26/11/2022
याद हो कि न याद हो:
पाणिनि और उनका व्याकरण ग्रंथ--अष्टाध्यायी.
“पाणिनीय व्याकरण मानव-मस्तिष्क की प्रतिभा के उस महत्तम आश्चर्य का नमूना है जो किसी दूसरे देश में आज तक सामने नहीं आई.” (प्रोफ़ेसर मोनियर विलियम्स)
“पाणिनीय व्याकरण मानव-मस्तिष्क की सबसे महान रचनाओं में से एक है.” (प्रोफ़ेसर टी. शेरवात्सकी, लेनिनग्राद)
पाणिनि के काल के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है. उन्हें सातवीं सदी ई. पू. से लेकर पाँचवीं सदी ई.पू. तक के बीच रखा जाता है. इतना निश्चित है कि उनके समय तक आते-आते वैदिक युग की मानक भाषा केवल आर्ष ग्रंथों तक सीमित रह गई थी; व्यवहार अर्थात् बोलचाल में उससे उद्भूत भाषा का एक परिवर्तित रूप प्रचलित हो गया था, जो अलग-अलग इलाक़ों और अलग-अलग समुदायों में भिन्नता लिए हुए था. ऐसे में इस वैदिकेतर भाषा के विभिन्न रूपों को परिष्कृत और संस्कारित कर एक ऐसी समावेशी और सर्वमान्य मानक भाषा की निर्मिति का दुस्तर कार्य पाणिनि द्वारा सम्पन्न हुआ, जो एकरूप और चिरंजीवी होकर युगों-युगों के उत्कृष्ट सृजन को अपने भीतर सँजोते हुए, भारतीय प्रतिभा का कालातीत दर्पण बन गई.
पाणिनि के जन्मस्थान और उनकी कर्म-भूमि को लेकर उतना विवाद नहीं है. यह लगभग निर्विवाद है कि वे उत्तर-पश्चिमी भारत में पुष्कलावती नगर के पास के रहनेवाले थे, जो इलाक़ा तब गांधार कहलाता था. पेशावर घाटी में आज के पाकिस्तानी शहर चरसड्डा के पास पुष्कलावती के अवशेष मिले हैं. पाणिनि के भाष्यकार पतंजलि (दूसरी सदी ई.पू.) के एक संदर्भ तथा अष्टाध्यायी में उपलब्ध एक उल्लेख के आधार पर जिस गाँव में उनका जन्म हुआ था उसका नाम शलातुर था, जो आज भी चरसड्डा के सीमांत पर मौजूद है. चीन से भारत आते समय ह्वेनसांग ( सातवीं सदी) शलातुर से होकर आए थे और उन्होंने अपने यात्रा-विवरण में उस समय वहाँ पाणिनि की एक मूर्ति के विद्यमान होने का उल्लेख किया है.
पतंजलि ने पाणिनि को दाक्षीपुत्र कहा है जिससे उनकी माता का नाम दाक्षी इंगित होता है. एक विद्वान (रामभद्राचार्य) ने महज़ व्युत्पत्तिमूलक अनुमान के आधार पर उनके पिता का नाम पाणिन बताया है, जो संदेह से परे नहीं है.
पाणिनि के समय वैदिक भाषा से उद्भूत जो भाषा व्यवहार में प्रचलित थी, उसमें एकरूपता लाने और उसके मानकीकरण के लिए उसे व्याकरण के अनुशासन में बाँधने का प्रयास पहले भी हुआ था, किंतु संबंधित आचार्यों में मतैक्य नहीं था और किसी का मत सर्वमान्य नहीं हो सका था. पाणिनि ने उस संक्रमण काल की इस कठिन चुनौती को स्वीकार किया. उन्होंने विभिन्न शाखाओं की वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों का गहन अध्ययन कर उनकी शब्द-संपदा को सँजोया. फिर अपने समय में देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्रचलित लोक-भाषा के भिन्न-भिन्न रूपों का सूक्ष्म निरीक्षण किया. दूर-दूर तक यात्राएँ कर विभिन्न समुदायों के विभिन्न पेशों में लगे लोगों द्वारा व्यवहृत शब्दों का संकलन और उनकी व्युत्पत्ति का विश्लेषण किया. ब्राह्मण, क्षत्रिय, सैनिक, व्यापारी, किसान, रँगरेज, बढ़ई, रसोइए, मोची, ग्वाले, चरवाहे, गड़रिए, बुनकर, कुम्हार आदि अनगिनत पेशेवर लोगों के पेशों में