Koshish

Koshish “Koshish” transforming lives of Poor through education . This NGO is meant for helping the poor and needy students, downtrodden section of the society.

14/04/2026

🚨 Coaching आपको पढ़ा सकती है… लेकिन success का फैसला hostel के कमरे में होता है।
हर parent यही सोचता है— “मैंने best coaching में admission करा दिया… अब सब ठीक है।” लेकिन सच थोड़ा अलग है… बच्चा दिन के सिर्फ़ 6–7 घंटे coaching में रहता है, बाकी के 18 घंटे वो hostel में अकेला होता है। और उन्हीं 18 घंटों में तय होता है कि वो revision करेगा या नहीं, homework पूरा करेगा या नहीं, mobile में खो जाएगा या mentally strong रहेगा।
धीरे-धीरे एक chapter छूटता है… फिर दूसरा… फिर confidence… और जब तक parents को पता चलता है— बच्चा already पीछे जा चुका होता है। फिर शुरू होता है coaching बदलना, teacher बदलना… लेकिन असली problem कहीं और थी— environment में।
👉 Remember: Coaching can only teach, but a good place makes you practice. इसलिए सही coaching के साथ ज़रूरी है सही system, discipline और monitoring— ऐसा place चुनिए जहाँ बच्चा सिर्फ़ पढ़े नहीं, बल्कि रोज़ track हो, guide हो और push हो।

10/04/2026

अभी हाल ही में काउंसलिंग के दौरान कुछ ऐसे बच्चों से मिला, जो क्लास 10 से 11 में जा रहे थे और पिछले 2 साल से (क्लास 9–10 से) कोचिंग ले रहे थे। इन बच्चों ने डमी एडमिशन ले रखा था, इसलिए स्कूल जाना बंद था और उनकी कोचिंग शाम के समय होती थी। पूरा दिन उनके पास “अपने हिसाब से पढ़ने” के लिए था।
लेकिन असली समस्या पढ़ाई नहीं, उनकी दिनचर्या थी। सुबह कोई निश्चित समय नहीं — 10–11 बजे उठना, न खाने का टाइम तय, न सोने का। रात देर तक मोबाइल और लैपटॉप पर पढ़ाई के नाम पर जागना, और पूरा रूटीन बिखर जाना।
दरअसल, यह समस्या संयोग नहीं बल्कि एक तरह से design flaw बन चुकी है — जहां क्लास 9–10 के बच्चों के पास कोई structured morning routine ही नहीं होता। जब सिस्टम ही सुबह के समय को खाली छोड़ देता है, तो अनुशासन धीरे-धीरे खत्म होना तय है।
मैं किसी कोचिंग को दोष नहीं दे रहा, लेकिन parents से बस एक आग्रह है — डमी + evening coaching चुनते समय ये जरूर देखें कि बच्चे का daily routine balanced रहे। क्योंकि सुबह का सही उपयोग ही लंबे समय में सफलता की असली नींव बनाता है।

A birthday done right. 🚴‍♂️✨Celebrating Gauransh’s 17th birthday by cycling 17 kms together — full of energy, discipline...
07/04/2026

A birthday done right. 🚴‍♂️✨

Celebrating Gauransh’s 17th birthday by cycling 17 kms together — full of energy, discipline, and purpose.

🎉 First birthday of this season at Crianza!
Gauransh, JEE aspirant from Mathura, leading by example.

