07/11/2025
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नालंदा, आप और मैं....
_ डॉ. सुरेश "प्रियदर्शी"
तुम्हारा कली से फूल हो जाना
कब प्रेम के दुश्मनों को पसंद आया था....
तुम यूहीं पल्लवित हो रही थी
सुंदरता, ज्ञान, प्रेम सुवासित हो रही थी
उस जन्म कभी कन्नौज के इत्र से हो रही सुवासित, सुगंधित
उत्तरापथ के मार्ग पर अठखेलियां खेलते, मुस्काते, निहारते.....
और
एक दिन
प्रेम के दुश्मन की आप बन गईं आंखों का काटा
उसे पसंद नहीं था तुम्हारा फूल बन जाना...
धरा पर अप्सरा बनकर तेरा उपनिषद होना....
तुम्हें प्रेयसी से पददासी बना आपको बेच गया कोई रक्तपिपासु खिलजी कंधार के चौक में तीन दिनार में......
उसी तरह जैसे ज्ञान, धम्म, विज्ञान, प्रेम, आत्मा,
"सोने की चिड़िया" की लूट गया हर निशानी
कोई अफगानी, ईरानी, उज्बेगी, तूरानी.......
सनातन के दुश्मन, रक्तपिपासु
बख्तियार खिलजी आकर जला गया था तुम्हें
नालंदा विश्वविद्यालय की तरह फिर से ना आने के लिए फिर कभी ....
तुम्हारा इस तरह बिछड़ना
फिर तुम्हारे
वापस आने की अप्रतिम कोशिश ही होगी...
उसी तरह जैसे नालंदा फिर अपने राख से
खड़ा हो गया है बिहार की धरा पर...
लौट आया है अपने पूर्ण रूप में...
लौट आएंगी आप भी
तीन दिनार चौक के राख से उठकर
भारत के पुनः विश्व गुरु भारत बनने तक..
"विश्वगुरु भारत, सोने की चिड़िया" के
एक प्रेमी प्रियदर्शी की यही अप्रतिम पुकार है
कन्नौज के गंगा तट से........
नालंदा के मुंडेर पर एक बाट जोहता
अपने प्रेमी प्रियदर्शी के लिए ...
सदा के लिए पुनः कभी वापस ना जाने के लिए.....
_ डॉ. डॉ सुरेश प्रियदर्शी ©
(प्रकाशनाधीन)