Samtaghar

Samtaghar a proper NGO for child education

04/11/2024

कमला हैरिस की यात्रा

अमरीका में चुनाव है
चंचल
भारतीय मीडिया अमरीका में चल रहे चुनाव के प्रति उदासीन है , इसे थोड़ा और बारीक किया जाय तो अमरीकी चुनाव भारतीय मीडिया के गले में फाँसी हुई हड्डी बन चुकी है , जिसे मीडिया न उगल पा रही है न लील पा रही है , इसकी वजह है -सत्तानशीं मोदी और उनकी पार्टी अमरीकी चुनाव को लेकर सांप और छछून्दर की स्थिति में है । अमरीकी राजनीति के प्रति भारत की सत्ताधारी पार्टी , अमरीका की रिपब्लिपार्टी को पसंद करती है और इस हद तक कि पिछले चुनाव में जब रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रैम्प उम्मीदवार थे तो मोदी खुल्लम खुल्ला ट्रंप के प्रचारक हो गए थे । ट्रंप हारे थे । इस बार फिर ट्रंप उम्मीदवार हैं और इनका मुकाबला डेमोक्रेटिक पार्टी के तेज तर्रार नेता कमला हैरिस से है ।
कौन हैं ये कमला हैरिस ?
कौन है यह कमला हैरिस जिससे ट्रंप और ट्रंप से ज्या ट्रंप के समर्थक जैसे भारत का मोदी तंत्र परेशान है । ट्रंप की भाषा उखड़ गई है , ट्रंप मोदी की तरह बोलने लगे हैं - “मंगलसूत्र ले लेंगे , भैस खोल ले जायेंगे , “ वगैरह वगैरह की तरह । अमरीकी जानता ट्रंप का मजाक उड़ा रही है जब की भारत की मीडिया ऐसे भाषणों को अतिरिक्त तरजीह देकर जानता के ताली बजाने को दिखा रही है । राजनीति में यह अदा मोदी ने ट्रंप से सीखा या ट्रंप ने मोदी से ? शोध का विषय है । ट्रंप इतना घबड़ाये और बौखलाए क्यों है ? वजह साफ़ है इस रिपब्लिकन ट्रंप का मुक़ाबला है डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ से मैदान में उतरी एक तेज तर्राक महिला - कमला हैरिस से ।
कौन है कमला हैरिस ?
यह जानने के लिए उस पोस्टर को जेरे बहस करना पड़ेगा जो एक सतर में लगता है -
“१९ साल की उम्र में मेरी माँ अकेले अमरीका आई थी “
देखने पढ़ने में यह पोस्टर जितना सारा और सपाट लगता है अंदर में यह कई पेंच खोलता है ।
कौन है कमला हैरिस की माँ ? कमला हैरिस की माँ श्यामला गोपालन भारत से बतौर एक साइंस की छात्रा के रूप में अमरीका गई थी । यह संदेश अमरीका में रह रहे भारतीय लोंगो को बाल दे रहा है किस तरह भारतीय अमरीका जाकर कामयाब हुए हैं । दो - अमरीकी समाज में भारत की बड़ी इज़्ज़त है इसकी वजह है अमरीकी समाज शांति और सदभाव का जबरदस्त हामी है ।अपने सरकार की बारूदी साम्राज्यवाद के विपरीत । वह समाज शांति और सदभाव की दिशा में भारत की इज्जत करता है और वह गांधी और नेहरू को ज़्यादा तरजीह देता है । और कमला हैरिस भारतीय मूल की हैं । इस पोस्टर का तीसरा बड़ा संदेश है “ १९ साल की श्यामला गोपालन जिस समय अकेले अमरीका गईं , वह नेहरू युग है और जाहिरी तौर पर २०१४ के पहले का काल खंड लेकिन श्यामला को भारत में पैदा होने पर कोई “शर्म “ है , वह भारत के उत्थान का युग है ।
५ नवम्बर को चुनाव है बैलेट पेपर से । दुनिया की निगाह अमरीका के चुनाव पर लगी है । मुक़ाबला जबरदस्त है । हार जीत का फ़ासला बहुत कम वोटों से होगा ऐसा अमरीकी मीडिया बता रहा है ।

