03/03/2025
बचपन में चित्रहार का इंतजार रहता था, पूरे सप्ताह दिन गिना करते थे। आज के ज़माने में, जब सब चीज़ें आपके मोबाइल और टीवी पर उपलब्ध हैं, तो किसी चीज़ का इंतजार करने की जरूरत ही नहीं रही। लेकिन उस इंतजार का एक अलग ही मज़ा था, उससे सीख भी मिलती थी, और सहनशीलता (रेसिलिएंस) भी विकसित होती थी। पहले सब कुछ बहुत natural था—चीज़ें कम थीं, विकल्प बहुत ही सीमित थे, इसलिए ज़िंदगी बहुत ही सरल थी।
डिप्रेशन, एंग्जायटी और मोटापा जैसी समस्याएँ बच्चों में कभी देखने को नहीं मिलती थीं। आजकल तो इन चीज़ों को नियंत्रित करने के लिए आर्टिफिशियल scarcity create पड़ती हैं, क्योंकि हर चीज़ फिंगरटिप्स पर मौजूद है। यहाँ तक कि 10 मिनट डिलीवरी ऐप्स ने तो प्लानिंग की जरूरत भी खत्म कर दी है—जब चाहो, जहाँ चाहो, कुछ भी मंगवा सकते हो।
मोबाइल का असर सिर्फ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि बच्चों की सामाजिक दक्षताओं (सोशल स्किल्स) पर भी पड़ रहा है। पहले शादी-पार्टियों में बच्चे आपस में बातें करते या छोटे-मोटे काम में मदद करते दिखते थे, लेकिन अब वे सिर्फ मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। कई जगहों पर तो टेबल पर पिता मोबाइल पकडे होते हैं और माँ बच्चे के मुँह में खाना ठूँस रही होती है, जबकि बच्चा बिना ध्यान दिए बस मोबाइल स्क्रीन देखे जा रहा होता है—उसे तो यह भी नहीं पता कि वह क्या खा रहा है!
कुछ दिन पहले एक परिचित का फ़ोन आया। उनकी पोस्टिंग बाहर थी और उनकी पत्नी बच्चे की पढ़ाई की वजह से कोटा में रुकी हुई थीं। वे पत्नी को कुछ दिनों के लिए अपनी पोस्टिंग वाली जगह बुलाना चाहते थे, लेकिन एक महीने के लिए बच्चे की पढ़ाई नहीं छुड़वा सकते थे। निर्णय लिया गया कि बच्चा एक महीने के लिए Crianza में रहेगा।
बच्चा वहाँ एक महीने बहुत अच्छे से रहा और फिर चला गया। कुछ समय बाद उन्होंने फ़ोन करके शुक्रिया अदा किया। हमने Crianza में लाइव CCTV एक्सेस माता-पिता को उपलब्ध करा रखा है। वे रोज़ अपने बच्चे को खाना खाते हुए देखते थे और बहुत खुश होते थे कि वह बिना मोबाइल देखे खाना खा रहा था। उनका कहना था कि उन्होंने अपने बच्चे को कभी बिना मोबाइल के खाते हुए नहीं देखा था! हमें तो इसका अंदाज़ा भी नहीं हुआ और न ही बच्चे ने कोई नखरे दिखाए।
पूरे हफ्ते बच्चों पर स्मार्टफोन की पाबंदी रहती है, लेकिन रविवार शाम को उन्हें एक घंटे के लिए स्मार्टफोन दिया जाता है और उसके बाद उनकी पसंद की मूवी दिखाई जाती है। मूवी के लिए हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों के विकल्प होते हैं—जिसे जो देखना हो, वह देख सकता है। इसे लेकर भी बच्चों में बहुत उत्सुकता होती है और वे पूरी तैयारी के साथ इस पल का इंतजार करते हैं। कोशिश करते हैं कि कोई ऐसा काम न करें जिससे मूवी कैंसल हो जाए।
यही तो बचपन है! जब सब चीज़ें बिना माँगे और बिना किसी प्रयास के मिलने लगती हैं, तो उनकी कद्र ही खत्म हो जाती है। तभी तो कहा जाता है—चाहे आपके पास कितना भी पैसा हो, बच्चों को थोड़ा अभाव में पालिए।