भारतीय इतिहास संकलन समिति, कानपुर प्रान्त

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कल दिनाँक 28-03-2025 से S.N.Sen P.G. College Kanpur में प्रारंभ हो रही दो-दिवसीय (28-29 मार्च) राष्ट्रीय संगोष्ठी में अप...
27/03/2025

कल दिनाँक 28-03-2025 से S.N.Sen P.G. College Kanpur में प्रारंभ हो रही दो-दिवसीय (28-29 मार्च) राष्ट्रीय संगोष्ठी में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें। अतः आप सभी से S.N. Sen P.G. College, Kanpur में प्रातः 10:00 बजे अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करने का आग्रह है।
सादर नमस्कार।🙏

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन hybrid mode (offline+Online) पर किया जा रहा है। अतः जो भी सहभाग करना चाहते हैं वो नीचे दिए हुए link से अपना पंजीकरण कर सकते हैं।

https://docs.google.com/forms/d/1kFXbWGeiI8szFKY7eS67O6IAIzqpfM5G6L3NSrDCu8k/edit?ts=67911c2e

इतिहास संकलन समिति, कानपुर प्रान्त के एस. एन. सेन पी. जी. कॉलेज में युग-युगीन कानपुर विषय पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठ...
20/03/2025

इतिहास संकलन समिति, कानपुर प्रान्त के एस. एन. सेन पी. जी. कॉलेज में युग-युगीन कानपुर विषय पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है।

इसमें प्रतिभाग के लिए नीचे दिए link पर अपना registration कराये-
https://docs.google.com/forms/d/1kFXbWGeiI8szFKY7eS67O6IAIzqpfM5G6L3NSrDCu8k/edit?ts=67911c2e

Google form for the seminar ‘Kanpur through the ages: unveiling the layers of history (Yug-Yugin Kanpur)

आज दिनाँक 09-11-2024 को कानपुर विश्वविद्यालय के पंडित दीनदयाल उपाध्याय सभागार में साधारण सभा की बैठक के निमित्त अखिल भार...
09/11/2024

आज दिनाँक 09-11-2024 को कानपुर विश्वविद्यालय के पंडित दीनदयाल उपाध्याय सभागार में साधारण सभा की बैठक के निमित्त अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री आदरणीय संजय श्रीहर्ष जी भाईसाहब, विश्वविद्यालय के प्रति-कुलपति आदरणीय प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी जी, प्रान्त महासचिव डॉ सुनील कुमार सिंह जी, संगठन सचिव श्री अमित जी, सह-संगठन सचिव श्री राघवेंद्र जी, महिला इतिहासकार प्रमुख डॉ मनीषा दीवान जी, सह-लेखक प्रमुख डॉ शालिनी मिश्रा, सोशल मीडिया प्रमुख अनुराग सिंह, युवा इतिहासकार प्रमुख महेंद्र सिंह विष्ट, सह लेखक प्रमुख अजय प्रजापति तथा अन्य प्रांतीय पदाधिकारी एवं सदस्यों की उपस्थिति रही। जिसमें प्रान्त कार्यकारणी और सदस्यों ने साधारण सभा की बैठक के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा के साथ-साथ अकादमिक गतिविधियों पर भी सहमति बनी।

आज दिनांक 28 अगस्त,2024 ईo को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रांत और कानपु...
28/08/2024

आज दिनांक 28 अगस्त,2024 ईo को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रांत और कानपुर महानगर ईकाई ने
"इतिहास दिवस"
एवं
"निधि समर्पण"
कार्यक्रम का आयोजन किया,जिसमे माननीय संजय जी भाईसाहब (सह संगठन मंत्री अखिल भारतीय इतिहास योजना), प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी (प्रति- कुलपति, C.S.J.M.U) जी का उदबोधन प्राप्त हुआ। इसमें डॉ सुनील सिंह, डॉ सुमन शुक्ला, डॉ शालिनी मिश्रा, डॉ मनीषा दीवान, डॉ जितेंद्र सिंह, अमित जी, अनुराग सिंह, हरिओम, नितिन, शुभम तथा अन्य सदस्यगण उपस्थित हुए।
डाॅ सुनील सिंह जी ने सभी का धन्यवाद और आभार प्रकट किया।

इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रान्त के सभी जिला इकाइयों द्वारा बाबा साहेब आम्टे जी का चित्र और भारत माता के चित्र के साथ बैठकर इतिहास विषय पर मुख्य कार्यकर्ता द्वारा बौद्धिक के प्रदान किया गया है। इकाइयों के कार्यक्रम संचालकों की सूची निम्नवत है-
कार्यक्रम स्थल प्रमुख कार्यकर्ता
1- कानपुर नगर- डॉ सुनील जी
2- झाँसी- श्री सत्यम जी
3- चित्रकूट- डॉ महेंद्र जी
4-फतेहपुर-श्री राघवेंद्र जी
5-बाँदा-डॉ ऋषि रंजन जी,
6- हम्मीरपुर *महोबा-डॉ चित्रगुप्त जी
7-औरैया- श्री मुनीस जी
8- इटावा - श्री अमित जी
9-फरुखाबाद -श्री संजीव जी
10-कन्नौज- श्री सुदीप शर्मा जी

