31/07/2024
#शहीद_ऊधम_सिंह (बलिदान दिवस)
(26 दिसंबर 1899 – 31 जुलाई 1940)
अपनी मातृभूमि के लिए मेरे मरने से ज्यादा बड़ा सम्मान क्या हो सकता है-शहीद ऊधम सिंह
संक्षिप्त परिचय
● शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के समय अहिंसा के मानकों से आगे बढ़कर देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। शहीद ऊधम सिंह को अपनी क्रांतिकारिता और वीरता के लिए प्रशंसा और गौरवभाव से याद किया जाता है। शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में शीर्ष बलिदानियों में गिने जाने वाले व्यक्ति हैं।उनका जीवन संघर्ष और साहस देशभक्ति की मिसाल है।
● शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। उनका असली नाम शेर सिंह था, लेकिन उन्हें शहीद ऊधम सिंह के नाम से जाना जाता है। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए इंग्लैंड में माइकल ओ'डायर की हत्या की, जो उस समय पंजाब का गवर्नर था और जलियांवाला बाग हत्याकांड का मुख्य जिम्मेदार था।
● शहीद ऊधम सिंह ने ब्रिटिश राज समय में भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के पीड़ितों के लिए बदले की तलवार उठाई।
● शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने अद्भुत साहस और निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। उनके बलिदान ने भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया और उनकी वीरता एवं निष्ठा ने उन्हें एक राष्ट्रीय हीरो के रूप में याद किया जाता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
● शहीद ऊधम सिंह का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता का जल्दी निधन हो गया था, जिसके बाद उन्हें अमृतसर के एक अनाथालय में भेजा गया। अनाथालय में रहते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की।
● शिक्षा के दौरान ही उनमें देशभक्ति की भावना जाग्रत हुई और वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। उस समय पंजाब तीव्र राजनीतिक उथल-पुथल से ओतप्रोत था और शहीद ऊधम सिंह अपने चारों ओर हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए बड़े हुए थे।
वर्ष 1919, जिसने ऊधम सिंह के विचारों को बदल दिया:
● वर्ष 1919 ऊधम सिंह के जीवन में व्यापक बदलाव का वर्ष रहा, उस समय पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक जन-आक्रोश बढ़ रहा था और रोलेट एक्ट के कारण भी जन आक्रोश तेजी से बढ़ता जा रहा था।
● महात्मा गांधी ने रौलटएक्ट के विरोध में देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया और 6 अप्रैल 1919 को पंजाब के लोगों से जबरदस्त प्रतिक्रिया प्राप्त की।अमृतसर मेंब्रिटिश प्रशासन ने जनरल माइकल ओ'डायर को नेतृत्व दिया।
● इसी क्रम में 10 अप्रैल, 1919 को कई स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जैसे कि सत्यापाल और सैफुद्दीन किचलू को रौलटएक्ट केअंतर्गत गिरफ्तारकिया गया था।
● परिणामस्वरूप पंजाब के लोगों में व्यापक आक्रोश और असंतोष के कारण गिरफ्तारियां हुईं, अमृतसर में नागरिकों और ब्रिटिश सैनिकों के बीच हिंसक दंगे भड़क गए। 13 अप्रैल, 1919 को, अमृतसर के जलियांवाला बाग में 10,000 से अधिक निहत्थे पुरुषों,महिलाओं और बच्चों की भीड़ जमा हुई (चारों तरफ दीवारों से घिरा एक खुला मैदान और केवल एक निकास के साथ)। यह बैसाखी त्योहार का दिन था औरमैदान में इकट्ठा होने वाले कई हजारों लोग दूर-दूर के गांवों से अमृतसर में मेलों में शामिल होने के लिए आए थे और डायर के प्रतिबंध के आदेश से अनजानथे। ऊधम सिंह और उनके दोस्त अनाथालय से जलियांवाला बाग में आए थे और उन्हें प्यासे लोगों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। वे ऐसा कर रहे थे,जब डायर ने अपने सैनिकों को वहां पहुँचाया, केवल बाहर निकलने वाले दरवाजे को बंद कर दिया और बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर गोलियां चला दीं।
