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सरसों में सल्फर कब डालनी चाहिए ?सरसों की फसल में सल्फर (गंधक) डालना बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि यह  #तेल की मात्रा और दा...
09/10/2025

सरसों में सल्फर कब डालनी चाहिए ?

सरसों की फसल में सल्फर (गंधक) डालना बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि यह #तेल की मात्रा और दानों की गुणवत्ता दोनों को बढ़ाता है✅ नीचे सही समय और तरीका बताया गया है 👇

🌱 सल्फर डालने का सही समय

1. पहली किस्त (बेसल डोज़)

बुवाई के समय सल्फर डालना सबसे बेहतर रहता है🔝

सल्फर को नींदाई-गुड़ाई से पहले मिट्टी में मिला दें✅

2. दूसरी किस्त (टॉप ड्रेसिंग, जरूरत हो तो)

30–35 दिन बाद, जब पौधे में 5–6 पत्तियाँ आ जाएँ या फूल आने से पहले🔝

यदि मिट्टी में सल्फर की कमी हो तो यह खुराक ज़रूर दें✅

⚖️ सल्फर की मात्रा

प्रति एकड़: 10–12 किलो सल्फर (S) की जरूरत होती है✅

अगर आप सल्फर युक्त खाद दे रहे हैं तो मात्रा इस प्रकार रखें:

बेंटोनाइट सल्फर (90%) → 12–15 किलो प्रति एकड़

जिप्सम (18% S) → 60–70 किलो प्रति एकड़

🌾 सल्फर देने का तरीका

बुवाई के समय: खेत की तैयारी के वक्त अन्य खादों (DAP, यूरिया, पोटाश) के साथ मिलाकर डालें।

टॉप ड्रेसिंग के समय: बारीक पाउडर वाली सल्फर मिट्टी में हल्की सिंचाई के साथ डालें ताकि पौधे को जल्दी अवशोषण हो🔝

⚠️ ध्यान दें

सल्फर को बीज के सीधा संपर्क में न आने दें✅

सिंचाई के बाद या नमी वाली मिट्टी में डालना बेहतर रहता है।

सल्फर की कमी से पत्तियाँ पीली और छोटी रह जाती हैं, फूल और फली कम लगती है।

📜 सुकरात से सिकंदर तक : सवालों और सोच से तानाशाह डरता ही है!🕰️ लगभग 2500 साल पहले यूनान (एथेंस) में एक साधारण-सा व्यक्ति...
28/09/2025

📜 सुकरात से सिकंदर तक : सवालों और सोच से तानाशाह डरता ही है!

🕰️ लगभग 2500 साल पहले यूनान (एथेंस) में एक साधारण-सा व्यक्ति रहता था।
उसका नाम था सुकरात (Socrates, 470–399 ईसा पूर्व)।
वह न कोई राजा था 👑, न योद्धा ⚔️ — बल्कि एक शिक्षक व दार्शनिक था!

❓सुकरात और सवालों की ताक़त

सुकरात लोगों से पूछता था —

अच्छा जीवन किसे कहते हैं? 🌱

न्याय क्या है? ⚖️

सच्चा ज्ञान क्या है? 📚

👉 उनका मानना था कि युवाओं को अंधभक्त या अंधी आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि सवाल करना चाहिए।
📌 बिना स्वतंत्र सोच के समाज हमेशा धनपतियों 💰 और सत्ता ⛓️ का गुलाम बन जाएगा।

उनकी यही शैली बाद में सुकराती विधि (Socratic Method) कहलायी — यानी प्रश्न पूछकर सत्य तक पहुँचना।

👨‍🏫 सुकरात → प्लेटो → अरस्तू → सिकंदर

सुकरात को “पश्चिमी दर्शन का जनक” माना जाता है।
उनके शिष्य थे प्लेटो (Plato), प्लेटो के शिष्य थे अरस्तू (Aristotle) और अरस्तू का शिष्य बना सिकंदर (Alexander the Great)।

🧩 इस तरह एक दार्शनिक परंपरा ने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों और विचारों को जन्म दिया।

⚔️ अरस्तू की सोच और सिकंदर

अरस्तू ने सिखाया कि

अगर राजा बड़ी सेना लेकर ज़मीन पर आगे बढ़े, शहर बसाए 🏙️ और सभ्यता विकसित करे 🌍 तो उसका साम्राज्य फैल सकता है।

नौवहन 🚢 और खोजें करके वह दूर देशों को जीत सकता है।

👉 इसी सोच से प्रेरित होकर अरस्तू का शिष्य सिकंदर बना इतिहास का महान विजेता।

⚖️ प्लेटो का सवाल और न्याय की परीक्षा

युवा प्लेटो ने एक बार एक जज से पूछा:
“अगर राजा 👑, अमीर 💰 और आम आदमी 👨‍🌾 एक ही अपराध करें तो क्या सज़ा समान होगी?”