03/11/2024

इस कथा में -
चंचल
एक दीप सत्यभामा के लिए ।
इस सुलेख में, मरहूम भाई राजेन्द्र यादव यूँ ही याद आ गए , गो कि उनका इस विषय से कोई ज्यादा ताल्लुक नही है । एक दिन राजेन्द्र जी ने हंस के दफ्तर में बुलाया और ' हंस ' की वह प्रति हमे दी जसमे हमने मशहूर कथाकार भाई काशी नाथ सिंह के एक लेख के बारे में जवाब दिया था जो काशी नाथ जी ने हमारे बारे में लिखा था । दफ्तर में उस समय प्रसिद्ध कथाकार लेखक शिवमूर्ति जी मौजूद थे । राजेन्द्र जी ने पूछा - आजकल क्या पढ़ रहे हो ? हमने कहा - वात्सायन को ।
- पहले नही पढ़े थे क्या ?
- कई बार पढा , बार बार पढ़ता हूँ । जब जब मौसम बदलता है , संदर्भ ढूंढता हूँ ।
- और क्या पढ़ते हो ?
- मिथक कथाएं
- जैसे ?
- जातक , बेताल पचीसी वगैरह
- क्यों ?
-लिखने का पसंदीदा विषय मिलता है ।
आगे भी बात हुई लेकिन उसका जिक्र यहां बेमानी होगा । आइये आज को देखें ।
आज छोटी दिवाली है । सनातन ने इसे 'नरक चतुर्दशी ' कहा है । नरकासुर राजा के अत्याचार की कथा । पौराणिक हवाला है - नरकासुर ने सारे देवताओं को पराजित कर उनकी पत्नियों को अपने संरक्षण मे ले
लिया । हताश देवताओं ने कृष्ण की शरण ली और उबरने का रास्ता पूछा । कृष्ण ने बताया - नरकासुर को वरदान मिला है , वह किसी पुरुष देवता से पराजित नही होगा उसे कोई स्त्री ही मार कर परास्त कर सकती है । देवताओं ने अगली समस्या सामने रखी - है यदुनंदन कृष्ण ! देवताओं में कोई पराक्रमी स्त्री तो है नही , फिर हम क्या करें ? इस बात- चीत को श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा सुन रही थी । सत्यभामा के पास कई युद्ध संचालन का अनुभव था, अतः सत्यभामा ने नरकासुर का वध कर तमाम देवताओं की पत्नियों को स्वतंत्र कराया । आज जो दीप जलेगा वह सत्यभामा के लिए है । आज के दिन हम सत्यभामा को के दिया जरूर जलाते हैं ।
आज का दिन ' सत्यभामा पर्व 'होना चाहिए लेकिन पाखण्डी पुरुष समाज ने इसे नरकासुर के नाम पर आरक्षित किया हुआ है ।
सत्यभामा पर्व की बधाई । एक दिया जलाइए ।

02/11/2024

मन की बात
चंचल
फेस बुक पर हमारी एक मित्र हैं , ( मुहावरे वाली मित्र नहीं , सही मायने में मित्र हैं , हम एक दूसरे पर इतना भरोसा करते हैं कि सुख , दुख बांट लेते हैं ) इनका नाम है रेनू उमराव । Renu UmRenu Umraoी का संदेश मिला कि - “आज केएल लिख नहीं रहे हो , कुछ दिख नहीं रहा ।खैरियत ? “ यह उन दिनों का संदेश था जब हम बीमार थे और वाक़ई नहीं लिख रहे थे । सो हमने वह संदेश भी नहीं देख सका , आज जब दिवाली का संदेश मिला तो उसी के साथ पुराना संदेश भी आ गया । कुतूहल वस हम रेनू जी के पेज पर गए । रेनू जी पेंसिल से किसी का पोर्ट्रेट बना रही थी ( रेनू जी एक मशहूर चित्रकार भी हैं ) लिखत में ढूंढा तो कारण मिला -

“ इस प्लेटफार्म से अब मन उचट गया है । लोग कहते हैं अब आप लिखती नहीं ,कुछ कहती नहीं , पोस्ट डालती नहीं । एक ही जवाब है एक समय पर हर तरफ से ,हर बात से मोह भंग हो जाता है । पोस्ट डालने की कोशिश।करती हूं पर अब जवाब नहीं दिया जाता न कुछ लिखा जाता । पता नहीं क्यों ? न जाने क्यों ?”
रेनु जी पूछ रही हैं - पता नहीं क्यों ? न जाने क्यों ? इस पता नहीं का जवाब भी रेनू जी के पास है , कहती हैं “ मन “ उचट गया है । रेनू जी ! एक काम करिए । कई टुकड़ों को जोड़ कर कमबख़्त मन को पकड़िए और हो सके तो उसके वाबर्ची बाप को पकड़िए वही इस मन को समझा सकता है , क्यों कि मन परम मुरहा होता है । स्वामी विवेकानंद ने राजयोग में इस मन के बारे में बताया है - “मन उस चंचल बंदर की तरह है जो नशा कर लिया है और कूद फाँद रहा है इसे जुगत से नहीं रोका जा सकता । बस इसे थक जाने दो । “रेणू जी आप भी यही करिए । मन के वालिद से मिलिए । इन्हें लोग दिल बोलते हैं । दरअसल आपका मन नहीं उचटा है , मन तो दिल की एक चंचल संतान है चित की तरह , दरअसल आपका दिल उचटा है , इसे घुमा कर पीठ के बल कर दीजिए , हँसने लगेगा । तमाम भाव आयेंगे । सारे रस झरेंगे ।कायनात नाचने लगेगी । कैनवास पर उतरेगा गुल लोग कहेंगे रेनू जी गुनगुना रही हैं । चलिए शुरू करिए एक लेख हाथरस के खच्चरों पर , जिसके लीद से गिरोही मसाला बनाते पकड़ाये हैं