विशेष रूप से प्रयुक्त होनेवाले शब्दों का एक विशाल भंडार एकत्रकर उन्होंने अपनी समावेशी दृष्टि से उन्हें सर्व-स्वीकार्यता और नियमबद्धता की कसौटी पर कसा. फिर वैदिक भाषा के यास्क-प्रभृत वैयाकरणों तथा प्रचलित भाषा के अपने से पहले के आचार्यों के मतों का सम्यक् समाहार किया. एक पूर्व आचार्य शाकटायन का मत था कि सभी संज्ञा शब्द धातुओं में प्रत्यय लगाकर बने हैं. पाणिनि ने मोटे तौर पर इस प्रमेय को मान लिया किंतु इसमें इतना जोड़ दिया कि बहुत-से ऐसे शब्द लोकजीवन के व्यवहार में आ गए हैं जिनकी धातु और उसमें लगे प्रत्यय पकड़ में नहीं आते. इस तरह विपुल सामग्री एकत्रकर उसके सूक्ष्म मनन-विश्लेषण के उपरांत उन्होंने आठ अध्यायों के अपने अद्भुत् ग्रंथ अष्टाध्यायी की रचना की, जिसमें उपरोक्त सामग्री का ऐसा सांगोपांग और युक्तिसंगत विवेचन है कि प्रचलित भाषा के पाणिनि के पहले के व्याकरण-ग्रंथ अप्रासंगिक होकर लुप्त हो गए; उनके बारे में आज उतना ही ज्ञात है जितना अष्टाध्यायी में आए उनके संदर्भों में उपलब्ध है.
पाणिनि ने अपनी मौलिक प्रतिभा से धातुओं (roots) से नए-नए शब्द निर्मित करने की एक वैज्ञानिक पद्धति भी नियम-बद्ध कर दी. फलस्वरूप विपुल क्षमतावाली जिस एकरूप मानक भाषा की निर्मिति हुई, उसी का नाम संस्कृत (जिसका संस्कार या परिष्कार किया गया हो) है. यह मुख्यत: पाणिनि का ही योगदान है कि उनके द्वारा गढ़ी यह मानक भाषा काल के अनवरत प्रवाह के साथ सहस्राब्दियों की मेधा अपने अंतस में समेटे अपनी अविच्छिन्न एकरूपता में एक अजस्र सांस्कृतिक जलस्रोत-सी प्रवाहित होती हम तक पहुँची है. इस तरह जिसे हम प्राचीन भारतीय संस्कृति के नाम से जानते हैं उसकी निर्मिति के भाषायी उपादान और उसके प्रवाह की निरंतरता को अक्षुण्ण रखने में पाणिनि-निर्मित संस्कृत भाषा का योगदान अप्रतिम है.
पाणिनि ने घूम-घूमकर लोकभाषा के जिस बहुमुखी वैभिन्य और विस्तार को अपनी आँखों से देखा था, उसके बिना भाषा का वह मानक किंतु सर्वग्राह्य रूप मूर्तिमान नहीं हो सकता था जिसने पूरे देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँधकर उसे एक अविभाज्य सांस्कृतिक इकाई बना दिया. इस तरह अपनी सांस्कृतिक बहुलता में अंतर्भूत एकता के लिए यह देश पाणिनि का हमेशा ऋणी रहेगा.
कहना न होगा, आज हिंदी को सारे देश में ग्राह्य बनाने के लिए ऐसी ही किसी प्रतिभा और उसके द्वारा ऐसे ही अध्यवसाय की ज़रूरत है.
पाणिनि ने इस प्रक्रिया में भाषाशास्त्र और व्युत्पत्ति शास्त्र के जिन सिद्धांतों की खोज की वे वैश्विक स्तर पर भाषाशास्त्रीय ज्ञान की धरोहर बन गए. 19वीं शताब्दी में यूरोप अष्टाध्यायी से परिचित हुआ और तब फ्रैंज़ बॉप (Franz Bopp) के माध्यम से इस ग्रंथ ने आधुनिक भाषाशास्त्रीय विमर्श को एक नई दिशा प्रदान की. फर्डिनैंड डि सॉसर (Ferdinand de Saussure), लिओनार्ड ब्लूमफ़ील्ड (Leonard Bloomfield), रोमन जैकॉब्सन (Roman Jakobson) और फ़्रिट्स स्टाल (Frits Staal) जैसे भाषाशास्त्रियों ने अष्टाध्यायी के प्रमेयों पर चलकर ही अपनी स्थापनाएँ स्थिर कीं. अष्टाध्यायी के अध्ययन के आधार पर ही फ़्रिट्स स्टाल (1930-2012) ने यूरोपीय भाषा-समुदाय पर भारतीय विचारों के प्रभाव का आकलन किया.
