Sahara Salary Dues Forum

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This is the official forum of the Employees Welfare Association, representing thousands of former and current employees of Sahara Group companies who have not received salaries, Provident Fund, Gratuity, and other statutory dues since 2014.

11/02/2026

#इसकहानीकोशेयरकरें #सहारासैलरीड्यूज़ #अन्यायकामानवीयचेहरा #न्यायमेंदेरी #कर्मचारीअधिकार #सुप्रीमकोर्ट #देश

11/02/2026

Justice delayed is justice denied
न्याय में देरी अन्याय के बराबर

06/02/2026

एक दशक से न्याय की प्रतीक्षा।।
एक दशक से बिना किसी गुनाह की सजा।।
हमको भी जीने का अधिकार है।।
मैं भारत का एक आम नागरिक हूं जो एक प्राइवेट नौकरी करके अपने और अपने परिवार का भरण पोषण करता है जो सरकार के सारे टैक्स भी समय पर देता है एक आम नागरिक जिसके कंधे पर उसके बूढ़े मां बाप के इलाज दवा आदि की जिम्मेदारी,पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी होती है और आय का एक स्रोत होता है नौकरी और उससे महीने में आने वाली छोटी सी तनख्वाह जिससे वो ये सब मैनेज करता है और एक दिन उसकी कंपनी जिसमें वो कार्यरत था उसके ऊपर केस हो जाता है कंपनी तनख्वाह ये बोल के रोक देती है कि अभी केस चल रहा वो सैलरी देने में असमर्थ है।
जी हां ये कहानी है सहारा इंडिया की उसके एम्पलाई की सहारा ने सरकार और केस का हवाला देके सैलरी रोक दी सरकार ने कानून और जमाकर्ता का हवाला देके कानूनी शिकंजा कस दिया न्यायालय ने अधिक केस होने का हवाला दे के तारीख पे तारीख दे दी पर किसी ने भी सहारा में काम करने वाले कार्यकर्ता का हवाला नहीं दिया न ही उन पे किसी का ध्यान गया चलिए मान लिया कंपनी ने नियम तोड़े कुछ गलत किया तो उसकी जांच करिए दोषी को सज़ा दीजिए उसमें कार्यकर्ता का क्या दोष उसने तो वही किया जो जिम्मेदारी उसे कार्यालय द्वारा दी गई फिर उसको सजा क्यों दी जा रही एक दशक से वो न्याय की प्रतीक्षा कर रहा कि कब न्याय मिले उसकी बकाया सैलरी मिले उसे और उसके हितों को क्यों अनदेखा किया जा रहा उसकी जिंदगी पर पूर्णवीराम क्यों लगा दिया गया उससे उसके मौलिक अधिकार क्यों छीन लिए गए इतनी सजा तो किसी आतंकवादी को भी नहीं दी जाती ये देश तो उसको भी बिरयानी खिलाता है तो हम सबके मुंह से क्यों सूखी रोटी भी छीन ली गई हम भी इसी देश के नागरिक है हमसे ये सौतेला व्यवहार क्यों क्यों हमको जीते जी मार दिया गया आखिर कब तक हमारा यूं ही शोषण होता रहेगा कब तक हम अपने हक का इंतजार करते रहेंगे हम किसी से कोई भीख नहीं मांग रहे हम अपना हक मांग रहे हमको तारीख नहीं न्याय चाहिए एक दशक का इंतजार कम नहीं होता ऐसी हालत में यदि न्यायालय को लगता है हम सब सहारियन दोषी है तो फांसी दे दे पर यूं तिल तिल न मारे हमारे कितने ही साथी मजबूर होके खुदकुशी कर लिए पर हमारे देश की सरकार और न्याय व्यवस्था संवेदनहीन हो गई उसे ये सब दिखाई सुनाई नहीं देता
यदि ऐसा ही चला तो अभी और कार्यकर्ताओं की बलि चढ़ेगी इस न्याय की वेदी पर इसलिए सरकार और सर्वोच्च न्यायालय से अपील है कि हमको न्याय दीजिए हमको हमारे हक दिलवाए ताकि इस देश के नागरिकों का भरोसा आप पर बना रहे
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06/02/2026

