Rajiv Dixit Foundation

Rajiv Dixit Foundation इंडिया से भारत की ओर

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02/04/2026

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23/06/2024

हमसे जुड़ने के लिए धन्यवाद।
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Ghanshyam Yadav, Rita Dave, Ashish Kaushik, Bk Suryanarayan, Mahipal Singh Lala Rawatseri, Kuldeep Kumar, Chanderbhan Munjal, Shailendra Giri, Hari Shankar Kumar, Thakur Uttam Chand, Kanta Prasad Silswal, Rajbeer Sharma, Harish Bordiya, Ransingh Kabawat Akoli Bjp, Ramchandra Sika, Tarak Jana, Gourav Sarmah, Rahul Singh, Chinku Samal, Dharmender Negi, Sam Yadav, Raghu Khata, Sarata Mahanta, Pravveen Pravveen, JC Ashok Seth, Vishwajit Chougale, Chandra Bahadur Maurya, Ajay Shukla, Prakash Bhatiya, Karuna Gupta, Sujit Sahu, Rekha Khandelwal, Malani Dipak, Jaleshwar Barnwal, Naveen Kumar, Raju Kushwah, Mahendra Vaghela, Raju Thakkar, Manu Gupta, Chirag Patel, Rahul Kumar, Kamlesh Shah, Chandrika Patel, Prakashsinh Gohil, Rohit Bohat, Omkar Sahu, Manoj Daksh, AK AK, Manju Shinobi, Sonu Ji

12/06/2024

शादी संभोग तक सिमट कर रह गई है, मर्द अपनी गर्मी औरत के शरीर से निकालना चाहता है, औरत अपनी चाहत मर्द के आलिंगन से
यही से जन्म होता है कॉर्पोरेट शादी का, जी हां आप लोगो को लग रहा होगा कि कॉरपोरेट जॉब होती थी, लेकिन समय तेज़ी से आगे बढ़ गया है l, अब समय है कॉर्पोरेट शादी का
मैं बंगलोर में बतौर मैरेज काउंसलर काम करता हूं, मेरा काम लोगो की शादी करवाना है, जिसके लिए बड़ी कंपनी जैसे शादी जीवनसाथी मुझे हाइयर करती हैं
लेकिन आज समय इतना तेज़ी से बदल रहा है, की इसके। सामने मनुष्य जाति का सबसे पवित्र बंधन शादी का बंधन भी छोटा लगने लगा है, और इसकी वजह से जन्म होता है कॉर्पोरेट शादी की
इस शादी में लड़के और लड़की की प्रोफाइल बनाई जाती है शादी वाले apps पर,
पहले जहां शादी करते वक्त परिवार और लड़के का चरित्र। वो जिम्मेदार है या नही ये देखा जाता था
आज लड़के के बारे में देखा जाता है, की वो कमाता कितना है, किस कंपनी में कितना शेयर है, पत्नी को क्लब जाने देगा या नहीं l, पत्नी के अगर लड़के दोस्त हुए तो कोई आपत्ति नही होनी चाहिए
लड़के की पढ़ाई किसी बड़े iit ya iim जैसे कॉलेज से होनी चाहिए,
लड़का स्टैंडअलोन होना चाहैये उसके मां बाप साथ में ना। हो
और लड़की ऐसी देखी जाती है जो दिखने में सुंदर हो या ना हो उसका फिगर एकदम अच्छा होना चाहिए, ना पतली हो ना मोटी हो,
स्तन शरीर के हिसाब से थोड़े बड़े हो, नितंब चौड़े हो
इसके बाद बारी आती है, पढ़ाई की इंडिया के किसी अच्छे कॉलेज से पढ़ी हो,
प्राइवेट जॉब हो लेकिन कंपनी अच्छी हो
पति की महिला कलीग से कोई आपत्ति ना हो
दहेज दे या ना दे पर सेक्स करने से किसी तरह का परहेज नहीं होना चाहिए
ये बातें मनगढ़ंत नहीं है बल्कि मेरे पास शादी के लिए आए 500 से अधिक लोगो के कॉमन प्रश्न हैं ये
जब लड़के और लड़की की मीटिंग होती है, उसके बाद वो फोन पर बात करते हैं तो पहला सवाल दोनो तरफ से होता है की उन्हें संभोग करना कितना पसंद है,
मानो जैसे शादी की बात नही बल्कि किसी वैश्य से डील चल रही हो
आज मेरे क्लाइंट दिल्ली बैंगलोर गुड़गांव में हैं और अंदर ही अंदर ये खेल चल रहा है,
और लोगो की शादी भी होती है, लेकिन ये शादी हर तरह के मर्यादा के परे होती है, और कुछ साल में जब ऐसे लोगो का संभोग से मन भर जाता है तो इनकी शादी सिर्फ नाम मात्र की रहती हैं
हम ऐसे समाज में हैं जहां किसी भी ऑप्शन की कोई कमी नहीं है
लेकिन आज भी मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं सबसे ज्यादा सफल शादी वही होती है जो मां बाप द्वारा लड़के और लड़की को ढूंढ के की जाती है
या फिर वो प्रेम विवाह जो कम से कम 5 साल पुराना हो
माता पिता द्वारा कराई शादी में परिवार और सभ्यता सब देखी जाती है
लेकिन कॉर्पोरेट शादी में सिर्फ कमाई और लड़की का फिगर देखा जाता है
मां बाप द्वारा कराई शादी में परिवार का एक अदृश्य दबाव होता है, जिसमे किसी की गलती होने पर परिवार के सदस्य शादी को बचाने का प्रयास करते हैं
और पति पत्नी भी संकोच में अपने रिश्तों को सुधारने का प्रयास करते हैं और समय ठीक होने पर रिश्ता भी ठीक हो जाता है
Lekin corporate शादी में आप आजाद हैं थोड़ी सी भी कमी होने पर आप अपनी पत्नी या पति को छोड़ते नही है बल्कि बाहर मुंह मारने निकल पड़ते हैं
और यही कारण है की दिल्ली मुंबई बैंगलोर में काम करने वाले ज्यादातर शादी शुदा लोगो के गैर मर्द और महिला के साथ संबद्ध बढ़ रहे हैं
आज की युवा पीढ़ी वो लड़की हो या लड़का सिर्फ इस बात पे ध्यान दें की शादी करते समय लड़के लड़की का चरित्र कैसा है जिमेदारी उठा सकता है, और उसके अंदर वफादारी कितनी है एक अच्छे शादी वाले जीवन के लिए। ये 3 बिंदु प्रयाप्त है
लेकिन अगर आप कॉरपोरेट शादी के चक्कर में पड़ रहे तो याद रखिए कुछ साल तो संभोग का खूब आनद आएगा लेकिन उसके बाद मन में अकेलापन महसूस होगा और मन से आप किसी को अपना नही बोल पाएंगे #सोच