जज चुप हो गया।
प्लेटो ने कहा: “फिर आदर्श न्याय कहाँ है? जब तुम्हें ही नहीं पता, तो तुम न्याय कैसे कर सकते हो?”

📌 यह सवाल सिर्फ़ यूनान के लिए नहीं था, बल्कि पूरी मानवता के लिए चुनौती बन गया।

⛓️ सुकरात पर मुक़दमा और मौत

जब शासकों और व्यवस्था की पोल खुलने लगी 🕵️‍♂️, तो सत्ता ने कहा:
“सुकरात युवाओं को भड़का रहा है, हक़ माँगना और सवाल करना सिखा रहा है। ये सत्ता के लिए ख़तरा है।”

🚔 सुकरात को गिरफ्तार किया गया।
⚖️ मुकदमा चला और उन्हें “युवाओं को भ्रष्ट करने” का दोषी ठहराकर जहर का प्याला 🍵 पीने की सज़ा दी गई।

भागने का मौका था, लेकिन उन्होंने भागना नहीं चुना।
👉 वे मुक़दमे का सामना करते रहे और अंततः सत्य के लिए मौत को गले लगाया।

🧠 विज्ञान, दर्शन और शिक्षा की तिकड़ी

वैज्ञानिक 🔬 हमें साधन और तकनीक देते हैं।

दार्शनिक 📜 हमें सोचने और सही-गलत चुनने की बुद्धि देते हैं।

शिक्षक 👨‍🏫 इन दोनों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।

👉 लेकिन अगर कोई व्यक्ति तीनों भूमिकाएँ निभा ले — शिक्षाविद + वैज्ञानिक + सवाल करने वाला दार्शनिक — तो सत्ता उससे हमेशा डरेगी 😨।
क्योंकि वह युवाओं में सवाल करने की प्रवृत्ति 🔥 जगा सकता है और सिस्टम को आईना दिखा सकता है।

🌍 कालचक्र और सबक

बहुत समय बाद दुनिया को समझ आया कि सुकरात सही था।
आज पूरी दुनिया उसे याद करती है 🌏, लेकिन जिन्होंने मुक़दमा चलाया और सज़ा दी — उनके नाम इतिहास में गुम हैं ❌।

📌 यही #कालचक्र है —
👉 सच और सवाल मरते नहीं।
👉 सत्ता दमन कर सकती है, लेकिन विचारों को कैद नहीं कर सकती।

⚡ यह कहानी सिर्फ़ इतिहास की नहीं, आज के दौर की भी है। जहाँ भी युवा सवाल करेंगे, सत्ता उन्हें “ख़तरा” कहेगी।
लेकिन आने वाला समय तय करेगा कि कौन सही था — सत्ता या सवाल! 🚩

19/09/2025
अपने खेतों में बीज बोते हुए जो हलूर गाई जाती है वो ही किसान के मंत्र हैं,मेहनत करने में जो पसीना बहता है वही इस महायज्ञ ...
19/09/2025

अपने खेतों में बीज बोते हुए जो हलूर गाई जाती है वो ही किसान के मंत्र हैं,
मेहनत करने में जो पसीना बहता है वही इस महायज्ञ की आहुतियाँ हैं,
जँगली जानवरों पक्षियों से सुरक्षा करते समय विभिन्न प्रकार की आवाज़ें निकालना ही श्लोक और लयबद्ध राग हैं,
खेत की झोपड़ी में जलने वाला अलाव ही उस किसान का हवन कुंड है,
कड़कड़ाती भूख में खेत की मेड़ पर घर से आई रोटी खाना ही उसका भोग लगाना है,
छह महीने की तपस्या के पश्चात प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपहार ही उसकी तपस्या का फल है,
इस हठयोगी से बड़ा कोई हठी नही हर बरस अपनी खेती में सट्टा लगाता रहता है,
परिणाम चाहे जो भी हो,
िसान

"वर्तमान पंचायत समिती पिलानी" वालों के संदर्भ में ना लें🤔किसी के झांसे में मत आना 🤔पहले अपनी योग्यता और औकात देख लेना 🤣🤣...
19/09/2025