आज दिनांक 28 अगस्त,2024 ईo को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रांत और कानपु...
28/08/2024

आज दिनांक 28 अगस्त,2024 ईo को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रांत और कानपुर महानगर ईकाई ने
"इतिहास दिवस"
एवं
"निधि समर्पण"
कार्यक्र।म का आयोजन किया,जिसमे माननीय संजय जी भाईसाहब (सह संगठन मंत्री अखिल भारतीय इतिहास योजना), प्रो. सुधीर कुमार अवस्थी (प्रति-कुलपति, C.S.J.M.U) जी का उदबोधन प्राप्त हुआ। इसमें डॉ सुनील सिंह, डॉ सुमन शुक्ला, डॉ शालिनी मिश्रा, डॉ मनीषा दीवान, अमित जी, अनुराग सिंह, हरिओम, नितिन शिवम तथा अन्य सदस्यगण उपस्थित हुए।
डाॅ सुनील सिंह जी ने सभी का धन्यवाद और आभार प्रकट किया।

इतिहास संकलन समिति कानपुर प्रान्त के सभी जिला इकाइयों द्वारा बाबा साहेब आम्टे जी का चित्र और भारत माता के चित्र के साथ बैठकर इतिहास विषय पर मुख्य कार्यकर्ता द्वारा बौद्धिक के प्रदान किया गया है। इकाइयों के कार्यक्रम संचालकों की सूची निम्नवत है-
कार्यक्रम स्थल प्रमुख कार्यकर्ता
1- कानपुर नगर- डॉ सुनील जी
2- झाँसी- श्री सत्यम जी
3- चित्रकूट- डॉ महेंद्र जी
4-फतेहपुर-श्री राघवेंद्र जी
5-बाँदा-डॉ ऋषि रंजन जी,
6- हम्मीरपुर *महोबा-डॉ चित्रगुप्त जी
7-औरैया- श्री मुनीस जी
8- इटावा - श्री अमित जी
9-फरुखाबाद -श्री संजीव जी
10-कन्नौज- श्री सुदीप शर्मा जी

🇮🇳🇮🇳🇮🇳            ाल_ढींगरा   (18 फरवरी 1883 — 17 अगस्त 1909) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अप्रतिम क्रान्तिकारी थे। भार...
17/08/2024

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ाल_ढींगरा
(18 फरवरी 1883 — 17 अगस्त 1909)

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अप्रतिम क्रान्तिकारी थे। भारतीय स्वतंत्रता की चिनगारी को अग्नि में बदलने का श्रेय महान शहीद मदन लाल धींगरा को ही जाता है । भले ही मदन लाल ढींगरा के परिवार में राष्ट्रभक्ति की कोई ऐसी परंपरा नहीं थी किंतु वह खुद से ही देश भक्ति के रंग में रंगे गए थे । वे इंग्लैण्ड में अध्ययन कर रहे थे जहाँ उन्होने विलियम हट कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी। कर्जन वायली की हत्या के आरोप में उन पर 23 जुलाई, 1909 का अभियोग चलाया गया । मदन लाल ढींगरा ने अदालत में खुले शब्दों में कहा कि "मुझे गर्व है कि मैं अपना जीवन समर्पित कर रहा हूं।" यह घटना बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की कुछेक प्रथम घटनाओं में से एक है।

18 सितंबर 1883 को अमृतसर में जन्मे मदन लाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) के पिता दत्ता मल्ल ढींगरा पेशे से डॉक्टर थे और अमृतसर में मेडिकल ऑफिसर थे। वह ब्रिटिश हुकूमत के वफादार माने जाते थे। साल 1904 में अमृतसर में स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद मदनलाल ढींगरा को मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के लिए लाहौर भेज दिया गया। यहीं वह स्वतंत्रता आंदोलन के संपर्क में आए और राष्ट्रप्रेम की भावना जगी।
लाहौर में पढ़ाई के दौरान मदनलाल ढींगरा ने ब्रिटेन से मंगाए गए कपड़ों के खिलाफ बगावत कर दी। कॉलेज प्रबंधन ने उनपर माफी मांगने का दबाव डाला लेकिन माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया।

कॉलेज से निकाले जाने के बाद मदन लाल ढींगरा वापस घर नहीं लौटे बल्कि शिमला और बम्बई में छोटी-मोटी नौकरी शुरू कर दी। साल 1906 में उनके परिवार ने उन्हें लंदन पढ़ने के लिए मना लिया। ढींगरा का दाखिला यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में कराया गया।
लंदन में पढ़ाई के दौरान ही मदनलाल ढींगरा विनायक दमोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आए, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अभियान चला रहे थे। साल भर पहले ही वर्मा ने लंदन में ”इंडिया हाउस” की नींव रखी थी, जो क्रांतिकारियों का गढ़ बन चुका था। ढीगरा अक्सर इंडिया हाउस जाने लगे और वहां होने वाली मीटिंग में हिस्सा लेने लगे। कुछ वक्त बाद ही मदन लाल ढींगरा, सावरकर और उनके भाई द्वारा स्थापित ”अभिनव भारत मंडल” के सदस्य बन गए। इसी दौरान ढींगरा के पिता को उनके बारे में पता लगा और अखबार में विज्ञापन देकर उनसे संबंध तोड़ लिए।

