Sampark Social Organisation M.P

Sampark Social Organisation M.P The organisation was founded in 1987 in Petlawad tehsil of Jhabua district as a unit of the Social Work and Research Centre (SWRC) Tilonia.

The organisation believes

in the essential worth of traditions and culture, and the dignity of life
that the present social order is unjust and inequitable and that certain communities have been unfairly marginalised
that despite the deprivation they may have suffered, the people have the inherent ability to assert their position in the society and determine their future
that Samp

ark can only facilitate their efforts. And it is to this end that Sampark strive to bring in changes by promoting traditional life styles based on simplicity and collective living, by promoting traditional systems of medicine and ways of healthy living, by brining alternative systems of learning, by facilitating access to alternative livelihood means, by facilitating access and control over common property resources, and by mobilising the people towards asserting their rightful position in society

Towards these goals, Samark follows a strategy, which combines Sangharsh and Nirman:

Sangharsh to create critical consciousness and mobilise the people to question the existing social order and struggle for a just position in society. Nirman to support the endeavours of the people for the development of their resources and for improving their resources and for improving their state of well being. Strategy

Sampark's vision provides to it a continuous sense of direction. Its mission shows it what it is trying to do through its endeavours. But it is through its strategy that it reflects on 'how' it is to actually go about working with the people and operationalising its objectives. Sampark's strategy has been evolving itself over 20 years of field experience. It has kept itself in touch with the pulse of the people, thus accommodating their 'felt' needs while keeping their 'actual' needs in mind. Initially Sampark gets involved in the time taking process of forming a relationship with the people. The discussions resorted to for this help it understand the people and win their trust. Based on issues of concern, it organises street play campaigns. These help it to make the people better understand the problems they face and their root causes. Elaborate discussions are held to raise their consciousness levels and to motivate them to do something about their situation. Once the people agree over the need to address the issues, Sampark makes a formal entry into the village. Regular visits are made by Sampark workers to further mobilise the people. Men's and women's self-help groups are formed, initially as thrift and credit groups. Sampark formally registers these when it observes that they have been regular and responsible. Capacity building measures like workshops and exposure visits are regularly undertaken to make the people more aware and confident of themselves. The self-help groups promote developmental activities in the village. Night schools are opened for working children where they demand the same. Health awareness and primary health services are also promoted. The groups, now having gained experience, are encouraged to take up activities to enhance their income levels. These are undertaken through on-farm and off-farm activities. All along Sampark encourages the people to take over the management of these activities. Thus the stage of intensive facilitation that develops with an increase in the level of activities of the people, gradually gives way to a phase out of our contribution.

भारत को बड़े पैमाने पर खेती-बाड़ी वाला देश माना जाता है, जिसकी लगभग आधी आबादी सीधे या इनडायरेक्टली खेती पर निर्भर है। हा...
10/03/2026

भारत को बड़े पैमाने पर खेती-बाड़ी वाला देश माना जाता है, जिसकी लगभग आधी आबादी सीधे या इनडायरेक्टली खेती पर निर्भर है। हालांकि ग्रीन रेवोल्यूशन के बाद देश ने अनाज प्रोडक्शन में बड़ी सफलता हासिल की, लेकिन भारतीय खेती यूरिया, DAP और पोटाश जैसे केमिकल फर्टिलाइजर पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गई है। इन फर्टिलाइजर का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट किया जाता है, खासकर पोटाश, जो लगभग पूरी तरह से विदेश से आता है, जबकि यूरिया का लगभग एक-चौथाई और DAP की लगभग 60% ज़रूरतें इम्पोर्ट से पूरी होती हैं। विदेशी फर्टिलाइजर पर यह भारी निर्भरता भारत के खेती-बाड़ी सिस्टम को ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव, जियोपॉलिटिकल झगड़ों और सप्लाई चेन में रुकावटों के प्रति कमज़ोर बनाती है।

किसानों के लिए फर्टिलाइजर को सस्ता बनाए रखने के लिए, सरकार सब्सिडी पर बहुत ज़्यादा खर्च करती है, जो 2022-23 में लगभग ₹2.5 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगी। सब्सिडी का यह बढ़ता बोझ मौजूदा सिस्टम की लंबे समय तक चलने वाली सस्टेनेबिलिटी के बारे में चिंताएं पैदा करता है। इसके अलावा, केमिकल फर्टिलाइजर के बहुत ज़्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत खराब हुई है, ऑर्गेनिक कार्बन का लेवल कम हुआ है और बाहरी इनपुट पर निर्भरता बढ़ी है।