पाणिनि ने भाषारूपीय (morphological) विश्लेषण का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया था वह बीसवीं सदी के मध्य तक सामने आए सभी पश्चिमी सिद्धांतों से अधिक उन्नत माना जाता रहा (Encyclopedia Britannica.2013, www.britannica,com). समासीकृत संज्ञाओं (noun compounds) पर उनकी विवेचना आज भी भाषाशास्त्र में समासीकरण के सिद्धांतों का मूल आधार है और इन सिद्धांतों में ‘बहुब्रीहि‘ तथा ‘द्वंद्व’ जैसे शब्द संस्कृत से ही उधार लिए गए हैं. पाणिनि के भाषागत सूक्ष्म निरीक्षण का जो स्तर है, ग्रीक और लैटिन के वैयाकरणों में उसकी छाया तक नहीं मिलती. यही कारण है कि आज भारत ही नहीं, पूरा विश्व कोषविज्ञान (lexicography), भाषारूप-विधान (morphology), वाक्य-विन्यास (syntax) और अर्थ-विधान (semantics) में पाणिनि की अनेक सुविचारित और सुसंगत अवधारणाओं का वाहक है.
यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि पाणिनीय व्याकरण भारतीय विचार-पद्धति में अध्यात्मेतर, लौकिक दृष्टि का प्रवेश-बिंदु है {Bloomfield, L.,1929 ‘Review of Liebich, Konkordanz Panini-Candra’, Language (Journal) 5, 267-276}. पाणिनि की अष्टाध्यायी इसी लौकिक दृष्टि की भाषाशास्त्रीय अभिव्यक्ति है.
पाणिनि का एक-एक सूत्र और उसमें प्रयुक्त एक-एक शब्द इतने प्रामाणिक हैं कि उनमें हमें शब्द-कोष, व्युत्पत्ति, भाषारूप, अर्थ-विधान, वाक्य-विन्यास से सम्बंधित बारीक ज्ञान ही नहीं मिलता, उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों और समानधर्मा वैयाकरणों के संदर्भों से तत्कालीन लोक-व्यवहार, आर्थिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक जीवन तथा भौगोलिक संरचना का यथार्थ ख़ाक़ा भी उभरता है. इस तरह अष्टाध्यायी महज़ व्याकरण और भाषाशास्त्र का ग्रंथ नहीं है, बहुआयामी इतिहास और भूगोल का समग्र दर्पण भी है (जिसके कुछ अंश का संक्षिप्त उल्लेख अष्टाध्यायी की विषय-वस्तु के संदर्भ में नीचे किया गया है).
अष्टाध्यायी
अष्टाध्यायी में कुल 3996 सूत्र (याद करने की सुविधा के लिए घनीभूत, अल्पतम शब्दों और संगर्भित अर्थोंवाले सूक्ष्म और स्वयं में पूर्ण नियम) हैं. इन्हें आठ अध्यायों में बाँटा गया है और प्रत्येक अध्याय के चार-चार पाद हैं. इसके अतिरिक्त अष्टाध्यायी के तीन परिशिष्ट हैं :
1.चौदह माहेश्वर सूत्र-- ये अष्टाध्यायी के प्रारम्भ में दिए हुए वर्णों या ध्वनियों (phonemes) के 14 वर्गीकरण हैं.
2.धातुपाठ—पाणिनि ने अपने संकलित शब्द-भंडार से धातुओं (roots) को अलग छाँटकर कुल 1943 धातुओं की सूची बनाई है. ये धातुएँ दो प्रकार की हैं—एक, जो पहले साहित्य में प्रयुक्त हो चुकी थीं; और दो—जो पाणिनि को लोकजीवन में प्रचलित बोलचाल की भाषाओं में मिलीं.
3.गणपाठ—ये उन समूहों या समुदायों की कोषीय सूची है जिनके गुणों में पाणिनि को समानता दिखाई पड़ी थी.
माहेश्वर या शिव के चौदस सूत्र संस्कृत वर्णमाला के चौदह उपसमूह हैं जो पाणिनि के पहले से प्रचलित थे. इनकी उत्पत्ति लोकोत्तर मानी जाती है. इस सम्बंध में यह श्लोक बहुत प्रचलित है--
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्र जालम्॥
[तांडव नृत्य के अवसान पर नटराज शिव ने सनकादि ( सनक, सनातन, सनकनंदन, सनत्कुमार) ऋषियों के उद्धार की कामना से चौदह (नव+पञ्च) बार डमरू बजाया. इस प्रकार चौदह सूत्रों का यह जाल प्रकट हुआ.]