"वर्तमान पंचायत समिती पिलानी" वालों के संदर्भ में ना लें🤔
किसी के झांसे में मत आना 🤔
पहले अपनी योग्यता और औकात देख लेना 🤣🤣🤣

*तथाकथित आजादी यानि अघोषित गुलामी का छुपा हुआ इतिहास:-**जिसके बारे में 99% लोग नहीं जानते और न ही जानना चाहते हैं बस किस...
18/09/2025

*तथाकथित आजादी यानि अघोषित गुलामी का छुपा हुआ इतिहास:-*

*जिसके बारे में 99% लोग नहीं जानते और न ही जानना चाहते हैं बस किसी तरह सर्वाइव करने में लगे रहते हैं।*
भारतीय संविधान संहिता ब्रिटिश गवर्नमेंट ऑफ पावर एक्ट:-
15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक अंतिम वायसराय माउंटबेटन India में रहा और Con-Si-tution of India तैयार करवाने के बाद उसकी सम्मानपूर्वक विदाई की गई ।
भारत में संविधान 1947 के पूर्व सात बार आ चुके थे जिसमें Government of India act 1935 आठवां हैं....
जिसे अंग्रेजों ने भारत पर 1000 साल राज करने के लिए बनाया था.....।
परंतु जो....भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ 26 जनवरी 1950 को इसके लिए एक संविधान सभा के 6 committees का गठन किया गया... जिसमें कुल 296 सदस्य थे 11 महीने और 18 दिन काम करके संविधान तैयार किए...।
परंतु आश्चर्य की बात है
कि
11 महीने और 18 दिन में काम केवल 166 घंटे ही हुआ...।।
यहीं कारण है कि
15 अगस्त 2025 तक भारत के संविधान में सैंकड़ों संशोधन हुए हैं... आगे और भी होने की पूर्ण संभावना है...
ऐसा तभी होता हैं जब संविधान में कोई बहुत बड़ी गड़बड़ी हो...।

सच तो ये है कि संविधान का आधार ही सही नहीं है...
संविधान का आधार है Government of India act 1935..... पूरी तरह से Copy Paste....।
इसके बारे में सही जानकारी ना होने के कारण ये बातें संभवतः ये तथ्य हमें भ्रांतियां मालूम पड़ती हैं ।।

संविधान की प्रस्तावना PREMABLE में साफ लिखा गया है:-
1. WE THE PEOPLE OF INDIA
इसमें People कौन हैं....?
यदि हम सब citizen है तो WE THE CITIZEN क्यों नहीं है...?
WE THE PEOPLE OF INDIA ये capital letter में क्यों है..?
PEOPLE और CITIZEN में क्या फ़र्क है..?
Indian Citizenship Act. On June 2 , 1924 क्या है...?

2. Indian comman wealth agreement 1949
इस agreement के आधार पर common wealth nation's महारानी की आधिकारिक संपत्ति है ।
1. Before 1947 : British India
2. From 1947 to 1950 : Dominion of India
3. After 1950 : Republic of India
इन सबमें एक बात common है । Government of India....!

GOVERNMENT OF INDIA 1947 से पहले भी थी , 1947 से 1950 के बीच में भी थी और 1950 से लेकर अब तक भी है...।
पहली बार Government of India Act 1800 में पारित हुआ था , UK Parliament द्वारा।
यानी अभी वाली Government of India तथाकथित आजादी से पहले से मौजूद है ।।

सवाल: आजादी किसने पाई ?
किस बात की आजादी पाई ?
आजादी का साक्ष्य कहां है ?
( Don't get confused with the Indian Independence Act , 1947 क्योंकि एक बड़ी ( parent ) कंपनी His Majesty's Government ने , अपनी ही एक छोटी ( branch ) कंपनी Government of India को चलाने के लिए , अपने नियमों में कुछ बदलाव किया। )
Comman :– साझा
Wealth :– संपत्ति
किसकी....?
अपनी आजादी का आकलन करें....।

*Independence is not Freedom....*
*स्वयं अध्ययन, विश्लेषण और विचार करें....!*

ताज्जुब की बात है गुलामी के हजारों प्रमाण मौजूद होते हुए भी आप गुलामी को ही आजादी मानकर उसी की भक्ति में लिन है तो प्रकृति रूपी परमात्मा आपको बचाये कैसे

