07/06/2026
”اساتذہ بچوں کی نفسیات و مخفی صلاحیتیں سمجھیں؛ ایمانی تربیت اور محلے کو ہدف بناکر مثالی و صالح معاشرہ تشکیل دیں“
‘‘शिक्षक बच्चों के मनोविज्ञान और छिपी प्रतिभाओं को समझें, ईमान की तरबियत और मोहल्ले को लक्ष्य बनाकर एक आदर्श व नेक समाज का निर्माण करें’’
مولانا امین الحق عبد اللہ قاسمی کی نگرانی میں دینی تعلیمی بورڈ جمعیۃ علماء شہر کانپور کے زیر اہتمام ’تدریب المعلمین‘ ورکشاپ کا انعقاد
मौलाना अमीनुल हक अब्दुल्लाह क़ासमी की निगरानी में दीनी तालीमी बोर्ड जमीअत उलमा शहर कानपुर के जे़ेरे एहतमाम शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन
کانپور:موجودہ پرفتن دور میں نسل نو کے ایمان و عقیدے کی حفاظت اور انہیں دین کی بنیادی تعلیمات سے روشناس کرانے کے عظیم مقصد کے پیش نظرجمعیۃ بلڈنگ رجبی روڈ میں دینی تعلیمی بورڈ جمعیۃ علماء شہر کانپور کے زیر اہتمام ایک اہم ’تدریب المعلمین‘ ورکشاپ شہری صدر ڈاکٹر حلیم اللہ خاں کی سرپرستی اور دینی تعلیمی بورڈ جمعیۃ علماء شہر کانپور کے صدر مفتی عبد الرشید قاسمی کی زیر صدارت منعقد ہوئی۔
ورکشاپ کے مقاصد پر روشنی ڈالتے ہوئے جمعیۃ علماء اترپردیش کے ناظم اعلیٰ اور ورکشاپ کے روح رواں مولانا امین الحق عبداللہ قاسمی نے فرمایا کہ آج کے عالمی و ملکی حالات میں معاشرے کی اصلاح کا سب سے مؤثر ذریعہ مکتب کا نظام ہے۔ انہوں نے کہا کہ جمعیۃ علماء ہند نے 1955ء میں دینی تعلیمی بورڈ کا قیام اسی غرض سے کیا تھا کہ گلی گلی مکاتب قائم ہوں۔ اساتذہ کو مخاطب کرتے ہوئے انہوں نے کہا کہ الفا جنریشن کے بچوں کی ذہن سازی ایک عظیم ذمہ داری ہے۔ ہمیں کم وقت میں جدید تقاضوں کو مدنظر رکھ کر محنت کرنی چاہیے۔
مہمان خصوصی ناظم المعہد العالی للدراسات الاسلامیہ لکھنؤمولانا محمد یحییٰ نعمانی نے فرمایا کہ کفر و شرک کے موجودہ طوفان کو روکنے کے لیے مکتب کی محنت سب سے افضل کام ہے۔ انہوں نے اساتذہ کو نصیحت کی کہ وہ بچوں کے اندر تین بنیادی صفات ضرور پیدا کریں: اول عقیدہئ توحید و رسالت پر پختہ ایمان، دوم آخرت کی فکر، اور سوم اعلیٰ اخلاق و شرافت۔ مولانا نے بچوں میں دین کا شوق پیدا کرنے کے لیے مختلف ترغیبی طریقوں پر بھی روشنی ڈالی۔
جامع مسجد امروہہ کے استاذ مولانا مفتی محمد اسلم قاسمی نے پروجیکٹر کے ذریعے ایک نہایت جامع، سائنسی اور فکر انگیز پریزینٹیشن پیش کی، جس میں انہوں نے اساتذہ کو معلم کی عظیم الشان ذمہ داریاں،دائرہ کار کا تعین،دس سالہ ہدف اور مثالی معاشرہ کی تشکیل،بچوں کی پوشیدہ صلاحیتوں کی پہچان اور زکوٰۃ سے پاک نظا م تعلیم جیسے موضوعات پر تفصیل سے روشنی ڈالتے ہوئے فرمایا کہ حضور پاک ﷺ نے اپنا تعارف یہ کہہ کر کرایا کہ ”میں معلم بنا کر بھیجا گیا ہوں“۔ اس سے قبل کسی نبی نے اس صراحت کے ساتھ اپنا تعارف اس انداز میں نہیں کرایا تھا۔ اس سے معلم کے منصب کی عظمت اور ذمہ داری کا اندازہ ہوتا ہے۔ ایک معلم اگر نبوی وراثت کو سنبھالنا اور مؤثر بننا چاہتا ہے تو اس کے لیے چار چیزوں سے واقفیت لازمی ہے: (1) بچوں کی نفسیات، (2) جنریشن گیپ (نسلی خلیج)، (3) جدید طریقہ تدریس اور عصری تقاضے، اور (4) بچوں کی متعدد اور پوشیدہ صلاحیتوں (Multiple Intelligences) کی پہچان۔
مولانا نے بتایا کہ ہر مسجد کے اطراف میں اوسطاً 200 گھر ہوتے ہیں۔ اگر ایک گھر میں 5 افراد مان لیے جائیں تو یہ ایک ہزار کی آبادی بنتی ہے، جن میں نصف بڑے اور نصف (تقریباً 400 سے 500) بچے ہوتے ہیں۔ ایک امام اور مکتب کے استاذ کو چاہیے کہ وہ اپنے اطراف کے انہی 400، 500 بچوں کی فکر کو اپنا ٹارگٹ بنا لیں۔ اگر محلے کے بڑے افراد ان چھوٹوں کی فکر کر لیں تو انشاء اللہ محض 10 سالوں میں ایک زبردست صالح اور مثالی معاشرہ ہمارے سامنے نظر آئے گا۔
مولانا نے کہا کہ یہ ضروری نہیں کہ ہر بچے کو حافظ یا عالم ہی بنایا جائے۔ اگر کوئی بچہ حفظ میں کمزور ہے، تو اسے ان میدانوں میں آگے بڑھایا جائے جن کی اس کے اندر صلاحیت موجود ہے۔ آج امت کو ہر طبقے اور ہر فیلڈ میں ماہر اور باصلاحیت لوگوں کی ضرورت ہے۔ مثال کے طور پر اگر ایک بچہ پڑھائی میں کمزور ہے لیکن چرب زبان ہے، تیز بولتا ہے اور زیادہ سوالات کرتا ہے، تو اس کا مطلب یہ نہیں کہ وہ ناکارہ ہے، بلکہ وہ بچہ آگے چل کر ایک بہترین وکیل، صحافی یا اچھا سیاستداں بن سکتا ہے۔ نبی کریم ﷺ نے صحابہ کرامؓ کی مختلف صلاحیتوں کو پہچان کر ان سے اسی میدان میں کام لیا، یہی ایک کامیاب معلم کی سب سے بڑی خوبی ہے۔
مولانا نے بتایا کہ معاشرے کے متوسط اور غریب بچوں کے ساتھ ساتھ، مالدار گھرانوں کے بچوں کے لیے بھی مکاتب کا بہترین اور معیاری نظام بنانا وقت کی اہم ضرورت ہے۔ مالدار طبقے کے لیے ایسا خود کفیل نظام بنایا جائے جو زکوٰۃ کے پیسوں سے بالکل پاک ہو، تاکہ ہر طبقے کا بچہ دین سے جڑ سکے۔
پروگرام کے شرکاء نے مفتی محمد اسلم کی اس جدید طرز تدریس پر مبنی پریزینٹیشن کو بے حد سراہا۔ ورکشاپ کا باقاعدہ آغاز قاری مجیب اللہ عرفانی کی تلاوت کلام پاک سے ہوا۔ نظامت کے فرائض دینی تعلیمی بورڈ شہر کانپور کے جنرل سکریٹری مولانا انصار احمد جامعی نے بحسن و خوبی انجام دیے۔ مولوی محمد مسعود نے نعت و منقبت کا نذرانہ عقیدت پیش کیا۔ ورکشاپ میں شہر کے مساجد کے ائمہ، حفاظ اور اساتذہ مکاتب نے بڑی تعداد میں شرکت کی۔ پروگرام کا اختتام مولانا محمد یحییٰ نعمانی کی دعا پر ہوا۔
