Dr. Kopal Foundation

Dr. Kopal Foundation Our foundation will spread awareness about ROAD Safety. We are a registered NGO.

'मैं' से 'तू' तक चलते-चलते एक ऐसा मोड़ भी आता है जब मैं ही 'मैं' को खो देता है और 'तू' ही 'तू' रह जाता है़..... डॉ कोपल ...
14/02/2024

'मैं' से 'तू' तक चलते-चलते एक ऐसा मोड़ भी आता है जब मैं ही 'मैं' को खो देता है और 'तू' ही 'तू' रह जाता है़.....
डॉ कोपल फाउन्डेशन
और 🌻बसंत🌻
इनोवेटिव पाठशाला के होनहारों के संग.....

19/02/2023
Dr Kopal Foundation representatives ( Veena Sexsena & Manisha Yadav ) were invited to judge an arts competition organize...
18/02/2023

Dr Kopal Foundation representatives ( Veena Sexsena & Manisha Yadav ) were invited to judge an arts competition organized by Lucknow Universty as part of its Inter Collegiate Youth Festival.
स्वर्णम् अभ्युत्थानम्
It was a pleasure and an honor for Dr Kopal Foundation to be involved. We will continue to work hard for the betterment of our society in various ways.

11/02/2023

जुलाई 2022 में जब हमने बाली और जावा (इंडोनेशिया )जाने का प्रोग्राम बनाया तो अपनी खोजबीन में और कई लोगों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी बताया कि बाली में सड़के बहुत पतली हैं जिससे वहाँ बहुत ज्यादा ट्रैफिक जाम रहता है।जिसके वजह से आपका कीमती समय बर्बाद हो जाता है और आप बाली का ठीक से आनंद नहीं उठा पाते।

इसलिए ज्यादातर लोग वहॉं आसानी से कम बजट में रेंट पर मिल जाने वाली बाइक या स्कूटी से बाली के बीच और अन्य घूमने वाली जगहों का आनंद लेते हैं।
बाली पहुँचने पर हम लोगों ने बाली के बीच, और सभी प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट को देखने के साथ वहाँ कि लोकल लाइफ और शानदार संस्कृति जो हिंदू धर्म से बहुत प्रभावित है को जानने और अनुभव करने का निर्णय लिया और बाली से कुछ रुके।
ट्रैफिक ने कहीं भी खलनायक की भूमिका नहीं निभाई हमने बहुत शांति और सुकून से बाली का आनंद लिया ।
चौराहों पर रेड सिग्नल छोड़कर हमें कहीं भी नहीं रुके।
हमारे अनुभव के आधार पर ट्रैफिक काफी अनुशासित था ।
रेड लाइट सिर्फ 30 से 40 सेकंड के लिए होती थी ‌जल्दी ही ग्रीन सिगनल हो जाता था। कुछ एक्सेप्शन छोड़ कर सभी बाइकर्स और पीछे बैठने वाले भी हेलमेट पहने थे।
अच्छी खासी भीड़ होने के बावजूद सड़कों पर हार्न का शोर शराबा बिल्कुल भी नहीं था।

कभी आगे का गाड़ी रुकने पर या थोड़ा बहुत जाम होने पर कोई अनावश्यक हार्न नहीं बजाता था ।
बल्कि धैर्य से आगे वाली गाड़ी के चलने का इंतजार करता था।
सड़क पतली थीं पर अतिक्रमण कहीं नहीं दिखा ।
और सबसे बड़ी बात कि सभी वाहन बहुत ही अच्छी हालत में थे।
बसें जितनी भी दिखीं सभी एयर कंडीशन थीं। एकदम नई सी दिखती थीं।
हर प्रकार के वाहन चाहे दो पहिया हों या चार पहिया, नंबर प्लेट पर उनके रजिस्ट्रेशन की एक्सपायरी डेट लिखी रहती थी।
सड़कों पर होल्डिंग्स कम ही दिखे।
पतली पहाड़ी सड़कें भी अच्छी थीं।सभी जगह ट्रैफिक सिग्नल और रोड पर सफेद रंग से मार्क किया गया था।
यह भी बताना चाहूँगी कि हमारे सभी ड्राइवरों का व्यवहार बहुत ही सौहार्दपूर्ण था। समय और पैसे को लेकर ना कोई तनाव ना परेशानी।ना टिप को लेकर कोई विशेष आग्रह। पूरे समय हमारे साथ समर्पित।
हो सकता है कि हम भाग्यशाली थे और हमारा ट्रिप शानदार रहा।
कोपल फाउंडेशन क्योंकि ट्रैफिक के क्षेत्र में काम कर रहा है तो इसे आप मेरा विशेष ऑब्जरवेशन भी समझ सकते हैं।लाई 2022 में जब हमने बाली और जावा (इंडोनेशिया )जाने का प्रोग्राम बनाया तो अपनी खोजबीन में और कई लोगों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी बताया कि बाली में सड़के बहुत पतली हैं जिससे वहाँ बहुत ज्यादा ट्रैफिक जाम रहता है।जिसके वजह से आपका कीमती समय बर्बाद हो जाता है और आप बाली का ठीक से आनंद नहीं उठा पाते।

इसलिए ज्यादातर लोग वहॉं आसानी से कम बजट में रेंट पर मिल जाने वाली बाइक या स्कूटी से बाली के बीच और अन्य घूमने वाली जगहों का आनंद लेते हैं।
बाली पहुँचने पर हम लोगों ने बाली के बीच, और सभी प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट को देखने के साथ वहाँ कि लोकल लाइफ और शानदार संस्कृति जो हिंदू धर्म से बहुत प्रभावित है को जानने और अनुभव करने का निर्णय लिया और बाली से कुछ रुके।
ट्रैफिक ने कहीं भी खलनायक की भूमिका नहीं निभाई हमने बहुत शांति और सुकून से बाली का आनंद लिया ।
चौराहों पर रेड सिग्नल छोड़कर हमें कहीं भी नहीं रुके।
हमारे अनुभव के आधार पर ट्रैफिक काफी अनुशासित था ।
रेड लाइट सिर्फ 30 से 40 सेकंड के लिए होती थी ‌जल्दी ही ग्रीन सिगनल हो जाता था। कुछ एक्सेप्शन छोड़ कर सभी बाइकर्स और पीछे बैठने वाले भी हेलमेट पहने थे।
अच्छी खासी भीड़ होने के बावजूद सड़कों पर हार्न का शोर शराबा बिल्कुल भी नहीं था।

कभी आगे का गाड़ी रुकने पर या थोड़ा बहुत जाम होने पर कोई अनावश्यक हार्न नहीं बजाता था ।
बल्कि धैर्य से आगे वाली गाड़ी के चलने का इंतजार करता था।
सड़क पतली थीं पर अतिक्रमण कहीं नहीं दिखा ।
और सबसे बड़ी बात कि सभी वाहन बहुत ही अच्छी हालत में थे।
बसें जितनी भी दिखीं सभी एयर कंडीशन थीं। एकदम नई सी दिखती थीं।
हर प्रकार के वाहन चाहे दो पहिया हों या चार पहिया, नंबर प्लेट पर उनके रजिस्ट्रेशन की एक्सपायरी डेट लिखी रहती थी।
सड़कों पर होल्डिंग्स कम ही दिखे।
पतली पहाड़ी सड़कें भी अच्छी थीं।सभी जगह ट्रैफिक सिग्नल और रोड पर सफेद रंग से मार्क किया गया था।
यह भी जोड़ना चाहूॅंगी कि हमारे सभी ड्राइवरों का व्यवहार बहुत ही सौहार्दपूर्ण था। समय और पैसे को लेकर ना कोई तनाव ना परेशानी।ना टिप को लेकर कोई विशेष आग्रह। पूरे समय हमारे साथ समर्पित।
हो सकता है कि हम भाग्यशाली थे और हमारा ट्रिप शानदार रहा।
कोपल फाउंडेशन क्योंकि ट्रैफिक के क्षेत्र में काम कर रहा है तो इसे आप मेरा विशेष ऑब्जरवेशन भी समझ सकते हैं।

