14/02/2026
सुभाष बाबल उर्फ मेवाड़ा और भूटाराम बाबल — इत्तेफ़ाक या गहरी साज़िश?
पाली जिले के खिंवाड़ा थाना क्षेत्र में हुई ताज़ा मुठभेड़ अब सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं रही। यह मामला इसलिए और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि आज से ठीक एक साल पहले, लगभग इसी इलाके में, इसी परिवार के सदस्य सुभाष बाबल उर्फ मेवाड़ा का भी पुलिस एनकाउंटर हुआ था।
अब एक साल बाद उसी घर से भूटाराम बाबल की मौत, उसी तरह की पुलिस कार्रवाई में — यह संयोग नहीं, बल्कि गंभीर जांच का विषय बन चुका है।
एक साल पहले सुभाष बाबल उर्फ मेवाड़ा का एनकाउंटर हुआ। उस वक्त भी पुलिस ने आत्मरक्षा की दलील दी, वही शब्द, वही प्रक्रिया और वही अंतिम परिणाम — एक मौत। आज भूटाराम बाबल के मामले में भी पुलिस की कहानी लगभग वैसी ही है।
तरीखा बदला नहीं, जगह बदली नहीं, सिर्फ नाम बदले — और लाशें बढ़ती गईं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या एक ही घर के दो भाइयों का, एक ही क्षेत्र में, पुलिस मुठभेड़ में मारा जाना केवल इत्तेफ़ाक हो सकता है?
क्या सुभाष बाबल उर्फ मेवाड़ा के एनकाउंटर की कभी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच हुई?
अगर हुई, तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं हुए?
क्या दोनों मामलों को जोड़कर देखने की ज़रूरत नहीं है?
कानून कहता है कि आरोपी को गिरफ़्तार कर अदालत में पेश किया जाए। सज़ा का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका के पास है।
जब किसी परिवार के दो बेटे अदालत तक पहुँचने से पहले ही गोलियों का शिकार हो जाएँ, तो यह केवल अपराध का मामला नहीं रहता — यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल बन जाता है।
भूटाराम बाबल और सुभाष बाबल उर्फ मेवाड़ा — दोनों अब अपनी बात रखने के लिए ज़िंदा नहीं हैं। लेकिन उनके पीछे एक परिवार है, जो हर दिन यह सवाल लेकर जी रहा है कि
क्या उनके बेटों को ज़िंदा पकड़ना संभव नहीं था?
क्या गोली ही आख़िरी विकल्प थी?
यह मामला अब स्थानीय घटना नहीं रहा। यह राज्य की पुलिस व्यवस्था, जवाबदेही और मानवाधिकारों से जुड़ा विषय बन चुका है।
ज़रूरत है कि इन दोनों एनकाउंटरों की संयुक्त, स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच हो — ताकि यह साफ हो सके कि यह सच में मुठभेड़ थी या व्यवस्था की आड़ में हुई जल्दबाज़ी।
क्योंकि जब एक ही घर में दो-दो एनकाउंटर हों,
तो चुप्पी अपराध बन जाती है —
और सवाल उठाना ज़रूरी।