आजकल बहुत बड़ी संख्या में दलित और ओबीसी के लोग भी ब्राह्मण धर्म के रक्षक बन गए  हैं।जबकि ब्राह्मण धर्म ब्राह्मणों का, ब्...
27/06/2025

आजकल बहुत बड़ी संख्या में दलित और ओबीसी के लोग भी ब्राह्मण धर्म के रक्षक बन गए हैं।

जबकि ब्राह्मण धर्म ब्राह्मणों का, ब्राह्मणों के लिए तथा ब्राह्मणों द्वारा निर्मित धर्म है। इसकी समस्त कहानियां ब्राह्मणों ने गढ़ी हैं तथा पुस्तकों में संग्रहीत की है। इन कथा-कहानियों की पुस्तकों को ही इन लोगों ने शास्त्र नाम दिया है।

ये सभी शास्त्र ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के लिए लिखे गए हैं। इनमें सबसे पुराने शास्त्र वेद कहलाते हैं।

इसलिए इस ब्राह्मणों के इस धर्म को विश्व भर के समस्त इतिहासकार वेदिक धर्म या ब्राह्मण धर्म कहते हैं।

ब्राह्मण लोग अपने इस ब्राह्मण धर्म के व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए आज भी दसा माता कथा, संतोष माता कथा, करवा माता कथा, चौथ माता कथा जैसी नित नई कहानियां गढ़ते रहते हैं।

क्षत्रियों और वैश्यों की देखा-देखी ओबीसी के लोग भी पिछले लगभग सौ साल से अपने घरों, मोहल्लों या गांवों में ब्राह्मणों को बुलाकर उसके धर्म के शास्त्रों में उसके पूर्वजों द्वारा लिखित विधियों से ब्राह्मणों वाले कर्मकांड करवाते हैं।

ब्राह्मण धर्म के रक्षक क्षत्रियों और आर्थिक सहयोगी वैश्यों की तरह ओबीसी के लोग भी आजकल ब्राह्मण द्वारा लिखी गई कथाएं बिना कोई सवाल किए ब्राह्मणों के मुख से ही सुनते हैं।

आश्चर्यजनक तो तब है जब आज इन जातियों के लोग भी अब अच्छा खासा पढ़ना-लिखना सीख गए हैं।

शिक्षित हो जाने के उपरांत ओबीसी वाले और दलित क्षत्रियों और वैश्यों की तरह ब्राह्मण के फायदे के स्थान पर अपने फायदे की नई कहानियां नहीं गढ़ पा रहे हैं। चलो कहानियां नहीं गढ़ पा रहे हैं तो कोई बात नहीं परंतु बाजार दस रुपए में मिलने वाली पुस्तक में से पढ़कर कथा सुनाने के लिए भी ये ब्राह्मण को बुलाते हैं। और वह ब्राह्मण के पक्ष में प्रचार करने के लिए गढ़ी कहानी ब्राह्मण के मुंह सुनने के लिए उल्टा उसे सुनाने का काफी बड़ा पारिश्रमिक दे रहे हैं।

इस प्रकार हमारे देश की मुस्लिम विश्नोई व सिख ओबीसी जातियों को छोड़कर शेष समस्त ओबीसी जातियां भी आजकल क्षत्रियों और वैश्यों की तरह ब्राह्मण के धर्म की ग्राहक हो गई हैं।
#सरदार_सुरेंद्र_सिंह_पीपली

#किसान_चौपाल_मंच

*ब्रह्मांड को जानिए पाखंड को नहीं*भगवान ने इंसानों को बनाया या इंसानों ने अपनी सहूलियत के लिए भगवानों को गढ़ा, यह सवाल आ...
30/04/2025

*ब्रह्मांड को जानिए पाखंड को नहीं*

भगवान ने इंसानों को बनाया या इंसानों ने अपनी सहूलियत के लिए भगवानों को गढ़ा, यह सवाल आस्तिकनास्तिक की बहस का मुख्य बिंदु रहता है. ब्रह्मांड में छिपे अनंत रहस्यों के खुलासे के नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने भगवानों को गढ़ कर लोगों के दिमाग से पड़ताल और सोचनेसमझने की क्षमता खत्म कर दी है.

ईश्वर के नाम पर दुनियाभर में पाखंड फैला है. ईश्वर को मानना एक प्रकार का कृत्रिम स्वभाव है जो ब्रह्मांडीय नियमों से नहीं, तार्किक, तथ्यात्मक व वैज्ञानिक धर्म के धंधेबाजों के भय, ढोंग, आलस्य, पैसा पाने के षड्यंत्र अथवा सीखी व उधार में मिली हुई मान्यताओं से बना है.