#कर्मचारीअधिकार #न्यायमेंदेरी #सुप्रीमकोर्ट #सहारासैलरीड्यूज़ #अन्यायकामानवीयचेहरा #इसकहानीकोशेयरकरें #देश

06/02/2026
06/02/2026

“जूता निकालकर मारो…” कर्मचारियों के सामने भावुक ड्रामा

05/02/2026

# #देश के प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट घरानों में गिने जाने वाले सहारा समूह से जुड़ा
एक और हृदयविदारक मामला सामने आया है।
लंबे समय से सहारा से जुड़े कर्मचारी
अनिल कुमार मिश्रा
ने वेतन न मिलने और लगातार आर्थिक तंगी से टूटकर
अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
यह केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है…
यह एक पूरे सिस्टम की असफलता का प्रमाण है।

सूत्रों के अनुसार —
• कई महीनों से वेतन नहीं मिला
• घर का किराया बकाया था
• बच्चों की फीस रुकी हुई थी
• बिजली का बिल बकाया
• इलाज तक के पैसे नहीं थे
घर में रोज़ खाली थाली…
और बाहर समाज के सवाल…
“कब मिलेगा पैसा?”
“कब करोगे फीस जमा?”
पड़ोसियों और सहकर्मियों के मुताबिक —
“अनिल जी बहुत शांत हो गए थे…”
“अक्सर कहते थे — अब कुछ नहीं बचा…”
“आँखों में डर और बेबसी साफ दिखती थी…”
वह एक कर्मचारी नहीं थे —
वह एक पिता थे,
एक बेटे थे,
एक पति थे…
और एक मेहनतकश इंसान थे।
• क्या यह सिस्टम द्वारा की गई हत्या?
• क्या किसी कॉर्पोरेट का इतना बड़ा होना
उसे कानून से ऊपर बना देता है?
• क्या मेहनत करने वाले इंसान की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं?
आज यह केवल सहारा की बात नहीं है,
यह हर उस कर्मचारी की बात है
जो वेतन न मिलने पर भी
खामोशी से काम करता है।
अगर आज चुप रहे —
तो कल सूची में
किसी और का नाम होगा।
अनिल कुमार मिश्रा जी
आपकी पीड़ा इस देश की अंतरात्मा का सवाल है।
आपका जाना एक इंकलाब की दस्तक है।
यह कोई खबर नहीं…
यह एक चेतावनी है…
अगर सिस्टम नहीं जागा,
तो यह आँकड़े नहीं,
लाशों की गिनती बन जाएगी।
हम पूछते रहेंगे —
न्याय कब मिलेगा?
जवाब कौन देगा?
#अन्यायकामानवीयचेहरा #सुप्रीमकोर्ट #न्यायमेंदेरी #कर्मचारीअधिकार #इसकहानीकोशेयरकरें