23 जुलाई 1909 को धींगड़ा मामले की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई। अदालत ने उन्हें मृत्यु दंड का आदेश दिया और 17 अगस्त सन् 1909 को लंदन की पेंटविले जेल में फाँसी पर लटका कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी। मदन लाल ढींगरा के शव को लंदन में ही दफना दिया गया था। 1976 में ढींगरा के शव के अवशेष को भारत लाया गया और अमृतसर के मल्ल मंडी इलाके में अंतिम संस्कार किया गया था।

फांसी के दिन 17 अगस्त 1909 को पेंटनविले जेल के सामने भारी भीड़ जमा थी. इनमें थोड़े ही भारतीय थे. फांसी के इंतजार या फिर फांसी के लिए ले जाये जाते समय ढींगरा की मस्ती ने अंग्रेजों को विचलित कर दिया. “द टाइम्स” में क्रन्तिकारियों से हमदर्दी रखने वाली मिस अजेंस ने लिखा ,”मातृभूमि से इतना गहरा प्यार. रस्सियों से बंधे ढींगरा से आखिरी इच्छा पूछी जाती है. जवाब में वन्देमातरम की गूंज सुनाई देती है. माँ! भारतमाता आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ. और उसने फांसी के फंदे को चूम लिया. फंदा पहनते समय भी वह गर्व से अपना मत्था ऊंचा किये हुए था. जल्लाद ने उसे सहारा देने की कोशिश की. उसने झटका. हुंकार भरी,” मैं मरने से नही डरता. गले में फाँसी का फंदा और उसने पूरी ताकत से अपने आखिरी शब्द कहे,” वन्देमातरम.” लन्दन के अखबार “न्यू ऐज” ने लिखा,” आने वाले दिनों में भारत उसे अपने नायक के तौर पर पूरी जिम्मेदारी के साथ याद करेगा. हमारी राय में यह सही होगा.
अमर शहीद मदन लाल ढींगरा के शब्द थे,"धन और बुद्धि से हीन मेरे पास सिर्फ मेरा रक्त और जीवन है. उसे मैं भारतमाता की पवित्र बेदी पर समर्पित कर रहा हूं. मौजूदा समय में केवल और केवल देश के लिए मरना सीखना है और खुद मरकर दूसरों को मरना सिखाना है. ईश्वर से बस यही प्रार्थना है. फिर उसी मांं की कोख से जन्म लूं. फिर उसी महान उद्देश्य के लिए जान दूं. तब तक, जब तक देश आजाद न हो जाये"।

लंदन के इंडिया हाउस में रविवार की एक बैठक में विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) भारत की आजादी पर एक गम्भीर भाषण दे रहे थे. बगल के कमरे में मदनलाल ढींगरा और उनके साथियों के शोर के कारण सावरकर को भाषण रोकना पड़ा. वह उस कमरे तक पहुंचे. ढींगरा को झिड़की देते हुए उन्होंने कहा,”एक्शन और बहादुरी की बात करते हो और हमारी मीटिंग में भी नहीं आते. तुम्हारी यही बहादुरी है? लज्जित ढींगरा फिर कई दिन तक इंडिया हाउस नहीं आए. वह सावरकर की नाराजगी को लेकर फिक्रमंद थे. कई दिनों बाद जब उनका सावरकार से सामना हुआ तो नाराजगी का कोई चिन्ह नही था. पुराने अंदाज में सावरकर उनसे मिले. मदनलाल ने उनसे पूछा,”क्या बलिदान का समय आ गया है? सावरकर का जबाब था,”बलिदानी ने अगर खुद को बलिदान के लिए तैयार कर लिया है, तो माना जाता है कि बलिदान का समय आ गया है.”
अंग्रेजी खुफिया एजेंसियों को झांसा देने के लिए उन्होंने इंडिया हाउस और सावरकर से दूरी बनाने का आडम्बर रचा. ईस्टर के बाद 1909 में इंडिया हाउस छोड़कर मिसेज़ हैरिस के लंदन स्थित मकान 108 लेदबरी रोड में रहने आ गए. क्रन्तिकारियों के रास्ते जाने से रोकने में लगे जॉली क्लब और नेशनल इंडियन असोसिएशन की सदस्यता हासिल की. वहां सावरकर और अन्य क्रन्तिकारियों की भरपूर आलोचना करते हुए उन्हें गलत बताया. मुख्यतः एंग्लो इंडियन्स द्वारा संचालित इस संस्था के कार्यक्रमों में बड़ी अंग्रेज शख्सियतें भी शामिल होती थीं. ढींगरा जल्दी ही सेक्रेटरी मिस एमा जोसेहपिन बेक के भरोसे के लोगों में आ गए. उन्हें ब्रिटिश अतिथियों के कार्यक्रमों के ब्यौरे मिलने लगे. भारत में वायसरॉय रह चुके लार्ड कर्जन की हत्या के ढींगरा के वहां दो प्रयास विफ़ल रहे. बंगाल के पूर्व गवर्नर ब्रेम्फील्ड फुलर भी समय की चूक से बच गए. ब्रिटिश खुफिया पुलिस के प्रमुख कर्नल सर विलियम हंट कर्जन वायली उन दिनों सावरकर और अन्य क्रन्तिकारियों को घेरने में जुटे हुए थे. कर्जन वायली भारतीय मामलों को देखने वाले सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के राजनीतिक सचिव भी थे. सावरकर और इंडिया हाउस के जरिये जारी क्रांतिकारी गतिविधियों की पुख़्ता जानकारी के लिए कर्जन वायली ने कीर्तिकर नाम के एक व्यक्ति को अपना मुखबिर बनाया. कीर्तिकर ने खुद को छात्र बताकर इंडिया हाउस में जगह बनाने की कोशिश की. सावरकर और साथी जल्दी ही कीर्तिकर की असलियत जान गए. कीर्तिकर को धमका कर उल्टे ब्रिटिश खुफिया विभाग से जुड़ी जानकारियां उससे ली जाने लगीं.