ईश्वर को मानना या उसे ढूंढ़ना एक गहरी आदत तो जरूर है परंतु यह आदत ब्रह्मांड की उपेक्षा करने से विकसित हुई है. इस उपेक्षा से एक ऐसी धार्मिकता अथवा आस्तिकता का जबरदस्त पालनपोषण हुआ है, जो पूर्णतया दिखावटी है.

दुनिया के अधिकांश आस्तिक केवल इसलिए आस्तिक हैं कि बगैर सृष्टि के रहस्यों में रुचि लिए वे उस धर्म और ईश्वर को चुपचाप मानते हैं जिसे उन के धर्म वाले अन्य लाखोंकरोड़ों लोग भेड़चाल में मान रहे होते हैं. इस आस्तिकता के पक्ष में वे धार्मिक ग्रंथों से उदाहरण देते हैं, किसी संतोषदायक मौलिक दृष्टि से नहीं.

इस भेड़चाल में उन्हें अबोध अवस्था में धकेल दिया जाता है और धर्म के नाम पर व्यवसाय करने वाले पंडित, मौलवी, पादरी जम कर ईश्वर की भ्रांति का प्रचार करते हैं.

वे भगवान को मानने या जानने का खूब ही नाटक करते हैं और उस के नाम पर अपने भवन, मंदिर, गढ़, मसजिद, चर्च और मठ बनाते हैं. अन्य धर्मावलंबियों पर आक्रमण करते हैं और इसे अपने ग्रंथों व शास्त्रों द्वारा सही प्रमाणित करते हैं. हमारे सामने ब्रह्मांड का अनंत विस्तार है, अपने सौरमंडल और ब्रह्मांड के संबंध में विचार करें तो युगों से प्रचलित ईश्वर की धारणा हमारे लिए निरर्थक पड़ जाएगी.

कहीं हमारा ईश्वर निरर्थक न पड़ जाए, अब तक पोषित पांडित्य का आत्मविश्वास ढह न जाए, इस भय से धर्म ने अपना प्रचारतंत्र तेज कर रखा है. लोग ईश्वर से चिपके रहें, कहीं इस दुनिया को तर्क की निगाह से देखनेजानने के चक्कर में उन के स्वार्थ फीके न पड़ जाएं, यह डर आज और गहरा होता जा रहा है और ईश्वर की बात को धर्म, जाति, नस्ल से जोड़ा जा रहा है.

मनुष्य स्वभाव से ही उधार के अंधविश्वासों व पांडित्य से मुक्ति चाहता है. ऐसा न होता तो आज ब्रह्मांड के कोनों पर मनुष्य की दृष्टि न पड़ती, उस की आंखों में हर बार आशा के नए नक्षत्र न टिमटिमाते. न्यूटन और आईंस्टीन न बनते.

आखिर मनुष्य यह दावा क्यों करे कि उस ने किसी सर्वशक्तिमान सत्ता का पता कर लिया है? क्यों न वह सृष्टि के रहस्यों में से गुजरते हुए पहले अपनी मौजदूगी के कारणों का पता लगाए? हर बार जो रहस्य बच जाए उसे भयभीत हो कर नहीं, आनंदित हो कर ही स्वीकार करना मनुष्य की प्रकृति है.

वह जन्म व जीवन को तो स्वीकार करता है पर मृत्यु से डरा रहता है. बातबात पर वह ‘जैसी ईश्वर की इच्छा’ जैसी मंजूरी तो देता है किंतु मृत्यु के अवसरों या संभावनाओं पर विचलित और भावुक हो उठता है. बहुत सीमा तक उस का यह डर स्वाभाविक तो जान पड़ता है किंतु इस के पीछे उसे यहां वहां से थोपी गई आत्मा, परमात्मा या पुनर्जन्म की ऐसी धारणाएं होती हैं जो उस के अवचेतन को सहमत नहीं कर पाती हैं.

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*भगवान व धर्म का फंदा*

धार्मिक समुदायों द्वारा ईश्वर को कितना भी बड़ा, उपकारी, दयालु, न्यायप्रिय और सहायक बताया जाता हो, लेकिन फिर भी दूसरे समुदाय से भयभीत हो कर उन का स्वरूप मानवताविरोधी, बर्बर, हिंसक और विध्वंसक हो जाता है.