28/10/2024
दास्ताँ औरत होने का       चंचल   डॉ लोहिया संसद में देश की औरत के सवाल पर बोल रहे थे , संसद में बैठी , अपनी वाकपटुता और ...
27/10/2024

दास्ताँ औरत होने का
चंचल
डॉ लोहिया संसद में देश की औरत के सवाल पर बोल रहे थे , संसद में बैठी , अपनी वाकपटुता और ख़ूबसूरती के लिए मशहूर सांसद तारकेश्वरी सिन्हा जो अक्सर डॉ लोहिया को छेड़ती रहती थी , उस दिन भी टोका -
- डाक्टर साहब आपने शादी तो किया नहीं , फिर औरत के बारे में कैसे इतनी जानकारी रखते हैं ?
डॉ लोहिया ने तुरत पलट कर कहा
- तुमने मौक़ा ही कब दिया ?
संसद ठहाके से गूंज उठी । डॉ लोहिया महिलाओं के जबरदस्त पैरोकार रहे , संसद में और संसद के बाहर । संसद में ही उनका एक मशहूर जुमला है - हमे अपने औरत न होने का मलाल है ।
अब अपनी गति सुनिए -
कल डाक से एक किताब आई । ( मंजुला चतुर्वेदी जी की टटकी कविताओं का संकलन ) डाकिये ने पूछा - सर यह आपका ही है ?
- क्यों , उस पर नाम और पता तो लिखा होगा ?
- इसी लिए तो पूछ रहा हूँ
- क्यों क्या हुआ ?
- इस पर श्रीमती चंचल लिखा है ,
लोग हंस दिए । हमने कहा - हमारे साथ यह पहली बार नहीं हुआ है , कई बार हम महिला माने गए हैं ।
डाकिया भी वहीं चाय की दुकान पर बैठ गया ।
- एकाध किस्सा बताइए न सर
- किस्सा नहीं है , सही घटना है भाई !
- जी !
- हम टाइम्स हाउस में मुलाज़मत कर रहे थे , हमारा बैंक खाता राजौरी गार्डन के बड़ौदा बैंक में था । हम बैंक वालों में काफ़ी परिचित रहे , अपने चुलबुलेपन की वजह से ।बैंक ने हमारे साथ , अनजाने में बैंक ने एक घपला कर रखा था , हमारी चेक बुक पर हमारे नाम चंचलके साथ M s / लिख दिया था । M s chanchal / इस घपले को पकड़ा नवभारत टाइम्स के सत सोनी जी ने । हुआ यूँ की नवभारत टाइम्स के कर्मचारियों ने एक हाउसिंग सोसाइटी बना रखी थी हम भी उसमे एक सदस्य थे । हमसे अग्रिम बैंक चेक मागा गया था , उसे हमने जमा कर दिया था । उस चेक बुक पर वही m s दर्ज था । एक दिन हम नवभारत टाइम्स गए । सत सोनी जी चेक बुक वापस करते हुए कहा - इसमें तुम्हें मिसेज चंचल लिखा गया है , बैंक से अपना जेंडर ठीक करा लो । “हमे जेंडर ठीक कराना है “ नवभारत संपादकीय विभाग ले उड़ा । उन दिनों वहाँ हाल में एक से बढ़ कर एक कारीगर बैठे रहते थे । बहुत खूबसूरत माहौल होता था । इब्बार रब्बी , रमेश गौड़ , पंकज शर्मा , रंजीत कुमार , वगैरह । रमेश गौड़ ने सत सोनी से पूछा
- किसका जेंडर ठीक लिया जा रहा है ?
- चंचल का
- देश हिंदी पखवाड़ा मना रहा है , जेंडर मत बोलो , लिंग बोलो , चंचल को लिंग ठीक कराना है ।
शाम को प्रेस क्लब गया तो पहुंचते ही लोग पूछने लगे - क्या हुआ है ? क्या बताता ?
Manjula Chaturvedi ji ! किताब मिली , धन्यवाद ! किताब पर अलग से पोस्ट लिखूँगा , अभी पढ़ रहा हूँ ।

काली पूजा      चंचल          काली की पूजा भी होती है , अरसे तक नहीं जानता रहा , क्यों कि हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने ...
26/10/2024

