15/05/2025
#साधक_सहाय_श्रृंखला
११. "सहज बालमन" को अपनी अंतः यात्रा में शामिल करें।
💗 बाल मन सदा आनंदित रहता हैं। उसके आनंद की उपस्थिति सभी को अपने साथ जोड़ लेती हैं। क्योंकि बाल मन में कोई समझ–बुझ नहीं होती। वह निर्मल होता हैं। शुद्ध होता हैं। किंतु जैसे–जैसे बालक बड़ा होता हैं और दुनियावी समझ को सीखता हैं तो वह अपनी निर्मलता, निश्छलता को लेकर द्वंद में पड़ जाता हैं।
🌸 परिवार में सभी उसे कौशल और बड़ा बनने के नाम पर रिश्तों का झूठा व्यापार, निजी हित के लिए स्वार्थ प्रेरणा, अधिक कमाने का लालच, स्पर्धा के लिए ईर्ष्या भावना और भय या मांगने के लिए भक्ति (धार्मिक कर्म क्रियाएं) सिखा देते हैं। बालमन के कोमल हृदय में Skills और Status के नाम पर *चालाक और मतलबी* बनने की ऐसी कलाकारी भर दी जाती हैं कि वह स्वयं के असली स्वभाव से ही दूर होता जाता हैं।
🌸 आधी उम्र के कठोर परिश्रम और बनावटी (आर्टिफीशियल) दौड़ (स्पर्धाओं) में भागते–भागते बहुत कुछ कमाने बनाने के बाद भी जब उसे आंतरिक सकून का कोई पड़ाव नहीं मिलता तो वह स्वयं से बोझिल हो जाता है। उस गहरे तनाव के समय हर किसी को आंतरिक शांति के लिए आध्यात्मिक यात्रा में किसी न किसी प्रक्रिया को अपनाने का मौका मिलता हैं।
💗 स्वयं से प्रेरित ईच्छुक लोगों को समर्पित भाव से आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने में अधिक समय नहीं लगता। अपने अंदर के आनंद को बढ़ाने के लिए अपनी लौकिक बुद्धि और भ्रमित मन को किसी दिव्य जीवन अथवा ईश्वरीय चेतना शक्ति से जोड़ने के बाद निर्मलता (कंडीशनिंग) होने का काम शुरू हो जाता हैं। बनावटी (आर्टिफीशियल) जीवन के बदलते ही अपने सहज बालमन के स्वभाव में जीने का प्रत्येक क्षण हमें परमात्मा के आनंद का अनुभव करवाता हैं।
#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान