Kaal bhairav samaj seva samiti

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आज हम सब राम मंदिर 🛕 को बनते देख रहे है क्या ये इतना आसान था जितना हमे दिख रहा है उत्तर है नहीं बिलकुल नहीं हजारों राम स...
17/11/2021

आज हम सब राम मंदिर 🛕 को बनते देख रहे है क्या ये इतना आसान था जितना हमे दिख रहा है
उत्तर है नहीं बिलकुल नहीं
हजारों राम सेवको ने अपने जान श्री राम जी के नाम कर दी
जब जब राम मंदिर की बात होगी हमे अशोक सिंघल जी को नहीं भूलना है
वे जन्म भूमि आंदोलन में सबसे आगे रहे

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के नायक, विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक, सनातन और राम सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले माननीय अशोक सिंघल जी की पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।
🪔🙏🏼🙏🏼🪔

14/11/2021

हिंदुस्तान के 3 बड़े मुस्लिम सुल्तानों को एक साथ एक बार में ही हराकर संपूर्ण उत्तर भारत में हिंदू राज स्थापित करने वाले राणा संग्राम सिंह की महान शौर्यगाथा का वर्णन

अध्याय-2- दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी का मेवाड़ पर आक्रमण, राणा सांगा के द्वारा इब्राहिम लोदी को पराजित करना

(नोट-इस सीरीज के आखिरी अध्याय में हम बताएंगे कि हिंदुओं के सबसे पराक्रमी योद्धा राणा सांगा को बदनाम करने के लिए और बाबर का महिमा मंडन करने के लिए कम्युनिस्टों और जिहादियों ने कैसे खानवा के युद्ध के ऐतिहासिक तथ्यों के साथ जालसाज़ी की लेकिन इससे पहले दूसरा अध्याय की जानकारी आवश्यक है)

- राणा संग्राम सिंह ने उत्तर भारत के समस्त मुस्लिम शासकों को हराकर सिंध, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा में हिंदू राज की स्थापना की थी... उनका ये स्वर्णिम इतिहास जो हिंदुओं से छुपा लिया गया... हम पूरे देश तक पहुंचाना चाहते हैं ।

- 4 मई 1509 को कुंवर संग्राम सिंह ने चित्तौड़गढ़ की गद्दी संभाल ली थी... सबसे छोटे होने के बाद भी राणा संग्राम सिंह को गद्दी इसलिए मिली क्योंकि उनके दो बड़े भाइयों की दुर्भाग्यवश राजपूतों की आपसी दुश्मनी में ही हत्या हो गई थी । जब राणा संग्राम सिंह गद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र 27 साल थी

-मेवाड़ की रियासत पर उस वक्त मालवा के खिलजी सुल्तान, गुजरात का तुर्क सरदार और दिल्ली के अफगान लोदी ने बुरी नजर डाल रखी थी । राणा सांगा ने इन समस्य विदेशी सल्तनतों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया

-इन सभी मुस्लिम रियासतों में हिंदुओं पर अत्याचार किए जा रहे थे । हिंदुओं से जजिया टैक्स बहुत सख्ती से वसूला जा रहा था लोग इतने ज्यादा परेशान हो चुके थे कि मुस्लिम धर्म अपनाकर अपनी जान माल और इज्जत आबरू की रक्षा कर रहे थे लेकिन बहुत सारे हिंदुओं ने दबाव में मुस्लिम धर्म अपनाने के बजाय धर्मपरायण रहते हुए जजिया देना ज्यादा बेहतर समझा लेकिन हिंदुओं के सारे मूल अधिकार छीन लिए गए थे जिसकी वजह से कमाई प्रभावित होने की वजह से वो जजिया टैक्स भी नहीं चुका पा रहे थे ऐसे में सभी सल्तनतों की मुसलमान सेनाएं जजिया ना दे पाने वाले हिंदुओं की औरतों को उठा ले जाती थीं और फिर उसके बदले में जजिया टैक्स की मांग के लिए ब्लैकमेलिंग का भी सहारा लेती थीं । इस तरह जजिया टैक्स के बहाने हिंदू औरतों को हड़पने का मजहबी फर्ज मुस्लिम फोर्सेज के द्वारा निभाया जा रहा था और फिर उनसे बलात्कारपूर्वक मुस्लिम बच्चे पैदा करके जिहादियों की आबादी बढ़ाने का कार्य भी जोर शोर से चल रहा था । ऐसे में उत्तर भारत की मुस्लिम फोर्सेज के खिलाफ राणा सांगा ने एक जबरदस्त मोर्चा तैयार कर दिया ।

