astrotantra

astrotantra AstroTa**ra.com धार्मिक भ्रष्टाचार का विरोध यही कार्य है

In Ta**ra, we provide accurate guidance related to (Anushatan) ta***ic ritual for specific motto just like success in court case, remove evils sprits, and remove black magic, helping career and humanity. Note: We are not helping or applying our ta***ic ritual for curse for harm anybody , so please do not contact us for above.

28/08/2026

।। विजय स्तोत्रम् ।।

इस पाठ से गारंटी से नर नारी, देव, किन्नर, गंधर्व आदि को विजय मिलती है। शत्रु रोयेंगे- बस देवी के इस स्तोत्र का आश्रय ले लो। भगवान श्रीराम ने भी इसी स्तोत्र से विजय प्राप्त की।

भगवान श्रीराम द्वारा देवी की स्तुति-
इस स्तोत्र से सदा जीत (विजय) होती रहेगी पर पापमार्ग में विजय न मांगे। यह विजय स्तोत्र कल्पवृक्षस्वरुप है। इसमें मात्र १६श्लोक हैं। इसे अक्षय नवमी पर या युगादि व मन्वादि तिथियों पर
कम से कम ११ बार पढ़े और नित्य शुभ मुहूर्त से आरंभ करके १-१ बार। यह विजय का मूल मंत्र है।

जो सारे प्रयास करके हार चुका और हताश हो गया उसे रोना छोड़कर इस स्तोत्र की शरण लेना चाहिए। यह स्तोत्र देवीपुराण अध्याय ४४ से संकलित है।

हिन्दी में प्रस्तुति-
श्रीरामजी बोले- त्रिलोकवन्दनीया ! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनि ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें।

सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती ! संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

आप ही सभी प्राणियों में निवास करनेवाली परा शक्ति हैं, संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

युद्धप्रिये ! शरणागत की पीड़ा हरनेवाली ! जगदम्बा ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

हाथ में खट्वाङ्ग तथा खड्ग धारण करनेवाली एवं मुण्डमाला से सुशोभित विग्रहवाली भगवती ! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुःख हरण कीजिये।

शरणागत-प्रिये! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिये, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है, पुनः नमस्कार है।

आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिमित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिन्तन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिन्त्य हैं। मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करनेवाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

युद्ध में महिषासुर का मर्दन करनेवाली तथा शरणग्रहण करनेयोग्य हिमालयसुता! आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

चण्डासुर का नाश करनेवाली प्रसन्नमुखी चण्डिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

रक्तवर्णके नेत्रवाली, रक्तरञ्जित दन्तपङ्किवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करनेवाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

निशुम्भ तथा शुम्भ का संहार करनेवाली, जगत की सृष्टि करनेवाली सुरेश्वरी! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

भवानी! आप सर्वदा इस सम्पूर्ण जगत का पालन करती हैं। माता! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिये। दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती! आप सबमें विद्यमान रहनेवाली शक्तिस्वरूपा हैं। जगन्माता! प्रसन्न होइये, मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक् पालन करनेवाली भगवती ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

शरणागतों का दुःख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिये और भय से सदा रक्षा कीजिये।

।। श्री कात्यायनी विजय स्तोत्रम् ।।

श्रीराम उवाच।
नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि।
प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते।।१।।

सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि।
दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।२।।

त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता।
दुष्ट संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।३।।

रणप्रिये रक्तभक्षे मांसभक्षणकारिणि।
प्रपन्नार्तिहरे युद्धे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।४।।

खट्वाङ्गासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे।
ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु तेषां दुःखहरा भव।।५।।

त्वत्पादपङ्कजादैन्यं नमस्ते शरणप्रिये।
विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोऽस्तु ते।।६।।

अचिन्त्यविक्रमेऽचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि। अचिन्त्यचरितेऽचिन्त्ये जयं देहि नमोऽस्तु ते।।७।।

ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवीं दुर्गविनाशिनीम्।
नावसीदन्ति दुर्गेषु जयं देहि नमोऽस्तु ते।।८।।

महिषासृप्रिये संख्ये महिषासुरमर्दिनि।
शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।९।।

प्रसन्नवदने चण्डि चण्डासुरविमर्दिनि।
संग्रामे विजयं देहि शत्रूञ्जहि नमोऽस्तु ते।।१०।।

रक्ताक्षि रक्तदशने रक्तचर्चितगात्रके।
रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।११।।

निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि विश्वकर्त्रि सुरेश्वरि।
जहि शत्रून् रणे नित्यं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१२।।

भवान्येत जगत्सर्व त्वं पालयसि सर्वदा।
रक्ष विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान्।।१३।।