1 जुलाई 1909 को लंदन के इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के जहांगीर हाल में नेशनल इंडियन असोसिएशन की बैठक आयोजित थी. कर्जन वायली सहित तमाम ब्रिटिश शख्सियतें इसमे हिस्सा लेने वाली थीं. ढींगरा ने 29 जून को सावरकर से विपिन चंद्र पाल के घर पर मुलाकात की. निरंजन पाल ने वह बयान टाइप किया, जो कि हत्या के बाद ढींगरा को देना था. सावरकर ने उन्हें बेल्जियम मेक ब्राउनिंग पिस्टल देते हुए पूरी योजना फिर से समझाई. पूरा बयान याद करने पर जोर दिया. 30 जून को ढींगरा इंडिया हाउस सावरकर से मिलने आये, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी. पहली जुलाई को दोपहर ढींगरा “फ़नलैंड” पहुंचे. 18 फीट की दूरी से पिस्टल से दर्जन भर निशाने साधे. इसमें 11 अचूक थे. शाम को सात बजे नीली पंजाबी पगड़ी और सूट मे सजे ढींगरा ने इम्पीरियल इंस्टीट्यूट के लिए टैक्सी ली. उनकी अलग-अलग जेबों में पिस्टल थीं. भीतरी जेब में वह बयान जो एक्शन के बाद देना था. पिस्टल सहित उनके साथी कोरगावँकर भी वहां पहुंच गए. पूरी तैयारी करके चले ढींगरा सबसे महत्वपूर्ण चीज लाना भूल गए थे. वह चीज थी- प्रवेश पास. लेकिन सहयोगी सदस्य होने के कारण विज़िटर रजिस्टर में दस्तख़त करके वह प्रवेश हासिल करने में सफल हो गए.
मीटिंग खत्म होने के बाद कर्जन वायली बाहर जाने को ही थे कि कोरगांवकर ने ढींगरा को आगे बढ़ने को कहा. ढींगरा अपने बड़े भाई कुंदन लाल ढींगरा के पत्र के जरिये कर्जन वायली से पूर्व में परिचित हो चुके थे. कर्जन की ओर मुख़ातिब ढींगरा ने यह अहसास कराने की कोशिश की, कि जैसे वह कोई गोपनीय बात करना चाहते हैं. कर्जन ने अपना कान उनके नजदीक किया. ढींगरा ने तुरंत उसे दो गोलियां मार दीं. मौत तयशुदा करने के लिए अगले ही पल ढींगरा की पिस्टल से दो और गोलियां कर्जन के शरीर में उतर चुकी थीं. समय रात का 11.20 था. कर्जन के बचाव में आगे आये एक पारसी डॉक्टर कावसजी लालकाका की भी ढींगरा की गोलियों से मौत हो गई. भीड़ की धक्का-मुक्की के बीच ढींगरा का चश्मा दूर गिर गया. उस उत्तेजक माहौल में भी बेफिक्र ढींगरा ने कहा,” कृपया मेरा चश्मा दे दीजिए.” इसके बाद ढींगरा ने खुद को पुलिस को सौंप दिया. पुलिस ने पूछा कि क्या अपने किसी मित्र को खबर देना चाहोगे ? चतुर ढींगरा का जबाब था,”लोगों को कल अखबार से खबर मिल जाएगी.” मेडिकल परीक्षण करने वाला डॉक्टर चकित था कि दो हत्याएं करने और पुलिस हिरासत में होने के बाद भी धींगरा की नाड़ी गति बिल्कुल सामान्य थी.