ऑर्गेनिक और नेचुरल खेती एक अच्छा विकल्प है। गाय का गोबर, फसल के बचे हुए हिस्से और कम्पोस्ट जैसे आस-पास मौजूद चीज़ों का इस्तेमाल करके किसान खर्च कम कर सकते हैं और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति वापस ला सकते हैं। ऑर्गेनिक तरीकों को बढ़ावा देने, कम्युनिटी लेवल पर खाद बनाने और बेहतर मार्केट सपोर्ट से भारत को ज़्यादा टिकाऊ, मज़बूत और आत्मनिर्भर खेती के सिस्टम की ओर बढ़ने में मदद मिल सकती है।

The Road to Fertilizer Self-Reliance: From Chemical Dependence to Indigenous Farming India is often described as an “agriculture-based nation.” This is not merely a cultural identity but a reflection of the country’s economic and social reality.

06/11/2025

सम्पर्क ग्राम परिसर में हाल ही में गांधी-विनोबा की कर्मभूमि सेवाग्राम से आए जमनालाल बजाज फाउंडेशन के प्रतिनिधियों एवं वहाँ से जुड़े 50 सक्रिय कृषक साथियों का शैक्षणिक अध्ययन भ्रमण आयोजित किया गया।

भ्रमण के दौरान अतिथियों ने सम्पर्क द्वारा संचालित सामुदायिक बीज बैंक की कार्यप्रणाली, उसके संचालन की प्रक्रिया, बीज संरक्षण एवं उत्पादन की स्थानीय प्रणाली को विस्तार से समझा। उन्होंने यह भी जाना कि समुदाय को बीज संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कैसे प्रेरित किया जाता है, किसान किस प्रकार स्थानीय बीजों का उपयोग, संग्रहण और पुनरुत्पादन करते हैं, तथा इस पूरी प्रक्रिया में उनकी सामूहिक भूमिका क्या होती है।

इसके अतिरिक्त, भ्रमण दल ने ग्राम कचराखदान और रताम्बा का भी दौरा किया, जहाँ उन्होंने स्थानीय किसानों के साथ संवाद किया और उनके द्वारा संचालित प्राकृतिक खेती प्रणालियों को नजदीक से समझा। किसानों ने अपने अनुभव साझा किए कि किस प्रकार वे बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के, देशी बीजों के संरक्षण और प्रयोग से अपनी खेती को टिकाऊ बना रहे हैं। दल ने किसानों के इन प्रयासों की सराहना की।

यह दल सेवाग्राम, वर्धा (महाराष्ट्र) से आया था — जो विदर्भ क्षेत्र में स्थित है, जहाँ बड़े पैमाने पर बीटी कपास की खेती होती है और जहाँ किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएँ भी सर्वाधिक रही हैं। इन कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए, ये किसान अब देशी बीजों और प्राकृतिक खेती के माध्यम से इस संकट का समाधान खोजने का प्रयास कर रहे हैं।

पूरा भ्रमण अत्यंत सार्थक और संवादपूर्ण रहा, जिसमें अनुभवों का समृद्ध आदान-प्रदान हुआ। अतिथियों ने सम्पर्क ग्राम में संचालित बुनियादी शाला का भी अवलोकन किया और बच्चों के साथ शिक्षणात्मक गतिविधियों में सहभागिता की। इस अवसर पर विस्तृत चर्चा और मार्गदर्शन का संचालन हरीश भाई एवं सुरेंद्र भाई द्वारा किया गया। Nilesh Desai bajaj foundation

देशी बीजों की ओर लौटता किसान – संपर्क का सामुदायिक बीज बैंक अभियान आज संपर्क के सामुदायिक बीज बैंक में किसानों की अच्छी ...
12/10/2025