त्वं हि सर्वगता शक्तिर्दष्टमर्दनकारिणि।
प्रसीद जगतां मातर्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१४।।

दङ्क्तवृन्ददमनि सवृत्तपरिपालिनि।
निपातय रणे शत्रूञ्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१५।।

कात्यायनि जगन्मातः प्रपन्नार्तिहरे शिवे।
संग्रामे विजयं देहि भयेभ्यः पाहि सर्वदा।।१६।।

।। इति श्री विजय स्तोत्रं संपूर्णम् ।।

25/08/2026

ग्रंथ: कुलार्णव तंत्र (13वां अध्याय, श्लोक 132) / श्री गुरु गीतामूल श्लोक:"मधुलुब्धो यथा भृङ्गः पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत् ।ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गूर्वान्तरं व्रजेत् ॥"अर्थ:जैसे मधु का लोभी भँवर एक फूल से दूसरे फूल पर जाता है, वैसे ही ज्ञान का भूखा शिष्य सही ज्ञान के लिए एक गुरु से दूसरे गुरु के पास जा सकता है।

22/08/2026

🔥 यज्ञ में शाकल्य ( सामग्री ) का परिमाण कितना होना
चाहिए 🔥

" तिलार्धं तण्डुला देयास्तण्डुलार्धं यवास्तथा ।
यवार्धं शर्कराः प्रोक्ताः सर्वार्धं च घृतं स्मृतम्।। "
तिल का आधा चावल - और चावल का आधा जौ लेना चाहिए - जौ से आधा शक्कर कही गई है और सब से आधा घृत कहा गया है - ( एक हिस्सा गुगलादि और यथा शक्ति मेवा )।

" तिलाधिक्ये भवेल्लक्ष्मीर्यवाधिक्ये दरिद्रता ।
धृताधिक्ये भवेन्मुक्तिः सर्वसिद्धिस्तु शर्करा ।। "
तिल की अधिकता से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और यव की अधिकता से दरिद्रता की प्राप्ति होती है -- घृत की अधिकता से मुक्ति शर्करा की अधिकता से सर्वसिद्धि होती है ।

" आयुःक्षयं यवाधिक्यं यवसाम्यं धनक्षयम् ।
सर्वकामसमृद्ध्यर्थं तिलाधिक्यं सदैव हि ।। "
तिल से जौ अधिक होने पर आयु का नाश होता है -- तिल के बराबर यव रहने पर धन का नाश होता है - अतः सर्वदा तिल की अधिकता ही उचित है - इससे सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि होती है ।

🔥यज्ञ में तिल की इतनी उपयोगिता क्यों हैं ?🔥

यज्ञ भगवान् विष्णु का स्वरूप है --- " यज्ञो वे विष्णुः " ( तैत्तिरीय ब्राह्मण १|२|५|४० )-- " विष्णुर्वै यज्ञः " ( ऐतरेय ब्राह्मण १|१५ )-- " यो वै विष्णुः स यज्ञः ( शतपथ ब्राह्मण ५|२|३|६ ) --- " त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वनां परमेश्वर ।। "
हे परमेश्वर ! आप ही यज्ञ करने वालों के यष्टा और यज्ञ स्वरूप हैं ।

" तिलाः पुण्याः पवित्राश्च सर्वपापहराः स्मृताः।
शुक्लाश्चैव तथा कृष्णा विष्णुगात्रसमुद्भवाः।। "
तिल अत्यंत पवित्र है और पुण्यप्रद है तथा वह समस्त प्रकार के पापों को दूर करने वाला है -- वह तिल सफेद और काला दो प्रकार का भगवान् श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है ।

🚩 हर हर महादेव 🚩 ।। वशिष्ठ ।।

21/08/2026

#श्रीक्षेत्रपालभैरवाष्टक स्तोत्र॥{श्री विश्वसार-तन्त्र}
{यह स्तोत्र भाव-पूर्वक पाठ करने मात्र से प्रभाव दिखाता है॥}
यं यं यं यक्ष-रूपं दश-दिशि-वदनं भूमि-कम्पाय-मानम्।
सं सं सं संहार-मूर्ति शिर-मुकुट-जटा-जूट-चन्द्र-बिम्बम्॥
दं दं दं दीर्घ-कायं विकृत-नख-मुखं ऊर्ध्व-रोम-करालं।
पं पं पं पाप-नाशं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥१॥

रं रं रं रक्त-वर्णं कट-कटि-तनुं तीक्ष्ण-दंष्ट्रा-करालम् ।
घं घं घं घोष-घोषं घघ-घघ-घटितं घर्घरा-घोर-नादं॥
कं कं कं काल-रूपं धिग-धिग-धृगितं ज्वालित-काम-देहं।
दं दं दं दिव्य-देहं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥२॥