-साल 1518 में दिल्ली के अत्याचारी सुल्तान इब्राहिम लोदी ने मेवाड़ पर हमला करने की योजना बनाई । राणा सांगा भी इब्राहिम लोदी को पराजित करने की तैयारी पहले से कर रहे थे । उन्होंने समस्त हिंदू योद्धाओं को इकट्ठा किया और सेनापतियों के सामने घोषणा कर दी कि दिल्ली की गद्दी पर बहुत लंबे समय से कोई हिंदू सम्राट नहीं बैठा है । हमने इन विदेशी साम्राज्यों को भारत से उखाड़ फेंकने का सपना देखा है

- उस वक्त के बहुत शौर्यवान राजपूत योद्धा... मेदिनी राय ने भी कहा... आपके इस सपने को पूरा करने के लिए हम अपने प्राणों की बाजी लगा देंगे । जितना भी युद्ध करना पड़े हम करेंगे । महाराजा संग्राम सिंह की जय जय कार से पूरा दरबार गूंज उठा ।

-शाम होते होते समस्त हिंदू सेनाएं युद्ध के लिए कूच कर गईं और राजस्थान के हड़ौती के पास खातौली गांव में दोनों सेनाएं आमने सामने हो गईं । सवेरा होते ही युद्ध का बिगुल बज उठा और दोनों सेनाएं आपस में भिड़ गईं । चारों तरफ से राजपूत सेनाओं ने अफगानों को घेर लिया... भीषण मारकट मच गई राणा सांगा की तलवारों से अफगानों के सिर उछल उछल कर आसमान में नजर आने लगे... मेदिनी राय की तलवार ने भी अफगानी खून का पान करना शुरू कर दिया । सलूंबर के रावत राजा रतन सिंह और मेड़ता के राजा वीरमदेव ने भी इस युद्ध में अद्भुत रणकौशल दिखाया

-शाम शाम होते होते दिल्ली की अफगान सेना के होश ठिकाने आए और वो भागने का रास्ता तलाशने लगे लेकिन सारे रास्ते हिंदू सेनाओं ने बंदकर दिए थे... राजपूत योद्धाओं की दीवार पर अफगान अपनी जान बचाने के लिए सिर पटकने लगे

-लेकिन इसी वक्त एक बड़ा हादसा हो गया... मुसलमान तीरंदाज लगातार राणा संग्राम सिंह को निशाने पर लिए हुए थे और एक जहर बुझा तीर राणा संग्राम सिंह के बाईं भुजा के कवच को भेद गया.... राणा संग्राम सिंह के बाएं जंघा में भी एक तीर घुसकर आर पार हो गया । मेदिनी राय ने राणा को संभाला... तमाम राजपूत योद्धा भी राव की सुरक्षा के लिए दौड़े इतने में अफगानों को भागने का मौका मिल गया और इब्राहिम लोदी भी अपनी जान बचाकर भागने में सफल हो गया

-हिंदुओं की बहुत बड़ी विजय हुई... चारों तरफ राणा संग्राम सिंह के नाम का डंका बज गया... विजय का समारोह मनाया गया लेकिन इस मौके पर एक ने दुख ने भी सबको बहुत पीड़ित किया । दरअसल जहर राणा संग्राम सिंह के बाएं भुजा में फैल गया जिसके बाद राजवैद्य ने राणा सांगा की बाईं भुजा को काट दिया । ताकी पूरे शरीर को जहर से बचाया जा सके ।

