Jeevan Anu-Sandhan Nyas

Jeevan Anu-Sandhan Nyas 'स्वबोध' के लिए स्वयं के जीवन का अनुसंधान करने वाले साधकों को समर्पित न्यास।

 #साधक_सहाय_श्रृंखला११. "सहज बालमन" को अपनी अंतः यात्रा में शामिल करें। 💗 बाल मन सदा आनंदित रहता हैं। उसके आनंद की उपस्थ...
15/05/2025

#साधक_सहाय_श्रृंखला
११. "सहज बालमन" को अपनी अंतः यात्रा में शामिल करें।

💗 बाल मन सदा आनंदित रहता हैं। उसके आनंद की उपस्थिति सभी को अपने साथ जोड़ लेती हैं। क्योंकि बाल मन में कोई समझ–बुझ नहीं होती। वह निर्मल होता हैं। शुद्ध होता हैं। किंतु जैसे–जैसे बालक बड़ा होता हैं और दुनियावी समझ को सीखता हैं तो वह अपनी निर्मलता, निश्छलता को लेकर द्वंद में पड़ जाता हैं।

🌸 परिवार में सभी उसे कौशल और बड़ा बनने के नाम पर रिश्तों का झूठा व्यापार, निजी हित के लिए स्वार्थ प्रेरणा, अधिक कमाने का लालच, स्पर्धा के लिए ईर्ष्या भावना और भय या मांगने के लिए भक्ति (धार्मिक कर्म क्रियाएं) सिखा देते हैं। बालमन के कोमल हृदय में Skills और Status के नाम पर *चालाक और मतलबी* बनने की ऐसी कलाकारी भर दी जाती हैं कि वह स्वयं के असली स्वभाव से ही दूर होता जाता हैं।

🌸 आधी उम्र के कठोर परिश्रम और बनावटी (आर्टिफीशियल) दौड़ (स्पर्धाओं) में भागते–भागते बहुत कुछ कमाने बनाने के बाद भी जब उसे आंतरिक सकून का कोई पड़ाव नहीं मिलता तो वह स्वयं से बोझिल हो जाता है। उस गहरे तनाव के समय हर किसी को आंतरिक शांति के लिए आध्यात्मिक यात्रा में किसी न किसी प्रक्रिया को अपनाने का मौका मिलता हैं।

💗 स्वयं से प्रेरित ईच्छुक लोगों को समर्पित भाव से आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ने में अधिक समय नहीं लगता। अपने अंदर के आनंद को बढ़ाने के लिए अपनी लौकिक बुद्धि और भ्रमित मन को किसी दिव्य जीवन अथवा ईश्वरीय चेतना शक्ति से जोड़ने के बाद निर्मलता (कंडीशनिंग) होने का काम शुरू हो जाता हैं। बनावटी (आर्टिफीशियल) जीवन के बदलते ही अपने सहज बालमन के स्वभाव में जीने का प्रत्येक क्षण हमें परमात्मा के आनंद का अनुभव करवाता हैं।

#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान

 #साधक_सहाय_श्रृंखला१०. "एकांत समय को साक्षी रहते हुए स्वीकार करें, हर घटना को अन्तः आनंद का निमित्त बनने दें।" 👏🏻अपनी द...
04/05/2025

#साधक_सहाय_श्रृंखला
१०. "एकांत समय को साक्षी रहते हुए स्वीकार करें, हर घटना को अन्तः आनंद का निमित्त बनने दें।" 👏🏻

अपनी दैनिक चर्या में नित्य प्रति एकांत में शांत बैठने का अभ्यास जैसा-जैसा बढ़ता जाएगा, हमारे अंदर आने वाले विचारों का प्रवाह भी धीमा होता जाएगा। एकांत में शांत बैठने पर अंदर से आने वाले विचारों को बिना किसी प्रतिक्रिया के केवल देखना भर है, इसी देखने भर को “साक्षी भाव” कहा जाता है।

जब हम किसी भी विचार या घटना को बिना प्रतिक्रिया के “साक्षी भाव से देखते हैं” तो हमारा भोक्ता-भाव खत्म होने लगता है। जिस कारण से उस विचार का प्रभाव हमारी अन्तः चेतना को प्रभावित नहीं करता है। इसी कारण से हमारे अंदर के आनंद का यथार्थ अर्थात; निर्मल बने रहने का स्वभाव हमें अधिक देर तक सहज और आनंदित रखता है।

अन्यथा हमारे दिमाग में हर क्षण लहरों की तरह आने वाले विचार, किसी न किसी तरह बीते कल की घटनाओं अथवा भविष्य की चिंताओं या कल्पनाओं के कारण हमें हमेशा वास्तविक आनंद से दूर रखते हैं। यही कारण है कि कोई भी नया साधक अपनी प्रारंभिक अवस्था में आंखों को बंद करके शांत बैठने का अभ्यास काफी कठिनता से कर पाता है।