देशी बीजों की ओर लौटता किसान – संपर्क का सामुदायिक बीज बैंक अभियान
आज संपर्क के सामुदायिक बीज बैंक में किसानों की अच्छी खासी हलचल रही। रबी फसल की तैयारी को लेकर किसानों ने एक उपयोगी प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया और साथ ही गेहूं (पिस्सी,कालिबाली ,पैगम्बर ,बंशी ,खपली व् भालिया प्रजाति) व चने की देशी प्रजातियों( काला,हरा व् लीला व् लाल ) के बीज लेकर अपने खेतों के लिए रवाना हुए। यह कार्यक्रम हर साल की तरह “बीज के बदले बीज” योजना के तहत आयोजित किया गया, जिसमें किसान खरीफ के बीज लौटाते हैं और रबी की फसल के लिए नए बीज प्राप्त करते हैं।
धीरे-धीरे यह प्रयास अब एक आंदोलन का रूप ले चुका है — हजारों किसान इस पहल से जुड़ चुके हैं और अब अपने घरों में भी देशी बीजों का संग्रह करने लगे हैं। किसानों में यह जागरूकता बढ़ रही है कि देशी बीज ही खेती की असली पहचान हैं, जो हमारे मौसम, मिट्टी और स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल हैं।
आज के प्रशिक्षण में किसानों को यह बताया गया कि बीजों को सुरक्षित कैसे रखें, बीजोपचार के पारंपरिक तरीके कौन से हैं, और कीट-प्रबंधन में प्राकृतिक उपाय कैसे कारगर होते हैं। यह चर्चा पूरी तरह व्यवहारिक रही, जिससे किसानों को अपने खेतों में तुरंत प्रयोग करने लायक ज्ञान मिला।
अब यह अभियान केवल बीज देने या लेने का कार्यक्रम नहीं रह गया है — यह आत्मनिर्भरता और सामुदायिक सहयोग की एक जीवंत मिसाल बन चुका है।
देशी बीजों के माध्यम से किसान न केवल अपनी जमीन और उत्पादन को सशक्त बना रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्थायी खेती का रास्ता तैयार कर रहे हैं।
संपर्क सामुदायिक बीज बैंक की यह पहल अब ग्रामीण जीवन में एक नई चेतना जगा रही है। किसान एक-दूसरे के अनुभवों से सीख रहे हैं, परंपरागत ज्ञान को फिर से जी रहे हैं और खेती को अपनी असली जड़ों से जोड़ रहे हैं।

# deshi seed #रबीफसल #सततकृषि #किसानआंदोलन
# bhart beej swraj abhiya

पंचायतों में महिला सशक्तिकरण – सम्पर्क की 12 वर्षों की यात्रा भारत सरकार ने 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के माध्य...
23/09/2025

पंचायतों में महिला सशक्तिकरण – सम्पर्क की 12 वर्षों की यात्रा
भारत सरकार ने 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के माध्यम से पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू किया। इसके बाद मध्यप्रदेश ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए इसे 50% आरक्षण में बदल दिया। यह नीति निश्चित रूप से प्रगतिशील थी, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता थी।
लंबे समय तक पंचायतों में निर्वाचित महिलाएँ अक्सर “सरपंच पति” की छाया में सीमित रहीं। सवाल यह था कि क्या महिलाएँ वास्तव में नेतृत्व कर पा रही हैं?
यहीं से सम्पर्क ने बदलाव की शुरुआत की।
2003 से 2015 तक, सम्पर्क ने लगातार 12 वर्षों तक गाँव-गाँव जाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि महिलाएँ केवल नाम मात्र की प्रतिनिधि न रहें, बल्कि वास्तविक और प्रभावी नेतृत्वकर्ता बनें। सम्पर्क संस्था ने गाँव-गाँव जागरूकता अभियान चलाए, निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को पंचायत कार्य, अधिकार व जिम्मेदारी का प्रशिक्षण दिया, चुनाव बाद नेतृत्व कौशल विकसित करने में सहयोग किया, राज्यस्तरीय महिला संगठन बनाया और सहयोग तंत्र के ज़रिए उनका आत्मविश्वास बढ़ाया ।
इन सतत प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे महिलाएँ पंचायतों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने लगीं। आज मध्यप्रदेश की अनेक महिलाएँ ग्राम पंचायत से लेकर जनपद और जिला पंचायत स्तर तक निर्णय लेने वाली सशक्त नेता के रूप में सामने आ रही हैं।
इस यात्रा में मध्यप्रदेश सरकार और जिला प्रशासन का सहयोग भी बेहद महत्वपूर्ण रहा।

आरक्षण केवल अवसर देता है, लेकिन प्रशिक्षण, संगठन और निरंतर सहयोग अवसर को सशक्त नेतृत्व में बदल देता है।
2003 से 2015 तक सम्पर्क की यह 12 साल की यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब महिलाओं को सही मंच और मार्गदर्शन मिलता है, तो वे बदलाव की धारा का नेतृत्व करती हैं। इस सम्बन्ध हम आगमी दिनों में सफल महिला नेत्रियो के बारे में जानेंगे .....