काली पूजा
चंचल
काली की पूजा भी होती है , अरसे तक नहीं जानता रहा , क्यों कि हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने एक अलग के समाज से , जाने अनजाने “ ज्ञान “ अर्जित कर रहे थे , उस समय ज्यादा देवी देवता अपने इस समाज में नहीं थे । ले - दे कर “ सत नारायण “ की कथा थी , अपनी जजमानी में एक ही पंडित थे , पंडित राम दीन दुबे । सात अध्यायों वाली इस कथा में - सतनारायण की कथा क्या है आख़िर तक नहीं है , यह भी बाद में समझा , उस समय तो जब एक अध्याय की समाप्ति पर शंख बजती तो हम बच्चे , बड़ों की देखा देखी , आँख बंद करके हाथ जोड़ लेते । पूजा ख़त्म होने तक हम बच्चों को बार बार प्रसाद में चढ़ने वाले पंजीरी और चरणामृत की लालसा बढ़ती रहती । दूसरे देवता मिले हनुमान जी , उनकी पूजा व्याधि की आशंका के समय होती , नज़दीक के कस्बे से लौटते , साँझ हो जाती तो डगर में पड़ने वाली भूतहिया बाग को पार करने के लिए हनुमान चालीसा मुँह जबानी बुदबुदाते । बाद बाक़ी मांओं केलिए जो व्रत उपवास थे , वे निर्गुण थे , न तो उनकी कोई मूर्ति मिलती , न ही कोई कलेंडर मिलता । गाँवो में जगह जगह कुल देवी का छोटा मोटा मंदिर रहता , जहाँ अलग अलग दिन दिन मुक़र्रर रहते , ये पूजा स्थल औरतो के निमित्त रहते , अलग अलग “ मन्नतों “ के पूरे होने पर मंदिर में “ कड़ाही चढ़ती “ । तेल की सोहारी ( पूड़ी ) और लपसी बनती ।
होली और दिवाली में तब तक देवी देवता नहीं आए थे । लेकिन गजब का उत्साह रहता ।होली के त्योहार के बारे में भक्त प्रह्लाद और “ नरसिंह “ भगवान की कथा आजी से सुना जरूर लेकिन भगवान नरसिंह की पूजा गांव में नहीं होती रही , अभी भी । बाद में विश्व विद्यालय गया तो नरसिंह भगवान के मंदिर की जानकारी मिली , वहाँ के लोग उन्हें पूजते हैं । ( पूर्णिया जिले के बन्मखनी के सिकलीगढ़ गांव में वह लौह स्तंभ आज भी है , जिसमे से भगवान विष्णु नरसिंह के अवतार में पैदा हुए थे ) होली कामदेव और शिव की का निचोड़ है । शिव के पूजास्थल तो आसानी से मिल जाएंगे लेकिन असल खिलाड़ी कामदेव ?
- लेकिन होना चाहिए , हर गांव , क्या समूचे ब्रह्मांड में काम देव की स्थापना होनी चाहिए ।
- इतनी बड़ी लालसा कामदेव की , क्यों ?
- अकेला देवता है , जो जड़ और चेतन दोनों में उद्दीपन का संचार करता है । यह सर्व संचारी काम किसी को भी नहीं छोड़ता , इतना बड़ा देवता है । कामदेव का एक भी मंदिर नहीं मिलता ।
- मिलता है , है , सबूत के साथ , जीवंत
- गपोड़ी ! दुष्ट !! करो नौटंकी ! कोई कथा सुना दो , हम मान जायेंगे ।
- लिखो , कागद पर लिखो या दिल पे लेकिन अब यह याद रहेगा ,
- बको !
- उत्तर प्रदेश का एक मशहूर जिला है बलिया । बलिया शहर से पच्चीस किलो मीटर की दूरी पर एक गांव है कारो । कारो में एक मंदिर है कामेश्वर धाम । कहते हैं यही पर कामदेव ने शिव पर काम वाण छोड़ा था । शिव ने यहीं पर काम देव को भस्म किया था । एक आधा जला हुआ आम का दरख़्त आज भी जिंदा है ।
इस तरह डूबते उतराते हम दिवाली तक आए ।
हमारे बचपन तक काली पूजन नहीं आया था । यह बंगाल मिथिला तक ही महदूद था । अब धीरे धीरे काली पूजा हमारे खेत्ते तक आ गई है । वरना हमारे जमाने तक लोग दिवाली “ जगाते “ थे । जगाने का मतलब था जो लोग जिस पेशे में हैं , दिवाली की रात उसे जरूर करते थे । चोरी चमचोरी तक । कहा गया है न -
चरण धरत , शंका करत , भावे नीद न शोर ।
सुवरण को खोजत फिरे , कवि , व्यभिचारी ,चोर ।
- लेकिन काली पर तो बताओ , नशेड़ी !
- काली और शिव की बेहतरीन कथा है । क्रोध , हिंसा और अहंकार के ख़िलाफ़ शिव का सत्याग्रह जीत जाता है । पूरी कथा सुननी हो तो इसी फ़ेस बुक पर Kumud Singh जी हैं इस पर कुमुद जी ने विस्तार से लिखा है । पढ़ लो ।
- तुम कहाँ जा रहे हो ?
- काजल पारने