-इस युद्ध के बाद राणा संग्राम सिंह का एक हाथ कट गया और वो लंगड़ाकर भी चलने लगे... उनकी एक आंख पहले ही उनके भाई पृथ्वीराज के द्वारा फोड़ी जा चुकी थी.... अत्यधिक शारिरिक कष्ट के बाद भी राणा संग्राम सिंह की जिजीविषा और उनका अमिट पराक्रम अभूतपूर्व था । उन्होंने अपने एक ही हाथ से तलवार बाजी का अभ्यास जारी रखा । उनकी वीरता को देकर समस्त हिंदू समाज हर्षित हो जाता था और राजपूतों को भी अनन्य प्रेरणा मिलती थी

-क्या विचित्र शूरवीर थे राणा सांगा... एक हाथ कटा हुआ... लंगड़ाते हुए चलते थे लेकिन उनके सिर्फ रणभूमि में होने मात्र से ही हिंदुओं की विजय सुनिश्चित हो जाती थी कितना महान व्यक्तिक्त रहा होगा राणा सांगा का... काश हम उन्हें कभी देख पाते !

-ये हिंदुओं का वो महान इतिहास है जिसे हिंदुओं से ही छुपा कर रखा गया... आगे हम आपको बताएंगे सिर्फ एक हाथ वाले राणा सांगा ने कैसे मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी और गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह को निर्णायक युद्ध में ना सिर्फ हराया बल्कि उनको बंदी भी बना लिया

-आपसे अनुरोध है कि हर लेख को अधिक से अधिक शेयर करें... अपने मित्रों, रिश्तेदारों, परिवारों के ग्रुप में भेजें और अपने बच्चों को भी जरूर पढ़ाएं

धन्यवाद

07/11/2021

राम राज्य क्या है ? कैसा था श्रीराम का शासन ? जो आज भी गुड गवर्नेंस का सबसे बड़ा आदर्श है ।

(इस दिवाली पर ये लेख अपने बच्चों को पढ़ाइए खुद भी पढ़िए)

- पीढ़ियां की पीढ़ियां बीत गईं लेकिन राम राज्य के प्रति भारत की जनता का आकर्षण आज भी मौजूद है... आज भी राजनीति में सफलता पाने के लिए हर कोई राम राज्य की माला जपता है लेकिन आखिर ये राम राज्य है क्या ? आखिर राम राज्य कैसा था ?

- गोस्वामी श्री तुलसी दास जी ने श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड में लिखा...

राम राज बैठें त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।
मतलब... श्रीरामचन्द्रजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोकों में प्रसन्नता छा गई

- बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप बिषमता सोई।।।।
इसका अर्थ है... सबके सारे शोक जाते रहे और किसी से किसी की कोई दुश्मनी नहीं रही ।

- दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
मतलब... राम-राज्य में दैहिक ताप यानी शारिरिक कष्ट, दैविक ताप यानी दैवीय आपदाएं... जैसे भूकंप... बाढ़ और भौतिक ताप यानी बाहरी कारणों से होने वाले दुख किसी को नहीं रहे

- अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
यानी कम उम्र में किसी की मृत्यु नहीं होती और ना किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं ।

- राम राज कर सुख संपदा ।
बरनि न सकइ फनीस सारदा।।
मतलब... रामराज्य की सुख सम्पत्ति इतनी ज्यादा है कि इसका वर्णन शेषजी और मां सरस्वती जी भी नहीं कर सकती हैं ।

- रामचरित मानस के उत्तरकांड में रामराज्य की व्याख्या करते हुए गोस्वामी तुलसी दास जी ने करीब 20 चौपाइयां लिखी हैं जिनके मुताबिक

- राम राज्य में कोई सपने में भी पाप नहीं करता

- पाप नहीं करता इसलिए किसी तरह की सजा का प्रावधान भी नहीं है

- कभी सूखा नहीं पड़ता है

- समुद्र भी कभी मर्यादा नहीं लांघता

- समुद्र में कोई तूफान नहीं आता

- कभी प्राकृतिक आपदा नहीं आती है

- नदियों का पानी हमेशा साफ और स्वादिष्ट रहता है और पानी उतना ही बरसता है जितना जरूरत है

- ये राम राज्य के बारे में गोस्वामी तुलसी दास की लिखी हुई प्रमुख बातें हैं आप अपने बच्चों को ये लेख जरूर पढ़वाइए ताकी वो भी अपनी संस्कृति और धर्म के बारे में जान सकें