31/08/2025

लेखा कार्य हेतु नियुक्ति विज्ञापन
सम्पर्क संस्था – नियुक्ति सूचना
सम्पर्क संस्था, झाबुआ (म.प्र.) एक प्रतिष्ठित सामाजिक विकास संस्था है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महिला सशक्तिकरण एवं जल–प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत है। संस्था को लेखा कार्य हेतु एक योग्य एवं अनुभवी कार्यकर्ता की आवश्यकता है।
पद का नाम: लेखा सहायक
स्थान: सम्पर्क ग्राम परिसर, रायपुरिया, पेटलावद कार्यालय, झाबुआ (म.प्र.)
योग्यता एवं अनुभव:
• बी.कॉम./एम.कॉम. या लेखा में डिप्लोमा
• न्यूनतम 2–3 वर्ष का अनुभव एन.जी.ओ./संस्था में लेखा एवं वित्तीय प्रबंधन कार्य में
• टेली /अन्य एकाउंटिंग सॉफ्टवेयर का ज्ञान आवश्यक
• आय–व्यय विवरण, परियोजना आधारित लेखा, बैंक कार्य एवं ऑडिट का अनुभव वरीयता
• पारदर्शिता, अनुशासन एवं जिम्मेदारी आवश्यक
वेतन: योग्यता एवं अनुभव के आधार पर चर्चनीय।
आवेदन की अंतिम तिथि: 5 सितम्बर 2025
इच्छुक अभ्यर्थी अपना विस्तृत बायोडाटा निम्न ईमेल पर भेजें:
[email protected]
www.samparkmp.org

25/08/2025

एच.आर. एवं प्रशासन कार्य हेतु नियुक्ति विज्ञापन

सम्पर्क संस्था – नियुक्ति सूचना

सम्पर्क संस्था, झाबुआ (म.प्र.) एक प्रतिष्ठित सामाजिक विकास संस्था है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महिला सशक्तिकरण एवं जल–प्रबंधन के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत है। संस्था को एच.आर. एवं प्रशासन कार्य हेतु एक योग्य एवं अनुभवी कार्यकर्ता की आवश्यकता है।

पद का नाम: एच.आर. एवं प्रशासन प्रभारी
स्थान: सम्पर्क ग्राम परिसर, रायपुरिया, पेटलावद कार्यालय, झाबुआ (म.प्र.)

योग्यता एवं अनुभव:

स्नातक/स्नातकोत्तर (प्रबंधन/सामाजिक विज्ञान/मानव संसाधन)

न्यूनतम 3–5 वर्ष का अनुभव एच.आर. एवं प्रशासन संबंधी कार्यों में

स्टाफ प्रबंधन, पेरोल, रिकॉर्ड संधारण, रिपोर्टिंग एवं खरीदी-बिक्री प्रक्रियाओं की समझ

कम्प्यूटर (MS Office, HR Software) का ज्ञान आवश्यक

टीमवर्क, संवाद क्षमता एवं नेतृत्व गुण आवश्यक

वेतन: योग्यता एवं अनुभव के आधार पर चर्चनीय।

आवेदन की अंतिम तिथि: 5 सितम्बर 2025

इच्छुक अभ्यर्थी अपना विस्तृत बायोडाटा निम्न ईमेल पर भेजें:
📧 [email protected]

ल्ली से बचाव का देशी नुस्खा: किसानों को मिला सकारात्मक परिणामजैविक या प्राकृतिक खेती में सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आती ह...
16/08/2025