“ख़ादिम का रोज़नामचा “ एक किताब की शक्ल में तैयार है । देर की की कुल दो वजहें हैं , एक अपनी काहिली , दूसरी नई तकनीकी विध...
25/10/2024

“ख़ादिम का रोज़नामचा “ एक किताब की शक्ल में तैयार है । देर की की कुल दो वजहें हैं , एक अपनी काहिली , दूसरी नई तकनीकी विधि ( कंप्यूटर , के सहारे ) की कमजोर जानकारी । इसी तकनीकी तरीके से प्रकाशक को एक बार स्क्रिप्ट भेजी गई लेकिन उसने कुछ खामी थी , पढ़ा ही नहीं जा सका । इसे अब दुबारा भेज रहा हूँ , टाइप किया हुआ । संभव है अब छप जाय ।

अग्रिम बधाई प्रियंका जी ! नामांकन पर जुटा हुजूम साक्षी है ।
23/10/2024

अग्रिम बधाई प्रियंका जी ! नामांकन पर जुटा हुजूम साक्षी है ।

राग जौनपुरी बसिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो- #ग़ालिब  #रागजौनपुरी के बहानेसुरैय्या का गाया हुआ मिर्ज़ा ग़ालिब 1954 में य...
23/10/2024

राग जौनपुरी

बसिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो- #ग़ालिब
#रागजौनपुरी के बहाने

सुरैय्या का गाया हुआ मिर्ज़ा ग़ालिब 1954 में यह खूबसूरत नग़मा और सैकड़ो ऐसे संगीत जो आपकी आत्मा में सराएत कर जाएंगे।पुरानी पीढ़ी को आज भी कुछ नग़मे अपनी लज़्ज़त अपनी हस्सासियत की डोर से बांध लेते हैं ,उनमें से अक्सर को आज की पीढ़ी भी उसी ज़ौक़ ओ शौक़ से सुनती है। इसी सिलसिले की एक कड़ी तलत महमूद साहब की मख़मली आवाज़ में 1954 में आई देवानंद की फ़िल्म "टैक्सी ड्राइवर" का नग़मा" ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो" या "मिरी याद में तुम न आंसू बहाना न जी को जलाना हमे भूल जाना"।इस बेहद पुरसोज़ नग़मे को हम सब ने ज़रूर सुना होगा।आज बात करेंगे इस नग़मे का जौनपुर से रिश्ता क्या है।?
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने अपने छोटे भाई जौना ख़ान के नाम पर उत्तर भारत मे एक शहर बसाया ,जिसे जौनपुर के नाम से शोहरत हासिल हुई ।बाद में अलग अलग समय काल के खंड में ये सल्तनत विस्तार लेते हुए नेपाल , भूटान बिहार आदि तक इब्राहिम शाह शरकी(मलिक सुल्तान सरवर, जो कि नसीरुद्दीन मुहम्मद शाह के वज़ीर थे) के नाम से फैल गया और इसे शरकी वंश के राज्य और शासन में शहर ए इल्म, शहर शीराज़ ए हिन्द (मुग़ल शहंशाह शाहजहाँ द्वारा)का लक़ब मिला।इब्राहिम शाह ने अपनी वज़ारत के दौर में इस सल्तनत का विस्तार पूर्व तक फैला दिया था जिसकी वजह से उसे सुल्तान उस शरक़(रूलर ऑफ ईस्ट) की उपाधि दी गई। ज़फर ख़ान का 85 वर्ष पूर्व बसाया गया नगर ज़फ़राबाद(विद्याभूमि) अब नए शहर, जौनपुर के कारण उपेक्षित होता गया।14 से 15 वी सदी के मध्य तक यह शरकी सल्तनत अपनी साहित्यिक, कला, संगीत, धार्मिक अध्यन और सांस्कृतिक पहचान लिए हुए इतना विख्यात था कि शेर शाह सूरी ने यहां से धार्मिक अध्यन,दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया और सब जानते हैं शेर शाह सुरी के निर्माण कार्य आज भी 500 साल से बाद भी सजीव हैं!
उसी क्रम में हुसैन शाह शरकी सल्तनत जौनपुर का आख़िरी शासक वो बेहद निपुड संगीतज्ञ था जिसे गंधर्व के नाम से भी ख्याति मिली हुई थी उसे साहित्य, कला, संगीत आदि से बेहद लगाव था। अपनी संगीत की समझ और विद्वता के कारण आज भी संगीत की दुनिया मे किसी ज़िले के नाम पर दिया गया "राग जौनपुरी" जिसे भोर में गाया जाता है।संगीत के विद्वानों का बेहद पसंदीदा राग है और विशिष्ट है।
"असावरी गंधर्व राग "का कहते हैं ,परिष्कृत रूप है कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह गुजरात स्थित जवनपुर नाम के स्थान से सम्बद्ध होने के कारण राग जौनपुरी कहा जाता है लेकिन संगीत के जानने वाले और अधिकांश इतिहास वेत्ताओं का विश्वास है कि यह राग हुसैन शाह शरकी का शुद्ध रूप से अविष्कृत राग है जो 14 वी और 15 वी सदी में उत्तर भारत के शरकी साम्राज्य का ,कला साहित्य प्रेमी शासक था।
राग आधारित लेखकों और इतिहास कारो का मानना है कि अकबर के नवरत्न तानसेन ने भी इस राग में संशोधन करते हुए इसे दरबार ए आलिया ,अकबर के दरबार मे गाते थे। विश्व पटल पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज बड़े गुलाम अली साहब, जयपुर घराना के विख्यात पंडित जसराज जी ,किशोरी अमोनकर जी, उस्ताद अली अकबर ख़ान जी आदि , सभी ने जौनपुरी राग पर आधारित अमर रचनाएं अपने विशष्ट शैली में गायी हैं।हेमंत कुमार, मन्नाडे, मुहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, सुरैय्या , लता मंगेशकर आदि सभी गायक और गायिकाओं ने राग जौनपुरी से संगीत की दुनिया मे अलख ज़रूर जगाया है। यूँ नही है कि इस राग का प्रचलन आधुनिक फ़िल्म संगीत में क्षीण हुआ हो बल्कि राग जौनपुरी आज भी उसी गौरव के साथ संगीत की दुनिया का अमरत्व दाता है।महान संगीतकार ए आर रहमान द्वारा संगीतबद्ध "रामलीला" फ़िल्म का एक नग़मा भी राग जौनपुरी पर आधारित है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की यह अद्वितीय और अनमोल धरोहर रहती दुनिया तक दरिया ए गोमती की लहरों की तरह स्वर लहरी बनकर जौनपुर -शिराज़ ए हिन्द की रगों में बहती रहेगी।