Happy Birthday! 🚀

29/03/2026

कुछ दिन पहले काउंसलिंग के दौरान एक पेरेंट अपने बेटे को लेकर मेरे पास आए। उनका बेटा घर बैठकर NEET की ऑनलाइन तैयारी कर रहा था। वह किसी ऑनलाइन कोचिंग से पढ़ता था और नियमित टेस्ट भी देता था। पेरेंट्स के अनुसार, वह हर टेस्ट में 650–700 के आसपास नंबर ला रहा था।
लेकिन जब उसने असली NEET परीक्षा दी, तो उसके सिर्फ़ 350–400 नंबर ही आए। पेरेंट्स बहुत परेशान थे। उनका मानना था कि परीक्षा वाले दिन बच्चे की तबियत खराब हो गई थी, इसलिए उसके नंबर कम आए।
उन्होंने अगले साल फिर से तैयारी शुरू करवाई—इस बार भी ऑनलाइन। और हैरानी की बात यह थी कि इस बार भी उसके ऑनलाइन टेस्ट में 650–750 तक नंबर आ रहे थे। लेकिन पेरेंट्स के मन में कहीं न कहीं एक संशय बना हुआ था, इसलिए वे उसे लेकर मेरे पास आए।
मैंने बच्चे से 10–15 मिनट बात की, कुछ बेसिक कॉन्सेप्ट पूछे… और वहीं मुझे समझ आ गया कि कुछ गड़बड़ है।
मैंने पेरेंट्स से कहा—
“आप अगला ऑनलाइन टेस्ट घर पर मत दिलवाइए, इसे मेरे यहाँ बैठाकर टेस्ट दिलवाइए।”
पेरेंट्स मान गए, लेकिन बच्चा तैयार नहीं था। जैसे-तैसे समझाकर उसे मेरे पास टेस्ट देने के लिए लाया गया।
जब वह टेस्ट दे रहा था, मैंने अपने स्टाफ को उसके पीछे खड़ा कर दिया—पूरे समय।
और जो रिज़ल्ट आया… वह चौंकाने वाला था।
जो बच्चा लगातार 650–700 नंबर ला रहा था, उसी के नंबर गिरकर 300 के आसपास आ गए।
अब तस्वीर साफ थी।
मैंने पेरेंट्स को समझाया—
“आपका बच्चा ऑनलाइन टेस्ट ईमानदारी से नहीं दे रहा था। इसलिए उसका सही असेसमेंट कभी हो ही नहीं पाया। असली स्तर वही है जो आज सामने आया है।”
यह सिर्फ़ उस बच्चे की कहानी नहीं है…
ऐसे कई बच्चे हैं जो घर पर ऑनलाइन तैयारी करते हुए अनजाने में या जानबूझकर गलत तरीके अपनाते हैं।
समस्या नंबर कम या ज्यादा आने की नहीं है…
समस्या है “गलतफहमी” में जीने की।
अगर आपको अपने बच्चे की सही स्थिति जाननी है, तो:
उसे ऑफलाइन टेस्ट जरूर दिलवाइए
टीचर्स से मिलवाइए
उसका वास्तविक असेसमेंट करवाइए
क्योंकि चयन हो या न हो…
लेकिन सच्चाई जानना बहुत जरूरी है।

27/03/2026

🚨 हर 6वाँ बच्चा फेल… क्या हम सच देखना चाहते हैं?

कोटा जैसे कोचिंग हब्स में last year का कक्षा 12 का परिणाम एक चेतावनी की घंटी है। JEE और NEET की तैयारी कर रहे लगभग 16% छात्र फेल (या कम्पार्टमेंट) हो गए हैं। कोचिंग संस्थान चाहें तो सटीक आँकड़े साझा कर सकते हैं, लेकिन अफ़सोस की बात है कि केवल टॉपर्स की तस्वीरें ही दिखाई जाएँगी। ध्यान इस बात पर ज्यादा रहता है कि कितने छात्रों ने JEE में 100 पर्सेंटाइल स्कोर किया। ज़रा सोचिए — JEE या NEET की तैयारी कर रहा एक छात्र कक्षा 12 बोर्ड में फेल हो रहा है। यह हर 6 में से 1 छात्र के साथ हो रहा है जो कोचिंग का हिस्सा है। लोग मुझे यह लिखने के लिए नापसंद करेंगे क्योंकि यह एडमिशन का समय है, और मुझे अन्य शहरों या अन्य कोचिंग के आँकड़ों की जानकारी नहीं है, इसलिए मैं उस पर टिप्पणी नहीं कर सकता।

असल वजह क्या है?
कक्षा 11 में एक भी सब्जेक्टिव टेस्ट नहीं होता। कक्षा 11 के बेसिक टॉपिक्स जैसे त्रिकोणमिति और कैल्कुलस, जो कक्षा 12 की नींव बनाते हैं, कमजोर रह जाते हैं। इसी तरह जो छात्र फिजिक्स में मैकेनिक्स को अच्छे से नहीं समझ पाता, वह कक्षा 12 में संघर्ष करता है। कक्षा 12 में भी कोचिंग में सब्जेक्टिव टेस्ट बहुत देर से शुरू होते हैं। बोर्ड जैसी लिखने की आदत कभी विकसित ही नहीं हो पाती।