#क्रांतिकारी #जयभारत
#जयहिंद #भारतीयइतिहास #पुण्यतिथि

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 #शहीद_ऊधम_सिंह  (बलिदान दिवस)(26 दिसंबर 1899 – 31 जुलाई 1940)अपनी मातृभूमि के लिए मेरे मरने से ज्यादा बड़ा सम्मान क्या ...
31/07/2024

#शहीद_ऊधम_सिंह (बलिदान दिवस)
(26 दिसंबर 1899 – 31 जुलाई 1940)

अपनी मातृभूमि के लिए मेरे मरने से ज्यादा बड़ा सम्मान क्या हो सकता है-शहीद ऊधम सिंह

संक्षिप्त परिचय

● शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के समय अहिंसा के मानकों से आगे बढ़कर देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। शहीद ऊधम सिंह को अपनी क्रांतिकारिता और वीरता के लिए प्रशंसा और गौरवभाव से याद किया जाता है। शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में शीर्ष बलिदानियों में गिने जाने वाले व्यक्ति हैं।उनका जीवन संघर्ष और साहस देशभक्ति की मिसाल है।
● शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। उनका असली नाम शेर सिंह था, लेकिन उन्हें शहीद ऊधम सिंह के नाम से जाना जाता है। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए इंग्लैंड में माइकल ओ'डायर की हत्या की, जो उस समय पंजाब का गवर्नर था और जलियांवाला बाग हत्याकांड का मुख्य जिम्मेदार था।
● शहीद ऊधम सिंह ने ब्रिटिश राज समय में भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के पीड़ितों के लिए बदले की तलवार उठाई।
● शहीद ऊधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने अद्भुत साहस और निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। उनके बलिदान ने भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया और उनकी वीरता एवं निष्ठा ने उन्हें एक राष्ट्रीय हीरो के रूप में याद किया जाता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
● शहीद ऊधम सिंह का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता का जल्दी निधन हो गया था, जिसके बाद उन्हें अमृतसर के एक अनाथालय में भेजा गया। अनाथालय में रहते हुए उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की।
● शिक्षा के दौरान ही उनमें देशभक्ति की भावना जाग्रत हुई और वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। उस समय पंजाब तीव्र राजनीतिक उथल-पुथल से ओतप्रोत था और शहीद ऊधम सिंह अपने चारों ओर हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए बड़े हुए थे।
वर्ष 1919, जिसने ऊधम सिंह के विचारों को बदल दिया:
● वर्ष 1919 ऊधम सिंह के जीवन में व्यापक बदलाव का वर्ष रहा, उस समय पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक जन-आक्रोश बढ़ रहा था और रोलेट एक्ट के कारण भी जन आक्रोश तेजी से बढ़ता जा रहा था।
● महात्मा गांधी ने रौलटएक्ट के विरोध में देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया और 6 अप्रैल 1919 को पंजाब के लोगों से जबरदस्त प्रतिक्रिया प्राप्त की।अमृतसर मेंब्रिटिश प्रशासन ने जनरल माइकल ओ'डायर को नेतृत्व दिया।
● इसी क्रम में 10 अप्रैल, 1919 को कई स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जैसे कि सत्यापाल और सैफुद्दीन किचलू को रौलटएक्ट केअंतर्गत गिरफ्तारकिया गया था।
● परिणामस्वरूप पंजाब के लोगों में व्यापक आक्रोश और असंतोष के कारण गिरफ्तारियां हुईं, अमृतसर में नागरिकों और ब्रिटिश सैनिकों के बीच हिंसक दंगे भड़क गए। 13 अप्रैल, 1919 को, अमृतसर के जलियांवाला बाग में 10,000 से अधिक निहत्थे पुरुषों,महिलाओं और बच्चों की भीड़ जमा हुई (चारों तरफ दीवारों से घिरा एक खुला मैदान और केवल एक निकास के साथ)। यह बैसाखी त्योहार का दिन था औरमैदान में इकट्ठा होने वाले कई हजारों लोग दूर-दूर के गांवों से अमृतसर में मेलों में शामिल होने के लिए आए थे और डायर के प्रतिबंध के आदेश से अनजानथे। ऊधम सिंह और उनके दोस्त अनाथालय से जलियांवाला बाग में आए थे और उन्हें प्यासे लोगों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। वे ऐसा कर रहे थे,जब डायर ने अपने सैनिकों को वहां पहुँचाया, केवल बाहर निकलने वाले दरवाजे को बंद कर दिया और बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर गोलियां चला दीं।
● उधमसिंह, उस समय मात्र 20 साल के थे, इस घटना से उनको गहरा आघात लगा और उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। वे जल्द ही सशस्त्र प्रतिरोध में शामिल हो गए, जो भारत के भीतर औरबाहर जारी था।
● 1920 के दशक की शुरुआत में, उन्होंने पूर्वी अफ्रीका की यात्रा की, जहां उन्होंने अमेरिका अपना ठिकाना बनाने से पहले कुछ समय के लिएएक मजदूर के रूप में काम किया।