12/06/2024

"""मैं तो किसी भी लड़के के सामने टांग खोल कर लेट जाऊंगी, और मिनट में मेरा काम हो जाएगा तुम अपना सोचो """

जब मैं घर से आ रही थी तो उसे समय पापा ने मुझे ₹5000 दिए थे और बोला था बेटा अपना ध्यान रखना क्योंकि खाना और रहना तो हॉस्टल में हो ही जा रहा था और बाकी जो लड़कियों के खर्च होते हैं सिर्फ वही खर्च थे

मुझे लगा था यह पैसे मेरे लिए पर्याप्त होंगे पर ऐसा नहीं था यहां पर आने पर मैंने देखा जो लड़कियां फीस माफी की एप्लीकेशन कॉलेज में देती हैं उनके पास ₹100000 के फोन है महंगे कपड़े हैं कहीं आने-जाने के लिए कार बुक करती हैं

जब इसके बारे में और जानना चाहा और जो चीज मुझे पता चली उसे सुनने के बाद तो मानो एक पल को तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि क्या सच में ऐसा कोई कर सकता है पर मैं गलत थी यहां के लोगों के लिए यह चीज काफी आम थे

अब आप में से कुछ लोग मेरी इस बात को सुनकर गुस्सा भी करेंगे और कुछ लोगों को मेरी बात पर यकीन नहीं होगा लेकिन एक बहुत बड़ा तब का है जो इस सच्चाई को काफी अच्छे से जानता है

और वह तब का जानता है कि कैसे शहर की लड़कियां कॉलेज में पढ़ने जाती हैं तो अपना खर्च चलाती हैं

मुझे पता चला कि यह लड़कियां आमिर लड़कों को ढूंढते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वह दिखने में कैसा है पर पैसे वाला होना चाहिए

यह सारी प्रक्रिया एक क्रमबद्ध तरीके से होती है
जिसमे पहले लड़किया एक अच्छा लड़का फसाती हैं कुछ दिन प्यार भरी बात करती हैं, और 1 से 2 हफ्ते में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं

इसके लिए वो डेटिंग ऐप, पब बार, महंगी पार्टी में का सहारा लेती हैं जहां पर अमीर लड़के आते हैं

एक बार शारीरिक सम्बंध बन जाने के बाद ये लडकिया लडको को अपने वश में करती है महंगे मोबाइल, कपड़े रेस्टिरेंट में खाना, और बदले में एक रात तक लड़के के साथ संबंध बना लेना,
कॉलेज में जाने वाली लड़कियों के लिए एक आम बात है , और यहीं से उनका खर्चा निकलता रहता है

लेकिन इसमें गलती सिर्फ लड़की की ही नहीं है उनके मां बाप की भी है, आखिर वो क्यों नहीं पूछते अपनी बेटी से को इतना महंगा फोन कहा से मिला, हर हफ्ते नए कपड़े कहा से आरे हैं

इस तरह चलता है लोगो का खर्चा, अब आप को इसमें ये लग रहा होगा की कितना आसान है, किसी लड़के को बेवकूफ बनाना

ऐसा ही बहुत सी लड़कियां को भी लगता है, लेकिन लड़के हमेशा अच्छे नही होते हैं
इस काम को लड़किया अपने क्षणभर के सुख के लिए करती है लेकिन कैसे चुटकी बजाते ही उनकी जिंदगी खराब हो जाती है मैं बताती हूं

हमारे वार्ड नंबर 6 के कमरा नंबर 33 की एक लड़की को भी यही नशा चढ़ा था, लड़का मिल गया, और रोज उसे अपने फ्लैट पर ले जाकर उसके साथ जो मन वो करता, बदले में उसे महंगी महंगी चीज ऑफर करता,

एक दिन वो लड़का उसे बोलता है जो तुम मेरे साथ करती जो वो मेरे कुछ जानने वालों के साथ करो

लकड़ी समझ गई की वो अब फंस चुकी है, और जैसे ही मौका मिला वो तुरंत कुछ दिन के लिए अपने हॉस्टल से घर चली गई
जब वो वापस आई तो लड़के ने बोला एक बार मिलो, जब उसने मिलने से इंकार किया तो उसने उसे एक वीडियो भेजी ये वीडियो उसकी के घर के बाथरूम की थी जिसमे वह नग्न अवस्था में कपड़े बदल रही थी

वो कुछ आगे सोचती इससे पहले ही उसके पास एक और वीडियो आया जिसमे वो उसी लकड़ा के साथ जिस्मानी संबंध बना रही थी

असल में उसके साथ फ्रॉड हुआ था और ना चाहते हुए भी उस लड़की को उस लड़के के जानने वाले के साथ संबंध बनाना पड़ा था

और ऐसे करते करते कभी वो लकड़ा संबंध बनाता कभी अपने जनन वालो को भेज देता और वो जानने वाले कोई और नहीं बल्कि उस लड़के के द्वारा फसाए गए ग्राहक होते थे
जो 10 हजार रूपए में कुछ देर के लिए लड़की का इस्तेमाल करते थे

लड़की को लगा की उस लड़के के सामने बिछ जाने से लड़का फसा रहेगा और उसका काम होता रहेगा

लेकिन लड़का खुद उसे महंगे गिफ्ट और फोन देके उसे फसता रहा, उसने जितना उसे गिफ्ट और पैसे दिए थे
उसका 4 गुना लड़की के जिस्म को बेच के कमा लिया था

आज भी वो लड़की काउंसलिंग सेंटर में हैं क्यों की वो अंदर से इतनी स्ट्रांग नही थी, और समाज लोक लाज के भय से उस लड़के पर कोई एक्शन भी नही ले सकी

ये एक सच्ची आप बीती है, जो बड़े शहर में जाने के बाद प्रत्येक लड़की और लड़के करते हैं

मेरे हॉस्टल में 100 में 98 लड़किया इसी तरह अपना खर्चा चलाती थी, और उन 98 में से 10 ऐसी होती थी जिनका जम कर शारीरिक शोषण होता था,

ये नंबर काफी कम लग सक्कता है लेकिन हो सकता हो आप को बहन बेटी जल्दी किसी बड़े कॉलेज में एडम्सिशन लें और वो भी इस रास्ते पर चले इसकी आशंका 95% है

मैं सभी पैरेंट्स से अनुरोध करूंगी की आप अपनी बेटी को बाहर पढ़ने भेज रहे हैं
तो उसने कठोर नही बल्कि दोस्त बनकर इस बारे में बात कीजिए उन्हें बताइए की कैसे लोग चंद जरूरतों के लिए अपना जिस्म किसी गैर लड़के के हाथ में देते हैं,
और बाद में उन्हें जीवन भर पछताना पड़ता है

यदि उन्हें किसी से प्रेम है या कोई उनका मित्र बना है तो सबसे पहले मित्रता परिवार वालो की नजर के सामने कीजिए ऐसे दोस्त बनाइए जो आप को अपने मां बाप से मिलाने में हिचकिचाहट महसूस ना करें

नही तो पल भर में ही एक कॉलेज स्टूडेंट से वैश्या बनाने में समय नही लगेगा
ये जानकारी अच्छी लगी हो तो हमारे पेज राजीव दीक्षित फाउंडेशन को फॉलो कीजिए और अन्य लोगो के साथ शेयर कीजिए।

27/05/2024

*जिसने भी लिखा है शानदार लिखा है। सभी को पढ़ना चाहिए।*

एक बात मेरी समझ में कभी नहीं आई कि ये फिल्म अभिनेता या अभिनेत्री ऐसा क्या करते हैं कि इनको एक-एक फिल्म के लिए 50 करोड़ या 100 करोड़ रुपये मिलते हैं?