धर्म व ईश्वर काल्पनिक मान्यताएं हैं जिन्होंने मानव बुद्धि को बुरी तरह जकड़ रखा है. बुद्ध महावीर, गांधी, ईसा, मुहम्मद, कबीर, मीरा, सुकरात, रविदास जैसे सैकड़ों लोगों ने अपना धर्म व ईश्वर न तो दूसरों से ले कर बनाया और न ही वे दूसरों को अपनी धार्मिकता दे सके. उन से केवल प्रेरित हुआ जा सकता था. जो निजी ढंग की प्रेरणा लेने में चूक जाते हैं वे किसी एक ऐसे महान व्यक्ति को अपना खुदा, पैंगबर, भगवान या देवदूत मान लेते हैं जिसे उन के आसपास के लोग मान रहे होते हैं.

कितनी हास्यास्पद बात है कि दुनिया में अधिकांश बच्चों के गले में केवल उसी ‘भगवान’ या ‘धर्म’ के फंदे को पहनाया जाता है जिस का फंदा मांबाप के गले में कसा होता है. वास्तव में ये फंदे मिल्कियत के सुबूत हैं कि जिस के गले में हम ने अपने धर्म का फंदा डाला वह हमारी संपत्ति हुआ.

इस निरंतर खूंटे के बंधन और झूठे धर्म के प्रचारतंत्र के रहते हुए भी जरा से बुद्धिमान व्यक्ति अपनी जान की बाजी लगा कर अपना लौजिकल और वैज्ञानिक रास्ता बनाने निकल पड़ते हैं. मानना पड़ता है कि हर मनुष्य को लंबे समय तक अंधा नहीं बनाया जा सकता. मौका मिलते ही वह मूर्ख बने रहने से इनकार कर देता है. हां, अगली पीढ़ी फिर उसी पाखंड में कूद पड़े तो बड़ी बात नहीं.

जिन समाजों में धर्म के पाखंडों के दैनिक, साप्ताहिक, मासिक या वार्षिक अभ्यास नहीं किए जाते, वहां मृत्यु, ईश्वर और धर्म डराने वाली नहीं, अध्ययनभर की चीजें रह जाती हैं. कुछ क्षेत्रों में आज भी लोग इस बात पर हैरान होते हैं कि पढ़ीलिखी सभ्यताएं किसी भगवान और किसी धर्म को ले कर बेहद गंभीर, आक्रामक, भावुक या समर्पित हैं, उन्होंने सामाजिक कुरुतियों तक को धार्मिकता मान रखा है.

ब्रह्मांड के रहस्यों को समझते हुए उस का आनंद लेने वालों को अकसर इसीलिए नास्तिक कह दिया जाता है कि वे सुविधा से मिली भगवान की धारणा को ले कर न तो झूमते हैं, न विचलित होते हैं. वे ईश्वर और ब्रह्मांड के पारस्परिक संबंधों को ले कर व्यक्त विचारों का अध्ययन अवश्य करते हैं. यह आवश्यक तथा स्वाभाविक भी है.

‘ब्रह्मांड को जानना’ उस के अंतिम रहस्य को पा लेना नहीं है, बल्कि मनुष्य की खोजी कोशिश और अपार उत्सुकता को व्यवहार में लाना है. इस के उलट, ‘ईश्वर’ को जानना उसे मुफ्त में जेब में रख लेने जैसा काम है. मजे की बात तो यह है कि कितने ही लोग ईश्वर को मानते हैं, ओढ़तेलपेटते हैं, उस के लिए जान देने को तैयार रहते हैं, लेकिन उन के इन ईश्वरों का मिलान किया जाए तो कहीं कोई समानता नजर नहीं आती, बल्कि झगड़ालू स्थिति दिखाई पड़ती है.

इन ईश्वरों के ग्रंथों में बेहूदी, झूठी, मनगढं़त बातें भरी पड़ी हैं, पर इन धर्मों के दुकानदार उन की चर्चा ही नहीं करने देते. भगवान या धर्म के चालू शक्ल के लिए जो व्यक्ति या समूह प्राण देते या लेते हैं वे मानवीय मूल्यों के लिए अकसर कुछ नहीं करते.

गांधी, भगत सिंह और उन के पूर्व या बाद के कितने ही लोग मानवता, बराबरी, नैतिकता के लिए मरे, किसी ईश्वर या धर्म को ले कर नहीं. सुकरात, ईसा, दयानंद आदि कितने ही लोगों को जहर या सूली इसलिए मिली कि वे प्रचलित सड़ी हुई धर्म की दुकानों के प्रति विद्रोह कर रहे थे.