आगे की यात्रा और रणनीति

● सैनफ्रांसिस्को में, वे पहली बार ग़दर पार्टी (ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए अप्रवासी पंजाबी-सिखोंद्वारा आयोजित एक क्रांतिकारी आंदोलन) के सदस्यों के संपर्क में आए। 1927 में, उन्होंने भारत की यात्रा करने वाले जहाज पर एक बढ़ई के रूप मेंकाम करके पंजाब (भगत सिंह के आदेश पर) में वापस अपना केंद्र बनाया। उसी वर्ष, उन्हें अवैध हथियार रखने और ग़दर पार्टी के मौलिक प्रकाशन,“ग़दर दी गुंज” को चलाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। 1931 तक उन्हें चार साल की जेल हुई।
● शहीद ऊधम सिंह को 1931 में रिहा किया गया था, लेकिनभगत सिंह के हिंदुस्तान सोशलिस्टरिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ घनिष्ठ संबंध के कारण ब्रिटिश पुलिस की निरंतर निगरानी में रहे। इसी बीच उन्होंने कश्मीरमें अपना ठिकाना बना लिया, जहाँ उन्होंने पुलिस से बचने और जर्मनी भागने के लिए एक अन्य व्यक्ति का प्रयोग किया।
● शहीद ऊधम सिंह माइकल ओ'डायर की हत्या के उद्देश्य से 1933 में इंग्लैंड पहुँचे, जिसे वह क्रूर जलियाँवाला नरसंहार के लिए उन्हें जिम्मेदार मानते थे (ओ डायर ने हत्याकांड को "सही कार्रवाई“ भी कहा था)। लंदन में, वह एक बढ़ई, मोटर मैकेनिक और साइनबोर्ड चित्रकार के रूप में काम करतेहुए समाजवादी समूहों के साथ जुड़ गए।

नरसंहार का बदला

● शहीद ऊधम सिंह उस कारण को कभी नहीं भूल पाए जिसके लिए वह इंग्लैंड आए थे। उन्हें पता था कि अपना लक्ष्य प्राप्त करने का समय आ गया है, जब उन्हें पता चला कि माइकल ओ’ डायर13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटनहॉल में एक बैठक को संबोधित करने वाला था।
● सम्मेलन के दिन, सिंह ने अपनेओवरकोट में एक रिवॉल्वर छिपाई औरकैक्सटनहॉल में घुस गए तथा बैठक समाप्त होने के बाद मंच से दो बार ओ'डायर को गोली मार दी। उन्होंने गिरफ्तारीसे बचने या भागने की कोशिश नहीं की और उन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया गया।
बलिदान
● शहीद ऊधम सिंह ने न्यायालय में अपनी पहचान बताई और गर्व के साथ अपने कृत्य को स्वीकार किया। उन्होंने अपने देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के अन्याय का प्रतिशोध लेने की भावना को खुलकर व्यक्त किया।
● शहीद ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 के दिन मौत की सजा सुनाई गई और उन्हे लंदन के पेंटोनविले जेल में फाँसी पर लटका दिया गया और जेल के मैदान में ही दफन कर दिया गया।
कांग्रेस ने किया स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान
● 1974 में, ऊधम सिंह की अस्थियों को भारत लाया गया और उसके पश्चात् पंजाब में उनके जन्म स्थान सुनाम गाँव में उनकी अस्थियाँ ले जाई गई। उनकी अस्थियाँ सतलुज नदी में प्रवाहित की गई जहाँ पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के अस्थि कलश भी प्रवाहित किए गए थे।
● अब यहाँ प्रश्न यह खड़ा होता है कि ऊधम सिंह 1940 में शहीद हुए थे परन्तु उनकी अस्थियाँ 1974 में भारत लाई गई। देश के लिए अपने जीवन को बलिदान करने वाले इन महान शहीदों के प्रति तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इतनी अनदेखी क्यों की? उनकी अस्थियाँ लाने में इतना लंबा समय क्यों लगा ? इसी प्रकार श्याम जी कृष्ण वर्मा की अस्थियों को लाने में भी भूतपूर्व सरकारों ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
● शहीदों की अनदेखी करना कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है क्योंकि भूतपूर्व सरकार ने अपने कार्यकाल में अलग-अलग अवसरों पर इस तरह के कार्य किए है जिससे शहीदों के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट होता है। उदाहरण के लिए लोकसभा में 17 नवम्बर, 1972 को एक संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हो रही थी। उस दिन अंडमान और निकोबार द्वीप का नाम बदलकर ‘शहीद और स्वराज द्वीप’ किया जाना प्रस्तावित था। चर्चा के दौरान कांग्रेस (आई) के सांसद, राम गोपाल रेड्डी ने सुभाष चन्द्र बोस, श्री अरविन्द और विनायक दामोदर सावरकर को ‘आतंकवादी’ कहकर संबोधित किया। जब इसका विरोध हुआ तो रेड्डी ने कहा कि मुझे यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने शर्मसार करने वाले इस शब्द पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी। ऐसा लगता है कि क्रांतिकारियों के अपमान को उन्होंने अपनी मौन स्वीकृति दी थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा की स्थापना
● 8 सितंबर 2022 को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभास चंद्र बोस की प्रतिमा का अनावरण किया जिसे आंध्रप्रदेश के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने तैयार किया था। इण्डिया गेट पर जिस छतरी के नीचे नेताजी की प्रतिमा स्थापित की गयी है उसमें कभी जार्ज पंचम की प्रतिमा होती थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद जार्ज पंचम की प्रतिमा तो हटा दी गयी लेकिन तब से ये छतरी खाली थी। यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है कि आजादी के बाद से इतने वर्षों तक ये छतरी खाली क्यों रही? क्यों किसी स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा को इस छतरी के नीचे स्थान नहीं दिया गया ? यह इसी बात का प्रमाण है कि कांग्रेस सरकार ने किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को इस स्थान के लायक ही नहीं समझा। इस ऐतिहासिक गलती का वर्तमान मोदी सरकार ने संज्ञान लिया और तुरंत प्रभाव से आगे की कार्यवाही की, जिसके परिणामस्वरूप अब वहाँ नेताजी सुभास चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गयी है जो स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि को दर्शाती है।