जिस देश में शीर्षस्थ वैज्ञानिकों, डाक्टरों, इंजीनियरों, प्राध्यापकों, अधिकारियों इत्यादि को प्रतिवर्ष 10 लाख से 20 लाख रुपये मिलते हों, उस देश में एक फिल्म अभिनेता प्रतिवर्ष 10 करोड़ से 100 करोड़ रुपए तक कमा लेता है। आखिर ऐसा क्या करता है वो?

देश के विकास में क्या योगदान है इनका? आखिर वह ऐसा क्या करता है कि वह मात्र एक वर्ष में इतना कमा लेता है जितना देश के शीर्षस्थ वैज्ञानिक को शायद 100 वर्ष लग जाएं!

आज जिन तीन क्षेत्रों ने देश की नई पीढ़ी को मोह रखा है, वह है - सिनेमा, क्रिकेट और राजनीति।

इन तीनों क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों की कमाई और प्रतिष्ठा सभी सीमाओं के पार है।

यही तीनों क्षेत्र आधुनिक युवाओं के आदर्श हैं, जबकि वर्तमान में इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं।

तो वह देश और समाज के लिए व्यर्थ ही है।

बॉलीवुड में ड्रग्स व वेश्यावृत्ति, क्रिकेट में मैच फिक्सिंग, राजनीति में गुंडागर्दी व भ्रष्टाचार। इन सबके पीछे मुख्य कारण धन ही है और यह धन उन तक हम ही पहुँचाते हैं।

हम ही अपना धन फूंककर अपनी हानि कर रहे हैं। यही मूर्खता की पराकाष्ठा है।

■ 70-80 वर्ष पहले तक प्रसिद्ध अभिनेताओं को सामान्य वेतन मिला करता था।

■ 30-40 वर्ष पहले तक क्रिकेटरों की कमाई भी कोई खास नहीं थी।

■ 30-40 वर्ष पहले तक राजनीति में भी इतनी लूट नहीं थी।

धीरे-धीरे ये हमें लूटने लगे और हम शौक से खुशी-खुशी लुटते रहे।

हम इन माफियाओं के चंगुल में फंसकर हम अपने बच्चों और अपने देश के भविष्य को
बर्बाद करते रहे हैं।

50 वर्ष पहले तक फिल्में इतनी अश्लील और फूहड़ नहीं बनती थीं। क्रिकेटर और नेता इतने अहंकारी नहीं थे। आज तो ये हमारे भगवान (?) बने बैठे हैं। अब आवश्यकता है इनको सिर पर से उठाकर पटक देने की ताकि इन्हें अपनी हैसियत पता चल सके।

एक बार वियतनाम के राष्ट्रपति हो-ची-मिन्ह भारत आए थे तो भारतीय मंत्रियों के साथ हुई मीटिंग में उन्होंने पूछा - "आप लोग क्या करते हैं?"

इन लोगों ने कहा - "हम लोग राजनीति करते हैं।"

वे समझ नहीं सके इस उत्तर को तो उन्होंने दुबारा पूछा - "मेरा मतलब, आपका पेशा क्या है?"

इन लोगों ने कहा - "राजनीति ही हमारा पेशा है।"

हो-ची मिन्ह तनिक झुंझलाए और बोले - "शायद आप लोग मेरा मतलब नहीं समझ रहे। राजनीति तो मैं भी करता हूँ, लेकिन पेशे से मैं किसान हूँ और खेती करता हूँ। खेती से मेरी आजीविका चलती है। सुबह-शाम मैं अपने खेतों में काम करता हूँ। दिन में राष्ट्रपति के रूप में देश के लिए अपना दायित्व निभाता हूँ।"

भारतीय प्रतिनिधिमंडल निरुत्तर हो गया। कोई जबाब नहीं था उनके पास।

जब हो-ची-मिन्ह ने दोबारा वो ही बातें पूछी तो प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने झेंपते हुए कहा - "राजनीति करना ही हम सबका पेशा है।"

स्पष्ट है कि भारतीय नेताओं के पास इसका कोई उत्तर ही नहीं था। बाद में एक सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में 6 लाख से अधिक लोगों की आजीविका राजनीति से ही चलती थी। आज यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है।

कुछ महीनों पहले ही जब कोरोना से यूरोप तबाह हो रहा था, तो डाक्टरों को लगातार कई महीनों से थोड़ा भी अवकाश नहीं मिल रहा था, तब पुर्तगाल की एक डॉक्टरनी ने खीजकर कहा था - *"रोनाल्डो के पास जाओ ना जिसे तुम करोड़ों डॉलर देते हो।*

"मैं तो कुछ हजार डॉलर ही पाती हूँ।"

मेरा दृढ़ विचार है कि जिस देश में युवा छात्रों के आदर्श वैज्ञानिक, शोधार्थी, शिक्षाशास्त्री आदि ना होकर अभिनेता, राजनेता और खिलाड़ी होंगे, उनकी स्वयं की आर्थिक उन्नति भले ही हो जाए, लेकिन देश की उन्नत्ति कभी नहीं होगी। सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, रणनीतिक रूप से देश पिछड़ा ही रहेगा हमेशा। ऐसे देश की एकता और अखंडता हमेशा खतरे में ही रहेगी।

जिस देश में अनावश्यक और अप्रासंगिक क्षेत्र का वर्चस्व बढ़ता रहेगा, वह देश दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जाएगा। देश में भ्रष्टाचारी व देशद्रोहियों की संख्या बढ़ती रहेगी। ईमानदार लोग हाशिये पर चले जाएँगे व राष्ट्रवादी लोग कठिन जीवन जीने को विवश होंगे।

सभी क्षेत्रों में कुछ अच्छे व्यक्ति भी होते हैं।

उनका व्यक्तित्व मेरे लिए हमेशा सम्माननीय रहेगा।

आवश्यकता है हम प्रतिभाशाली, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, समाजसेवी, जुझारू, देशभक्त, राष्ट्रवादी, वीर लोगों को अपना आदर्श बनाएं।

