28/02/2026
तुम्हें प्रेम करने के बाद
मैंने जाना
ईश्वर किसी ऊँचे शिखर पर नहीं
मेरे ही भीतर स्पंदित होता है।
न मुझे किसी देवालय की सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ीं
न धूप-दीप से दिशा भरनी पड़ी
तुम्हारी एक क्षणिक प्रतीति ने ही
मेरे समस्त संशयों का अभिषेक कर दिया।
जैसे कोई जोगी
जपमाला के प्रत्येक दाने में
अपने ईष्ट का नाम नहीं
अपना समर्पण गिनता है
वैसे ही मैं
तुम्हारे प्रत्येक स्मरण में
अपना अहं विसर्जित करता हूँ। 🙏🌹