हमारे अंदर का जीव-संसार अनेकों प्रकार की घटनाओं को इकट्ठा किए हुए हैं। जैसे ही हम आंखें बंद करके अंदर जाते हैं वह सब पुरानी बातें, घटनाएं और संग्रहित (इकट्ठे) हुए विचार हमें बार-बार विचलित करते हैं। निरंतर बहती लहरों की तरह उनका आना, बढ़ना और लगातार बहते जाना हमें अपने अंदर के आनंद की ओर जाने ही नहीं देता है।

इसलिए प्रत्येक साधक को अपने निरंतर बैठने के अभ्यास को दृढ़ करना चाहिए। उस समय हमारा साक्षी भाव यदि स्थिर रहता है तो हमारे आनंद का कार्यकाल अर्थात समय की अवधि भी निरंतर बढ़ती जाएगी। जीवन की सभी परिस्थितियों में साक्षी भाव का स्थिर होना ही हमारे विवेक को जागृत करता है और हमारे अन्तः आनंद को बढ़ाने का निमित्त बनता हैं।

#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान

पार्वती ने पूछा — क्या मृत्यु भी माया है.........?(और शिव उन्हें मृत्यु के पार शून्य दिखाने ले गए —जहाँ जीवन भी मौन था, ...
20/04/2025

पार्वती ने पूछा — क्या मृत्यु भी माया है.........?

(और शिव उन्हें मृत्यु के पार शून्य दिखाने ले गए —
जहाँ जीवन भी मौन था, और मृत्यु भी…)

प्रारंभ — प्रश्न का जन्म:

वो रात शिव मौन थे —
लेकिन पार्वती के भीतर कुछ टूट रहा था।

श्मशान की ओर देखते हुए उन्होंने पूछा:

नाथ… क्या मृत्यु भी माया है?

या वो सच है?

क्योंकि हर किसी से मोह छूट सकता है —
लेकिन मृत्यु के भय से कोई छूटा नहीं…...

शिव ने आँखें मूँद लीं — फिर धीरे से बोले:

मृत्यु को शब्दों से नहीं समझा जा सकता
उसे केवल देखा जा सकता है।

चलिए…....
आज तुम्हें वो दिखाता हूँ
जो तुम सोचती थीं — अंत है।
और जो वास्तव में…
शून्य है।

दृश्य 1 — शव का विघटन

एक अधजला शव —
कीड़े रेंग रहे थे…
मांस गल रहा था…
साँसें अब केवल स्मृति थीं।

पार्वती देखती रहीं — पर विचलित नहीं हुईं।

(भीतर की आवाज़):
ये वही देह है,
जिसे मैंने ‘स्वरूप’ माना था…
क्या मैं यह हूँ?

शिव बोले:
देह केवल आवरण है —
और मृत्यु उस आवरण को मिटाने की विद्या।
माया की पहली सीख —
जो दिखता है, वही मिटता है।

दृश्य 2 — रुदन और विस्मृति

एक चिता जल रही थी —
बेटी रो रही थी —
और पीछे लोग फोटो खींच रहे थे, बातें कर रहे थे।

(पार्वती):
अभी-अभी एक जीवन गया है —
और लोग पहले ही वापस ‘सामान्य’ हो चुके हैं…

शिव ने कहा:

मृत्यु केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं,
ये संबंधों की क्षणभंगुरता का दर्पण है।

माया का दूसरा बंधन —
रिश्तों को सत्य मानना।

दृश्य 3 — भ्रम की अंतिम साँकल

एक आत्मा देह से निकल रही थी —
लेकिन नीचे से आवाज़ें उसे खींच रही थीं:

“तेरा अपमान अभी बाकी है…”

“तेरी बेटी अकेली है…”

“तू अधूरी रह गई…”

आत्मा काँपती है,
और....… रुक जाती है।

(पार्वती):
क्या ये मृत्यु है?
या मैं ही हूँ जो जा नहीं पा रही…...

शिव बोले:

मृत्यु देह से नहीं,
'मैं' से होती है।
और जब तक ‘मैं’ ज़िंदा है —
तब तक तुम मृत्यु के पार नहीं जा सकते।

अंतिम दृश्य — शून्य का द्वार

अब चारों ओर सन्नाटा था।
कोई देह नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।
कोई स्मृति नहीं।
सिर्फ़ शून्य।

पार्वती ने पूछा:

नाथ… यह कौन सा स्थान है?