छात्रों को कक्षा 11 की वार्षिक परीक्षा देने तक के लिए प्रेरित नहीं किया जाता। इसका परिणाम यह होता है कि parents और छात्र दोनों ही अंधेरे में रहते हैं। न कोई वास्तविक अंतिम परीक्षा होती है, और जो परीक्षा के पेपर और कॉपियाँ घर भेजी जाती हैं, वे सिर्फ “fill up” के लिए होती हैं — छात्र अक्सर ChatGPT जैसी मदद से answer sheet भर देते हैं। लगभग 90% कोचिंग छात्रों के लिए कक्षा 11 की परीक्षा इसी तरह एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। दुखद बात यह है कि सच्चाई और चेतावनी कभी सामने आती ही नहीं।

इसे ऐसे समझिए — जैसे किसी को शुगर की समस्या हो, लेकिन कभी शुगर टेस्ट ही न कराया जाए और हम मान लें कि सब ठीक है। फिर अचानक कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा आती है और शुगर लेवल खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका होता है। अगर समय पर टेस्ट हुआ होता, तो सुधार की गुंजाइश थी। यही हाल हमारे छात्रों का है। जिन स्कूलों में कक्षा 12 में लगभग 20% छात्र फेल हो जाते हैं, वहीं कक्षा 11 में एक भी छात्र फेल नहीं होता। अगर पिछले 5 साल का कोई भी रैंडम सैंपल लेकर कक्षा 11 और 12 के मार्कशीट की तुलना की जाए, तो सच्चाई साफ दिख जाएगी।

👉 अंत में parents से निवेदन है — इस पर जरूर ध्यान दें। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी हर छठा छात्र फेल हो रहा है।

26/03/2026

क्या आप अपने बच्चे के स्कूल से संतुष्ट हैं? 🤔

कानून साफ़ हैं—नाबालिगों को सिगरेट/शराब बेचना अपराध है, सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान प्रतिबंधित है।लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ...
19/12/2025

कानून साफ़ हैं—नाबालिगों को सिगरेट/शराब बेचना अपराध है, सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान प्रतिबंधित है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है।

यह तस्वीर राजीव नगर रोड, Country Inn के ठीक सामने की है।
शाम होते ही यहाँ खुलेआम छात्रों को धूम्रपान करते देखा जा सकता है। सड़क किनारे लगी ये दुकानें ज़्यादातर अवैध अतिक्रमण हैं। दुकानों के सामने बेतरतीब वाहन पार्किंग होती है, जिससे लगभग 80 फ़ुट चौड़ी सड़क शाम के समय 20 फ़ुट रह जाती है। नतीजा—ट्रैफिक जाम, पैदल चलने वालों की परेशानी और सुरक्षा जोखिम।

सवाल यह नहीं है कि कानून है या नहीं।
सवाल यह है—लागू कौन करेगा?
अगर रोज़ाना यह सब दिख रहा है, तो निगरानी कहाँ है?

यह सिर्फ़ ट्रैफिक या अतिक्रमण का मुद्दा नहीं,
यह छात्रों के स्वास्थ्य, सार्वजनिक व्यवस्था और शहर की ज़िम्मेदारी का सवाल है।

अब ज़रूरत है दिखावटी नियमों की नहीं,
स्थायी कार्रवाई और जवाबदेही की।

🎉 Happy Birthday Siddhant 🎉Crianza परिवार की ओर से हमारे होनहार NEET aspirant Siddhant को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!...
22/11/2025

🎉 Happy Birthday Siddhant 🎉

Crianza परिवार की ओर से हमारे होनहार NEET aspirant Siddhant को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
Siddhant एक smart, active, intelligent और एकदम all-rounder बच्चा है — पढ़ाई में focused, खेलों में हमेशा आगे और SRG बैच का एक disciplined छात्र।

उनकी बहन भी NEET aspirant हैं और SRG बैच की ही मेहनती छात्रा हैं।
Crianza, Kota का एक co-ed, disciplined और academically supportive hostel, Siddhant और उनकी बहन—दोनों की मेहनत और उन्नति पर गर्व करता है।

भगवान करे नया साल Siddhant के लिए सफलता, ऊर्जा और खुशियों से भरा हो।
Happy 16th Birthday, Champ! 🎂✨

📚 बच्चों का पढ़ना बंद, पैरेंट्स के पास समय नहीं!एक चिंताजनक सच्चाई जो इस रिपोर्ट से सामने आई है।Crianza में हमारा मानना ...
05/06/2025