लं लं लं लम्ब-दन्तं लल-लल-लुलितं दीर्घ-जिह्वा-करालं।
धूं धूं धूं धूम्र-वर्णं स्फुट-विकृत-मुखं भासुरं भीम-रूपं॥
रुं रुं रुं रुण्ड-मालं रुधिर-मय-मुखं ताम्र-नेत्रं विशालं।
नं नं नं नग्न-रूपं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥३॥

वं वं वं वायु-वेगं प्रलय-परिमितं ब्रह्म-रूपं-स्वरूपम्।
खं खं खं खङ्ग-हस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करं भीमरूपं॥
चं चं चं चालयन्तं चल-चल-चलितं चालितं भूत-चक्रं।
मं मं मं माया-रूपं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥४॥

शं शं शं शङ्ख-हस्तं शशि-कर-धवलं यक्ष-सम्पूर्ण-तेजं।
मं मं मं माय-मायं कुलमकुल-कुलं मन्त्र-मूर्ति स्व-तत्वं॥
भं भं भं भूत-नाथं किल-किलित-वचश्चारु-जिह्वालुलंतं।
अं अं अं अंतरिक्षं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥५॥

खं खं खं खङ्ग-भेदं विषममृत-मयं काल-कालांधकारं।
क्षीं क्षीं क्षीं क्षिप्र-वेगं दह दह दहनं गर्वितं भूमि-कम्पं॥
शं शं शं शान्त-रूपं सकल-शुभ-करं देल-गन्धर्व-रूपं।
बं बं बं बाल-लीलां प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥६॥

सं सं सं सिद्धि-योगं सकल-गुण-मयं देव-देव-प्रसनं।
हं हं हं सकल दोष विनाशकंदेव देव प्रपन्नम्॥
पं पं पं पद्म-नाभं हरि-हर-वरदं चन्द्र-सूर्याग्नि-नेत्रं ।
जं जं जं यक्ष-नागं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥७॥

हं हं हं हस-घोषं हसित-कहकहा-राव-रुद्राट्टहासम्।
यं यं यं यक्ष-सुप्तं शिर-कनक-महाबद्-खट्वाङ्गनाशं॥
रं रं रं रङ्ग-रङ्ग-प्रहसित-वदनं पिङ्गकस्याश्मशानं।
सं सं सं सिद्धि-नाथं प्रणमत-सततं भैरवं क्षेत्रपालम्॥८॥

॥फल श्रुति॥
एवं यो भाव-युक्तं पठति च यत: भैरवास्याष्टकं हि ।
निर्विघ्नं दु:ख-नाशं असुर-भय-हरं शाकिनीनां विनाश:॥९
दस्युर्न-व्याघ्र-सर्प: घृति विहसि सदा राजशस्त्रोस्तथाज्ञातं।
सर्वे नश्यन्ति दूराद् ग्रह-गण-विषमाश्चेति तांश्चेष्टसिद्धि:॥१०॥