(संगीत की विद्या में मैं महामूर्ख हूँ , मेरे लेख का आधार कुछ शोध पत्रों, लेखों और विकिपीडिया पर उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है,
(चित्र कलीच ख़ान की बारादरी )

22/10/2024

अहिंसा की ताक़त
चंचल

मिथक की कहानियाँ तमीज़ की बारीक गुत्थी भी सुलझाती हैं और अंतर्मन में एक ज्योति जला कर , वहीं बैठ जाती हैं । मिथ पर विश्वास या उसकी सत्यता बोध कोई भी नहीं स्थापित कर सकता , लेकिन उसके “ बहाने “ में बहती निर्मल जल धारा को छू तो लेना ही चाहिए ।

तथागत बुद्ध को लोंगो ने अंगुलिमाल के कुकृत्य , लूट , हत्या और सबूत के लिए हत्या हुए मानव की एक उँगली काट कर माला बना लेने की कथा सुना कर , अपने भय का कारण बताया । इस अंगुलिमाल की तलाश में , बुद्ध जंगल की तरफ़ निकल पड़े । कुछ दूर ही गये होंगे क़ि पीछे से एक कर्कस आवाज़ आयी । कौन है ? रुक जाओ ! हमे जानते नही हम अंगुलिमाल हैं ! तथागत मुस्कुराए शांत चित से बस इतना ही कहा -
“ मैं तो रुका हूँ , अंगुलिमाल ! भाग तो तुम रहे हो । “
अंगुलिमाल ने “देखा “ - आज पहली बार देखा - एक डर एक शांत निडर के सामने काँप रहा है । (बाक़ी अपनी हत्या के अनुमान से ही अंगुलिमाल के सामने कापने लगते थे , यह तो बाक़ियों से कत्तयी अलहदा है । ) अंगुलिमाल तथागत के चरण में था । तथागत ने उठाया गले से लगा लिया । वही अंगुलिमाल बाद में बहुत परोपकारी साधू बना ।
जंगल के दरख़्तों ने अपने पत्तों पर लिख दिया - “ अप्प दीपों भव “ इंसानी सभ्यता का बड़ा हिस्सा आज भी तथागत के साथ खड़ा है ।

निर्दोष ईसा को जब सलीब पर चढ़ा दिया गया तो कुल तैतींस वर्षीय ईसा ने इतना भर कहा
“- हे ईश्वर ! इन्हें माफ़ कर देना , ये नही जानते क़ि ये क्या कर रहे हैं ।”