मैंने कईं माताओं बहनों को मंदिर में भगवान के सामने दंडवत/ साष्टांग प्रणाम करते देखा है। शास्त्रों में कहा गया है कि - ब्...
07/11/2021

मैंने कईं माताओं बहनों को मंदिर में भगवान के सामने दंडवत/ साष्टांग प्रणाम करते देखा है।
शास्त्रों में कहा गया है कि -

ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्राम च पुस्तकं।
वसुंधरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं।

ब्राह्मण का गुदा, शंख, शालिग्राम भगवान, पुस्तक और स्त्री की छाती जमीन पर लगने से दोष होता है व धरती पर भार पड़ता है।

सुभाषीतानि में लिखा गया है कि 🌷
ब्राह्मण बिना आसन के (जिनमें ब्राह्मणत्व हो), स्त्रियों के स्तन ,शंख ,अनामिका में पहनी हुई पवित्री, और जप की हुई रुद्राक्ष की माला यह पांच चीजों का भार पृथ्वी वहन नहीं कर सकती इसलिए उसका स्पर्श जमीन से नहीं होना चाहिए। अतः स्त्रीयों को साष्टांग नमस्कार (दंडवत) निषिद्ध है।

इसलिये पुरुष इस तरीक़े से और स्त्री इस तरीके से प्रणाम करें 👇

01/11/2021

ंकियों_का_अड्डा_देवबंद_मदरसा

एशिया में प्रथम स्थान को प्राप्त उत्तर प्रदेश के इस विशाल मदरसे में कल एक परम मित्र का भ्रमणार्थ जाना हुआ जो अभी तक
अल्लाह ईश्वर तेरो नाम
टाईप के थे ,लेकिन अब मानसिकता बदल गई,
मात्र एक भ्रमण के बाद ।
मदरसा !!!!
जिसकी स्थापना1866 में हुई थी जिसे देखकर ऐसा लगता है कि हम गल्ती से कहीं #पाकिस्तान तो नहीं आ गए

यह मदरसा पहले भी यहा से पढ़ा लिखाकर कई आतंकी निकाल चुका है अभी भी यहां पर 6000 विद्यार्थि इस्लाम की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं
जिससे इनको मुख्यत: #अरबी और #उर्दू भाषा का ज्ञान कराया जाता है, और #हदीस और #कुरान इनके पाठयक्रम की मुख्य पुस्तक है

इस संस्था क एक वर्ष का व्यय 35 करोड़ रूपये है यहां पर 8000 लोगों को की प्रतिदिन भोजन व्यवस्था होती है जिसमें प्रतिदिन 10 क्विंटल आटा लग जाता है मीट अलग से और ये सब पूर्ण रुपेण दान पर आधारित है।

इसके लिए मुसलमान और कुछ तथाकथित हिन्दू भी दान देते हैं सरकार इनको एक रूपए भी नहीं देती है क्योंकि इन्होंने से सरकार से मान्यता प्राप्त नहीं की है इसलिए ये अपनी मनमर्जी कुछ भी पढाने में स्वतंत्र है ।

यहां का भोजन ऐसा बनता है कि उसे हमारी गाय, भैंस भी नहीं खाएगी और ये लोग इसी को खा कर प्रसन्न रहते हैं ये जानते हुए भी कि भविष्य में हमें किसी भी प्रकार कि कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी

मैंने इन सभी से एक प्रश्न पूछा कि आपके जीवन का #लक्ष्य_क्या_है ? जो इनका उत्तर मिला वह बहुत ही भयभीत कर देने वाला है। उनका उत्तर था कि ना तो हमें इंजीनियर बनना है ना ही हमें चिकित्सक बनाना है नहीं हमें उद्योग पति बनना..
बस हमें तो अपने जीवन की अंतिम #श्वास तक दीन( इस्लाम) के लिए लड़ना है जब तक जिएंगे इसी के लिए और इस्लाम का प्रचार पूरे संसार में करेंगे ।

इसे कहते हैं अपने धर्म के लिए जीना... न भोजन के लिए चिंतित न नौकरी और भविष्य के लिए चिंतित! चिंतित हैं तो बस अपने धर्म के लिए।

