत पेश किया गया । राजमार्ग संहिता में कहा गया कि सड़क यातायात "जब एक पैदल यात्री क्रॉसिंग पर चला जाता है तो रास्ता देना चाहिए।"
ब्रिटेन से प्रभावित होकर यूनाइटेड किंग्डम और आयरलैंड जैसे अन्य देशों ने भी पैदल सड़क पार करने वाले लोगों की सुरक्षा पर ध्यान दिया।
1930 के दशक में ही यूनाइटेड किंग्डम में बेलीशा बीकन को सड़क सुरक्षा उपाय के रूप में लाया गया। यह लैंप पोस्ट की तरह थे। काली सफेद पट्टी के डिजाइन वाले पतले पोल पर एम्बर ग्लोब में चमकदार नारंगी लाइट लगी रहती थी।
1940 तक आते-आते क्रॉसिंग के डिज़ाइन में सड़क चिन्हों को जोड़ा गया । यह सड़क की सतह पर एक के बाद एक हल्की और एक गाढ़े रंग की पट्टियाँ थीं, जो कंट्रास्ट में होती थीं और देखने में ज़ेबरा के शरीर से मिलती जुलती थी।
इस दौरान अलग-अलग देशों में पैटर्न ,डिजाइन और रंगों को लेकर कई प्रयोग होते रहे।
जेबरा क्रॉसिंग को पहली बार 1949 में यूनाइटेड किंगडम में 1000 स्थानों पर विभिन्न सड़क संकेतों के साथ प्रयोग किया गया।
प्रयोग के विभिन्न स्तरों से गुजरते हुए पाया गया कि सड़क पर काली सफेद पट्टियों वाला पैटर्न सबसे ज्यादा कारगर है । काली सड़क पर लम्बवत बनी समानांतर सफेद पट्टियाँ जो आमतौर पर 40 से 60 सेमी या 16 से 24 इंच चौड़ी होती थीं जो दूर से ही वाहन चालक को स्पष्ट दिखाई देतीं थीं। जिससे उनको अपनी रफ्तार कम करने और सजग रहने का संकेत मिल जाता था। परिणाम स्वरूप दुर्घटनाओं की सम्भावना कम हो जाती थी। और उसी समय से ज़ेबरा की तरह दिखने वाले इस चिन्ह को ज़ेब्रा क्रॉसिंग नाम दिया गया
इस नामकरण की एक विवादित कथा यह भी है कि ब्रिटिश सांसद जेम्सकैलाघन ने 1948 में परिवहन और सड़क अनुसंधान प्रयोगशाला का निरीक्षण करते हुए ,काला और सफेद डिजाइन देख टिप्पणी की थी कि यह जेबरा जैसा दिखता है। तब से इसे से जेब्रा क्रॉसिंग नाम दिया गया।
हमारे देश भारत में ज़ेब्रा क्रासिंग कि कैसे शुरूआत हुई इसकी एक अन्य रोचक कथा है।
हमारे देश में पहली कार 1897 में आई थी॥1930 तक आते आते कई ब्रिटिश नागरिकों के साथ कुछ बहुत खास और शौकीन अमीर भारतीय भी कार रखने लगे थे।
उस समय यातायात के लिए बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी का प्रयोग होता था यह तो हम सब जानते हैं।
लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि
1930 के आसपास बंगाल के कलकत्ता में अंग्रेज ट्रॉन्सपोटेशन के लिए घोड़ागाड़ी के साथ-साथ ज़ेबरा गाड़ी का प्रयोग भी करते थे क्योंकि ज़ेबरा जो कि घोड़े और बैल से बहुत ताकतवर होते थे और उनकी तुलना में बहुत तेज़ी से काम करते थे ।
लेकिन इनके साथ समस्या यह थी कि ये बिल्कुल भी अनुशासित नहीं थे और किसी भी आदेश को नहीं मानते थे॥
जब यह सड़क पर चलते थे तब कार और ट्राम जो भी रास्ते में होता उसपर चढ़ जाते थे।
जिससे लोगों को सावधान करने के लिए ताकि दुर्घटना ना हो ,गाड़ीवान उद्घघोषणा करता चलता था कि सब रास्ते से हट जाओ ज़ेबरा गाड़ी आ रही है।
सड़कों पर जब जेब्रा गाड़ी निकलती तब यातायात रुक जाता और लोग सावधान हो जाते थे ।असुविधाजनक होने के कारण ही इनपर रोक लगा दी गई।
ऐसा माना जा सकता है कि
ज़ेबरा गाड़ी के निकलने पर , यातायात के रुकने को आधार बनाकर ही भारत में ज़ेब्रा क्रासिंग की शुरुआत हुई।
मनीषा कोपल यादव