Sahitya Sagar

Sahitya Sagar राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ® 📚
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प्रकाशन -
संस्थापक -
स्थापित - 13-09-2013
(664)

12/08/2026

हम अपनी जान के दुश्मन को
अपनी जान कहते हैं।
मोहब्बत की इसी मिट्टी को
हिन्दुस्तान कहते हैं।

राहत इंदौरी | साहित्य सागर



11/08/2026

कुछ नहीं बदला, दीवाने थे दीवाने ही रहे।
हम नये शहरों में रहकर भी पुराने ही रहे।

दिल की बस्ती में हज़ारों इंक़लाब आये मगर,
दर्द के मौसम सुहाने थे सुहाने ही रहे।

हमने अपनी सी बहुत की वो नहीं पिघला कभी,
उसके होंठों पर बहाने थे बहाने ही रहे।

ऐ परिंदों हिजरतें करने से क्या हासिल हुआ,
चोंच में थे चार दाने, चार दाने ही रहे।

इक़बाल अशहर | साहित्य सागर



10/08/2026

सौ फूल खिले जब ये खिला रूप सुनहरा,
सौ चाँद बने जब ये बना चाँद-सा चेहरा।

इतना भी कोई प्यार की राहों में ना गुम हो
बस होश है इतना के मेरे साथ में तुम हो।

राहत इंदौरी | साहित्य सागर



10/08/2026

होंठों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते।
साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते।

बशीर बद्र | साहित्य सागर



08/08/2026

आप ही के बिना हूँ क्यों बेचैन,
आप ही क्यूँ मेरी ज़रूरत हैं।
वहम इतना हसीं नहीं होता,
वाकई आप खूबसूरत हैं।

महशर आफ़रीदी | साहित्य सागर



literaturelov

06/08/2026

प्रतीक्षा एक बीमारी है,
जो समय नहीं, साँसें गिनवाती है।

चंदन | साहित्य सागर



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