आखिर ऐसे कैसे किसी को परिवार के बीच में बैठ कर पोर्न देखने को मजबूर किया जा सकता है ????अब तो घर में बच्चों के बीच बैठकर...
24/05/2024

आखिर ऐसे कैसे किसी को परिवार के बीच में बैठ कर पोर्न देखने को मजबूर किया जा सकता है ????
अब तो घर में बच्चों के बीच बैठकर न्यूज देखना भी बहुत बड़ी शर्मिदगी का काम हो गया है ! वैसे तो मैं और कोई चैनल देखती ही नही हूँ सिवाय आजतक न्यूज के
आजकल सभी न्यूज़ चैनलों पर हर ब्रेक में एक कन्डोम का प्रचार आता है और इस प्रचार में आती है एक अन्तरराष्ट्रीय वेश्या जिनका नाम है सनी लियोनी !
इस एडवर्टाईजमेंट में गाना चलता है "मन क्यों बहका रे बहका आधी रात में " और इतने अश्लिल ढंग से कपड़ा उतारते और बेड पर लेटते दिखाया जाता है कि परिवार व बच्चों के बीच बैठे एक सभ्य परिवार के व्यक्ति का सर शर्म से झुक जाता है !
आखिर ऐसे कैसे किसी को परिवार के बीच में बैठ कर पोर्न देखने को मजबूर किया जा सकता है ?
क्या हम किसी भी वस्तु के प्रचार को सभ्य ढंग से नही दिखा सकते ?
क्या हर सामान को बेचने के लिए (चाहे वह एक पानी का बोतल हो या अंडरवेयर और बनियान, चाहे वह परफ्यूम हो या शेविंग ब्लेड) इनके विज्ञापनों में अधनंगी लड़कियों, किसिंग सीन का होना, भद्दे तरीके से लिपटा लिपटी दिखाना आवश्यक है ?
हद तो तब हो गयी जब एक बच्चा कमरे में बैठा कार्टून चैनल देख रहा होता है और बच्चों के उस कार्टून चैलन पर व्हिस्पर का ऐड आ जाता है...
अब सात साल के बच्चे को खेलने कूदने की उम्र में व्हीस्पर और कंडोम का प्रचार दिखाकर यह मीडिया और कम्पनियाँ क्या हासिल करना चाहती है यह मेरे तो समझ में नही आया लेकिन दुख बहुत हुआ !
न जाने कितने साल बीत गए इसी नंगेपन के कारण मुझे अपने घर में बैठ कर किसी म्यूजिक चैनल पर फिल्मों के गाने सुने और बच्चों के सामने टीवी पर फिल्म देखे हुए...
क्या ये मेरे राइट टू वॉच में सेंध नही है..?
मैं क्या देखूँ क्या नही...
ये कोई और ही तय करेगा क्या...?
क्या इस जंगली और अश्लील मीडिया और विज्ञापनों पर कोई कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है या नही...?
क्या समाज में उन लोगों को जीने का कोई हक नही है जो अपने परिवार को इस गंदगी से दूर रखना चाहते हैं..?
मैं अपने मीडियातंत्र सरकार, समाजविद्, सभी से यह सवाल पूछना चाहती हूँ कि.. क्या ये मेरी अकेले की समस्या है...? क्या उनके घरों में टीवी नही चलता, क्या उनको भी शर्म आती है ?
सरकार से मैं आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करती हूं कि कृपया हमें इस पोर्न की विभिषिका से बचाइए !
भारतीय संस्कारी समाज की जड़े कफी हद तक खोखली हो चुकी है लेकिन जो बची है उन्हें बचाने की कृपा करिए !
ये सिर्फ स्त्री की कहानी ही नही पुरुष का दर्द भी है वो भी परिवार को बचाना चाहते हैं इस अभिशाप से ।

उसने रेखा को जकड़ लिया और पांच मिनट तक चुंबन करता रहा। जबकी रेखा को मालूम भी नहीं था कि फिल्म में ऐसा कोई सीन भी था। पां...
24/05/2024

उसने रेखा को जकड़ लिया और पांच मिनट तक चुंबन करता रहा। जबकी रेखा को मालूम भी नहीं था कि फिल्म में ऐसा कोई सीन भी था। पांच मिनट तक वो रेखा को ज़बरन किस करता रहा। सेट पर मौजूद लोग तालियां बजाते रहे। लेकिन रेखा रो रही थी। डायरेक्टर कट बोलने को तैयार नहीं था। एक्टर रेखा को छोड़ने को तैयार नहीं था। फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई महज़ 15 साल की रेखा ने हताशा में आंखें बंद कर ली। और कुछ ही देर में वो बेहोश भी हो गई। तब जाकर डायरेक्टर ने कट बोला। फिर जब रेखा होश में आई तो उसने इस पूरे वाकये पर एक्टर और डायरेक्टर से पल्ला झाड़ लिया।
वो एक्टर थे विश्वजीत चटर्जी। और डायरेक्टर थे राजा नवाथे। पत्रकार यासिर उस्मान द्वारा लिखित रेखा की जीवनी में इस घटना का ज़िक्र है। उसमें ये भी लिखा है कि इस घटना के बाद विवाद इतना बढ़ गया कि अमेरिका की मीडिया में भी इसकी चर्चा हुई। अमेरिका की बड़ी मशहूर लाइफ मैगज़ीन ने इस घटना को किसिंग क्राइसिस ऑफ इंडिया नाम दिया। इस घटना को कवर करने के लिए लाइफ मैगज़ीन की एक पत्रकार भारत भी आई। इस घटना के बारे में बात करते हुए अभिनेता विश्वजीत ने कहा कि उन्होंने तो वही किया जो डायरेक्टर ने उनसे करने को कहा था।
अमेरिकी पत्रकार ने इस घटना के बारे में रेखा से भी बात की थी। और रेखा ने इस बारे में खुलकर बात की थी। रेखा के मुताबिक चूंकि वो फिल्म के कॉन्ट्रैक्ट में बंधी थी तो उन्होंने फिल्म की शूटिंग ना चाहते हुए कंप्लीट भी की। फिल्म को जब सेंसर बोर्ड में भेजा गया तो रेखा के किसिंग सीन पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जताई। सेंसर बोर्ड ने फिल्म रिलीज़ करने से मना कर दिया। उस वक्त इस फिल्म का नाम था अंजाना सफर। ये रेखा की पहली हिंदी फिल्म थी। सेंसर बोर्ड से इजाज़त ना मिलने पर इस फिल्म के मेकर्स कोर्ट पहुंच गए। अगले दस सालों तक ये मामला कोर्ट में चला।
आखिरकार कोर्ट का फैसला फिल्म के मेकर्स के पक्ष में आया। और साल 1979 में ये फिल्म रिलीज़ हो गई। हालांकि इस वक्त तक इस फिल्म का नाम अंजाना सफर से बदलकर दो शिकारी कर दिया गया था। और डायरेक्टर भी बदल चुके थे। कहा जाता है कि अमेरिका से जो पत्रकार ये मामला कवर करने भारत आया था उसे अपनी स्टोरी के लिए तस्वीरें चाहिए थी। इसलिए फिर से उसी दृश्य को शूट करने के लिए सेट लगवाया गया था। एक्टर विश्वजीत को बुलवाया गया। और एक मॉडल को हायर किया गया। क्योंकि रेखा तो अब दोबारा वो सीन शूट करने वाली नहीं थी।
यानि ये जो तस्वीर आप इस पोस्ट के साथ देख रहे हैं इसमें विश्वजीत तो हैं। लेकिन रेखा नहीं हैं। वैसे ये कहीं से भी दिखने में रेखा जैसी लग भी नहीं रही हैं। तो साथियों, फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी-ऐसी कहानियां भी होती हैं। ये तो रेखा की कहानी थी। लेकिन जाने कितनी ही कहानियां ऐसी भी होंगी जो उन लड़कियों के साथ घटी होंगी जो कभी सामने नहीं आ सकी। क्रिएटिविटी के नाम पर फूहड़ता भी इस इंडस्ट्री में खूब होती है। और ये एक कटु सत्य है।

