"दोस्त, एक ऐसा शब्द, जो दिमाग में आते ही ऐसे बहुत-से चेहरों की याद दिला जाता है,
जिनके साथ हमारी ज़िन्दगी के बेहतरीन लम्हों की साझेदारी होती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उनमें से ज़्यादातर चेहरे वक्त के साथ-साथ, अपनी-अपनी व्यस्तताओं के चलते दूर होते चले जाते हैं, और दोस्ती की तपिश कम होने लगती है, जिससे चेहरे भी अक्सर धुंधले पड़ जाते हैं। बचपन में गली के दोस्तों के साथ गुजरने वाले सुनहरे दिनों से ह
ोकर हमारे दिलों में बसी दोस्ती को नए साथी मिलते हैं, स्कूल और कॉलेज पहुंचने पर, लेकिन फिर वहां से आगे आकर हम सब अपनी-अपनी मंज़िलों की तलाश में ऐसी संकरी गलियों में पहुंचते चले जाते हैं, जहां दोस्तों के लिए जगह ही नहीं बचती, और आखिरकार हममें से हरेक खुद को अकेला खड़ा पाता है।
ऐसा नहीं है कि नौकरियों और व्यवसायों में व्यस्तता के अलावा दोस्ती के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन यहां बनने वाली दोस्तियों में अक्सर औपचारिकता और स्वार्थ छिपे रहने का खतरा रहता है, जो दोस्ती को उसके आत्मिक स्तर तक पहुंचने ही नहीं देता। शंकाओं का यही मानसिक द्वंद्व दिमाग में घर कर जाने के बाद शुरुआत हो जाती है अलग-थलग पड़ने की स्थिति, जो वृद्धावस्था में बेहद कष्टदायक हो जाती है, क्योंकि तब तक औपचारिक मित्र दूर हो चुके होते हैं, और निस्वार्थ मित्र बरसों के अंतराल और दूरी के कारण हमें भूल चुके होते हैं। इस दौरान परिवार और बच्चे, जिनके लिए ताउम्र संघर्ष करने के लिए ही हमने दोस्तों से दूरियां बनाईं, वे भी अपनी-अपनी राह पर निकल चुके होते हैं, और उनसे भी दूरी स्वाभाविक रूप से बढ़ चुकी होती है।
हिम जागृति 'जुड़ते रहो, बढ़ते रहो' के सिद्धांत पर चलकर निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए कुछ करने वाले मित्रों को इकट्ठा करने का मंच है। हर मित्र यदि ज़िन्दगी के कुछ पल अपने जैसे ही दूसरे मित्रों के लिए निकाले, तो न सिर्फ ज़िन्दगी 'ज़िन्दा' रहती है, बल्कि इस तरह मिलते-जुलते रहने से समाज को भी एक बेहतर दिशा और दशा प्रदान की जा सकती है। दोस्त जुड़े हैं, और जुड़ते जा रहे हैं... कारवां बनता जा रहा है। समाज आज भी अच्छे लोगों से भरा पड़ा है, बस, ज़रूरत है उन्हें एक ही मंच पर इकट्ठा करने की, ताकि 'अच्छाई', 'मित्रता', 'सद्भावना' के भावों के प्रत्येक हृदय में सुदृढ़ और साकार रूप दिया जा सके। आओ, अपनी पहचान स्वयं बनें, जुड़ें, और अच्छे मित्रों को जोड़ें, ताकि ज़िन्दगी कभी किसी संकरे मोड़ पर फंसी नज़र न आए। "
नागेश्वर मनकोटिया
अध्यक्ष हिम जागृति