By joining this forum the member organizations may collectively be able to pay their functionaries for social work. मतभेद ही व्यक्ति के जीवन में, स्थानीय समाज और संपूर्ण विश्व में अशांति का मूल कारण है। इसीलिए कहा गया है- मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ने। मतभेद के कारण एक मत के लोग समूह बना लेते हैं। अलग-अलग समूह आपस में लड़ाई झगड़ा और युद्ध करने लगते हैं। मतभेदों और विचारधाराओं के बीच फिलामेंट की तरह प्रब
ंधन ही विश्व में शांति और सर की समृद्धि सुनिश्चित कर सकता है।
मानव जीवन में मौत किसी को पसंद नहीं है किंतु चूंकि उसे नष्ट नहीं जा सकता। इसलिए उसके साथ समन्वय और संतुलन बनाकर जीवन जीना समझदारी माना जाता है। जिस प्रकार व्यक्ति को अपनी विचारधारा अपनी अंतरात्मा की रूहानी आवाज और समाज के लिए हितकर आवाज महसूस होती है, उसी प्रकार वे विचारधाराएं भी अंतरात्मा की रूहानी आवाज और समाज के लिए हितकर उन लोगों को महसूस होती है जो विचारधाराएं अपने को पसंद नहीं होतीं, या हमें शत्रु विचारधारा जैसी महसूस होती हैं। प्रकृति दो अलग-अलग लिंगों के इंसान पैदा करती है जो शारीरिक बनावट में परस्पर विपरीत दिखाई पड़ते हैं। किंतु फिर भी एक दूसरे के पूरक होते हैं। उसी प्रकार प्रकृति दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लोगों को भी पैदा करती है, जो परस्पर शत्रु भले ही दिखाई पड़े, किंतु एक दूसरे के पूरक होते हैं। चाहे शारीरिक बनावट में भेद हो, चाहे मानसिक बनावट में भेद हो, दोनों ही भेद व्यक्ति के अंदर मौजूद कुछ विशेष हारमोंस और जींस के कारण होते हैं। अपने अंदर मौजूद जींस और हारमोंस को सही कहना और दूसरे के अंदर मौजूद जींस और हारमोंस को गलत कहना उचित नहीं है। अपने शरीर में मौजूद जींस और हारमोंस पर जिस प्रकार अपना वश नहीं है, उसी प्रकार दूसरे व्यक्ति के शरीर में मौजूद जींस और हारमोंस पर उस व्यक्ति का अपना वश नहीं है। इसलिए अपने को संत समझना और अपने विरोधी विचारधारा के प्रचारक को अपराधी समझना उचित नहीं है। जब अपनी विचारधारा और अपनी विरोधी विचारधारा दोनों के पीछे प्रकृति के नियमों का हाथ है तब दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच समन्वय और संतुलन बना कर जीना ही उचित है।
दलितों, महिलाओं और समलैंगिकों के अधिकारों की वकालत करने वालों को पहले पथभ्रष्ट, अनैतिक, समाज को तोड़ने वाले, अज्ञानी, समाजद्रोही, असामाजिक तत्व, साजिशकर्ता, दलितों, महिलाओं और समलैंगिक समुदायों के मन को उकसाने वाले, समाज व्यवस्था को तोड़ने वाले, पश्चिमी देशों के एजेंट, भारतीय सभ्यता और संस्कृत के शत्रु… आदि नकारात्मक शब्दों से संबोधित किया जाता था। किंतु समय के क्रम में दलितों, महिलाओं और समलैंगिकों को उनके आंशिक अधिकार मिल गए। इन घटनाओं ने यह साबित किया कि आज भी जब समाज के बहुत लोग एक ही विचारधारा पर आधारित कोई एक ही मांग करते हैं और उनको अज्ञानी, समाज द्रोही, अनैतिक और साजिशकर्ता … कहकर रोका जाता है, तो यह रोकने वालों का ही अज्ञान है। जब किसी एक व्यक्ति की विचारधारा बहुत से लोगों की विचारधारा बन जाए तो यह समझना चाहिए कि वह प्रकृति द्वारा पैदा की गई विचारधारा है। यह किसी की साजिश नहीं है। धरती के, समाज के और सरकार के संसाधनों में इन सभी तरह की विचारधाराओं को हिस्सेदारी मिलना चाहिए।