चौदह माहेश्वर सूत्र इस प्रकार हैं—
अ इ उ ण्
ऋ लृ क्
ए ओ ङ्
ऐ औ च्
ह य व र ट्
ल ण्
ञ म ग ण न म्
झ भ ञ्
घ ढ ध ष्
ज ब ग ड द श्
ख फ छ ठ थ च ट त व्
क प य्
श ष स र्
ह ल्
वर्णमाला का यह वर्गीकरण याद करने में इतना सुगम है कि बचपन में लघु सिद्धांत कौमुदी घोखते समय मुझे पता ही नहीं चला कि ये कब याद हो गए. पहले का बहुत कुछ भूल जाने के बावजूद ये भूलने का नाम नहीं लेते. इनकी लयबद्धता में अपूर्व संगीत है और पंडित जसराज ने इन्हें शास्त्रीय संगीत की तर्ज़ पर कोरस में गाया है, जिसकी सी.डी. उपलब्ध है. उसे सुनते हुए वस्तुत: डमरू की-सी आवाज़ का आभास होता है. यह संस्कृत की संपूर्ण वर्णमाला है और यही पाणिनीय व्याकरण का मूल आधार है. इसमें हर सूत्र का अंतिम हलंत अक्षर वैसे तो शोभामूलक है जिसे इत् (भाष्यकारों द्वारा अनुबंध) कहा जाता है किंतु संक्षेप के लिए वह अपने पूरे वर्ग का संकेतक है. जैसे च् से पूरे चौथे समूह "ऐ औ च्" का बोध हो जाता है. अष्टाध्यायी का पहला सूत्र है ‘वृद्धिरादैच्’ जिसमें अंतिम वर्ण च् तीनों ध्वनियों ऐ औ च् को इंगित करता है. प्रत्येक वर्ग को प्रत्याहार कहा जाता है और उसके संक्षिप्त प्रयोग की एक सुविचारित पद्धति है जो सभी पाणिनीय सूत्रों में एकरूप प्रयुक्त हुई है.
गणपाठ का परिशिष्ट तत्कालीन इतिहास की एक झाँकी के लिए बहुत बहुमूल्य है. एक गण सगोत्रों का है. वैसे तो वैदिक काल से सात गोत्र ही चले आ रहे थे किंतु पाणिनि के काल तक उनका बहुत विस्तार हो चुका था. पाणिनि ने वैदिक और लौकिक दोनों भाषाओं में उपलब्ध कुटुंब-नामों की एक विस्तृत सूची बनाई. एक गोत्र या कुटुंब में सपिंड, स्थविर (बूढ़े) पिता, पुत्र, पौत्र आदि के नाम कैसे रखे जाते थे, पाणिनि ने इसका विस्तार से उल्लेख किया.
गणपाठ में पाणिनि की एक और सूची भौगोलिक है. उन्होंने अपने उत्तर-पश्चिमी प्रांत के 500 ऐसे ग्रामों का नामोल्लेख किया है जो यथार्थ में थे. पाणिनि ने पंजाब के दो गाँवों के नाम दिए हैं सुनेत्र और शैरीषक जिनकी पहचान आज के सुनेत और सिरसा से होती है. पंजाब में अनेक जातियों के नाम उन गाँवों पर थे जहाँ वह निवास करती थी या जहाँ से उसके पूर्वज आए थे, जिन्हें ‘अभिजन’ कहा जाता था. इन दोनों स्थानों से बननेवाले नाम पुरुषों के नाम के आगे उपनाम के रूप में जुड़ जाते थे.
पाणिनि ने अपने प्रदेश के पूर्व में स्थित त्रिगर्त भूखंड का ज़िक्र किया है जो आज का कुल्लू-काँगड़ा है. पश्चिम के पहाड़ी प्रदेश में निवास करनेवालों की संस्कृति तथा सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पाणिन के काल में भी जनजातीय या क़बीलाई थी. उसके उत्तर में दरद भूखंड था जिसे आज गिलगित कहते हैं और दक्षिण में था सौवीर जो आज का सिंध है. पाणिनि ने पश्चिमोत्तर पहाड़ी प्रदेश के क़बीलों की विस्तृत सूची बनाई और उनकी शासन-पद्धति का अध्ययन किया , जिसे ग्रामणी शासन कहते थे. ग्रामणी वस्तुत: जनजाति के मुखिया की पदवी थी. उनकी पंचायत को व्रातपूग, संघ या गण कहते थे, जिसे अब जिरगा कहते हैं. सभी संघों की शासन-प्रणाली एक-सी नहीं थी. इनमें से कुछ क़बीले लूटपाट से जीविका चलाते थे जिन्हें पाणिनि ने ‘उत्सेदजीवी’ कहा है. इन क़बीलों के बहुत से नाम गणपाठ में मिलते हैं, जैसे देवदत्त (जो किसी क़बीले का पूर्वपुरुष रहा होगा), आप्रीत और मधुमंत. सार्वभौम इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद भी इनकी क़बीलाई जन-संस्कृति और शासन-व्यवस्था में विशेष अंतर नहीं आया है.