10/09/2023
28/01/2023
01/01/2023

पहनावा...........पूरा_जरूर_पढ़ें।।🙏🏻🙏🏻
एक महिला को सब्जीमंडी जाना था...उसने जूट का बैग लिया और सड़क के किनारे सब्जी मंडी की और चल पड़ी। तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने #आवाज़ दी : 'कहाँ जायेंगी माता जी...?'' #महिला ने ''नहीं भैय्या'' कहा तो ऑटो वाला आगे निकल गया। अगले दिन महिला अपनी #बिटिया मानवी को स्कूल बस में बैठाकर घर लौट रही थी...तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी :— ी चन्द्रनगर जाना है क्या...? महिला ने मना कर दिया।

पास से गुजरते उस ऑटोवाले को देखकर महिला पहचान गई कि ये कल वाला ही ऑटो वाला था। आज महिला को अपनी सहेली के घर जाना था। वह सड़क किनारे खड़ी होकर ऑटो की प्रतीक्षा करने लगी। तभी एक ऑटो आकर रुका :— ''कहाँ जाएंगी मैडम...?'' महिला ने देखा ये वो ही ऑटोवाला है जो कई बार इधर से गुज़रते हुए उससे पूंछता रहता है चलने के लिए...महिला बोली :— ''मधुबन कॉलोनी है ना सिविल लाइन्स में, वहीँ जाना है, चलोगे...?''

ऑटोवाला मुस्कुराते हुए बोला :— ''चलेंगें क्यों नहीं मैडम, आ जाइये...! "ऑटो वाले के ये कहते ही महिला ऑटो में बैठ गयी. ऑटो स्टार्ट होते ही महिला ने जिज्ञासावश उस ऑटोवाले से पूछ ही लिया :—''भैय्या एक बात बताइये..? दो-तीन दिन पहले आप मुझे माताजी कहकर चलने के लिए पूछ रहे थे, कल बहन जी और आज मैडम, ऐसा क्यूँ...?'' ऑटोवाला थोड़ा झिझककर शरमाते हुए बोला :—''जी सच बताऊँ... आप चाहे जो भी समझेँ पर किसी का भी पहनावा हमारी सोच पर असर डालता है।

आप दो-तीन दिन पहले साड़ी में थीं तो एकाएक मन में आदर के भाव जागे, क्योंकि मेरी माँ हमेशा साड़ी ही पहनती है। इसीलिए मुँह से स्वयं ही "माताजी" निकल गया। कल आप सलवार-कुर्तें में थीँ, जो मेरी बहन भी पहनती है। इसीलिए आपके प्रति स्नेह का भाव मन में जागा और मैंने ''बहनजी'' कहकर आपको आवाज़ दे दी। आज आप जीन्स-टॉप में हैं, और इस लिबास में माँ या बहन के भाव तो नहीँ जागते। इसीलिए मैंने आपको "मैडम" कहकर पुकारा।

शिक्षा🙏🏻🙏🏻
उपर्युक्त कहानी से हमें यह सीख मिलती हैं कि हमारे परिधान (वस्त्र) न केवल हमारे विचारों पर वरन दूसरे के भावों को भी बहुत प्रभावित करते है।

26/11/2022

याद हो कि न याद हो:

पाणिनि और उनका व्याकरण ग्रंथ--अष्टाध्यायी.

“पाणिनीय व्याकरण मानव-मस्तिष्क की प्रतिभा के उस महत्तम आश्चर्य का नमूना है जो किसी दूसरे देश में आज तक सामने नहीं आई.” (प्रोफ़ेसर मोनियर विलियम्स)

“पाणिनीय व्याकरण मानव-मस्तिष्क की सबसे महान रचनाओं में से एक है.” (प्रोफ़ेसर टी. शेरवात्सकी, लेनिनग्राद)

पाणिनि के काल के बारे में निश्चित जानकारी नहीं है. उन्हें सातवीं सदी ई. पू. से लेकर पाँचवीं सदी ई.पू. तक के बीच रखा जाता है. इतना निश्चित है कि उनके समय तक आते-आते वैदिक युग की मानक भाषा केवल आर्ष ग्रंथों तक सीमित रह गई थी; व्यवहार अर्थात्‌ बोलचाल में उससे उद्भूत भाषा का एक परिवर्तित रूप प्रचलित हो गया था, जो अलग-अलग इलाक़ों और अलग-अलग समुदायों में भिन्नता लिए हुए था. ऐसे में इस वैदिकेतर भाषा के विभिन्न रूपों को परिष्कृत और संस्कारित कर एक ऐसी समावेशी और सर्वमान्य मानक भाषा की निर्मिति का दुस्तर कार्य पाणिनि द्वारा सम्पन्न हुआ, जो एकरूप और चिरंजीवी होकर युगों-युगों के उत्कृष्ट सृजन को अपने भीतर सँजोते हुए, भारतीय प्रतिभा का कालातीत दर्पण बन गई.
पाणिनि के जन्मस्थान और उनकी कर्म-भूमि को लेकर उतना विवाद नहीं है. यह लगभग निर्विवाद है कि वे उत्तर-पश्चिमी भारत में पुष्कलावती नगर के पास के रहनेवाले थे, जो इलाक़ा तब गांधार कहलाता था. पेशावर घाटी में आज के पाकिस्तानी शहर चरसड्डा के पास पुष्कलावती के अवशेष मिले हैं. पाणिनि के भाष्यकार पतंजलि (दूसरी सदी ई.पू.) के एक संदर्भ तथा अष्टाध्यायी में उपलब्ध एक उल्लेख के आधार पर जिस गाँव में उनका जन्म हुआ था उसका नाम शलातुर था, जो आज भी चरसड्डा के सीमांत पर मौजूद है. चीन से भारत आते समय ह्वेनसांग ( सातवीं सदी) शलातुर से होकर आए थे और उन्होंने अपने यात्रा-विवरण में उस समय वहाँ पाणिनि की एक मूर्ति के विद्यमान होने का उल्लेख किया है.