ल्ली से बचाव का देशी नुस्खा: किसानों को मिला सकारात्मक परिणाम
जैविक या प्राकृतिक खेती में सबसे बड़ी चुनौती तब सामने आती है जब फसल पर इल्ली का प्रकोप हो जाता है। अक्सर किसान इससे परेशान होकर रासायनिक दवाओं का सहारा लेते हैं। लेकिन इस बार झाबुआ के किसानों ने एक देशी नुस्खा अपनाया और इसके बेहद सकारात्मक परिणाम मिले। इस अनुभव ने किसानों का विश्वास प्राकृतिक खेती की पद्धति पर और गहरा कर दिया।
दवा बनाने की विधि:
आकड़ा: 22 किलो
काला धतूरा: 12 किलो
नीम: 22 किलो
करंज: 22 किलो
बेशर्म: 22 किलो
अरंडी: 22 किलो
इन सभी को गोमूत्र में पीसकर पेस्ट तैयार किया गया। इसके बाद इसमें 5 किलो लहसुन, 5 किलो अदरक और 10 किलो हरी मिर्च मिलाई गई। इस मिश्रण से लगभग 600 लीटर जैविक दवा बनाई गई।
चार दिन बाद इसे छानकर 6 किलो सर्फ मिलाया गया। प्रयोग के लिए इस दवा की 1 लीटर मात्रा प्रति टंकी डाली गई।
इस दवा के छिड़काव से फसल पर इल्ली का प्रकोप नियंत्रित हुआ और किसानों ने देखा कि जैविक पद्धति से भी प्रभावी परिणाम मिल सकते हैं। इससे उनके आत्मविश्वास और विश्वास दोनों में वृद्धि हुई। अधिक जानकारी के लिए हमारे साथी श्री सुरेन्द्र सिंह 9165902622

चलित बायो रिसोर्स सेंटर : किसानों के लिए नया प्रयोगहमने चलित स्वास्थ्य सेवाएँ और चलित राशन सेवाएँ तो सुनी होंगी, लेकिन अ...
14/08/2025

चलित बायो रिसोर्स सेंटर : किसानों के लिए नया प्रयोग
हमने चलित स्वास्थ्य सेवाएँ और चलित राशन सेवाएँ तो सुनी होंगी, लेकिन अब चलित बायो रिसोर्स सेंटर की कल्पना साकार हुई है।
हाँ, आपने सही पढ़ा। यह पहल संपर्क संस्था द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई है। पहले से ही संस्था द्वारा देशी बीज, देशी कीटनाशक और देशी पौध टॉनिक जैसे संसाधन उपलब्ध कराए जाते रहे हैं।
इस बार, किसानों की बढ़ती मांग को देखते हुए एक अभिनव कदम उठाया गया—चलित जैव दवाओं का वितरण केंद्र।
जीव कीटनाशकों की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए यह निर्णय लिया गया और इसका असर बहुत ही सकारात्मक रहा।
अब तक किसानों तक निम्न तैयारियाँ पहुँचाई गईं:
पाँच पत्ती स्वरस: 4200 लीटर
सोया महुआ टॉनिक: 4000 लीटर
पंचगव्य: 3200 लीटर
किसानों तक इन जैविक दवाओं की समय पर पहुँच ने न केवल उनकी खेती को सुरक्षित बनाया, बल्कि रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से भी उन्हें जागरूक किया। आज सुखद स्थिति यह है कि विशेष बात यह रही कि ग्रामीणों ने इन उत्पादों को सशुल्क खरीदा इसका अर्थ हे कि ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का विश्वास लगातार जैविक खेती की ओर बढ़ रहा है।

विश्व आदिवासी दिवस पर हम याद करते हैं कि हमारी जड़ें कितनी गहराई से प्रकृति और परंपरा से जुड़ी हैं। आदिवासी समाज सदियों से...
09/08/2025

विश्व आदिवासी दिवस पर हम याद करते हैं कि हमारी जड़ें कितनी गहराई से प्रकृति और परंपरा से जुड़ी हैं। आदिवासी समाज सदियों से भूमि, जल और जंगल के साथ संतुलन बनाकर खेती करता आया है। मक्का, उड़द, मूंग, तुवर, मूंगफली, तिल, सूरजमुखी जैसी अनेक फसलें एक ही खेत में उगाना – यह केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समझदारी भरी कला है, जिसे हम मिश्रित खेती कहते हैं।

परंतु बीते वर्षों में नगदी फसलों का चलन बढ़ा और मोनोकल्चर खेती ने जगह ले ली। इसके कारण कई देशी बीज लुप्त हो गए और खेती की विविधता खत्म होने लगी। यह बदलाव न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक था, बल्कि आदिवासी समाज की पारंपरिक कृषि पहचान के लिए भी एक खतरा बन गया।