॥इति श्री क्षेत्रपाल भैरवाष्टक स्तोत्र संपूर्णम् ॥
~~~```b~~~```~~~```d~~~```~~~```v~~~```~~~

21/08/2026

कौल का मूलभूत सिद्धांत।

अप्रमाणानि शास्त्राणि प्रमाणं योगिनीमतम् ।
परोक्षफलदाः सर्वाः पाश्चात्या मन्त्रदेवताः ॥
प्रत्यक्षफलदं शाक्तं कौलिकं विस्मयप्रदम् ।
कुलज्ञानात् परं नास्ति संसारोत्तारणं प्रिये ॥

योगिनीमत ही (सर्वोच्च) प्रमाण है, इस सिद्धांत में अन्य शास्त्रों का कोई प्रमाण नहीं है। अन्य देवताओं (मंत्रों) की पूजा से केवल अप्रत्यक्ष फल ही मिल सकते हैं, जबकि शाक्त साधना प्रत्यक्ष फल देती है और कौल साधना आश्चर्यजनक परिणाम देती है।
हे प्रिय, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने के लिए 'कुल' के ज्ञान से बढ़कर कोई मार्ग नहीं है।

देवी-केंद्रित योग की परिभाषा।

13वीं सदी के चिदंबरम के महान कौल गुरु महेश्वरानंद, 'महारार्थमंजरी' नामक अपनी उत्कृष्ट रचना में—जो महारार्थ (कालीक्रम) की शिक्षाओं पर आधारित है—एक प्रभावशाली अंश का उल्लेख करते हैं...

उज्झित्वात्मसमाधानं ये द्यायन्त्यन्यदेवताः ।
भिक्षन्ते भूरिवित्तास्ते भिक्षित्वापि बुभुक्षिताः ॥

"जो लोग (अपने) आत्म-बोध को छोड़कर अन्य देवताओं का ध्यान (पूजा) करते हैं, वे (वास्तव में) भिखारी हैं; बहुत धन होने के बावजूद वे भूखे ही रहते हैं।"
महेश्वरानंद अपनी टीका में स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि देवता उतने ही विविध होते हैं जितने कि उनकी पूजा करने वाले (उपासक), फिर भी वे (वास्तव में) (दिव्य सत्ता के) विविध रूप हैं जो अंततः एक अद्वैत सत्य में विलीन हो जाते हैं; जिसे वे चेतना-हृदय के स्पंदन के रूप में वर्णित करते हैं।
महेश्वरानंद सिखाते हैं कि केवल इसी की पूजा की जानी चाहिए, न कि निर्जीव पुस्तकों, मूर्तियों आदि की।
वे इस गहन शिक्षा का समापन यह समझाते हुए करते हैं कि चेतना की विविध रूपों में प्रकट होने की शक्ति ही योग है।
देवी ही योग हैं और शिव योगी हैं। वे दोनों मिलकर संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।

त्रिक कौल परंपरा के मुख्य मूल-शास्त्रों में से एक, 'मालिनीविजयोत्तर तंत्र' के अनुसार ज्ञान के तीन प्रकार हैं:

1) श्रौत - किसी विषय को पूरी तरह से सुनना, याद करना और सीखना।

2) चिंता - जो कुछ भी सीखा गया है, उस पर विचार करना। यह विचार या तो
1) सतही तरीके (मंद) से हो सकता है, या
2) बहुत गहरे चिंतन और 'अच्छे अभ्यास' (स्वाभ्यस्त) के साथ।
यही दूसरा 'स्वाभ्यस्त' रूप ज्ञान के तीसरे रूप (भावना) को जन्म देता है।
3) भावना - ज्ञान पर गहराई से चिंतन करना और रचनात्मक एकाग्रता, इच्छा-शक्ति और ध्यान की शक्ति को पुरानी मानसिक धारणाओं (सीमित करने वाली मान्यताओं) से हटाकर वास्तविकता के निर्बाध सत्य और स्वतंत्रता की ओर निर्देशित करके मन को वास्तविकता के साथ जोड़ना (व्याप्त करना) और उसे 'साकार करना'।

जो लोग सारांश के बजाय मूल पाठ (मूल) को पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए 'मालिनीविजयोत्तर तंत्र' से सीधे लिया गया अंश इस प्रकार है:
(डॉ. मार्क डाइज़कोव्स्की द्वारा अनुवाद)

ज्ञानं तत्त्रिविधं प्रोक्तं तत्राद्यं श्रुतमिष्यते |
चिन्तामयमतथान्यच्च भावनामयमेव च || 4.28 ||
कहा जाता है कि ज्ञान तीन प्रकार का होता है। पहला प्रकार सुनने (यानी अध्ययन) से प्राप्त ज्ञान (श्रौत) माना जाता है।
दूसरा प्रकार चिंतन (चिंता) है और
तीसरा प्रकार कल्पनाशील चिंतन (भावना) है।

शास्त्रार्थस्य परिज्ञानं विक्षिप्तस्य श्रुतं मतम् |
इदमिदमत्रेति इदमत्रोपयुज्यते || 4.29 ||