ऐसे लोग हर समुदाय में पैदा हुए. ऐसा नहीं कि इन लोगों के सभी विचार सही थे पर कुल मिला कर ये सभी उस मार्ग पर चलना शुरू कर चुके थे जो दकियानूसी दुकानदारी वाले धर्म व ईश्वर को ललकारते हैं जबकि ब्रह्मांड के कणकण से मित्रवत व्यवहार करने की प्रेरणा मिलती है, जियो और जीने दो का सिद्धांत निकलता है.

*ज्ञान मुरदा नहीं*

ज्ञान या विज्ञान पुरानी सड़ीगली सोच व कहानियों से भरी पोथियों में हो ही नहीं सकता. यह निरंतर विकासमान है और अंतिम नहीं है. कुछ लोगों ने हजार या 2 हजार या 5 हजार साल पहले जो सोचा, कहा या लिखा, वही सत्य होता तो आज संसार का स्वरूप इतना भिन्न न होता. हम वहीं के वहीं होते.

ज्ञान मुरदा नहीं होता. ज्ञान तो ताजा और मौजूद होता है, ओस की बूंद सा होता है. पलपल में यहां नए नक्षत्र, आकाशगंगाएं और सौरमंडल देखे जाने लगते हैं, यदि मनुष्य को कृत्रिम ज्ञान के मतलब से बाहर आने दिया जाए. ब्रह्मांड की चर्चा न कर के ब्रह्मांड की चर्चा करने के नाम पर ब्राह्मण, पुजारी, पादरी, मुल्ला की चर्चा सदियों से की जा रही है क्योंकि उस के नाम पर विशाल मंदिर, पिरामिड, मसजिदें, चर्च, मठ बनाए जा सकते हैं, जिस को दूसरों की कमाई पर मौज कर रहे लोग अपनी तर्जनी पर पूरे समाज को चलाते हैं.

अनंत ब्रह्मांड की खोज करने वाले एक तरफ तारों की ओर जा रहे हैं तो दूसरी ओर छोटे से छोटे अणु को चीर रहे हैं. ब्रह्मांड की सोच वाले समाज को अगड़ोंपिछड़ों, पूजनीयों, अछूतों, कालोंगोरों, अमीरीगरीबों में बांटते हैं.

आज दुनिया के सारे हिंसक विवाद ईश्वर से जुड़े हैं. ईश्वर दयालु नहीं, जानलेवा है. हाल में रूसयूक्रेन विवाद में और्थोडौक्स क्रिश्चियन धर्म का भी एक बड़ा गुप्त हाथ है. हाल के ही कोविड का टीकाकरण खोजा गया, उस से मुकाबला किया गया. ईश्वर के भक्त तो अपने दड़बों में जा छिपे थे जबकि वैज्ञानिक, डाक्टर, किसान अपने काम पर डटे रहे.

*लेखक सैन्नी अशेष (सरिता पत्रिका से)*

*सुरेंद्र सिंह पिपली*
*किसान चौपाल मंच पीपली*

*अंधविश्वास, रूढ़िवाद व तमाम कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करें और बेहतर समाज बनाने के लिए संघर्ष करें।*

आंतकवादी घटना.. क्या पाकिस्तान मे अडानी पावर प्लांट बंद होगा
26/04/2025

आंतकवादी घटना..
क्या पाकिस्तान मे अडानी पावर प्लांट बंद होगा

बहरूपिया कोई भी कलाकारी कर सकता है वोट पाने के लिए 🤔पुलवामा की जांच हुई नहीं लोगों को फिर से पागल बनाने का नया जरिया है ...
24/04/2025

बहरूपिया कोई भी कलाकारी कर सकता है वोट पाने के लिए 🤔
पुलवामा की जांच हुई नहीं लोगों को फिर से पागल बनाने का नया जरिया है और कुछ नहीं पहलगांव में जो कुछ हुआ वो प्रायोजित सोची समझी घटना है
क्योंकि बिहार और बंगाल में इनको पूर्ण बहुमत चाहिए है क्योंकि इनको पता है दिल्ली के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में इनका वोट बैंक खिसक चुका है, और असलियत पता चल चुकी है।

 #शिक्षा  #समाज की रीढ़ है, और इसे मुफ्त करना सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि जरूरत है।https://chat.whatsapp.com/D71whiaXv0OBh...
01/04/2025