पतंजलि ने पाणिनि को दाक्षीपुत्र कहा है जिससे उनकी माता का नाम दाक्षी इंगित होता है. एक विद्वान (रामभद्राचार्य) ने महज़ व्युत्पत्तिमूलक अनुमान के आधार पर उनके पिता का नाम पाणिन बताया है, जो संदेह से परे नहीं है.

पाणिनि के समय वैदिक भाषा से उद्भूत जो भाषा व्यवहार में प्रचलित थी, उसमें एकरूपता लाने और उसके मानकीकरण के लिए उसे व्याकरण के अनुशासन में बाँधने का प्रयास पहले भी हुआ था, किंतु संबंधित आचार्यों में मतैक्य नहीं था और किसी का मत सर्वमान्य नहीं हो सका था. पाणिनि ने उस संक्रमण काल की इस कठिन चुनौती को स्वीकार किया. उन्होंने विभिन्न शाखाओं की वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों का गहन अध्ययन कर उनकी शब्द-संपदा को सँजोया. फिर अपने समय में देश के भिन्न-भिन्न भागों में प्रचलित लोक-भाषा के भिन्न-भिन्न रूपों का सूक्ष्म निरीक्षण किया. दूर-दूर तक यात्राएँ कर विभिन्न समुदायों के विभिन्न पेशों में लगे लोगों द्वारा व्यवहृत शब्दों का संकलन और उनकी व्युत्पत्ति का विश्लेषण किया. ब्राह्मण, क्षत्रिय, सैनिक, व्यापारी, किसान, रँगरेज, बढ़ई, रसोइए, मोची, ग्वाले, चरवाहे, गड़रिए, बुनकर, कुम्हार आदि अनगिनत पेशेवर लोगों के पेशों में विशेष रूप से प्रयुक्त होनेवाले शब्दों का एक विशाल भंडार एकत्रकर उन्होंने अपनी समावेशी दृष्टि से उन्हें सर्व-स्वीकार्यता और नियमबद्धता की कसौटी पर कसा. फिर वैदिक भाषा के यास्क-प्रभृत वैयाकरणों तथा प्रचलित भाषा के अपने से पहले के आचार्यों के मतों का सम्यक्‌ समाहार किया. एक पूर्व आचार्य शाकटायन का मत था कि सभी संज्ञा शब्द धातुओं में प्रत्यय लगाकर बने हैं. पाणिनि ने मोटे तौर पर इस प्रमेय को मान लिया किंतु इसमें इतना जोड़ दिया कि बहुत-से ऐसे शब्द लोकजीवन के व्यवहार में आ गए हैं जिनकी धातु और उसमें लगे प्रत्यय पकड़ में नहीं आते. इस तरह विपुल सामग्री एकत्रकर उसके सूक्ष्म मनन-विश्लेषण के उपरांत उन्होंने आठ अध्यायों के अपने अद्भुत्‌ ग्रंथ अष्टाध्यायी की रचना की, जिसमें उपरोक्त सामग्री का ऐसा सांगोपांग और युक्तिसंगत विवेचन है कि प्रचलित भाषा के पाणिनि के पहले के व्याकरण-ग्रंथ अप्रासंगिक होकर लुप्त हो गए; उनके बारे में आज उतना ही ज्ञात है जितना अष्टाध्यायी में आए उनके संदर्भों में उपलब्ध है.

पाणिनि ने अपनी मौलिक प्रतिभा से धातुओं (roots) से नए-नए शब्द निर्मित करने की एक वैज्ञानिक पद्धति भी नियम-बद्ध कर दी. फलस्वरूप विपुल क्षमतावाली जिस एकरूप मानक भाषा की निर्मिति हुई, उसी का नाम संस्कृत (जिसका संस्कार या परिष्कार किया गया हो) है. यह मुख्यत: पाणिनि का ही योगदान है कि उनके द्वारा गढ़ी यह मानक भाषा काल के अनवरत प्रवाह के साथ सहस्राब्दियों की मेधा अपने अंतस में समेटे अपनी अविच्छिन्न एकरूपता में एक अजस्र सांस्कृतिक जलस्रोत-सी प्रवाहित होती हम तक पहुँची है. इस तरह जिसे हम प्राचीन भारतीय संस्कृति के नाम से जानते हैं उसकी निर्मिति के भाषायी उपादान और उसके प्रवाह की निरंतरता को अक्षुण्ण रखने में पाणिनि-निर्मित संस्कृत भाषा का योगदान अप्रतिम है.

पाणिनि ने घूम-घूमकर लोकभाषा के जिस बहुमुखी वैभिन्य और विस्तार को अपनी आँखों से देखा था, उसके बिना भाषा का वह मानक किंतु सर्वग्राह्य रूप मूर्तिमान नहीं हो सकता था जिसने पूरे देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँधकर उसे एक अविभाज्य सांस्कृतिक इकाई बना दिया. इस तरह अपनी सांस्कृतिक बहुलता में अंतर्भूत एकता के लिए यह देश पाणिनि का हमेशा ऋणी रहेगा.

कहना न होगा, आज हिंदी को सारे देश में ग्राह्य बनाने के लिए ऐसी ही किसी प्रतिभा और उसके द्वारा ऐसे ही अध्यवसाय की ज़रूरत है.
पाणिनि ने इस प्रक्रिया में भाषाशास्त्र और व्युत्पत्ति शास्त्र के जिन सिद्धांतों की खोज की वे वैश्विक स्तर पर भाषाशास्त्रीय ज्ञान की धरोहर बन गए. 19वीं शताब्दी में यूरोप अष्टाध्यायी से परिचित हुआ और तब फ्रैंज़ बॉप (Franz Bopp) के माध्यम से इस ग्रंथ ने आधुनिक भाषाशास्त्रीय विमर्श को एक नई दिशा प्रदान की. फर्डिनैंड डि सॉसर (Ferdinand de Saussure), लिओनार्ड ब्लूमफ़ील्ड (Leonard Bloomfield), रोमन जैकॉब्सन (Roman Jakobson) और फ़्रिट्स स्टाल (Frits Staal) जैसे भाषाशास्त्रियों ने अष्टाध्यायी के प्रमेयों पर चलकर ही अपनी स्थापनाएँ स्थिर कीं. अष्टाध्यायी के अध्ययन के आधार पर ही फ़्रिट्स स्टाल (1930-2012) ने यूरोपीय भाषा-समुदाय पर भारतीय विचारों के प्रभाव का आकलन किया.