अभी सोचों कि एक वर्ष ये 6000 लोग जब इस देश में इस जिहाद की भावना के साथ निकलेंगे तो इस देश में हिन्दुओं की क्या दुर्दशा होगी.. सोचों।

और ारे_लोग_हैं जो स्वय के बच्चो को तो गुरुकुल में भेजते नहीं और जो #गुरुकुल में अध्ययन करते हैं उनको और उल्टा भविष्य को लेकर हतोत्साहित करते रहते हैं। जिसके कारण वे अपना मार्ग छोड़कर नौकरी खोजने लग जाते हैं ।

हमारे लिए ये लब्ज की ही बात है कि हमारे देश में हमारी इतनी संख्या होते हुए भी एक भी ऐसा #गुरुकुल नहीं है जिसमें ऐसे पूर्ण समर्पित १००० भी ब्रह्मचारी रहते हो...

हम दान भी देंगे तो पीर मजारों पर...😔😔

21/10/2021

नानक से पहले कोई सिक्ख नहीं था! जीसस से पहले कोई ईसाई नहीं था! मुहम्मद से पहले कोई मुसलमान नहीं था! ऋषभदेव से पहले कोई जैनी नहीं था! बुद्घ से पहले कोई बौद्ध नहीं था! कार्ल मार्क्स से पहले कोई वामपंथी नहीं था!

लेकिन :--
*कृष्ण* से पहले *राम...*
*राम* से पहले *जमदग्नि...*
*जमदग्नि* से पहले *अत्री...*
*अत्री* से पहले *अगस्त्य ...*
*अगस्त्य से पहले पतंजलि...*
*पतंजलि* से पहले *कणाद...*.
*कणाद* से पहले *याज्ञवल्क्य...*.
*याज्ञवलक्य* से पहले...
सभी *"सनातन वैदिक"* धर्मी थे..!
"राजनीतिक शतरंज" की इन -"12 चालों" को, ध्यान से -"देखें और समझें" ....?*

*01*.
"मुगल", "भारतीय" बन गए...?
और, "भारतीय., "काफ़िर".. ..?

*02*.
“ग़यासुद्दीनखान”:-
मोतीलाल, जवाहरलाल "नेहरू”
-इंदिरा,राजीव,-माइनो, "गांधी" बन गए..?
और.., "भारतीय", "मूर्ख"....?*

*03*.
"मोमिन", "कश्मीरी" बन गए... ?
और, "कश्मीरी पंडित", "शरणार्थी"....?

*04*.
"बांग्लादेशी"- "बंगाली" बन गये....?
और, "बंगाली", "बाहरी हिन्दू" .....?

*05*.
"सैनिको" के "हत्यारे" और
"पत्थर बरसाने वाले"....,
"आंदोलनकारी" बन गए.....? और,"सेना",
"मानवाधिकार उल्लंघनकारी"....?*

*06*.
"टुकड़े- टुकड़े गैंग", "देशभक्त" बन गया...?
और, "देशभक्त",
"ब्रांडेड कट्टर अतिवादी ......?*

*07*.
"चिता की लकड़ी",
"पर्यावरणीय चिंता" बन गई.....
और, "दफनाने" में "बर्बाद होने वाली भूमि",
"जन्मसिद्ध अधिकार" हो गई.....?

*08*.
"राखी" में इस्तेमाल किया गये
-"ऊन" से, "भेड़" को "चोट" पहुंची..?,
और,
"बकरीद" में -"हजारों बकरियों" का "कत्ल",
"धार्मिक स्वतंत्रता" बन गया....?*
*09*.
"तुष्टिकरण", "धर्मनिरपेक्ष" हो गया.....?
जबकि, "समानता", "कम्यूनल" हो गई....?

*10*.
"आरएसएस", "आतंकवादी" बन गया...?
और, "ओसामा जी"..., "हाफिज साहेब"..., और -"हुर्रियत",
"शांति के शिखर"......
*11*.
*“भारत माता की जय”*,
"सांप्रदायिक" हो गया....?और,
“भारत तेरे टुकडे होंगे”,
*"फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन हो गया"....?*
*12*.“फूट डालो राज करो” ,"नियम" बन गया.... ?और..,
*“सबका साथ सबका विकास” "जुमला"..*?

