11/09/2026
साथियों, वैसे तो मैं ट्रेन में सोता नहीं हूँ। फिर भी एक रात्रि ट्रेन में यात्रा के दौरान नींद लग गई। आँख क्या लगी गहरा सपना आ गया। वही सपना आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। निवेदन है इसे केवल विनोदवश स्वप्न की रचना ही समझिये।
*भयावह स्वप्न*
एक रात सपने में पहुँचा,
पता नहीं था कौन सा देश।
पतली दाढ़ी सिर पर टोपी,
एक मुस्लिम सा था मेरा वेश।
अजब थी दुनिया, गज़ब लोग थे,
नज़ारा सब अचरज से भरा।
नीली-नीली घास थी मित्रों,
देखा ऊपर, आकाश हरा ।
सूरज शीतलता बरसाता,
और चांदनी तपन भरी।
राजा दिन को रात कहे और,
जनता गहरी नींद परी।
अद्भुत मायानगरी मित्रों,
न मुसलमां न दिखे ईसाई।
जय श्री राम का नारा था बस,
और हिंदू कुछ दिखे कसाई।
न शिक्षा, न रोज़गार था,
अफ़ीम धर्म की सबको चटाई।
साहिब से इतर, कुछ बोला तो,
देशद्रोह और जेल, कुटाई।
*फिर मित्रों, राजा को देखा,*
*क्या अद्भुत उसकी काया थी।*
*घनी दाढ़ी से भरा था चेहरा,*
*भाषण की अनुपम माया थी।*
*लाल-लाल थी आंखें उसकी,*
*छप्पन इंच का सीना था।*
*एक बड़े भू-भाग को उसने,*
*स्वयं चीन से छीना था।*
सरपरस्त एक उल्लू देखा,
चमगादड़ की फौज खड़ी थी।
*नमो-नमो*, साहिब की जय हो,
नारा था और भीड़ बड़ी थी।
अंधेरे का शासन ऐसा,
जो अंधा था, वही सुखी।
बेशरम कीचड़ में लगे थे,
दिखा नहीं कहीं सूर्यमुखी।
डरा, सहमा सब देख रहा था,
कुछ भक्तों ने पकड़ा। हाय!
*जय श्री राम* कहा और भागा,
जान बची तो लाखों पाए।
नींद गहन और स्वप्न भयावह,
टूटे दोनों, आवाज़ थी *चाय*।
आँख खुली तो खड़ी थी गाड़ी,
हम अपने गंतव्य को धाय।
साँस तेज थी, और पसीना,
थर-थर कंपन, रुक न पाए।
कैसी दुनिया थी? कैसे लोग?
राजा कैसा? कुछ कहा न जाए।
*घट-घट व्यापी असल राम से,*
*फिर करी अरज, सब देव मनाए।*
*सल्तनत खत्म कर उसकी,*
*फिर ऐसा स्वप्न कभी ना आए।*
द्वारा - *संजय तिवारी*