पाणिनि ने भाषारूपीय (morphological) विश्लेषण का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया था वह बीसवीं सदी के मध्य तक सामने आए सभी पश्चिमी सिद्धांतों से अधिक उन्नत माना जाता रहा (Encyclopedia Britannica.2013, www.britannica,com). समासीकृत संज्ञाओं (noun compounds) पर उनकी विवेचना आज भी भाषाशास्त्र में समासीकरण के सिद्धांतों का मूल आधार है और इन सिद्धांतों में ‘बहुब्रीहि‘ तथा ‘द्वंद्व’ जैसे शब्द संस्कृत से ही उधार लिए गए हैं. पाणिनि के भाषागत सूक्ष्म निरीक्षण का जो स्तर है, ग्रीक और लैटिन के वैयाकरणों में उसकी छाया तक नहीं मिलती. यही कारण है कि आज भारत ही नहीं, पूरा विश्व कोषविज्ञान (lexicography), भाषारूप-विधान (morphology), वाक्य-विन्यास (syntax) और अर्थ-विधान (semantics) में पाणिनि की अनेक सुविचारित और सुसंगत अवधारणाओं का वाहक है.

यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि पाणिनीय व्याकरण भारतीय विचार-पद्धति में अध्यात्मेतर, लौकिक दृष्टि का प्रवेश-बिंदु है {Bloomfield, L.,1929 ‘Review of Liebich, Konkordanz Panini-Candra’, Language (Journal) 5, 267-276}. पाणिनि की अष्टाध्यायी इसी लौकिक दृष्टि की भाषाशास्त्रीय अभिव्यक्ति है.

पाणिनि का एक-एक सूत्र और उसमें प्रयुक्त एक-एक शब्द इतने प्रामाणिक हैं कि उनमें हमें शब्द-कोष, व्युत्पत्ति, भाषारूप, अर्थ-विधान, वाक्य-विन्यास से सम्बंधित बारीक ज्ञान ही नहीं मिलता, उनके द्वारा दिए गए उदाहरणों और समानधर्मा वैयाकरणों के संदर्भों से तत्कालीन लोक-व्यवहार, आर्थिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक जीवन तथा भौगोलिक संरचना का यथार्थ ख़ाक़ा भी उभरता है. इस तरह अष्टाध्यायी महज़ व्याकरण और भाषाशास्त्र का ग्रंथ नहीं है, बहुआयामी इतिहास और भूगोल का समग्र दर्पण भी है (जिसके कुछ अंश का संक्षिप्त उल्लेख अष्टाध्यायी की विषय-वस्तु के संदर्भ में नीचे किया गया है).

अष्टाध्यायी

अष्टाध्यायी में कुल 3996 सूत्र (याद करने की सुविधा के लिए घनीभूत, अल्पतम शब्दों और संगर्भित अर्थोंवाले सूक्ष्म और स्वयं में पूर्ण नियम) हैं. इन्हें आठ अध्यायों में बाँटा गया है और प्रत्येक अध्याय के चार-चार पाद हैं. इसके अतिरिक्त अष्टाध्यायी के तीन परिशिष्ट हैं :

1.चौदह माहेश्वर सूत्र-- ये अष्टाध्यायी के प्रारम्भ में दिए हुए वर्णों या ध्वनियों (phonemes) के 14 वर्गीकरण हैं.

2.धातुपाठ—पाणिनि ने अपने संकलित शब्द-भंडार से धातुओं (roots) को अलग छाँटकर कुल 1943 धातुओं की सूची बनाई है. ये धातुएँ दो प्रकार की हैं—एक, जो पहले साहित्य में प्रयुक्त हो चुकी थीं; और दो—जो पाणिनि को लोकजीवन में प्रचलित बोलचाल की भाषाओं में मिलीं.

3.गणपाठ—ये उन समूहों या समुदायों की कोषीय सूची है जिनके गुणों में पाणिनि को समानता दिखाई पड़ी थी.

माहेश्वर या शिव के चौदस सूत्र संस्कृत वर्णमाला के चौदह उपसमूह हैं जो पाणिनि के पहले से प्रचलित थे. इनकी उत्पत्ति लोकोत्तर मानी जाती है. इस सम्बंध में यह श्लोक बहुत प्रचलित है‌‌‌--

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्‌।
उद्धर्तुकामो सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्र जालम्‌॥

[तांडव नृत्य के अवसान पर नटराज शिव ने सनकादि ( सनक, सनातन, सनकनंदन, सनत्कुमार) ऋषियों के उद्धार की कामना से चौदह (नव+पञ्च) बार डमरू बजाया. इस प्रकार चौदह सूत्रों का यह जाल प्रकट हुआ.]

चौदह माहेश्वर सूत्र इस प्रकार हैं—

अ इ उ ण्‌
ऋ लृ क्‌
ए ओ ङ्‌
ऐ औ च्‌
ह य व र ट्‌
ल ण्‌
ञ म ग ण न म्‌
झ भ ञ्‌
घ ढ ध ष्‌
ज ब ग ड द श्‌
ख फ छ ठ थ च ट त व्‌
क प य्‌
श ष स र्‌
ह ल्‌

वर्णमाला का यह वर्गीकरण याद करने में इतना सुगम है कि बचपन में लघु सिद्धांत कौमुदी घोखते समय मुझे पता ही नहीं चला कि ये कब याद हो गए. पहले का बहुत कुछ भूल जाने के बावजूद ये भूलने का नाम नहीं लेते. इनकी लयबद्धता में अपूर्व संगीत है और पंडित जसराज ने इन्हें शास्त्रीय संगीत की तर्ज़ पर कोरस में गाया है, जिसकी सी.डी. उपलब्ध है. उसे सुनते हुए वस्तुत: डमरू की-सी आवाज़ का आभास होता है. यह संस्कृत की संपूर्ण वर्णमाला है और यही पाणिनीय व्याकरण का मूल आधार है. इसमें हर सूत्र का अंतिम हलंत अक्षर वैसे तो शोभामूलक है जिसे इत्‌ (भाष्यकारों द्वारा अनुबंध) कहा जाता है किंतु संक्षेप के लिए वह अपने पूरे वर्ग का संकेतक है. जैसे च्‌ से पूरे चौथे समूह "ऐ औ च्‌" का बोध हो जाता है. अष्टाध्यायी का पहला सूत्र है ‘वृद्धिरादैच्‌’ जिसमें अंतिम वर्ण च्‌ तीनों ध्वनियों ऐ औ च्‌ को इंगित करता है. प्रत्येक वर्ग को प्रत्याहार कहा जाता है और उसके संक्षिप्त प्रयोग की एक सुविचारित पद्धति है जो सभी पाणिनीय सूत्रों में एकरूप प्रयुक्त हुई है.