📚 बच्चों का पढ़ना बंद, पैरेंट्स के पास समय नहीं!
एक चिंताजनक सच्चाई जो इस रिपोर्ट से सामने आई है।

Crianza में हमारा मानना है —
हर विषय की जड़ होती है भाषा, और भाषा का आधार है पढ़ना।
चाहे साइंस हो या मैथ्स — जब तक पढ़ने की आदत मजबूत नहीं होगी, समझ गहराई तक नहीं जाएगी।

🧒 कक्षा 6 से 10 तक के बच्चों के साथ हम नियमित रूप से पढ़ने की आदत को विकसित करने के लिए सचेत प्रयास करते हैं।

📖 किताबों से दोस्ती, सोच और समझ की असली शुरुआत है।

🌳⛅ मौसम सुहाना हो और साथ हो प्यारे बच्चे तो क्या कहना! 🎒😄Crianza के बच्चों ने लिया छोटा सा आउटडोर ब्रेक —📍मंदिर दर्शन, प...
05/06/2025

🌳⛅ मौसम सुहाना हो और साथ हो प्यारे बच्चे तो क्या कहना! 🎒😄
Crianza के बच्चों ने लिया छोटा सा आउटडोर ब्रेक —
📍मंदिर दर्शन, पार्क में मस्ती, और मौसम के संग खूब एंजॉय किया!

📸 जब पढ़ाई और अनुशासन के साथ ज़िंदगी में थोड़ी मस्ती भी मिले — तभी बनता है संतुलन।
हर पल की यादें बन रही हैं यहां, Crianza में! 💚

03/03/2025

बचपन में चित्रहार का इंतजार रहता था, पूरे सप्ताह दिन गिना करते थे। आज के ज़माने में, जब सब चीज़ें आपके मोबाइल और टीवी पर उपलब्ध हैं, तो किसी चीज़ का इंतजार करने की जरूरत ही नहीं रही। लेकिन उस इंतजार का एक अलग ही मज़ा था, उससे सीख भी मिलती थी, और सहनशीलता (रेसिलिएंस) भी विकसित होती थी। पहले सब कुछ बहुत natural था—चीज़ें कम थीं, विकल्प बहुत ही सीमित थे, इसलिए ज़िंदगी बहुत ही सरल थी।

डिप्रेशन, एंग्जायटी और मोटापा जैसी समस्याएँ बच्चों में कभी देखने को नहीं मिलती थीं। आजकल तो इन चीज़ों को नियंत्रित करने के लिए आर्टिफिशियल scarcity create पड़ती हैं, क्योंकि हर चीज़ फिंगरटिप्स पर मौजूद है। यहाँ तक कि 10 मिनट डिलीवरी ऐप्स ने तो प्लानिंग की जरूरत भी खत्म कर दी है—जब चाहो, जहाँ चाहो, कुछ भी मंगवा सकते हो।

मोबाइल का असर सिर्फ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि बच्चों की सामाजिक दक्षताओं (सोशल स्किल्स) पर भी पड़ रहा है। पहले शादी-पार्टियों में बच्चे आपस में बातें करते या छोटे-मोटे काम में मदद करते दिखते थे, लेकिन अब वे सिर्फ मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। कई जगहों पर तो टेबल पर पिता मोबाइल पकडे होते हैं और माँ बच्चे के मुँह में खाना ठूँस रही होती है, जबकि बच्चा बिना ध्यान दिए बस मोबाइल स्क्रीन देखे जा रहा होता है—उसे तो यह भी नहीं पता कि वह क्या खा रहा है!

कुछ दिन पहले एक परिचित का फ़ोन आया। उनकी पोस्टिंग बाहर थी और उनकी पत्नी बच्चे की पढ़ाई की वजह से कोटा में रुकी हुई थीं। वे पत्नी को कुछ दिनों के लिए अपनी पोस्टिंग वाली जगह बुलाना चाहते थे, लेकिन एक महीने के लिए बच्चे की पढ़ाई नहीं छुड़वा सकते थे। निर्णय लिया गया कि बच्चा एक महीने के लिए Crianza में रहेगा।