गणपाठ की सूचियों में एक सूची जनपदों की है. मध्य एशिया के ऊपरी भाग में वंक्षु नदी के उत्तर कंबोज जनपद स्थित था, पश्चिम में कच्छ, पूरब में सूरमस (आज के आसाम प्रदेश की सूरमा घाटी) और दक्षिण में गोदावरी के तट पर अश्मक. इन सीमाओं के बीच मध्यदेश का विशाल भूभाग भी भिन्न-भिन्न जनपदों में बँटा हुआ था.
पाणिनि ने आर्थिक जीवन के भाषाशास्त्रीय पक्ष का अध्ययन करने के लिए बाज़ार में प्रचलित सिक्कों की भी सूची बनाई . शतमान, कार्षापण, सुवर्ण, अंध, पाद, माशक, त्रिशत्क (तीन मासे की तौल का सिक्का) और विंशतिक ( बीस मासे की तौल का सिक्का). कुछ समूह जिन्स के विनिमय (barter) से काम चलाते थे, जिसे ‘निमान’ कहा जाता था.
अष्टाध्यायी का 3996 सूत्रोंवाला मुख्यभाग इतना जटिल और तकनीकी है कि उसका वर्णन ऐसे किसी आलेख में असंभव है. संस्कृत व्याकरण के पारंपरिक छात्र पहले तो सूत्रों को रट जाते हैं, फिर उनकी व्याख्या समझने में दस-दस साल लगा देते हैं. किंतु एक बार व्याकरण का अध्ययन कर लेने के बाद उन्हें संस्कृत में महारत हासिल हो जाती है और अलग से कुछ पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती. फिर तो वे स्वाध्याय से कुछ भी सीख-समझ सकते हैं. संस्कृत व्याकरण की पद्धति है ही ऐसी.
अष्टाध्यायी पर पतंजलि के महाभाष्य के बाद 8वीं और 15वीं सदी में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ. भट्टोजि दीक्षित (17वीं सदी) का ग्रंथ वैयाकरणसिद्धांतकौमिदी और उसके बाद आए पंडित रामाश्रम का वैयाकरणसिद्धांतचंद्रिका दो ऐसे भाष्य हैं, जो संस्कृत व्याकरण के भारतीय विद्यार्थियों के बीच विशेष लोकप्रिय हैं.
भारत सरकार ने 2004 में पाणिनि की स्मृति में पाँच रुपए का डाकटिकट जारी किया था.
जैसा कि उपरोक्त विमर्श से स्पष्ट है, आज सम्पूर्ण विश्व पाणिनि के आधारभूत और उच्चस्तरीय भाषाशास्त्रीय काम के लिए उनका ऋणी है. उनका योगदान शुद्ध रूप से अकादमिक और सेक्यूलर है, जिसका किसी धर्म से कोई अनिवार्य सम्बंध नहीं. ऐसे में यदि पाकिस्तान सरकार उनके जन्म-स्थान शलातुर में उनका कोई स्मारक या संग्रहालय बनवाए तो यह विश्व-संस्कृति के एक महान स्तंभ के प्रति यथोचित सम्मान होगा. क़ायदे से देखा जाए तो पाणिनि अपने जन्म-स्थान की दृष्टि से पाकिस्तान के राष्ट्रीय गौरव हैं. लेकिन अपनी जड़ों से विच्छिन्न और इस विच्छेद को ही अपनी अस्मिता का पर्याय माननेवाले लोगों से ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है। भारत सरकार की दृष्टि भी कभी सतही सेक्युलरवाद तो कभी खोखले राष्ट्रवाद से राजनीतिक लाभ उठाने के अतिरिक्त कहीं और कहाँ जाती है ! तो भारत सरकार को भी अपनी सांस्कृतिक कृपणता में पाणिनि के नाम पर पाँच रुपए का डाकटिकट जारी करने से इतर कुछ और कैसे सूझेगा ?
✍🏻कमलाकांत त्रिपाठी