शिव बोले:
यह वही है
जहाँ मृत्यु नहीं आती —
क्योंकि यहाँ ‘तुम’ ही नहीं हो।

शास्त्र-संगति:

“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”
— श्रीमद्भगवद्गीता

“मृत्योर्मामृतं गमय”
— बृहदारण्यक उपनिषद

“मायैव सर्वमखिलं ह्यनात्मा”
— शिवगीता

🪷 पार्वती ने मौन स्वर में कहा:

अब समझ में आया…...
मृत्यु का भय मुझसे बाहर नहीं था —
वो तो मेरे भीतर था…
मेरे ही 'मैं' में छिपा हुआ।
और जब मैंने वो छोड़ दिया —
मृत्यु भी चुप हो गई।

जो मृत्यु से नहीं डरता —
वही पहली बार जीता है।

मृत्यु कोई अंत नहीं —
वो तो एक दरवाज़ा है…
जिसके उस पार तुम नहीं हो।
और जहाँ ‘तुम’ नहीं —
वहाँ सिर्फ़ शिव है।।

ॐ शिव गोरक्ष योगी 🔱
आदेश आदेश आदेश 🧘🏻

 #साधक_सहाय_श्रृंखला९. "एकांत में शांत बैठने के बाद विचारों के प्रति अपना अभिमत शून्य कर मात्र देखने का अभ्यास करें।"वैर...
09/04/2025

#साधक_सहाय_श्रृंखला
९. "एकांत में शांत बैठने के बाद विचारों के प्रति अपना अभिमत शून्य कर मात्र देखने का अभ्यास करें।"

वैराग्य की अभिव्यक्ति (आंतरिक सकून) को सहजता से विकसित करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रतिदिन एकांत में शांत बैठने का अभ्यास करना चाहिए। उस एकांत समय मन में आने वाले विचारों को किसी भी प्रकार का टैग नहीं देना चाहिए अर्थात किसी भी विचार के प्रति अपना कोई भी सही, गलत, क्यों इत्यादि का अभिमत नहीं बनना चाहिए।

हमारे ख्यालों में आने वाले अतीत या भविष्य के विचारों के प्रति राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार अथवा जिज्ञासा के सभी टैग (अभिमत) उस विचार को बार-बार हमारे मन मस्तिष्क में स्थान दे देते हैं। इसलिए शांत अवस्था में बैठने पर आने वाले सभी विचारों को अपनी किसी भी प्रतिक्रिया से नहीं जोड़ना है।

आने वाले विचारों को मात्र देखते रहने से भी वह विचार हल्के होते जाते हैं और एक लंबे समय इसी प्रक्रिया द्वारा उन विचारों का मूल कारण हमें दिखाई देने लगता है। इसके बाद हमारे स्वभाव में बदलाव प्रकट होता है और वह विचार सदा के लिए खत्म हो जाता है। अतः सभी प्रकार से विमुक्त होने के बाद ही विरक्त स्वभाव का प्रकटीकरण होता है।

#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान

 #साधक_सहाय_श्रृंखला८. “वैराग्य को दृढ़ करना है तो श्रद्धा, संकल्प और त्याग को स्वभाव में धारण करना होगा।”भक्ति, साधना, ...
23/03/2025

#साधक_सहाय_श्रृंखला
८. “वैराग्य को दृढ़ करना है तो श्रद्धा, संकल्प और त्याग को स्वभाव में धारण करना होगा।”

भक्ति, साधना, उपासना अथवा समाज सेवा; ऐसे कई अलग-अलग प्रकार से हर व्यक्ति किसी न किसी प्रक्रिया में जुड़कर स्वयं को निर्मल करने में लगा हुआ है अर्थात सात्विक शुद्धता बनाने में लगा हुआ है। यह सब करते हुए भी साधक के मन में अनेक प्रकार की वासनाएं और निराशा परेशान करती रहती है।

इसका अर्थ यह है कि बाहरी स्तर पर दिखने वाली इन सब क्रियाओं में बुद्धि नही लग रही है। यह सब क्रियाएं केवल मन और शरीर को एकाग्र रखने अथवा मनोरंजन के लिए एक माध्यम मात्र बनकर रह गई है। मन की इस अवस्था से आगे बढ़ने के लिए साधकों को बुद्धि की अधीनता से बाहर निकलना होगा अर्थात अपने व्यवहार में निश्चल श्रद्धा, दृढ़ संकल्प और त्याग का पालन करना होगा।

जब हम अपने श्रद्धा-संकल्प से किसी सेवा, साधना, परोपकार या सादगीपूर्ण जीवन के लिए प्रस्तुत होते है तो बुद्धि हमें आकर्षण और कष्ट के डर से विचलित करती हैं। बुद्धि सदा बाहरी दिखावे और अनजान भय के द्वारा हमें भौतिक जगत में ही फसाएं रखती हैं। इसी कारण आध्यात्मिक स्तर को बढ़ाने के लिए आत्मीय आचरण से शुरुआत करना हैं। जैसे; समय और धन को निस्वार्थ परोपकार में लगाना, क्षमाशील होना, सादगी पूर्ण आचरण, नित्य आराधना, अहंकार जुटाने से बचना और न्यूनतम व्यवस्था में रहने पर भी आनंद लेना।।