28/01/2023
Dr.Kopal Foundation organized an art and drawing competition on the topic 'traffic and road safety' in which the student...
26/01/2023

Dr.Kopal Foundation organized an art and drawing competition on the topic 'traffic and road safety' in which the students of Basic Vidyalaya,35th Vahini PAC Mahanagar from standard 1 to 8 th participated on 25/1/23 with great zeal & enthusiasm. The basic aim of Kopal foundation is to ensure stopage of road accidents by making the children aware of the traffic rules,so that they may turn out to be proud citizens who are well conversant with the road safety rules.
The children pledged to follow the traffic rules taught to them by Kopal foundation

ना हार की फ़िक्र ना जीत  का गुमान छू लेगें  हम आसमान  ज्ञान का हो रास्ता आत्मविश्वास की चिन्गारीछोटे छोटे प्रयास आज का व...
14/11/2022

ना हार की फ़िक्र ना जीत का गुमान
छू लेगें हम आसमान

ज्ञान का हो रास्ता
आत्मविश्वास की चिन्गारी
छोटे छोटे प्रयास
आज का विश्वास
कल की आस
आशीर्वाद की ज्योति

हर मौसम में खुशी और खुशियां फैलाते ,भगवान की सबसे खूबसूरत रचना बच्चे…
और बच्चों को
बाल दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं

पैदल पार पथ तो आप सब जानते ही होंगे। वही अपनी जे़ब्रा क्रॉसिंग।सड़क पर बना वह स्थान जो आज लगभग पूरे विश्व में पैदल चलने ...
31/10/2022

पैदल पार पथ तो आप सब जानते ही होंगे। वही अपनी जे़ब्रा क्रॉसिंग।सड़क पर बना वह स्थान जो आज लगभग पूरे विश्व में पैदल चलने वालों को सुरक्षित सड़क पार करने की सुविधा प्रदान करता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं इस की शुरुआत कब और कैसे हुई????

31 अक्टूबर 1951 को आधिकारिक रूप से काली सड़क पर सफेद पट्टी के रूप में ज़ेब्रा क्रॉसिंग को पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित तरीके से रोड पार करने का विशिष्ट तरीका बताया गया।

और इस जेब्रा क्रॉसिंग को , जो पैदल यात्रियों को सड़क पार करने की सुरक्षा प्रदान करती है उसे इस रूप में आने तक बहुत लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1930 के दशक में ब्रिटेन में वाहनों की संख्या कम होने के बावजूद सड़क पर हादसों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। अव्यवस्थित यातायात और बढ़ते जाम से पैदल यात्रियों के लिए सड़क पर चलना बहुत कठिन होता जा रहा था।

इस समस्या से निपटने के लिए पहली बार ब्रिटेन में रोड ट्रैफिक एक्ट 1934 की धारा 18 के अंतर्गत पेश किया गया । राजमार्ग संहिता में कहा गया कि सड़क यातायात "जब एक पैदल यात्री क्रॉसिंग पर चला जाता है तो रास्ता देना चाहिए।"

ब्रिटेन से प्रभावित होकर यूनाइटेड किंग्डम और आयरलैंड जैसे अन्य देशों ने भी पैदल सड़क पार करने वाले लोगों की सुरक्षा पर ध्यान दिया।

1930 के दशक में ही यूनाइटेड किंग्डम में बेलीशा बीकन को सड़क सुरक्षा उपाय के रूप में लाया गया। यह लैंप पोस्ट की तरह थे। काली सफेद पट्टी के डिजाइन वाले पतले पोल पर एम्बर ग्लोब में चमकदार नारंगी लाइट लगी रहती थी।

