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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के नायक राम हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि के नायक शम्बूक। कोई तो वजह होगी? ओमप्रकाश वाल्मीकि के ज...
30/06/2026

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के नायक राम हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि के नायक शम्बूक। कोई तो वजह होगी?

ओमप्रकाश वाल्मीकि के जन्मदिन ( 30 जून) सादर नमन के साथ

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराल’ की सर्वश्रेष्ठ कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ मानी जाती है। इसमें दशरथ पु्त्र राम अन्यायियों और अन्याय से मुक्ति दिलाने वाले नायक के रूप में सामने आते हैं।

महिषासुर की हत्या करने वाली दुर्गा इस कविता में राम को शक्ति प्रदान करती हैं। इस कविता में राम न्याय-अन्याय के युद्ध में न्याय के प्रतीक बनकर सामने आते हैं।

इसके विपरीत ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘शंबूक का कटा सिर’ में दशरथ पुत्र राम हत्यारे और अन्यायी के रूप में सामने आते हैं। जो दहशत पैदा करते हैं। इस कविता में राम वर्ण वर्चस्व की स्थापना के लिए निरपराध शंबूक की निर्मम हत्या करते हैं।

यह सिर्फ दो कविताएं नहीं हैं, ये हिंदी साहित्य और वैचारिक दुनिया की दो परंपराएं हैं।

सवाल यह है कि वामपंथी भाषा में बात करें तो कौन सी परंपरा और विरासत प्रगतिशील है?

कौन सी परंपरा भारत के उत्पादक और मेहनतकश वर्ग की परंपरा है और कौन सी भारत के परजीवी-अनुत्पादक और शोषक वर्ग की परंपरा है?

भारत में कौन सी प्रतिवाद और प्रतिरोध की परंपरा है और कौन सी यथास्थतिवादी या प्रतिक्रियावादी परंपरा है?

समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित भारत का निर्माण करने की चाह रखने वाले लोगों को खुद को निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ से जोड़ना चाहिए या ओमप्रकाश वाल्मीकि के ‘शंबूक के कटे सिर’ से?

अभी फिलहाल हिंदी पट्टी ने खुद को राम की शक्तिपूजा की परंपरा से जोड़ रखा है। अकारण नहीं है कि विश्वविद्यालयों में यह कविता पाठ्यक्रम में है। यह कविता सिविल सर्विसेज के कोर्स में भी शामिल है।

जबकि 'शंबूक कटा सिर' पाठ्यक्रम और विमर्श के मुख्य दायरे से बाहर है।

निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ और ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘शंबूक का कटा सिर’

रवि हुआ अस्त : ज्योति के पत्र पर लिखा अमर
रह गया राम-रावण का अपराजेय समर
आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर,
शतशेलसंवरणशील, नीलनभ-गर्ज्जित-स्वर,
प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद-कौशल-समूह,—
राक्षस-विरुद्ध प्रत्यूह,—क्रुद्ध-कपि-विषम—हूह,
विच्छुरितवह्नि—राजीवनयन-हत-लक्ष्य-बाण,
लोहितलोचन-रावण-मदमोचन-महीयान,
राघव-लाघव-रावण-वारण—गत-युग्म-प्रहर,
उद्धत-लंकापति-मर्दित-कपि-दल-बल-विस्तर,
अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,—
विद्धांग-बद्ध-कोदंड-मुष्टि—खर-रुधिर-स्राव,
रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल-वानर दल-बल,—
मूर्च्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,
वारित-सौमित्र-भल्लपति—अगणित-मल्ल-रोध,
गर्ज्जित-प्रलयाब्धि—क्षुब्ध—हनुमत्-केवल-प्रबोध,
उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि-चतुः प्रहर,
जानकी-भीरु-उर—आशाभर—रावण-सम्वर।
लौटे युग-दल। राक्षस-पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।
वानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न;
प्रशमित है वातावरण; नमित-मुख सांध्य कमल
लक्ष्मण चिंता-पल, पीछे वानर-वीर सकल;
रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,
श्लथ धनु-गुण है कटिबंध स्रस्त—तूणीर-धरण,
दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशांधकार,
चमकती दूर ताराएँ ज्यों हों कहीं पार।
आए सब शिविर, सानु पर पर्वत के, मंथर,
सुग्रीव, विभीषण, जांबवान आदिक वानर,
सेनापति दल-विशेष के, अंगद, हनुमान
नल, नील, गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान
करने के लिए, फेर वानर-दल आश्रय-स्थल।
बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर; निर्मल जल
ले आए कर-पद-क्षालनार्थ पटु हनुमान;
अन्य वीर सर के गए तीर संध्या-विधान—
वंदना ईश की करने को, लौटे सत्वर,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर।
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,
सुग्रीव, प्रांत पर पाद-पद्म के महावीर;
यूथपति अन्य जो, यथास्थान, हो निर्निमेष
देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।


‘शंबूक का कटा सिर’

जब भी मैंने
किसी घने वृक्ष की छाँव में बैठकर
घड़ी भर सुस्‍ता लेना चाहा
मेरे कानों में
भयानक चीत्‍कारें गूँजने लगी
जैसे हर एक टहनी पर
लटकी हो लाखों लाशें
ज़मीन पर पड़ा हो शंबूक का कटा सिर ।

मैं उठकर भागना चाहता हूँ
शंबूक का सिर मेरा रास्‍ता रोक लेता है
चीख़-चीख़कर कहता है--
युगों-युगों से पेड़ पर लटका हूँ
बार-बार राम ने मेरी हत्‍या की है ।

X x x

शंबूक ! तुम्‍हारा रक्‍त ज़मीन के अंदर
समा गया है जो किसी भी दिन
फूटकर बाहर आएगा
ज्‍वालामुखी बनकर !

दर्शन के क्षेत्र में जो स्थान बुद्ध का है... राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान सम्राट अशोक का है...साहित्य के क्षेत्र में ...
29/06/2026

दर्शन के क्षेत्र में जो स्थान बुद्ध का है... राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान सम्राट अशोक का है...साहित्य के क्षेत्र में वहीं स्थान कबीर का है।
हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार गार्सां द तासी ने 19 वीं सदी में कबीर के बारे में तुलसीदास से डेढ़ गुना अधिक लिखा.....
मगर रामचंद्र शुक्ल ने 90 साल बाद 20 वीं सदी में अपने इतिहास में तुलसीदास के बारे में कबीर से तीन गुना अधिक लिखा.....और कबीर को उल्ट दिया........और इस प्रकार 20 वीं सदी में शुक्ल जी ने कबीर की आलोचना की दिशा और दृष्टि बदल दी।
लेकिन कबीर अग्निपक्षी हैं, अपनी ही राख से फिर जिंदा हो उठे....
नमन है अग्निपक्षी कवि कबीर को!
हजार साल के इतिहास में कबीर अकेला कवि हैं....जिन्हें वाणी का डिक्टेटर कहा जाता है....कबीर की भाषा बड़ी ताकतवर है.....अंदर तक बेधती है....
कबीर ने अपनी भाषा में 2% से भी कम संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल कर बता दिया .....कि वाणी का डिक्टेटर कौन हो सकता है...
नमन है वाणी के डिक्टेटर को!
सतगुरु कबीर जयंती 💐💐

🎓 DASFI Admission Help Deskकुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है।प्रवेश से संबंधित किसी भी ...
27/06/2026

🎓 DASFI Admission Help Desk

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है।

प्रवेश से संबंधित किसी भी प्रकार की जानकारी, फॉर्म भरने में मार्गदर्शन, कोर्स चयन, दस्तावेज़, प्रवेश परीक्षा एवं छात्रवृत्ति संबंधी सहायता के लिए DASFI Kurukshetra से संपर्क करें।

आधुनिक एवं जाति आधारित आरक्षण के जनक और छुआ-छूत के घोर विरोधी छत्रपति शाहूजी महाराज का आज जन्मदिन है......आरक्षण किस जात...
26/06/2026

आधुनिक एवं जाति आधारित आरक्षण के जनक और छुआ-छूत के घोर विरोधी छत्रपति शाहूजी महाराज का आज जन्मदिन है......

आरक्षण किस जाति को मिले, शाहूजी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं था.....

आरक्षण किस जाति को न मिले, शाहूजी के लिए यहीं महत्वपूर्ण था....

नौकरियों में जिन 4 जातियों का वर्चस्व था, उन्हें छोड़कर शाहूजी ने बगैर भेदभाव किए सभी जातियों को आरक्षण दे दिए.....

समाज में फैली अनेक जातियों का सर्वे न करा कर शाहूजी ने नौकरियों में वर्चस्व प्राप्त जातियों का ही सर्वे करा लिए....

पूरा पहाड़ उठाए बिना आरक्षण देने का यहीं सुगम मार्ग था....

आखिरकार आरक्षण तो नौकरी में देना था सो उन्होंने नौकरी का ही जातिगत सर्वे करा लिए....

फालतू का झंझट फेंक दिए....

आरक्षण का वह गजट 26 जुलाई, 1902 दिन शनिवार को प्रकाशित हुआ था....

जयंती पर जय!!!

मातृभूमि की आन-बान-शान की रक्षा के लिये साहस, शौर्य एवं पराक्रम के साथ अपना सर्वस्व न्यौछावर कर बलिदान देने वाले वीर शिर...
09/05/2026

मातृभूमि की आन-बान-शान की रक्षा के लिये साहस, शौर्य एवं पराक्रम के साथ अपना सर्वस्व न्यौछावर कर बलिदान देने वाले वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की जयंती पर सादर श्रद्धांजलि।

  TEAM
14/04/2026

TEAM

14/04/2026



वे धन्य है जो यह अनुभव करते है कि जिन लोगो मे हमारा जन्म हुआ,उनका उद्धार करना हमारा कर्तव्य है।वे धन्य है,जो गुलामी का ख...
14/04/2026

वे धन्य है जो यह अनुभव करते है कि जिन लोगो मे हमारा जन्म हुआ,उनका उद्धार करना हमारा कर्तव्य है।वे धन्य है,जो गुलामी का खात्मा करने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते है।धन्य है वे,जो सुख,दुख,मान और अपमान,कष्ट और कठिनाइयों,आंधी और तूफान इनकी परवाह किये बिना तब तक सतत संघर्ष करते रहेंगे,जब तक कि अछुतो और महिलाओ को मानव के जन्मसिद्ध अधिकार पूर्णतया प्राप्त न हो जाए।
-बाबा साहब डॉ अम्बेडकर


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