#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान

नियमितता से पानी बूंद की भी चट्टान पर निशान बना देती हैं। अपनी नित्य जीवन शैली में कुछ आवश्यक काम नियम से करने की आदत बन...
22/03/2025

नियमितता से पानी बूंद की भी चट्टान पर निशान बना देती हैं। अपनी नित्य जीवन शैली में कुछ आवश्यक काम नियम से करने की आदत बना लेनी चाहिए। जिससे शरीर, मन और आत्मा को भी आराम (सकून) मिलता रहे। 👏🏻

 #साधक_सहाय_श्रृंखला७. “वैराग्य न हो और केवल ज्ञान की बातें बखान करना अच्छा लगे तो सेवा और भजन छूट जाते हैं।”बचपन से बड़...
16/03/2025

#साधक_सहाय_श्रृंखला
७. “वैराग्य न हो और केवल ज्ञान की बातें बखान करना अच्छा लगे तो सेवा और भजन छूट जाते हैं।”

बचपन से बड़े होते होते हमें जो भी मिला हमने उसे शिक्षा, संस्कार, जानकारी या ज्ञान मान कर स्वीकार कर लिया। इन सभी बाहर से स्वीकार किए विषयों में हमें स्वयं से कोई अनुभव ज्ञान नही होता। अबोध बाल मन में बाहरी जानकारी को ज्ञान बताकर ही भरा गया है। इसलिए सामान्य जन के लिए ज्ञान की बातें सुनना, पढ़ना और बखान करना भी सरल ही होता हैं। पर उस ज्ञान बताने वाले ने अपने ज्ञान के विषय में ही कभी जीवन जीने की कोशिश की होगी तो उसे वास्तविक सत्य स्वरुप में ज्ञान अवश्य हुआ होगा।

यहां अनुभव से प्राप्त ज्ञान को ही वास्तविक जीवन का पाठ / सीख (lesson) माना गया है। जैसे समुद्र के जल के बारे में अनेक जानकारी होने के बाद भी समुद्र का अनुभव उसके तट पर जाने के बाद ही महसूस होता है अर्थात समुद्र की उपस्थिति में ही समुद्र का अनुभव किया जा सकता है। केवल जानकारी होने से वह अनुभव ज्ञान नहीं हो सकता।

अपने जीवन के अनुभव से प्राप्त ज्ञान के प्रभाव से व्यवहारिक लक्षणों में भी बदलाव आ जाता हैं। जिसे शरीर से परे की परम् सत्ता का थोड़ा भी अनुभव होता है उसके स्वभाव में वैराग्य भी स्वयं प्रकट हो जाता हैं। उसकी अपनी मन–बुद्धि की स्मृतियों में ही द्वंद होने लगता हैं, वह समय परिवर्तन के कारण स्वयं के स्वीकार किए विषयों को ही दुरुस्त करने के लिए प्रयत्नशील रहता हैं। स्वयं से स्वयं में निरंतर सुधार की ओर बढ़ने वाला साधक ही वैराग्य को प्राप्त होता हैं। केवल ज्ञान का बखान करने वाले सर्वदा वहीं उपलब्ध मिलेंगे।।

#सत्संग_प्रसाद #जीवन_अनुसंधान

13/02/2025

🚩 माघ पुर्णिमा के शुभ अवसर पर जीवन अनुसंधान न्यास के पांच वर्ष संपन्न होने के उपलक्ष्य में स्थापना दिवस पर महाकुंभ, प्रयागराज में जीवन अनुसंधान न्यास द्वारा आयोजित वैदिक शिविर, सैक्टर 24 में काशी के विद्वान ब्राह्मणों द्वारा विशेष यज्ञ पूजन करवाया गया। 🎪

पांचवीं वर्षगांठ पर मंगलमय शुभकामनाएं 💝
12/02/2025

पांचवीं वर्षगांठ पर मंगलमय शुभकामनाएं 💝

🕉️   #महाकुंभ_2025  #तीर्थराज_प्रयाग  🔯🚩 सनातन संस्कृति का पावन पुरातन पर्व 🔱🕉️ 🚩 ॐ शिव ॐ मां 🔱 🔯
07/01/2025

🕉️ #महाकुंभ_2025 #तीर्थराज_प्रयाग 🔯
🚩 सनातन संस्कृति का पावन पुरातन पर्व 🔱

🕉️ 🚩 ॐ शिव ॐ मां 🔱 🔯

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