1940 तक आते-आते क्रॉसिंग के डिज़ाइन में सड़क चिन्हों को जोड़ा गया । यह सड़क की सतह पर एक के बाद एक हल्की और एक गाढ़े रंग की पट्टियाँ थीं, जो कंट्रास्ट में होती थीं और देखने में ज़ेबरा के शरीर से मिलती जुलती थी।

इस दौरान अलग-अलग देशों में पैटर्न ,डिजाइन और रंगों को लेकर कई प्रयोग होते रहे।
जेबरा क्रॉसिंग को पहली बार 1949 में यूनाइटेड किंगडम में 1000 स्थानों पर विभिन्न सड़क संकेतों के साथ प्रयोग किया गया।
प्रयोग के विभिन्न स्तरों से गुजरते हुए पाया गया कि सड़क पर काली सफेद पट्टियों वाला पैटर्न सबसे ज्यादा कारगर है । काली सड़क पर लम्बवत बनी समानांतर सफेद पट्टियाँ जो आमतौर पर 40 से 60 सेमी या 16 से 24 इंच चौड़ी होती थीं जो दूर से ही वाहन चालक को स्पष्ट दिखाई देतीं थीं। जिससे उनको अपनी रफ्तार कम करने और सजग रहने का संकेत मिल जाता था। परिणाम स्वरूप दुर्घटनाओं की सम्भावना कम हो जाती थी। और उसी समय से ज़ेबरा की तरह दिखने वाले इस चिन्ह को ज़ेब्रा क्रॉसिंग नाम दिया गया
इस नामकरण की एक विवादित कथा यह भी है कि ब्रिटिश सांसद जेम्सकैलाघन ने 1948 में परिवहन और सड़क अनुसंधान प्रयोगशाला का निरीक्षण करते हुए ,काला और सफेद डिजाइन देख टिप्पणी की थी कि यह जेबरा जैसा दिखता है। तब से इसे से जेब्रा क्रॉसिंग नाम दिया गया।

हमारे देश भारत में ज़ेब्रा क्रासिंग कि कैसे शुरूआत हुई इसकी एक अन्य रोचक कथा है।
हमारे देश में पहली कार 1897 में आई थी॥1930 तक आते आते कई ब्रिटिश नागरिकों के साथ कुछ बहुत खास और शौकीन अमीर भारतीय भी कार रखने लगे थे।
उस समय यातायात के लिए बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी का प्रयोग होता था यह तो हम सब जानते हैं।
लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि
1930 के आसपास बंगाल के कलकत्ता में अंग्रेज ट्रॉन्सपोटेशन के लिए घोड़ागाड़ी के साथ-साथ ज़ेबरा गाड़ी का प्रयोग भी करते थे क्योंकि ज़ेबरा जो कि घोड़े और बैल से बहुत ताकतवर होते थे और उनकी तुलना में बहुत तेज़ी से काम करते थे ।
लेकिन इनके साथ समस्या यह थी कि ये बिल्कुल भी अनुशासित नहीं थे और किसी भी आदेश को नहीं मानते थे॥
जब यह सड़क पर चलते थे तब कार और ट्राम जो भी रास्ते में होता उसपर चढ़ जाते थे।
जिससे लोगों को सावधान करने के लिए ताकि दुर्घटना ना हो ,गाड़ीवान उद्घघोषणा करता चलता था कि सब रास्ते से हट जाओ ज़ेबरा गाड़ी आ रही है।
सड़कों पर जब जेब्रा गाड़ी निकलती तब यातायात रुक जाता और लोग सावधान हो जाते थे ।असुविधाजनक होने के कारण ही इनपर रोक लगा दी गई।

ऐसा माना जा सकता है कि
ज़ेबरा गाड़ी के निकलने पर , यातायात के रुकने को आधार बनाकर ही भारत में ज़ेब्रा क्रासिंग की शुरुआत हुई।
मनीषा कोपल यादव

Dr. Kopal Foundation organized a workshop on Traffic Rules and Road Safety for the students of Primary School, Chandganj...
14/08/2022

Dr. Kopal Foundation organized a workshop on Traffic Rules and Road Safety for the students of Primary School, Chandganj earlier this week

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