इसी विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए सम्पर्क संस्था ने क्षेत्र में पारंपरिक बीजों और विविधता पूर्ण कृषि को बढ़ावा देने का अभियान शुरू किया। संस्था द्वारा 30 गाँवों में किसानों को देशी बीज वितरित किए गए और उन्हें मिश्रित खेती, फसल चक्र, जैविक खाद और प्राकृतिक कीट प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। इस पहल से किसान फिर से अपने खेतों में विविध फसलें लगाने लगे, मिट्टी की उर्वरता बढ़ी, रासायनिक खाद पर निर्भरता घटी और जलवायु परिवर्तन से बचाव की क्षमता मजबूत हुई।

आज विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर हम देख रहे हैं कि आदिवासी किसान फिर से अपनी परंपरा की ओर लौट रहे हैं – अपने घर में बीज बचा रहे हैं, अगली पीढ़ी को दे रहे हैं और खेती को आत्मनिर्भर बना रहे हैं। यह सिर्फ बीज बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर, हमारी पहचान और हमारे अस्तित्व को बचाने का संकल्प है।

आइए, इस विश्व आदिवासी दिवस पर संकल्प लें –
बीज बचाएं, परंपरा बचाएं, धरती बचाएं।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर एक महत्वपूर्ण कदम — "ज्ञान का पिटारा" प्रशिक्षण कार्यक्रमबालिका शिक्षा को लेकर संपर्क संस्था ...
05/08/2025

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर एक महत्वपूर्ण कदम — "ज्ञान का पिटारा" प्रशिक्षण कार्यक्रम

बालिका शिक्षा को लेकर संपर्क संस्था द्वारा वर्षों से जो कार्य किया जा रहा है, उसने अब एक नई दिशा ली है। "स्कूल चलो अभियान" के माध्यम से हजारों अनामांकित बालिकाओं को शाला से जोड़ा गया है, लेकिन केवल नामांकन ही पर्याप्त नहीं। अब आवश्यक है कि बालिकाएं विद्यालय में टिकें, नियमित रूप से पढ़ाई करें और शिक्षा उनके लिए बोझ नहीं, आनंद का माध्यम बने। इसी सोच के साथ संपर्क संस्था द्वारा झाबुआ और अलीराजपुर जिलों के कार्यकर्ताओं को गुणवत्तापूर्ण और रुचिकर शिक्षा के लिए एक तीन दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है।

इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य यह है कि कार्यकर्ता शालाओं में जाकर बच्चों को हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित जैसे विषयों को रुचिकर और व्यावहारिक तरीकों से पढ़ाने में शिक्षकों का सहयोग कर सकें। इसमें विशेष रूप से "ज्ञान का पिटारा" नामक शिक्षण टूल का उपयोग सिखाया जा रहा है, जिसे बच्चों की सीखने की क्षमताओं और ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। यह टूल बच्चों के लिए खेल, गतिविधियों, कहानियों और अभ्यासों के माध्यम से एक ऐसा माहौल तैयार करता है जहाँ वे सहज रूप से सीख सकें।

स्थानीय भाषा में इसे ‘भणवा नो कंडियो’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है – ज्ञान से भरा झोला। यह केवल एक टूल नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जो बच्चों की जिज्ञासा को जीवित रखती है और उन्हें पढ़ाई से जोड़ती है। इस झोले में ऐसे प्रयोगात्मक साधन होते हैं, जो कठिन से कठिन विषय को भी बच्चों के लिए सरल और आनंददायक बना देते हैं।

विगत सात वर्षों में, इस पद्धति से हजारों छात्र-छात्राओं को लाभ मिला है। उनकी गणना, भाषा और अभिव्यक्ति संबंधी क्षमताओं में आशाजनक सुधार देखा गया है। संपर्क संस्था द्वारा संचालित इस अभिनव प्रयास को राज्य शिक्षा केंद्र, मध्य प्रदेश द्वारा भी सराहा गया है।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन एजुकेट गर्ल्स की विशेषज्ञ टीम कर रही है, जो शिक्षाशास्त्र और नवाचारी शिक्षण विधियों में दक्ष है। टीम कार्यकर्ताओं को संवाद कौशल, गतिविधि-आधारित शिक्षण, समूह सहभागिता और सीखने के मूल्यांकन के व्यावहारिक तरीके सिखा रही है।

यह प्रयास यह साबित करता है कि जब समुदाय, संस्था और शासन एक साझा उद्देश्य के लिए साथ आते हैं, तो शिक्षा केवल एक व्यवस्था नहीं रह जाती, वह समाज के विकास का सशक्त माध्यम बन जाती है। Nilesh Desai
Educate Girls

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