'सुनने' (यानी अध्ययन) को शास्त्र में बताए गए किसी विषय (अर्थ) का पूरा ज्ञान माना जाता है, जो शास्त्र में अलग-अलग जगहों पर बिखरा हुआ होता है।

सर्वमालोच्य शास्त्रार्थमानुपूर्व्या व्यवस्थाम् |
तद्वच्चिन्तामयं ज्ञानं द्विरूपमुपदिश्यते || 4.30 ||

शास्त्रों में किसी शिक्षा (अर्थ) के संपूर्ण अर्थ को देखकर, उसका व्यवस्थित क्रम (इस चिंतन से प्राप्त होता है कि) "यहाँ यह कहा गया है; (जबकि) यहाँ यह कहा गया है और यहाँ यह (सही ढंग से) लागू किया गया है," चिंतन से प्राप्त ज्ञान है।

मंदस्वभ्यस्तभेदेन तत्र स्वभ्यस्तमुच्यते |
सुनिष्पन्ने ततस्तस्मिज्जायते भावनामयम् || 4.31 ||

ऐसा सिखाया जाता है कि यह दो प्रकार का होता है, इस आधार पर कि यह (सतही और) धीमा (मंद) है या (गहन और) अच्छी तरह से अभ्यास किया हुआ है।
इनमें से, अच्छी तरह से अभ्यास किया हुआ श्रेष्ठ है। फिर, जब यह अच्छी तरह से विकसित हो जाता है, तो इसमें चिंतन से युक्त अवस्था उत्पन्न होती है।

यतो योगं समासद्य योगी योगफलं लभेत् |
एवं विज्ञानभेदेन ज्ञानी प्रोक्तश्चतुर्विधः || 4.32 ||

इसी कारण से, एक बार योगी योग प्राप्त कर लेता है, तो उसे योग का फल मिलता है। इस प्रकार, ज्ञानी व्यक्ति (ज्ञानी) को चार प्रकार का कहा जाता है।
(उसके पास किस प्रकार का ज्ञान है, इसके अनुसार)।

18/08/2026

#मंत्र_तारक भी है, मंत्र मारक_भी >>>??
पुस्तक लिखित मन्त्र को देखकर जो जप करता है वह जीवन में चाण्डाल होता है । मरने पर कुत्ता योनि में जन्म लेता है ।

विधिवत् दीक्षा लिये बिना जो साधक शैव, शाक्त या वैष्णव मन्त्रों का जप करता है उसे देवता दग्ध कर देते हैं और वह देवता की दृष्टि में जुगुप्सित एवं घृणित हो जाता है ।

विधिवत् दीक्षा ग्रहण के बिना जो साधक मन्त्र जप करता है उसे करोड़ो-करोड़ो मन्त्र जप के बाद भी सागर के बालू-कणों की संख्या के बराबर भी वर्षों तक सिद्धि नहीं मिलती ।।

इसलिये सभी प्रयत्नों से कुलगुरु के मुख से उपदेश-क्रम से मन्त्र की दीक्षा अवश्य लेना चाहिए।

ईश्वर उवाच---

पुस्तके लिखितान्मन्त्रानवलोक्य जपेत्तु यः ।
स जीवन्नेव चाण्डालो मृतः श्वानो भविष्यति॥३

दीक्षामार्गं विना मन्त्रं शैवं शाक्तञ्च वैष्णवम्।
यो जपेत्तं दहत्याशु देवता च जुगुप्सति॥४

दीक्षाविधिं विना मन्त्रं यो जपेत्कोटिकोटयः।
न स सिद्धिमवाप्नोति सिन्धुसैकतवर्षवत् ॥५

तत्मात्सर्वप्रयत्नेन दीक्षां कुलगुरोर्मुखात् ।
उपदेशक्रमेणैव
मन्त्रसंग्रहणं चरेत् ॥६

- इतिश्रीसांख्यायनतन्त्रे द्वितीय पटले

मन्त्र के दोष: ---
मन्त्र के बारे में लोगों में बहुत भ्रान्ति है, अगर किसी को समजाया जाए की मन्त्र करने के यह विधि निषेध है तो लोग सामने से ज्ञान देते है की भगवन की भक्ति में दोष कैसा?

उसका उत्तर है आप भगवन्नाम का कीर्तन करो वो भक्ति मार्ग है, उसमे कोई बाधा नहीं कोई मात्रा छंद बीज आदि का बंधन नहीं। भक्ति आनंद स्वरूप है।

मन्त्र उपासना मार्ग है, और मन्त्र केवल गुरु से प्राप्त हो वही फलीभूत होता है, उपासना मार्ग के विधिनिषेध, बहुत सारे यम नियम है जिनका पालन न किया जाए तो मंत्र विपरीत असर करता है, कई लोग प्रश्न करते है हम यह देवी वो देवता का मंत्र करते है पर वह फलीभूत नहीं होता उसके कुछ दोष नीचे दिए गए है।

(१) अभक्ति दोष -मन्त्र को अक्षर एवं वर्णों की समष्टि मात्र समझना अभक्ति दोष है ।।

(२) अक्षरभ्रान्ति दोष - मन्त्राक्षरों में उलट-फेर या एकाध अक्षर बढ़ जाना अक्षरभ्रान्ति दोष है ।।

(३) लुप्त दोष – मन्त्राक्षरों में किसी वर्ण की न्यूनता हो जाना लुप्त दोष है ।।

(४) ह्रस्व दोष—मन्त्र में किसी दीर्घ वर्ण का ह्रस्व हो जाना ह्रस्व
दोष है ।।

(५) दीर्घ दोष – ह्रस्व वर्ण के स्थान में दीर्घ वर्ण कर देना दीर्घ दोष है ।।