05/02/2026

आज रात में मैं एक ATM पे गया तो अचानक मुझे लगा कि कोई मुझे देख कर असहज हो रहा है तो ध्यान उधर गया देखा तो सहारा के एक वरिष्ठ खड़े थे जो उस ATM पे सिक्योरिटी की ड्यूटी कर रहे थे मै भी थोड़ा असहज हुआ क्योंकि वो
सहारा में मैनेजर थे और यहां सिक्योरिटी गार्ड के रूप में उनको देखा
खुद को नियंत्रित करके उनका हाल पूछा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए और सबसे पहले उन्होंने मुझसे ये बोला कि मैं उनकी इस दशा को किसी को न बताऊं क्योंकि समाज में जो उनकी जो प्रतिष्ठा बनी है वो न खराब हो इसलिए मैं उनका नाम यहां नहीं बता रहा फिर उन्होंने अपना दुख बताया कि उनकी पत्नी को कैंसर है और दो बेटियों की शादी करनी है सहारा ने उनको 58 साल में ही रिटायर कर दिया 2014 से जो उनका वेतन नहीं मिला जो कि शायद करोड़ के आसपास होगा न वो दिया न ही ग्रेच्युटी न अन्य भुगतान अपनी पत्नी के इलाज के लिए उन्होंने कार्यालय में एक प्रार्थना पत्र भी दिया था कि कंपनी उनके बकाया वेतन से ही उनको कुछ पैसा दे दे जिससे वो अपनी पत्नी का इलाज करा सके उसका भी कुछ नहीं हुआ तो मजबूरी में उनको ये काम करना पड़ रहा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा उसकी फीस भी भरनी है और उम्र के इस पड़ाव पे दूसरी नौकरी कहा ही मिलेगी इसलिए जीने के लिए उनको ये करना पड़ रहा
ये कहानी शायद केवल उनकी नहीं कमोवेश हम सब सहारियन की है सहारा ने हम सबको ही ऐसे ही मुकाम पर लाके खड़ा कर दिया है और हम सब की बस एक ही उम्मीद शेष है कि हमारे जो भी देय लंबित है सर्वोच्च न्यायालय या सरकार वो दिला दे
ये कोई कहानी नहीं सच है और गौर से पढ़ेंगे तो आपको लगेगा शायद ये आपकी अपनी दशा से मिलती जुलती ही है या आपकी ही है🙏
#सहारासैलरीड्यूज़ #अन्यायकामानवीयचेहरा #कर्मचारीअधिकार #सुप्रीमकोर्ट

04/02/2026

*Urgent Humanitarian Appeal* for Intervention in the Plight of Sahara Employees in CONMT.PET.(C) NO. 1820-1822/2017. (I.A.) No. 283346/2025 & (I.A) No. 258857/2025

Respected Hon’ble Chief Justice of India,

With profound respect and a sense of utter desperation, we, the former and current employees of the Sahara Group, appeal to your compassionate conscience to personally consider the extreme and protracted hardship we have endured for over a decade.

While the legal proceedings in the captioned SEBI-Sahara matter continue, our lives have been systematically dismantled. Our situation is not merely one of delayed salaries, but of a complete abandonment of legal and moral obligations by the Sahara Group, leading to a grave humanitarian crisis:

1. Forced Retirements & Illegal Terminations: The Group arbitrarily imposed a retirement age of 58 years and removed a large number of employees without clearing their long-pending salary dues, Provident Fund, Gratuity, or TDS liabilities. This has thrust experienced, loyal employees into sudden financial ruin during their most vulnerable years.

2. Coerced Resignations Without Compensation: Many employees were forced to resign under duress without any settlement, forfeiting all rightful claims to their unpaid salaries, accrued PF, gratuity, and other statutory benefits.

3. Systemic Withholding of Statutory Dues: The non-payment of the employer's PF contribution, TDS, and gratuity has not only deprived us of our retirement security but also exposed us to legal and financial penalties from government authorities, compounding our distress.

4. Livelihoods Destroyed, Future Extinguished: As a consequence of these actions, we find ourselves on the road, struggling for basic survival. At this age, finding new employment is nearly impossible. Our lifelong hard-earned savings, meant for our children's education, healthcare, and family welfare, have been obliterated. We cannot afford medical treatment, our children's futures are compromised, and we have been unable to perform essential family duties like the marriage of our sons and daughters.

We have filed an Intervention Application (I.A.) to formally place our plea before the Hon’ble Court. However, the daily reality of destitution compels us to seek your benevolent and direct attention to this urgent human tragedy unfolding alongside the legal process.

We earnestly pray that Your Honour, in your wisdom and kindness, may be pleased to intervene and direct the creation of a swift and transparent mechanism for the verification and immediate disbursement of our legitimate dues from the available funds under the Court's supervision.

Our only hope for justice and survival now rests in your compassionate intervention.

With deepest reverence and hope,
Sincerely,
Employees Welfare Association

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Lucknow
226013

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