नेपोलियन कहता है -
“ अलेक्ज़ेंडर , शार्लमेन और मैंने महान साम्राज्यों का निर्माण किया है । हमने उन्हें सैनिक बल से बनाया , आज वे कहाँ हैं ,? ईसा ने अपना साम्राज्य प्रेम के बल पर क़ायम किया , और आज करोड़ों उसके लिए बाख़ुशी अपनी जान दे देंगे । “
सुकरात एथेंस की गलियों में घूम रहे थे , उन्हें भूख लगी थी । मोड़ पर एक नौजवान दिखा । सुकरात ने उससे पूछा - रोटी कहाँ मिलेगी ? नौजवान ने कहा -
- यहाँ शराब कहाँ मिलेगी ? सुकरात ने उसकी बाँह पकड़ ली - “ चलो मिल के खोजते हैं “ सुकरात को ज़हर का प्याला दिया गया , सुकरात ने मौत स्वीकारी लेकिन इंसानी सभ्यता ने उसे कंधे पर बिठा लिया है ।

मोहनदास करम चंद गांधी दक्षिण अफ़्रीका में ट्रेन से यात्रा कर रहे थे , अंग्रेज़ी क़ानून था फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे में केवल गोरी चमड़ी के लोग ही सफ़र कर सकते हैं । गांधी जी के पास फ़र्स्ट क्लास का टिकट था , लेकिन वे रंगीन चमड़ी होने की वजह से अंग्रेज टी टी ने गांधी जी को ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक दिया । लूई फ़िशर लिखते हैं -
“ अगर उस अंग्रेज के बच्चे को यह मालूम रहता क़ि वह जिसे ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक रहा है , वह एक दिन अंग्रेज़ी साम्राज्य को ही ग्लोब से बाहर फेंक देगा , तो वह ऐसी गलती कभी नही करता “
अंग्रेज़ी साम्राज्य की अकूत ताक़त को “सविनय अवज्ञा “ के अहिंसक हथियार से गांधी ने झुका दिया ।
उसी बापू के देश का भटका हुआ नौजवान पूछता है - क्या यह सम्भव है ?
यही सवाल गांधी जी से स्विटीज़र लैंड में एक नौजवान ने पूछा था ।सीधा सा छोटा सा जवाब है , खुद आज़मा कर देख लो । जवाब अंग्रेज़ी समाज ही दे रहा है -

“ एक असामान संघर्ष शुरू हो गया है , हमारा विश्वास है की इस संघर्ष में , हम अंग्रेजों की पराजय निश्चित है । हम सर्वोत्तम युद्ध नही कह सकते , जब दुश्मन (गांधी की अहिंसक नीति ) निरंतर मित्रता की भावना बनाए रख रहा हो । हम अप्रतिरोधी लोंगो पर आक्रमण के लिए , देर तक उत्साहित नही रह सकते । उनकी ( कांग्रेस की ) ताक़त निश्चलता में है । वे बड़ी संख्या में सड़कों पर , रेल मार्गों पर , कहीं भी लेट जाँयगे जहां से उन पर हमला करने वाले गुज़र रहे होंगे ।”
यहाँ दो शब्द हैं जो दो अलग अलग सभ्यता को परिभाषित करते हैं ।
“ अ समान “ और अ प्रतिरोधी ।
यह तो रही इतिहास की गवाही । कांग्रेस की अहिंसा और सामने है हिंसा की पलटन । असमान संघर्ष है ।
“ वो “ चाहते हैं , कांग्रेस हिंसा करे बदले में सरकारि हिंसा को जायज़ ठहराया जा सके लेकिन नही , कांग्रेस की ओर से अप्रतिरोध है । सड़कों पर लेट रहे हैं लेकिन सुरक्षा बल पर हाथ नही उठ रहा है ।
धन्यवाद दीजिए इस सरकार को क़ि इसने इस पीढ़ी को समझने का मौक़ा दिया की अहिंसा में कितनी ताक़त होती है । इसे ही कहते हैं , साधन की पवित्रता ।
जारी -
Chanchal Bhu

21/10/2024

बाल यूँ ही सफेद नहीं हुए हैं , रंग रोगन भी नहीं किया , वक्त को काटने- छाटने में चेहरे ने झुर्रियां ओढ़ ली और झुर्रियों ने बाल के काले भूरे रंग को सोख लिया और बाल चांदी हो गया । लोगों ने ऐलान कर दिया कि हम जईफी की तरफ़ बढ़ गए हैं , यकीन के लिए कमबख़्त आईना आ गया । गबरू गदहपचीसी में खड़ा मुमतजवा चचा बुलाने लगा , घास छोलने झुंड में जाती मुग्धाएँ बाबा बोलने लगीं , लेकिन मन किसी ने नहीं देखा , उसकी जवानी में रत्ती भार का फ़र्क़ नहीं आया है , यह सच डंके की चोट पर कहता हूँ , कोई लाग लपेट नहीं । गवाही में हमारे बगल खड़े हैं कवि केशव -
केशव केशन असि करी , जस अरि हू कराय ।
चंद्र बदन मृग लोचनी , बाबा कहि कहि जाँय ।।
(केशव के केशन ( बाल ) ने वह कर दिखाया है जो दुश्मन भी नहीं कर सकता , मुग्धाएँ बाबा बोल कर बगलिया जाती हैं ।)
- नानू ! तुम्हारे बाल कब सफेद हुए ?
- बाल रंगाने का समय तो सकता है लेकिन सफेद होने का नहीं
- क्या मतलब ?
- मतलब यह कि छोड़ो इस बात को , युवा वह होता है जो एक साथ तीन शर्तें पूरी करे -
एक - भविष्य के बारे में रंगीन सपना देखे
दो - परमार्थवादी दृष्टिकोण हो
तीन - जोखिम उठाने की क्षमता हो ।