ज़रा "सोचो"...? और "समझो"... कि :-
*"आखिर" एक - "हिन्दू बहुल देश" में ....,*
"ये सब" हुआ कैसे...???

सिर्फ पढ़ोगे,,?
या फारवर्ड भी करोगे,,?
नहीं ना,,,???

मुझे पता था

*"हिन्दू" जो "ठहरे", "हम"...?*!!!

ऐसे ही सोए रहे .....? तो -
पता भी नही चलेगा..?,
"कब"...
"मुस्लिम देश" के "नागरिक" बन गए...े

🚩
15/10/2021

🚩

12/10/2021

*नवरात्रि में कन्या पूजन क्यों?*

नवरात्रि के समय कन्या पूजन का विशेष महत्व है। नौ कन्याओं को नौ देवियों के रूप में पूजन के उपरांत ही भक्त व्रत पूरा करते हैं। भक्त अपने सामर्थ्य के अनुसार भोग लगाकर दक्षिणा देते हैं। इससे माता प्रसन्न होती हैं।

नवरात्रि की सप्‍तमी से कन्‍या पूजन आरम्भ हो जाता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन इन कन्याओं को नौ देवी का रूप मानकर पूजा जाता है। कन्याओं के पैरों को धोया जाता है और उन्हें आदर-सत्कार के साथ भोजन कराया जाता है। ऐसा करने वाले भक्तों को माता सुख-समृद्धि का वरदान देती है।

*किस दिन करें कन्या पूजन?*
सप्‍तमी से ही कन्‍या पूजन का महत्व है। किन्तु जो भक्त पूरे नौ दिन का व्रत करते हैं वे तिथियों के अनुसार नवमी और दशमी को कन्‍या पूजन करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण कर व्रत खत्म करते हैं। शास्‍त्रों में भी बताया गया है कि कन्‍या पूजन के लिए दुर्गाष्टमी के दिन को सबसे मुख्य और शुभ माना गया है।

ऐसे करें कन्या पूजन-
1. कन्या पूजन के लिए कन्‍याओं को एक दिन पहले सम्मान के साथ आमंत्रित करें।
2. कन्या पूजन के दिवस ही कन्याओं को यहां-वहां से एकत्र करके लाना उचित नहीं होता है।
3. गृह प्रवेश पर कन्याओं का पूरे परिवार के साथ पुष्प वर्षा से स्वागत करना चाहिए।
4. कन्याओं को आरामदायक और स्वच्छ स्थान पर बैठाकर सभी के पैरों को स्वच्छ पानी या दूध से भरे थाल में पैर रखवाकर अपने हाथों से उनके पैर धोना चाहिए। पैर छूकर आशीष लेना चाहिए और कन्याओं के पैर धुलाने वाले जल या दूध को अपने मस्तिष्क पर लगाना चाहिए।
5. कन्याओं को स्वच्छ आसन पर बैठाकर पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए।
6. उसके बाद कन्याओं को माथे पर अक्षत, फूल और कुमकुम लगाना चाहिए।
7. इसके बाद मां भगवती का ध्यान करने के बाद इन देवी स्वरूप कन्याओं को इच्छा अनुसार भोजन कराएं।
8. कन्याओं को अपने हाथों से थाल सजाकर भोजन कराएं और अपने सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, उपहार दें और पुनः से पैर छूकर आशीष लें।

*दो से 10 साल तक होना चाहिए कन्या!*
1.अपने घर में बुलाई जाने वाली कन्याओं की आयु दो वर्ष से 10 वर्ष के भीतर होना चाहिए।
2. कम से कम 9 कन्याओं को पूजन के लिए बुलाना चाहिए, जिसमें से एक बालक भी होना अनिवार्य है। जिसे हनुमानजी का रूप माना गया है। जिस प्रकार मां की पूजा भैरव के बिना पूरी नहीं पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार कन्या पूजन भी एक बालक के बिना पूरा नहीं माना जाता। यदि 9 से अधिक कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति न कर उनका स्वागत करना चाहिए।