देश के युवाओं को संदेश

● अपने परीक्षण के दौरान, ऊधम सिंह ने अपना परिचय नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद के रूप में दिया, जो उनकी बांह पर एक प्रतीक के रूप में अंकित था कि भारत में सभी धर्म ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट थे।
पंजाब के प्रेरणास्रोत
● शहीद ऊधम सिंह पंजाब के महान स्वतंत्रता सेनानी हैं।शहीद ऊधम सिंह का जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी दृढ़ता, साहस और देशभक्ति हमें सिखाती है कि अपने देश और अपने लोगों के लिए किस प्रकार निस्वार्थ भाव से कार्य किया जा सकता है।
● उनकी कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि न्याय के लिए संघर्ष करना और अन्याय का विरोध करना हमारी जिम्मेदारी है।शहीद ऊधम सिंह का बलिदान भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित हैऔर वे हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। उनका जीवन और उनकी वीरता हमें सदैव प्रेरित करती रहेगी।

विरासत और सम्मान

शहीद ऊधम सिंह की शहादत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई ऊर्जा और दिशा दी। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक हैं और पंजाब के साथ-साथ पूरे भारत में एक प्रेरणास्रोत हैं। भारत सरकार ने उनके सम्मान में कई स्मारक और संस्थान स्थापित किए गए हैं, जैसे कि:
● शहीद ऊधम सिंह नगर: उत्तराखंड का एक जिला उनके नाम पर रखा गया है।
● शहीद ऊधम सिंह कॉलेज और विश्वविद्यालय: उनके नाम पर कई शैक्षणिक संस्थान स्थापित किए गए हैं।

आज दिनांक 10,06,2024 को कानपुर प्रान्त के अंतर्गत इतिहास संकलन समिति चित्रकूट इकाई की बैठक संपन्न हुई।     आनंद रिसोर्ट ...
10/06/2024

आज दिनांक 10,06,2024 को कानपुर प्रान्त के अंतर्गत इतिहास संकलन समिति चित्रकूट इकाई की बैठक संपन्न हुई।

आनंद रिसोर्ट में संम्पन्न हुई "इतिहास संकलन समिति "की बैठक - आज दिनांक 10-06-2024 को कानपुर प्रान्त के अंतर्गत इतिहास संकलन समिति चित्रकूट इकाई की बैठक संपन्न हुई जिसमें अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्री संजय कुमार जी, महाकौशल प्रान्त के इतिहास संकलन समिति के अध्यक्ष एवं रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर (म. प्र.)के निवर्तमान कुलपति प्रो. कपिलदेव मिश्र जी, इतिहास संकलन समिति की चित्रकूट इकाई के प्रमुख डॉ. महेंद्र उपाध्याय कानपुर प्रान्त के संगठन मंत्री श्री अमित जी, भा. ज. पा. जनपद चित्रकूट के उपाध्यक्ष एवं आनंद रिसोर्ट के प्रमुख श्री आनंद सिंह जी, अन्य प्रमुख जनों में श्री अश्विनी अवस्थी जी, डॉ. संग्राम सिंह, डॉ. शिवप्रेम यागिक, डॉ. सीलू सिंह, श्री अश्विनी कुमार श्रीवास्तव, डॉ. अभय वर्मा, श्री साहिब चौहान एवं डॉ सुनील कुमार मिश्र उपस्थित रहे। बैठक में डॉ. संग्राम सिंह की पुस्तक "चित्रकूट तीर्थस्थलों का महात्म ", डॉ. शिवप्रेम यागिक की पुस्तक "चित्रकूट एवं बाँदा का क्रमबद्ध इतिहास -स्वाधीनता आंदोलन में योगदान ", एवं डॉ. सीलू सिंह की पुस्तक "चित्रकूट अंचल में शैव धर्म एवं कला का ऐतिहासिक अनुशीलन का लोकार्पण हुआ। बैठक में स्वागत एवं परिचय भाषण चित्रकूट इतिहास संकलन समिति के प्रमुख डॉ. महेंद्र कुमार उपाध्याय ने की एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवप्रेम यागिक ने किया।

कार्य विभाजन /दायित्व निम्नवत है:-

चित्रकूट परिक्षेत्र का सर्वेक्षण

➡️ शैलचित्रो का संग्रह एवम ऐतिहासिक अध्ययन द्वारा डॉक्टर संग्राम सिंह जी

➡️लोक परंपराओं एवम किमदंतियो ,प्रतिमाओं का अध्यन द्वारा डॉक्टर शिव प्रेम यागिक।

➡️लोक कला,संगीत एवम व्रत त्योहारों का अध्ययन द्वारा डॉक्टर सीलू सिंह।
सभी सहयोगियों से अनुरोध है कि उपरोक्त विंदुओ पर अध्ययन प्रारंभ कर दे।

➡️28, अगस्त को समर्पण दिवस मनाया जाना है। सभी भाई योजना को मूर्तरूप देने में सहयोग करें।