● उधमसिंह, उस समय मात्र 20 साल के थे, इस घटना से उनको गहरा आघात लगा और उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। वे जल्द ही सशस्त्र प्रतिरोध में शामिल हो गए, जो भारत के भीतर औरबाहर जारी था।
● 1920 के दशक की शुरुआत में, उन्होंने पूर्वी अफ्रीका की यात्रा की, जहां उन्होंने अमेरिका अपना ठिकाना बनाने से पहले कुछ समय के लिएएक मजदूर के रूप में काम किया।
आगे की यात्रा और रणनीति
● सैनफ्रांसिस्को में, वे पहली बार ग़दर पार्टी (ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए अप्रवासी पंजाबी-सिखोंद्वारा आयोजित एक क्रांतिकारी आंदोलन) के सदस्यों के संपर्क में आए। 1927 में, उन्होंने भारत की यात्रा करने वाले जहाज पर एक बढ़ई के रूप मेंकाम करके पंजाब (भगत सिंह के आदेश पर) में वापस अपना केंद्र बनाया। उसी वर्ष, उन्हें अवैध हथियार रखने और ग़दर पार्टी के मौलिक प्रकाशन,“ग़दर दी गुंज” को चलाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। 1931 तक उन्हें चार साल की जेल हुई।
● शहीद ऊधम सिंह को 1931 में रिहा किया गया था, लेकिनभगत सिंह के हिंदुस्तान सोशलिस्टरिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ घनिष्ठ संबंध के कारण ब्रिटिश पुलिस की निरंतर निगरानी में रहे। इसी बीच उन्होंने कश्मीरमें अपना ठिकाना बना लिया, जहाँ उन्होंने पुलिस से बचने और जर्मनी भागने के लिए एक अन्य व्यक्ति का प्रयोग किया।
● शहीद ऊधम सिंह माइकल ओ'डायर की हत्या के उद्देश्य से 1933 में इंग्लैंड पहुँचे, जिसे वह क्रूर जलियाँवाला नरसंहार के लिए उन्हें जिम्मेदार मानते थे (ओ डायर ने हत्याकांड को "सही कार्रवाई“ भी कहा था)। लंदन में, वह एक बढ़ई, मोटर मैकेनिक और साइनबोर्ड चित्रकार के रूप में काम करतेहुए समाजवादी समूहों के साथ जुड़ गए।
नरसंहार का बदला
● शहीद ऊधम सिंह उस कारण को कभी नहीं भूल पाए जिसके लिए वह इंग्लैंड आए थे। उन्हें पता था कि अपना लक्ष्य प्राप्त करने का समय आ गया है, जब उन्हें पता चला कि माइकल ओ’ डायर13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटनहॉल में एक बैठक को संबोधित करने वाला था।
● सम्मेलन के दिन, सिंह ने अपनेओवरकोट में एक रिवॉल्वर छिपाई औरकैक्सटनहॉल में घुस गए तथा बैठक समाप्त होने के बाद मंच से दो बार ओ'डायर को गोली मार दी। उन्होंने गिरफ्तारीसे बचने या भागने की कोशिश नहीं की और उन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया गया।
बलिदान
● शहीद ऊधम सिंह ने न्यायालय में अपनी पहचान बताई और गर्व के साथ अपने कृत्य को स्वीकार किया। उन्होंने अपने देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के अन्याय का प्रतिशोध लेने की भावना को खुलकर व्यक्त किया।
● शहीद ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 के दिन मौत की सजा सुनाई गई और उन्हे लंदन के पेंटोनविले जेल में फाँसी पर लटका दिया गया और जेल के मैदान में ही दफन कर दिया गया।
कांग्रेस ने किया स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान
● 1974 में, ऊधम सिंह की अस्थियों को भारत लाया गया और उसके पश्चात् पंजाब में उनके जन्म स्थान सुनाम गाँव में उनकी अस्थियाँ ले जाई गई। उनकी अस्थियाँ सतलुज नदी में प्रवाहित की गई जहाँ पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के अस्थि कलश भी प्रवाहित किए गए थे।
● अब यहाँ प्रश्न यह खड़ा होता है कि ऊधम सिंह 1940 में शहीद हुए थे परन्तु उनकी अस्थियाँ 1974 में भारत लाई गई। देश के लिए अपने जीवन को बलिदान करने वाले इन महान शहीदों के प्रति तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इतनी अनदेखी क्यों की? उनकी अस्थियाँ लाने में इतना लंबा समय क्यों लगा ? इसी प्रकार श्याम जी कृष्ण वर्मा की अस्थियों को लाने में भी भूतपूर्व सरकारों ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