बच्चा वहाँ एक महीने बहुत अच्छे से रहा और फिर चला गया। कुछ समय बाद उन्होंने फ़ोन करके शुक्रिया अदा किया। हमने Crianza में लाइव CCTV एक्सेस माता-पिता को उपलब्ध करा रखा है। वे रोज़ अपने बच्चे को खाना खाते हुए देखते थे और बहुत खुश होते थे कि वह बिना मोबाइल देखे खाना खा रहा था। उनका कहना था कि उन्होंने अपने बच्चे को कभी बिना मोबाइल के खाते हुए नहीं देखा था! हमें तो इसका अंदाज़ा भी नहीं हुआ और न ही बच्चे ने कोई नखरे दिखाए।

पूरे हफ्ते बच्चों पर स्मार्टफोन की पाबंदी रहती है, लेकिन रविवार शाम को उन्हें एक घंटे के लिए स्मार्टफोन दिया जाता है और उसके बाद उनकी पसंद की मूवी दिखाई जाती है। मूवी के लिए हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों के विकल्प होते हैं—जिसे जो देखना हो, वह देख सकता है। इसे लेकर भी बच्चों में बहुत उत्सुकता होती है और वे पूरी तैयारी के साथ इस पल का इंतजार करते हैं। कोशिश करते हैं कि कोई ऐसा काम न करें जिससे मूवी कैंसल हो जाए।

यही तो बचपन है! जब सब चीज़ें बिना माँगे और बिना किसी प्रयास के मिलने लगती हैं, तो उनकी कद्र ही खत्म हो जाती है। तभी तो कहा जाता है—चाहे आपके पास कितना भी पैसा हो, बच्चों को थोड़ा अभाव में पालिए।

13/01/2025

कीपैड फोन लेने वाले बच्चों के चयन की संभावना अधिक होती है। पिछले साल पाँच ऐसे बच्चे थे जिन्होंने IIT की परीक्षा दी थी। इनमें से तीन बच्चे विभिन्न रैंक पर IIT में चयनित हो गए, जबकि दो बच्चे चयनित नहीं हो पाए। इनमें से एक बच्चे की अवधारणाएँ (कॉन्सेप्ट) कमजोर थीं, जबकि दूसरा बच्चा अच्छा होने के बावजूद चयनित नहीं हो पाया।

हर मोटिवेशनल सेशन में यह बताया जाता है कि ऑफलाइन कोचिंग में स्मार्टफोन या लैपटॉप की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी बच्चों को ये सुविधाएँ दिला दी जाती हैं। ये पाँचों बच्चे जब Crianza में आए, तो बिना स्मार्टफोन के बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। यदि उन्हें कोई अवधारणा समझ में नहीं आती थी, तो वे यहाँ के शिक्षकों से चर्चा कर लेते थे। कंप्यूटर लैब का भी सीमित उपयोग कर सकते थे। कभी-कभी यूट्यूब पर थोड़ा बहुत मनोरंजन भी हो जाता था।

लेकिन चौथे बच्चे का रवैया अलग था। वह कोचिंग के अपने दोस्तों से बहुत प्रभावित रहता था, जो हॉस्टल में रहते थे और जहाँ मोबाइल पर कोई नियंत्रण नहीं था। यह चीज़ उसे बहुत आकर्षित करती थी। वह अपने पेरेंट्स से टैब के लिए बहुत ज़िद करता था। अन्य बच्चे भी कई बार अपने माता-पिता से ज़िद करते थे, लेकिन उनके माता-पिता हमेशा कहते थे, "नीलेश सर कहेंगे तो दिलवा देंगे।"

आखिरकार, पेरेंट्स ने उसे टैब दिलवा ही दिया, लेकिन धीरे-धीरे उसका उपयोग बढ़ता गया। व्हाट्सएप पर नोटिस आने लगे, और फिर वह क्लास में भी टैब ले जाने लगा। बहाना था कि शिक्षक तेजी से पढ़ाते थे, इसलिए वह नोट्स की तस्वीरें लेने लगा, लेकिन वे तस्वीरें टैब में ही रह गईं, कभी कॉपी में नहीं आईं।

यहाँ रोज़-रोज़ उसे टैब को लेकर हमारा रोकना-डाँटना उसे अच्छा नहीं लगा, इसलिए वह ऐसी जगह रहने चला गया जहाँ कोई रोक-टोक नहीं थी। और परिणाम वही हुआ जिसकी अपेक्षा थी—उसके अंक अच्छे नहीं आए।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी एक बड़ा डिजिटल त्याग माँगती है। जो माता-पिता और बच्चे इसे समझ जाते हैं, वे सफल हो जाते हैं।

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