गणपाठ का परिशिष्ट तत्कालीन इतिहास की एक झाँकी के लिए बहुत बहुमूल्य है. एक गण सगोत्रों का है. वैसे तो वैदिक काल से सात गोत्र ही चले आ रहे थे किंतु पाणिनि के काल तक उनका बहुत विस्तार हो चुका था. पाणिनि ने वैदिक और लौकिक दोनों भाषाओं में उपलब्ध कुटुंब-नामों की एक विस्तृत सूची बनाई. एक गोत्र या कुटुंब में सपिंड, स्थविर (बूढ़े) पिता, पुत्र, पौत्र आदि के नाम कैसे रखे जाते थे, पाणिनि ने इसका विस्तार से उल्लेख किया.

गणपाठ में पाणिनि की एक और सूची भौगोलिक है. उन्होंने अपने उत्तर-पश्चिमी प्रांत के 500 ऐसे ग्रामों का नामोल्लेख किया है जो यथार्थ में थे. पाणिनि ने पंजाब के दो गाँवों के नाम दिए हैं सुनेत्र और शैरीषक जिनकी पहचान आज के सुनेत और सिरसा से होती है. पंजाब में अनेक जातियों के नाम उन गाँवों पर थे जहाँ वह निवास करती थी या जहाँ से उसके पूर्वज आए थे, जिन्हें ‘अभिजन’ कहा जाता था. इन दोनों स्थानों से बननेवाले नाम पुरुषों के नाम के आगे उपनाम के रूप में जुड़ जाते थे.

पाणिनि ने अपने प्रदेश के पूर्व में स्थित त्रिगर्त भूखंड का ज़िक्र किया है जो आज का कुल्लू-काँगड़ा है. पश्चिम के पहाड़ी प्रदेश में निवास करनेवालों की संस्कृति तथा सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पाणिन के काल में भी जनजातीय या क़बीलाई थी. उसके उत्तर में दरद भूखंड था जिसे आज गिलगित कहते हैं और दक्षिण में था सौवीर जो आज का सिंध है. पाणिनि ने पश्चिमोत्तर पहाड़ी प्रदेश के क़बीलों की विस्तृत सूची बनाई और उनकी शासन-पद्धति का अध्ययन किया , जिसे ग्रामणी शासन कहते थे. ग्रामणी वस्तुत: जनजाति के मुखिया की पदवी थी. उनकी पंचायत को व्रातपूग, संघ या गण कहते थे, जिसे अब जिरगा कहते हैं. सभी संघों की शासन-प्रणाली एक-सी नहीं थी. इनमें से कुछ क़बीले लूटपाट से जीविका चलाते थे जिन्हें पाणिनि ने ‘उत्सेदजीवी’ कहा है. इन क़बीलों के बहुत से नाम गणपाठ में मिलते हैं, जैसे देवदत्त (जो किसी क़बीले का पूर्वपुरुष रहा होगा), आप्रीत और मधुमंत. सार्वभौम इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद भी इनकी क़बीलाई जन-संस्कृति और शासन-व्यवस्था में विशेष अंतर नहीं आया है.

गणपाठ की सूचियों में एक सूची जनपदों की है. मध्य एशिया के ऊपरी भाग में वंक्षु नदी के उत्तर कंबोज जनपद स्थित था, पश्चिम में कच्छ, पूरब में सूरमस (आज के आसाम प्रदेश की सूरमा घाटी) और दक्षिण में गोदावरी के तट पर अश्मक. इन सीमाओं के बीच मध्यदेश का विशाल भूभाग भी भिन्न-भिन्न जनपदों में बँटा हुआ था.

पाणिनि ने आर्थिक जीवन के भाषाशास्त्रीय पक्ष का अध्ययन करने के लिए बाज़ार में प्रचलित सिक्कों की भी सूची बनाई . शतमान, कार्षापण, सुवर्ण, अंध, पाद, माशक, त्रिशत्क (तीन मासे की तौल का सिक्का) और विंशतिक ( बीस मासे की तौल का सिक्का). कुछ समूह जिन्स के विनिमय (barter) से काम चलाते थे, जिसे ‘निमान’ कहा जाता था.

अष्टाध्यायी का 3996 सूत्रोंवाला मुख्यभाग इतना जटिल और तकनीकी है कि उसका वर्णन ऐसे किसी आलेख में असंभव है. संस्कृत व्याकरण के पारंपरिक छात्र पहले तो सूत्रों को रट जाते हैं, फिर उनकी व्याख्या समझने में दस-दस साल लगा देते हैं. किंतु एक बार व्याकरण का अध्ययन कर लेने के बाद उन्हें संस्कृत में महारत हासिल हो जाती है और अलग से कुछ पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती. फिर तो वे स्वाध्याय से कुछ भी सीख-समझ सकते हैं. संस्कृत व्याकरण की पद्धति है ही ऐसी.

अष्टाध्यायी पर पतंजलि के महाभाष्य के बाद 8वीं और 15वीं सदी में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ. भट्टोजि दीक्षित (17वीं सदी) का ग्रंथ वैयाकरणसिद्धांतकौमिदी और उसके बाद आए पंडित रामाश्रम का वैयाकरणसिद्धांतचंद्रिका दो ऐसे भाष्य हैं, जो संस्कृत व्याकरण के भारतीय विद्यार्थियों के बीच विशेष लोकप्रिय हैं.

भारत सरकार ने 2004 में पाणिनि की स्मृति में पाँच रुपए का डाकटिकट जारी किया था.

जैसा कि उपरोक्त विमर्श से स्पष्ट है, आज सम्पूर्ण विश्व पाणिनि के आधारभूत और उच्चस्तरीय भाषाशास्त्रीय काम के लिए उनका ऋणी है. उनका योगदान शुद्ध रूप से अकादमिक और सेक्यूलर है, जिसका किसी धर्म से कोई अनिवार्य सम्बंध नहीं. ऐसे में यदि पाकिस्तान सरकार उनके जन्म-स्थान शलातुर में उनका कोई स्मारक या संग्रहालय बनवाए तो यह विश्व-संस्कृति के एक महान स्तंभ के प्रति यथोचित सम्मान होगा. क़ायदे से देखा जाए तो पाणिनि अपने जन्म-स्थान की दृष्टि से पाकिस्तान के राष्ट्रीय गौरव हैं. लेकिन अपनी जड़ों से विच्छिन्न और इस विच्छेद को ही अपनी अस्मिता का पर्याय माननेवाले लोगों से ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है। भारत सरकार की दृष्टि भी कभी सतही सेक्युलरवाद तो कभी खोखले राष्ट्रवाद से राजनीतिक लाभ उठाने के अतिरिक्त कहीं और कहाँ जाती है ! तो भारत सरकार को भी अपनी सांस्कृतिक कृपणता में पाणिनि के नाम पर पाँच रुपए का डाकटिकट जारी करने से इतर कुछ और कैसे सूझेगा ?
✍🏻कमलाकांत त्रिपाठी

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