● शहीदों की अनदेखी करना कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि भूतपूर्व सरकार ने अपने कार्यकाल में अलग-अलग अवसरों पर इस तरह के कार्य किए है जिससे शहीदों के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट होता है। उदाहरण के लिए लोकसभा में 17 नवम्बर, 1972 को एक संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हो रही थी। उस दिन अंडमान और निकोबार द्वीप का नाम बदलकर ‘शहीद और स्वराज द्वीप’ किया जाना प्रस्तावित था। चर्चा के दौरान कांग्रेस (आई) के सांसद, राम गोपाल रेड्डी ने सुभाष चन्द्र बोस, श्री अरविन्द और विनायक दामोदर सावरकर को ‘आतंकवादी’ कहकर संबोधित किया। जब इसका विरोध हुआ तो रेड्डी ने कहा कि मुझे यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने शर्मसार करने वाले इस शब्द पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी। ऐसा लगता है कि क्रांतिकारियों के अपमान को उन्होंने अपनी मौन स्वीकृति दी थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा की स्थापना
● 8 सितंबर 2022 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभास चंद्र बोस की प्रतिमा का अनावरण किया जिसे आंध्रप्रदेश के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने तैयार किया था। इण्डिया गेट पर जिस छतरी के नीचे नेताजी की प्रतिमा स्थापित की गयी है उसमें कभी जार्ज पंचम की प्रतिमा होती थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद जार्ज पंचम की प्रतिमा तो हटा दी गयी लेकिन तब से ये छतरी खाली थी। यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है कि आजादी के बाद से इतने वर्षों तक ये छतरी खाली क्यों रही? क्यों किसी स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा को इस छतरी के नीचे स्थान नहीं दिया गया ? यह इसी बात का प्रमाण है कि कांग्रेस सरकार ने किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को इस स्थान के लायक ही नहीं समझा। इस ऐतिहासिक गलती का वर्तमान मोदी सरकार ने संज्ञान लिया और तुरंत प्रभाव से आगे की कार्यवाही की, जिसके परिणामस्वरूप अब वहाँ नेताजी सुभास चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गयी है जो स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि को दर्शाती है।
देश के युवाओं को संदेश
● अपने परीक्षण के दौरान, ऊधम सिंह ने अपना परिचय नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद के रूप में दिया, जो उनकी बांह पर एक प्रतीक के रूप में अंकित था कि भारत में सभी धर्म ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट थे।
पंजाब के प्रेरणास्रोत
● शहीद ऊधम सिंह पंजाब के महान स्वतंत्रता सेनानी हैं।शहीद ऊधम सिंह का जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी दृढ़ता, साहस और देशभक्ति हमें सिखाती है कि अपने देश और अपने लोगों के लिए किस प्रकार निस्वार्थ भाव से कार्य किया जा सकता है।
● उनकी कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि न्याय के लिए संघर्ष करना और अन्याय का विरोध करना हमारी जिम्मेदारी है।शहीद ऊधम सिंह का बलिदान भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित हैऔर वे हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। उनका जीवन और उनकी वीरता हमें सदैव प्रेरित करती रहेगी।
विरासत और सम्मान
शहीद ऊधम सिंह की शहादत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई ऊर्जा और दिशा दी। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक हैं और पंजाब के साथ-साथ पूरे भारत में एक प्रेरणास्रोत हैं। भारत सरकार ने उनके सम्मान में कई स्मारक और संस्थान स्थापित किए गए हैं, जैसे कि:
● शहीद ऊधम सिंह नगर: उत्तराखंड का एक जिला उनके नाम पर रखा गया है।
● शहीद ऊधम सिंह कॉलेज और विश्वविद्यालय: उनके नाम पर कई शैक्षणिक संस्थान स्थापित किए गए हैं।