*हर उम्र की कन्या का है अलग रूप!*
1. शास्त्रानुसार नवरात्रि के समय सभी दिन एक कन्या का पूजन होता चाहिए, जबकि अष्टमी और नवमी पर नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है।
2. दो वर्ष की कन्या का पूजन करने से घर में दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है।
3.तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति का रूप मानी गई हैं। त्रिमूर्ति के पूजन से घर में धन-धान्‍य रहता है।
4.चार साल की कन्या को कल्याणी माना गया है। इनकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है।
5.पांच वर्ष की कन्या रोहिणी होती हैं। रोहिणी का पूजन करने से व्यक्ति रोगमुक्त रहता है।
6.छह साल की कन्या को कालिका रूप माना गया है। कालिका रूप से विजय, विद्या और राजयोग मिलता है। 7.सात साल की कन्या चंडिका होती है। चंडिका रूप को पूजने से घर में ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
8.आठ वर्ष की कन्याएं शाम्‍भवी कहलाती हैं। इनको पूजने से सारे विवाद में विजयी मिलती है।
9.नौ साल की की कन्याएं दुर्गा का रूप होती हैं। इनका पूजन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है और असाध्य कार्य भी पूरे हो जाते हैं।
10.दस साल की कन्या सुभद्रा कहलाती हैं। सुभद्रा अपने भक्तों के मनोरथ पूरा करती हैं।

विशेष-कन्या का सम्मान सिर्फ 9 दिन नहीं जीवनभर करें!

*प्रवीण कुमार सिंह*
*ॐ नमो भगवते रुद्राय।*

10/10/2021

#क्या_शिवलिंग_रेडियोएक्टिव_होते_हैं ??

#हाँ_100%_सच_है !!

भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।

▪️ शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें।

▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।

▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।

▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

▪️ ध्यान दें कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

▪️ जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है।

*_● विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।●_*

▪️ आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गये हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडु का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79°E 41’54” Longitude की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

▪️ यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिवलिंगों को प्रतिष्टापित किया गया है।

जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है,
आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है,
हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है,
पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम् में है और अतं में
अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है!

वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

▪️ भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

▪️ इन मंदिरों का करीब पाँच हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं थी। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जानें।

▪️ केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं। _आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, यह आज तक रहस्य ही है।_

श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।
तिरुवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है।
अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है।
कंचिपुरम् के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और
चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

▪️ अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच लिंगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। _हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीकी थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है।_ माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं। *इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है।* संभवतया यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हों जो 81.3119° E में पड़ता है!? उत्तर शिवजी ही जाने।

*_कमाल की बात है "महाकाल" उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी )देखिये_*

▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी

▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी

▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी

हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था ।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले ।

और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।
🚩*हर हर महादेव*🚩
🙏🏻🌹🌹🙏🏻

07/10/2021

*सरल विधि, नवरात्रि कलश स्थापना व पूजन*

*कलश स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री:-*

जौ बोने के लिए मिटटी बड़ा का पात्र
साफ़ मिट्टी
मिटटी का एक छोटा घड़ा
कलश को ढकने के लिए मिट्टी का एक ढक्कन
गंगा जल
25 ग्राम सुपारी
25 ग्राम लौंग
25 ग्राम छोटी इलाइची
5 रुपए का सिक्का
आम की पत्तियां या पञ्च पल्लव
100 ग्राम बासमती या लंबे वाले चावल
कलावा
छोटा शहद
कपूर
कुमकुम
हवन सामग्री
100 ग्राम काला तिल
जौ (जवारे)
इत्र
दीपक हेतु गाय का घी या तिल का तेल
फूल और फूल माला
पानी वाला नारियल
लाल कपडा
दूर्वा घास