➡️डॉक्टर अश्वनी अवस्थी जी, श्री अश्वनी श्रीवास्तव जी, श्री आनंद जी, डाक्टर अभय वर्मा जी, अपनी रुचि का विषय चयन कर बहुमूल्य विचार देने में सहयोग करें।

 #जयन्ती_विशेषविनायक दामोदर सावरकर ने राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ना ...
28/05/2024

#जयन्ती_विशेष
विनायक दामोदर सावरकर ने राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ना केवल स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे, बल्कि महान क्रांतिकारी चिंतक, लेखक, कवि, वक्ता, और दूरदर्शी राजनेता भी थे। भारत के स्वाभिमान स्वतंत्र आंदोलन में विनायक दामोदर सावरकर ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और भारतीय राष्ट्रवाद की अपनी नई परिभाषा भी साबित की। भारतीय स्वतंत्र आंदोलन में भूमिका निभाने वाले विनायक दामोदर सावरकर ना केवल क्रांतिकारी थे, बल्कि प्रखर राष्ट्रवाद के समर्थक भी थे।
विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 ई० को महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ था। इनके पिता दामोदर पंत थे। सावरकर महज़ 9 साल के थे, जब महामारी की वजह से उनकी माता राधाबाई का निधन हो गया। उसके सात साल बाद उनके पिता दामोदर सावरकर भी स्वर्ग सिधार गए। उनके बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन पोषण का जिम्मा संभाला। सन 1901 ई० में उन्होंने नासिक के शिवाजी हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1901 में उनकी शादी है यमुनाबाई के साथ हुई। इस दौरान तमाम परेशानियों के बावजूद उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखी। पुणे के मशहूर फरडयुसन कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह वकालत की पढ़ाई करने लंदन चले गए। पढ़ाई के दौरान ही उनका झुकाव राजनैतिक गतिविधियों की तरफ हुआ।

1904 में सावरकर ने " अभिनव भारत " नाम से एक संगठन बनाया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलन का हिस्सा रहे। इस दौरान कई पत्र- पत्रिकाओं में उनके लेख भी छपे। रूसी क्रांति का उनके जीवन पर गहरा असर हुआ।

जब वे अपनी कानून की पढ़ाई के लिए यूनाइटेड किंगडम गए, तो उन्होंने खुद को इंडिया हाउस और फ्री इंडिया सोसाइटी जैसे संगठनों से जोड़ लिया।लंदन में उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों इंडिया हाउस की देखरेख करते थे। 1907 में इंडिया हाउस में आयोजित 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती के कार्यक्रम में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।उन्होंने क्रांतिकारी तरीकों से पूर्ण भारतीय स्वतंत्रता की वकालत करने वाली किताबें भी प्रकाशित कीं। 1857 के भारतीय विद्रोह के बारे में द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस नामक उनकी एक किताब को ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने प्रतिबंधित कर दिया था।

1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा ने विलियम हट कर्जन वाइली को गोली मार दी, इसके बाद सावरकर ने लंदन टाइम्स में एक लेख लिखा था। 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। 8 जुलाई 1990 को सावरकर ब्रिटिश गिरफ्त से भाग निकले। 24 दिसंबर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई। 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया। 7 अप्रैल 1911 को उन्हें काला पानी की सजा पर पोर्ट ब्लेयर की सेल्युलर जेल भेज दिया गया। सावरकर 4 जुलाई 1911 से 21 मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर जेल में रहे। इसके बाद अंग्रेज शासकों ने उनकी याचिका पर विचार करते हुए उन्हें रिहा कर दिया।

1959 में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। नवंबर 1963 में उनकी धर्मपत्नी की मृत्यु हो गई। सितंबर 1965 में सावरकर को बीमारी ने घेर लिया। इसके बाद उन्होंने मृत्युपर्यंत उपवास रखने का फैसला लिया। सावरकर ने 26 फरवरी 1966 को प्रातः 10 बजे वह स्वर्गवासी हो गए।

#जयहिंद 🇮🇳🇮🇳
#जयभारत 🇮🇳🇮🇳

1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है। 1857 की क्रान्ति की शुरूआत '10 म...
10/05/2024

1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है। 1857 की क्रान्ति की शुरूआत '10 मई 1857' की संध्या को मेरठ मे हुई थी और इसको समस्त भारतवासी 10 मई को प्रत्येक वर्ष "क्रान्ति दिवस" के रूप में मनाते हैं।

आज दिनाँक 23/04/2024 को सांय काल 5 बजे छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के दीनदयाल शोध केन्द्र में भारतीय इतिहास संक...
23/04/2024

आज दिनाँक 23/04/2024 को सांय काल 5 बजे छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के दीनदयाल शोध केन्द्र में भारतीय इतिहास संकलन समिति, कानपुर प्रान्त की बैठक सम्पन्न हुई। इसमें अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सह संगठन मंत्री माननीय संजय जी भाईसाहब, विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. सुधीर अवस्थी जी, प्रान्त अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार मिश्र, प्रान्त कार्यकारणी के पदाधिकारी, सम्मानित सदस्यगण तथा विश्वविद्यालय के अध्यापकगण उपस्थित रहें।

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