#शिक्षा #समाज की रीढ़ है, और इसे मुफ्त करना सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि जरूरत है।
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जब एक बच्चा स्कूल की चौखट तक नहीं पहुंच पाता, तो उसके सामने जो रास्ते खुलते हैं, वे अक्सर अपराध और अंधेरे की ओर ले जाते हैं। इसे साक्ष्यों से समझें—यूनेस्को की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि अगर हर बच्चे को प्राथमिक शिक्षा मिले, तो वैश्विक गरीबी 12% तक कम हो सकती है। अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के एक अध्ययन के मुताबिक, हाई स्कूल छोड़ने वाले 70% से ज्यादा लोग कभी न कभी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचते हैं। भारत में भी हालात अलग नहीं—एनसीआरबी के 2022 के आंकड़े दिखाते हैं कि जेल में बंद 60% से अधिक कैदी 10वीं से कम पढ़े-लिखे हैं। ये आंकड़े चीख-चीखकर कहते हैं कि शिक्षा का अभाव अपराध को जन्म देता है।

अब सवाल उठता है—शिक्षा मुफ्त क्यों हो ? क्योंकि ये कोई सौगात नहीं, हर इंसान का मौलिक हक है। भारत का संविधान अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है, मगर हकीकत में ये कानून कागजों तक सिमटकर रह गया है। सरकारी स्कूलों की हालत देखिए—एनएसएसओ के 2018 के सर्वे के अनुसार, देश के 15% सरकारी स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, और 34% में बुनियादी सुविधाएं जैसे पीने का पानी और शौचालय तक नहीं। दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों की फीस लाखों परिवारों की पहुंच से बाहर है—ऑक्सफैम की 2022 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में निजी स्कूलों की औसत वार्षिक फीस एक गरीब परिवार की सालाना आय का 40% तक हो सकती है। ऐसे में शिक्षा तक पहुंच कैसे सुनिश्चित होगी ?

दुनिया भर के उदाहरण इस तर्क को मजबूत करते हैं। फिनलैंड जैसे देश, जहां शिक्षा पूरी तरह मुफ्त और समावेशी है, वहां अपराध दर न के बराबर है—वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट 2023 के मुताबिक, फिनलैंड दुनिया के सबसे सुरक्षित देशों में शुमार है। इसके उलट, जिन देशों में शिक्षा महंगी और असमान है, जैसे दक्षिण अफ्रीका, वहां अपराध और गरीबी का चक्र थमने का नाम नहीं लेता। भारत में भी प्राइमरी एजुकेशन पर खर्च जीडीपी का महज 3% है, जबकि यूनेस्को सिफारिश करता है कि ये 6% होना चाहिए। सरकारें जब बुलेट, ट्रेन 80 करोड़ जनता को 5 किलो मुफ्त अनाज, जैसे आंगनबाड़ी केंद्र काफी ऐसे हैं, जहां सुधार की आवश्यकता है और बेकार के प्रोजेक्ट्स पर अरबों खर्च कर सकती हैं, तो बच्चों के भविष्य पर निवेश क्यों नहीं ?

शिक्षा मुफ्त होने से सिर्फ अपराध ही कम नहीं होगा, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। एक पढ़ा-लिखा इंसान नौकरी करता है, टैक्स देता है, और देश की प्रगति में हिस्सा लेता है। वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि हर अतिरिक्त साल की स्कूली शिक्षा से किसी व्यक्ति की आय में 10% की बढ़ोतरी होती है। इसके विपरीत, अनपढ़ व्यक्ति या तो समाज पर बोझ बनता है या गलत रास्तों पर चल पड़ता है। भारत जैसे देश में, जहां 26 करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूल जाने की उम्र में हैं, शिक्षा को मुफ्त और सुलभ बनाना न सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक जरूरत भी।

तो क्या करना चाहिए? पहला, सरकारी स्कूलों को मजबूत करें—शिक्षकों की भर्ती हो, बुनियादी ढांचा सुधरे। दूसरा, प्राइवेट स्कूलों की लूट पर लगाम लगे—फीस को रेगुलेट किया जाए। तीसरा, शिक्षा बजट बढ़े, ताकि हर बच्चा स्कूल की दहलीज तक पहुंच सके। ये कोई खैरात नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज का निर्माण है जहां जेलों की जरूरत कम हो और स्कूलों की संख्या बढ़े। समय आ गया है कि हम शिक्षा को सिर्फ अमीरों का हक मानना बंद करें और इसे हर बच्चे की पहुंच में लाएं—क्योंकि एक पढ़ा-लिखा देश ही सच्चा विकसित देश होता है।..................
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