कानपुर: वर्तमान चुनौतियों के दौर में नई पीढ़ी के ईमान (आस्था) और अक़ीदे की सुरक्षा करने तथा उन्हें दीन (धर्म) की बुनियादी शिक्षाओं से अवगत कराने के महान उद्देश्य से जमीअत बिल्डिंग, रजबी रोड में दीनी तालीमी बोर्ड जमीअत उलमा शहर कानपुर द्वारा एक महत्वपूर्ण ‘‘तदरीब-उल-मुअल्लेमीन’’ (शिक्षक प्रशिक्षण) कार्यशाला नगर अध्यक्ष डॉक्टर हलीमुल्लाह खां के संरक्षण और दीनी तालीमी बोर्ड जमीअत उलमा शहर कानपुर के अध्यक्ष मुफ्ती अब्दुर्रशीद कासमी की अध्यक्षता में आयोजित हुई।
कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए जमीअत उलमा उत्तर प्रदेश के महासचिव और कार्यक्रम के संयोजक मौलाना अमीनुल हक़ अब्दुल्लाह क़ासमी ने कहा कि आज के वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य में समाज सुधार का सबसे प्रभावी माध्यम मकतब की व्यवस्था है। उन्होंने बताया कि जमीअत उलमा-ए-हिंद ने 1955 में दीनी तालीमी बोर्ड की स्थापना इसी उद्देश्य से की थी कि गली-गली मकातिब स्थापित किए जाएं। शिक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘अल्फा जनरेशन’ (Alpha Generation) के बच्चों का मानसिक विकास करना एक बड़ी जिम्मेदारी है। हमें कम समय में आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए मेहनत करनी चाहिए।
मुख्य अतिथि नाजिम अल-माहद अल-आली लिद-दिरासात अल-इस्लामिया लखनऊ मौलाना मुहम्मद याह्या नोमानी ने कहा कि कुफ्र और शिर्क के मौजूदा तूफान को रोकने के लिए मकतब की मेहनत सबसे उत्कृष्ट कार्य है। उन्होंने शिक्षकों को नसीहत दी कि वे बच्चों के अंदर तीन बुनियादी गुण अवश्य पैदा करेंः पहला, तौहीद (एकेश्वरवाद) और रिसालत पर दृढ़ विश्वास, दूसरा आखिरत की फिक्र, और तीसरा उच्च नैतिकता और शिष्टाचार। मौलाना ने बच्चों में दीन का शौक पैदा करने के लिए विभिन्न प्रोत्साहक तरीकों पर भी प्रकाश डाला।
जामा मस्जिद अमरोहा के शिक्षक मौलाना मुफ्ती मुहम्मद असलम कासमी ने प्रोजेक्टर के माध्यम से एक अत्यंत व्यापक, वैज्ञानिक और विचारोत्तेजक प्रेजेंटेशन प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने शिक्षकों को एक मुअल्लिम (शिक्षक) की महान जिम्मेदारियों, कार्यक्षेत्र का निर्धारण, दस वर्षीय लक्ष्य, आदर्श समाज का निर्माण, बच्चों की छिपी प्रतिभाओं की पहचान और जकात से मुक्त शिक्षा प्रणाली जैसे विषयों पर विस्तार से संबोधित किया। उन्होंने कहा कि पैगंबर मुहम्मद स0अ0व0 ने अपना परिचय यह कहकर दिया कि ‘‘मुझे एक शिक्षक बनाकर भेजा गया है’’। इससे पूर्व किसी नबी ने इतने स्पष्ट रूप से अपना परिचय इस अंदाज में नहीं दिया था, जिससे शिक्षक के पद की महानता और जिम्मेदारी का अंदाजा होता है। एक शिक्षक यदि नबवी विरासत को संभालना और प्रभावशाली बनना चाहता है तो उसके लिए चार चीजों से अवगत होना अनिवार्य है: (1) बच्चों का मनोविज्ञान, (2) जनरेशन गैप (पीढ़ियों का अंतर), (3) आधुनिक शिक्षण विधियां और समकालीन आवश्यकताएं, और (4) बच्चों की बहुआयामी और छिपी प्रतिभाओं (Multiple Intelligences) की पहचान।