(६) कथन दोष – जाग्रत् अवस्था में अपना मन्त्र किसी से कह देना कथन दोष है ।।

(७) छिन्न दोष – संयुक्त वर्णों में से किसी वर्ण का छूट जाना छिन्न दोष है ।।

(८) स्वप्नकथन दोष- स्वप्न में अपना मन्त्र किसी को बता देना स्वप्नकथन दोष हैं।।

मन्त्र के एक-एक अक्षर के उच्चारण में परमानन्द का अनुभव करते हुए उसका जप करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है,

क्योंकि – 'संविदेव मन्त्र: ' अर्थात् मन्त्र संवित् तत्त्व है ।

याद रहें मंत्र तारक भी है और मारक भी है। जो विधिनिषेध यम नियम पालन नहीं कर सकते उनके लिए भगवन्नाम कीर्तन ही तारक है, उनके लिए भक्तिमार्ग ही उत्तम है।।

: ❗जय महादेव❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

21/06/2026

"शिवविद्या"(रुद्रयामलतंत्र देवीरहस्य)
किस देवी के साथ किस् स्वरूप में भगवान शिव विराजमान करते हैं:-
जिस प्रकार बिना शक्ति के यानी कि बिना देवी के किसी भी पुरुष देवता का पूजन नहीं करना चाहिए अगर पूजा किया जाए तो संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है ठीक उसी भांति बिना पुरुष देवता के किसी भी देवी का पूजा अगर किया जाए तो पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है ।

रुद्रयामल तंत्र अंतर्गत देवी रहस्य के (53) पटल में बताया गया है कि आप जिन देवी का आराधना कर रहे हैं उनके पुरुष देवता का पता आपको चल जाए।

श्रीभैरव उवाच:-
अधुना शिवविद्यां ते वक्ष्यामि परमार्थदाम् ।
सर्वविद्यामयीं साध्यां सर्वतन्त्रेषु गोपिताम् ॥१॥

केवलं यो जपेच्छाक्तं मनुं शैवं तु नो जपेत् ।
जन्मकोटिषु जप्तोऽपि न मनुः सिद्धिभाग्भवेत्॥२॥

यस्या देव्यास्तु यो देवः शिवस्तस्याः शिवो भवेत्।
तेन विद्या महादेवि कलौ सिद्ध्यति सत्वरम्॥३॥

शिवविद्या निर्णय- श्री भैरव ने कहा कि हे देवि ! अब मैं परमार्थदायक शिवविद्या को कहता हूँ। यह विद्या सर्वसिद्धिमयी, साध्य और सभी तन्त्रों में गोपित है। जो केवल शक्तिमन्त्र का जप करता है, शिवमन्त्र का जप नहीं
करता, उसे करोड़ों जन्मों तक जप करने से भी सिद्धि नहीं मिलती। जैसे देवियाँ होती हैं, वैसे ही उनके शिव भी होते हैं। शिव के साथ विद्या के जप से कलियुग में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है।।१-३।।

कालिकाया महाकालः सुमुख्या अमृतेश्वरः ।
कामेश्वरस्त्रिकूटायाः शिव इत्येवमीश्वरि ॥४॥

छिन्नाया: कालरुद्रस्तु शारदायाः शिवः शिवः ।
श्री भैरवः कालरात्र्याः शिव इत्येवमीश्वरि ॥५॥

ज्वालामुख्या महादेवो वाग्देव्या विजयेश्वरः ।
ईश्वरो भुवनेश्वर्य्याः शिव इत्येवमीश्वरि ॥६॥

विश्वनाथस्तु पार्वत्या राज्या भूतेश्वरः शिवः ।
भीडायास्तु विरूपाक्ष शिव इत्येवमीश्वरि ॥७॥

नीलकण्ठस्तु दुर्गायाः शिव इत्येवमीश्वरि।
शिलाया वामदेवस्तु शिवः प्रोक्तः सुरेश्वरि ॥८॥

सद्योजातस्तु तारायाः शिव इत्येवमीश्वरि।
अद्य दुर्गाशिवस्यादौ वक्ष्ये मूलमनुं परम् ॥९॥

यं जप्त्वा परमेशानि विद्या सिद्ध्यति सत्वरम् ।

किस देवी के कौन शिव -
कालिका के शिव-- महाकाल हैं,
सुमुखी के शिव-- अमृतेश्वर हैं।
हे ईश्वरि ! त्रिकूटा पञ्चदशी ललिता मन्त्र के शिव-- कामेश

आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे स्वयंभू बाबा, गुरु और चमत्कारी संतों की बाढ़ आ गई है जो खुद ही अपनी महिमा का प्रचार करते हैं। या...
02/06/2026

आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे स्वयंभू बाबा, गुरु और चमत्कारी संतों की बाढ़ आ गई है जो खुद ही अपनी महिमा का प्रचार करते हैं। याद रखिए, "जंगल में मोर नाचा किसने देखा" कहकर अपनी ही प्रशंसा करने वाला व्यक्ति संत नहीं, बल्कि अक्सर अपना प्रभाव और कारोबार बढ़ाने की कोशिश कर रहा होता है।

