15/05/2026
शनि को ज्योतिष में "विच्छेदात्मक ग्रह" माना गया है। जहां एक ओर शनि मृत्यु प्रधान ग्रह माना गया है, वहीं शनि दूसरी ओर शुभ होने पर भौतिक जीवन में श्रेष्ठता भी देता है।
शनि अकस्मात् कुप्रभाव देने वाला ग्रह माना जाता है, अतः भय तो सहज स्वाभाविक है। यह अकाल मृत्यु, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय-हानि, अपमान, धोखा, द्वेष, ईर्ष्या का कारण माना जाता है, पर वास्तविकता यह नहीं है, सूर्य पुत्र शनि हानिकारक न होकर लाभदायक भी सिद्ध होता है,
*1.* शनि तुरंत एवं निश्चित फल देता है।
*2.* शनि 'सन्तुलन' तथा न्याय प्रिय है।
*3.* शनि शुभ होकर मनुष्य को व्यवस्थित, व्यवहारिक, घोर परिश्रमी, गम्भीर एवं स्पष्ट वक्ता बना देता है।
*4.* संकुचित व्यक्ति भरपूर आत्मविश्वास, प्रबल इच्छा शक्ति युक्त, महत्वाकांक्षी, मितव्ययता पूर्ण आचरण करने वाला, हर कार्य में सावधान रहने वाला तथा व्यवसाय में चतुर तथा कार्यपटु होता है।
*5.* मनुष्य का भेद लेने में शनि-प्रधान व्यक्ति दक्ष होता है।
*6.* शनिप्रधान व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक क्रांति के लिए प्रयत्नपूर्ण त्याग मय जीवन व्यतीत करने वाले, पूर्ण सामाजिक व मिलनसार, परोपकार के कार्यों में समय व्यतीत करने वाले, लोक-कल्याण में सतत् संलग्न, विद्वान, उदार तथा पवित्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।
*7.* अध्यात्मवाद की ओर विशेष झुकाव रहता है।
*8.* योगाभ्यासी, गूढ़ रहस्य का पता लगाने में दक्ष, कर्म कांड व धार्मिक शास्त्रों का अभ्यास, ग्रंथ प्रकाश, तत्वज्ञ, लेखन कार्य का यश व सम्मान पाते हैं।
समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं जो अत्यन्त क्रोधी होते हुए भी अत्यन्त दयालु कहे गए हैं। इनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं, इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।
*जिस साधक को शनि की साढे साती अथवा ढैय्या से विशेष कष्ट अनुभव हो रहा हो, उनके लिए तो यह एक श्रेष्ठ दीक्षा है।*
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