मौलाना ने बताया कि हर मस्जिद के आसपास औसतन 200 घर होते हैं। यदि एक घर में 5 व्यक्ति मान लिए जाएं तो यह एक हजार की आबादी बनती है, जिनमें आधे बड़े और आधे (लगभग 400 से 500) बच्चे होते हैं। एक इमाम और मकतब के शिक्षक को चाहिए कि वे अपने आसपास के इन्हीं 400-500 बच्चों की फिक्र को अपना ‘लक्ष्य’ (ज्ंतहमज) बना लें। यदि मोहल्ले के बड़े लोग इन छोटों की फिक्र कर लें तो इंशाअल्लाह महज 10 वर्षों में एक जबरदस्त नेक और आदर्श समाज हमारे सामने नजर आएगा।
उन्होंने आगे कहा कि यह जरूरी नहीं कि हर बच्चे को हाफिज या आलिम ही बनाया जाए। यदि कोई बच्चा हिफ्ज (याद करने) में कमजोर है, तो उसे उन क्षेत्रों में आगे बढ़ाया जाए जिनकी उसके अंदर प्रतिभा मौजूद है। आज उम्मत को हर वर्ग और हर फील्ड में विशेषज्ञ व प्रतिभाशाली लोगों की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, यदि एक बच्चा पढ़ाई में कमजोर है लेकिन वाक्पटु है, तेज बोलता है और अधिक सवाल करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह नकारा है, बल्कि वह बच्चा आगे चलकर एक बेहतरीन वकील, पत्रकार या एक अच्छा राजनेता बन सकता है। नबी करीम स0अ0व0 ने सहाबा ए किराम (रजि.) की विभिन्न प्रतिभाओं को पहचान कर उनसे उसी क्षेत्र में काम लिया, यही एक सफल शिक्षक की सबसे बड़ी खूबी है।
मौलाना मुफ्ती असलम ने यह भी स्पष्ट किया कि समाज के मध्यम और गरीब बच्चों के साथ-साथ, अमीर घरानों के बच्चों के लिए भी मकातिब की बेहतरीन और उच्च स्तरीय व्यवस्था बनाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। अमीर वर्ग के लिए एक ऐसी आत्मनिर्भर प्रणाली बनाई जाए जो जकात के पैसों से बिल्कुल मुक्त हो, ताकि हर वर्ग का बच्चा दीन से जुड़ सके।
कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने मुफ्ती मोहम्मद असलम के इस आधुनिक शिक्षण पद्धति पर आधारित प्रेजेंटेशन की अत्यधिक सराहना की। कार्यशाला का विधिवत शुभारंभ कारी मुजीबुल्लाह इरफानी द्वारा पवित्र कुरान की तिलावत से हुआ। संचालन का दायित्व दीनी तालीमी बोर्ड शहर कानपुर के महासचिव मौलाना अंसार अहमद जामेई ने बखूबी निभाया। मौलवी मुहम्मद मसूद ने नात व मनक़बत का नज़राना पेश किया। कार्यशाला में शहर की मस्जिदों के इमामों, हाफिजों और मकतब के शिक्षकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम का समापन मौलाना मुहम्मद याह्या नोमानी की दुआ पर हुआ।
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