यदि किसी बाबा के पास वास्तव में दिव्य शक्तियां होतीं, तो क्या वे बड़ी आपदाओं, युद्धों, भूकंपों, महामारी या हजारों लोगों की मौतों को पहले से नहीं बता सकते थे? क्या वे उन्हें रोक नहीं सकते थे? लेकिन जब वास्तविक घटनाएं घटती हैं, तब ये लोग बाद में दावा करते हैं कि उन्हें पहले से सब पता था। यह श्रद्धा नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं का शोषण है।

भारत में पिछले कुछ दशकों में कई तथाकथित "गुरु" और "बाबा" गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए हैं। करोड़ों भक्तों का विश्वास जीतने के बाद कुछ लोग यौन शोषण, धोखाधड़ी, अवैध संपत्ति और अंधविश्वास फैलाने के मामलों में जेल तक पहुंचे। यह दिखाता है कि केवल बड़ी भीड़, भव्य आश्रम, लाखों अनुयायी या सोशल मीडिया पर करोड़ों व्यूज किसी व्यक्ति को संत नहीं बना देते।

आज यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर कोई भी वीडियो बनाकर दावा कर सकता है कि उसे भविष्य दिखाई देता है, किसी पर जादू-टोना हुआ है, भूत-प्रेत का साया है, ग्रह दोष है या लाखों रुपये का विशेष अनुष्ठान कराने से सब ठीक हो जाएगा। डर पैदा करना और फिर उसका समाधान बेच देना एक बड़ा कारोबार बन चुका है।

सच्चे संत और आध्यात्मिक गुरु आमतौर पर विनम्र होते हैं। वे लोगों को आत्मविश्वास, सदाचार, ईश्वर भक्ति, सेवा और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करते हैं। वे भय बेचकर पैसा नहीं कमाते, न ही हर समस्या का कारण जादू-टोना या अदृश्य शक्तियों को बताते हैं।

कुछ सावधानियां हमेशा याद रखें:

• जो व्यक्ति हर समस्या का चमत्कारी समाधान बेचता हो, उससे सावधान रहें।
• जो बार-बार धन, दान, विशेष पूजा या महंगे अनुष्ठान की मांग करे, उससे दूरी रखें।
• जो आपको परिवार, मित्रों या समाज से अलग करने की कोशिश करे, उस पर कभी भरोसा न करें।
• जो डर दिखाकर पैसा कमाए, वह आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, व्यापारी है।
• किसी भी दावे को आंख बंद करके स्वीकार न करें। प्रश्न पूछें, तर्क करें और प्रमाण मांगें।

आस्था रखें, लेकिन अंधविश्वास नहीं। धर्म और अध्यात्म का उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र, जागरूक और मजबूत बनाना है, किसी बाबा का अंधभक्त बनाना नहीं।

ईश्वर पर विश्वास रखिए, लेकिन अपनी बुद्धि को कभी गिरवी मत रखिए।

https://www.facebook.com/share/1GmZsJ8E7B/
13/05/2026

https://www.facebook.com/share/1GmZsJ8E7B/

सनातन धर्म में भारत माता नाम की कोई देवी नहीं हैं। भारती नामक सरस्वती देवी और जन्मभूमि, राष्ट्रभक्ति हेतु पृथ्वी देवी हैं। इनकी शास्त्रीय पूजा ही फलित होती है। भारतमाता नामक काल्पनिक देवी इसीलिए लायी गयी ताकि वास्तविक देवता, मन्त्र और देवालय से दूर करके हिन्दुओं को भटकाया जा सकें। मदर रसिया, ब्रिटानिया, जर्मनिया आदि से प्रेरित भारत माता है जिसे कुटिलता से देवी दुर्गा से मिलता जुलता दिखाया ताकि हिन्दुओं की आस्था का दोहन हो। नरेन्द्र दत्त से लेकर नरेन्द्र मोदी तक "देवी देवताओं को भूल जाओ" वाला षड्यन्त्र चलता हुआ हिन्दूद्रोही संगठन "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" धीरे धीरे सनातन धर्म को खोखला कर रहा है।

