Sanjay tiwari's poetry

Sanjay tiwari's poetry कविताएं, दोहे, मुक्तक.....

02/09/2024

गोडसे का दौर भले हो, मैं गांधी के साथ रहूँगा।
अगर जले पाप की लंका, मैं आंधी के साथ रहूँगा।
क्षमापत्र लिखकर कायर,कश्ती छोड़ कर भाग गये,
तूफां कितना भी हावी हो, मैं माँझी के साथ रहूँगा।

द्वारा - संजय तिवारी।

06/01/2024

*भारत जोड़ो*

निकलेगा पूरब से पश्चिम तक जायेगा।
वो जनमानस के प्रश्नों का उत्तर लायेगा।
अंधियारा हो घना तो मन की आस सहारा।
इतिहास देख लो कब तम से दीपक हारा।
हो संकल्पित, लड़ो, न किंचित रण छोड़ो
निकल पड़ो, भारत जोड़ो।

जाति धर्म में बाँट देश किया खंड-खंड।
चरम पर मंहगाई,जनता में क्रोध प्रचंड।
संकल्प एकता का धारो, अब ललकारो
राम हो तुम कलयुग के रावण को मारो।
कर्तव्यपथ पर दौड़ो, न किंचित रण छोड़ो
निकल पड़ो, भारत जोड़ो।

जुमलों से न देश चले सब जान गये।
सच्ची राष्ट्रभक्ति है क्या पहचान गये।
लोकलुभावन भाषण की दरकार नहीं।
विदूषक सर्कस में सोहे, सरकार नहीं।
छोड़ो अंधभक्ति पर किंचित न रण छोड़ो
निकल पड़ो, भारत जोड़ो।

द्वारा : संजय तिवारी।

01/07/2023

वतन सोने की चिड़िया है मगर वो खाक कर देगा।
जर्रा-जर्रा जमीं-ए-हिन्द, लहू से लाल कर देगा।
गुजारिश अवाम से ये है, हुकूमत छीन लो वरना,
फैला के आग नफरत की सब कुछ राख कर देगा।

29/05/2023

तू माली बन उत्साहित है, जंगल को कौन सींचे है।
तू अपना घर ही चला रहा, सृष्टि को कौन खींचे है।
मत फूल अहम में घातक है पुरुषार्थ राम से सीख सखा,
मंजिल कितनी भी ऊँची हो, रास्ता पैरों के नीचे है।

द्वारा : संजय तिवारी।

26/05/2023

बिरह की चुभन ही मेरा गीत है।
और मिलने की तड़प संगीत है।
स्व निनादित हूँ घटा एकांत भीतर,
प्रेम की बस यही अनुपम रीत है।

द्वारा : संजय तिवारी।

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