*कलश स्थापना विधि :-*

सबसे पहले मिट्टी के बड़े पात्र में थोड़ी सी मिट्टी डालें। और उसमे जवारे के बीज डाल दें। अब इस पात्र में दोबारा थोड़ी मिटटी और डालें। और फिर बीज डालें। उसके बाद सारी मिट्टी पात्र में डाल दें और फिर बीज डालकर थोड़ा सा जल डालें।
(ध्यान रहे इन बीजों को पात्र में इस तरह से लगाएं कि उगने पर यह ऊपर की तरफ उगें। यानी बीजों को खड़ी अवस्था में लगाएं और ऊपर वाली लेयर में बीज अवश्य डालें।)
अब कलश और उस पात्र की गर्दन पर मौली बांध दें। साथ ही तिलक भी लगाएं।
इसके बाद कलश में गंगा जल भर दें।
इस जल में सुपारी, इत्र, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्का भी डाल दें।
अब इस कलश के किनारों पर पंचपल्लव पत्ते रखें और कलश को ढक्कन से ढक दें।
अब एक नारियल लें और उसे लाल कपड़े या लाल चुन्नी में लपेट लें। चुन्नी के साथ इसमें कुछ पैसे भी रखें।
इसके बाद इस नारियल और चुन्नी को रक्षा सूत्र से बांध दें।
तीनों चीजों को तैयार करने के बाद सबसे पहले जमीन को अच्छे से साफ़ करके उसपर मिट्टी का जौ वाला पात्र रखें। उसके ऊपर मिटटी का कलश रखें और फिर कलश के ढक्कन पर नारियल रख दें।

आपकी कलश स्थापना संपूर्ण हो चुकी है। इसके बाद कलश में वरुण देवता का मानसिक आह्वाहन(यदि मंत्र न ज्ञात हों)करें। दो स्वच्छ सुपारियों को गौरी गणेश मानकर पूजन करें।

तदोपरांत परमेश्वर शिव-शक्ति से पूजन व पाठ की आज्ञा लेकर सिद्ध कुञ्जिका स्त्रोत्र का 5 बार पाठ करें।
तदोपरांत नवार्ण मंत्र की 1 माला जप करें।
इसके उपरांत दुर्गा सप्तशती में दिये पुनःशचरण मंत्र का जप करें, तदोपरांत कीलक स्त्रोत्र का पाठ करें।
इसके बाद आप दिन के अनुसार नौ दुर्गा रूप का पूजन करते रहे या जो भी विशेष सिद्धि पूजन करना चाहें वह करें, पूजन के समापन पर क्षमा प्रार्थना स्त्रोत्र का पाठ करें।

कलश के पास रात्रि में दीपक अवश्य जलाए रक्खें। हो सके तो रात्रि में पूजन व सिद्धि कर्म करने का प्रयास करें।

शेष क्रमशः....।

*प्रवीण कुमार सिंह*

*ॐ नमो भगवते रुद्राय।*

05/10/2021

*अवश्य पढ़ें।*

*नवरात्रि क्या है? और नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य*

नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियों) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है।
भारत के प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता,... तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। इसी कारण नवरात्र के दिन, नवदिन नहीं कहे जाते।

मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। और इसी प्रकार ठीक छह मास बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं। कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते। न कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। बहुत कम उपासक आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि - मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।
दिन में आवाज दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी , किंतु रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता - जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।
*वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं , उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि - मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है।*

मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर - दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं , उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

नवरात्र या नवरात्रि::
संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुद्ध है।

*नवरात्र क्या है?*
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।

*नौ दिन या रात*
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से शुद्धि अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

*विशेष- नौ देवियाँ / नव देवी*

नौ दिन यानि हिन्दी माह चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की पड़वा यानि पहली तिथि से नौवी तिथि तक प्रत्येक दिन की एक देवी मतलब नौ द्वार वाले दुर्ग के भीतर रहने वाली जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-
1. शैलपुत्री
2. ब्रह्मचारिणी
3. चंद्रघंटा
4. कूष्माण्डा
5. स्कन्दमाता
6. कात्यायनी
7. कालरात्रि
8. महागौरी
9. सिध्दीदात्री

*इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीजों से भी सम्बंध है, जिन्हे नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-*
1. कुट्टू (शैलान्न)
2. दूध-दही,
3. चौलाई (चंद्रघंटा)
4. पेठा (कूष्माण्डा)
5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
6. हरी तरकारी (कात्यायनी)
7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
8. साबूदाना (महागौरी)
9. आंवला(सिध्दीदात्री)
क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।

*अष्टमी या नवमी*
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता 'दुर्गासप्तशती' में कही गई है।

*प्रवीण कुमार सिंह*

*ॐ नमो भगवते रुद्राय।*

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