पहले गुरुपरम्परा हटाकर झंडे के नाम पर मनमानी की, फिर वर्णाश्रम को हटाकर मुस्लिम और ईसाई को हिन्दुओं में घुसाया, फिर वास्तविक मन्दिरों पर कब्जा करके नकली धर्मगुरु खड़े किए, गोहत्यारों को भाई बताया, गोमांस खाना जीवनशैली बताया, विवाह की मर्यादा हटाकर समलैंगिकता और व्यभिचार का समर्थन किया, शास्त्रों को मिलावटी बताकर बदलने की बात कही, हिन्दूद्रोही अम्बेडकर, फुले, पेरियार आदि को महापुरुष बताया, इस्लाम के बिना हिन्दुत्व अधूरा, इस्लाम का विरोधी हिन्दू सोच का नहीं, कहकर हमारी हिन्दू पहचान पर आघात करना आदि अनन्त कुकर्म आरएसएस के हैं।

राष्ट्रीय मुस्लिम एवं ईसाई मञ्च चलाने वाले सङ्घी विधर्मियों के लिए देवताओं को गाली देने वाले अम्बेडकर और फुले को महापुरुष मानना हिन्दू सोच है, ब्राह्मणों को गाली देना भी हिन्दू सोच है और इस्लाम का विरोध करने वाला हिन्दू सोच का नहीं है। अब ये नकली मन्दिर और तीर्थ, नकली शक्तिपीठ बनवा रहे हैं। कभी ज्योतिर्लिंग में शास्त्रीय धारापात्र के स्थान पर मशीनी पाइप का शॉवर लगाना तो कभी अखण्ड ज्योति के नाम पर अयोध्या में चीनी मॉडल रख देना, ये सब इन नास्तिकों की अश्रद्धा के ही दुष्परिणाम हैं। अवधेशानन्द, राजेन्द्रदास, गोविन्ददेव, कैलासानन्द, मोरारी, ऋतम्भरा, धीरेन्द्र जैसे सैकड़ों गुलाम सङ्घ ने हिन्दू धर्म में विकृति हेतु जन्म दे रखे हैं। महर्षि वेदव्यास जी ने इन सब बातों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी ―

अदृष्ट्वा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते।
देवानां भेदनिन्दे च देवतावध उच्यते॥
आत्महत्या हि सा प्रोक्ता जाबाले नात्र संशयः॥
*****
शास्त्रार्थमन्यथा यस्तु व्याख्यायति सुमन्दधी:।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
यः पुराणेषु चार्थेषु स्वयं श्लोकादि कल्पयेत्।
स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥
*****
कल्पयिष्यन्ति शास्त्राणि स्वबुध्या देवता अपि।
त्यक्ष्यन्ति धर्मशास्त्राणि निन्दयिष्यन्ति तान्यपि॥
*****
अन्तःशठा महाक्रूरा परद्रव्याभिलिप्सवः।
भ्रमन्ते वैष्णवैर्वेशधारयिष्यन्त्यसज्जनान्॥
पुराणार्थविदां साधुशीलानाञ्च द्विजन्मनाम्।
देवताद्वेषकास्ते वै द्वेषयिष्यन्ति सर्वदा॥
अन्यवर्णाश्रमश्चिह्नरन्येऽधिष्यन्ति लोभिन:।
(बृहद्धर्मपुराणे)

हे जाबाले ! जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसे पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए। देवताओं में भेद देखने वाले एवं उनकी निन्दा करने वाले को देवतावध का पाप लगता है, जो आत्महत्या के ही समान है "इसमें संशय नहीं है"। जो शास्त्रों का मनमाना अर्थ लगाता है, और जो मूर्ख ऐसा ही व्याख्यान देता है, उसे भी ब्रह्महत्या के समान पातकी जानना चाहिए। जो पुराणों के अर्थों में अपनी कल्पना से ही श्लोकों को बताता है, (अथवा श्लोकों को ही काल्पनिक बताता है) उसे भी ब्रह्महत्या का ही दोषी बताया गया है। कलियुग में लोग अपने मन से शास्त्रों एवं देवताओं की कल्पना करके व्याख्या करेंगे। मान्य धर्मशास्त्रों को छोड़कर, उनकी निन्दा भी करेंगे। अन्दर से शठबुद्धि वाले, अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाले, तथा दूसरे के धन के अपहरण की इच्छा रखने वाले लोग, केवल वैष्णव वेश धारण करके और अयोग्य लोगों को वैष्णव वेश धारण करा कर भ्रमण किया करेंगे। जो ब्राह्मण पुराणों के अर्थ को जानने वाले होंगे, अच्छा और शीलयुक्त आचरण करने वाले होंगे, उन लोगों से, तथा देवताओं से भी ये लोग द्वेष करेंगे। साथ ही, बिना शास्त्रोक्त अधिकार के ही अन्य वर्ण या आश्रम के चिह्न को (प्रतिष्ठा आदि के) लोभ से धारण कर लेंगे।
(बृहद्धर्म पुराण, उत्तरखण्ड)

― श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु

Address

Kamakhya

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when astrotantra posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share