पंडित नेहरू का चाँद          चंचल     आज भारत चाँद पर चहलकदमी कर रहा है , कभी उत्सुकता हुई यह जानने के लिए यह किसके दिमा...
19/10/2024

पंडित नेहरू का चाँद
चंचल
आज भारत चाँद पर चहलकदमी कर रहा है , कभी उत्सुकता हुई यह जानने के लिए यह किसके दिमाग़ की उपज है ? इसी सवाल का उत्तर है यह लेख । जानना चाहिए , विशेष कर नयी पीढ़ी को ।
( यह लेख अमर उजाला में छप चुका है , लेख थोड़ा लंबा है लेकिन बहुत दिलचस्प है । )

जब सितुही में चाँद उतरता था
चंचल
चन्दा मामा आरे आव
बारे आव
नादिया किनारे आव
बेटवा के मुहाँ में घुड़ूक ।
गोद में लेटा चुलबुला लड़िका , दादी के गोद में , मुँह बाये , चंदा मामा के संगीत में मगन रहा , घुड़ूक के साथ सितुही भर दूध उसके मुँह में चला गया ।
“ घुड़क “ के साथ गीत में आये व्यवधान पर प्रतिवाद दर्ज कराने ले लिये लड़िका साँस अंदर खींचता , इसी खींच तान में दूध पेट में चला जाता । एक जमाने तक गाँव के बच्चों को इसी तरह दूध पिलाया जाता रहा है । संगीत और चंदा का यह रिश्ता जीवन से उठ कर लोक में गया , लोक से साहित्य सहित तमाम विधाओं में स्थापित हो गया । इंसानी सभ्यता में जब विकास को गति देने के लिये विज्ञान का हाथ थामना पड़ा तो विज्ञान की तमाम शाखाओं ने पृथ्वी से इतर अन्य ग्रहों की सतह पर होने हरकतों की खोज शुरू कर दी । भारत भी इस दौड़ में शामिल हो गया और सफलता भी हासिल कर ली । चन्द्रयान तीन का सफलता पूर्वक चाँद पर उतरना इसी खोज का एक पड़ाव है । भारत में इस यात्रा की कहानी बहुत दिलचस्प है -
“ 1942 , 9 अगस्त बंबई में कांग्रेस सम्मेलन आयोजित था । कांग्रेस समाजवादी यूसुफ़ मेहर अली बंबई के मेयर थे उन्हें कांग्रेस सम्मेलन का स्वागत करना था । सम्मेलन की पूर्व संध्या पर गाँधी ने लोगों से पूछा था , अंग्रेजों को भारत से जाने का एक नारा बताओ । कई लोगों ने सुझाव दिये लेकिन गाँधी जी को नहीं पसंद आया । यूसुफ़ मेहर अली ने सुझाया “ अंग्रेजों भारत छोड़ो “ और अंग्रेज़ी में “ क्विट इण्डिया “ । दिलचस्प बात ये है कि इसी नाम से मेहर अली साहब ने एक दिन पहले ही एक पुस्तिका पहले ही छपवा ली थी जिसे सम्मेलन में आये प्रतिनिधियों के बीच बाँटा जाना था । “ क्विट इण्डिया “ का एक प्रतीक चिह्न भी बनाया जा चुका था । बापू को दोनों पसंद आ गया और उन्होंने आमीन कह कर , अपनी सहमति ही नहीं दी , अपने भाषण के केंद्र में इसे रख लिया । उस रात गाँधी जी का ऐतिहासिक भाषण “ अंग्रेजों भारत छोड़ो “ के साथ आम जान से अपील की गई - “करो या मरो “
यह इतिहास है सब को मालूम है ।
असहयोग के इस आंदोलन को बार बार जेल के पड़ाव से गुजरना पड़ा है । लंबी जेल में दिन और रात भी परिस्तिथि गढ़ते रहे हैं , इतिहास इस हिस्से को छूने से परहेज़ करता आ रहा है । इस इतिहास के समानांतर जो कुछ अंदरूनी खाँचे में चला है बह इतिहास बोध है । जेल में लिखी गई कहानियाँ , कवितायें , दर्शन या व्याख्या इसी इतिहास बोध में आते हैं । क़ैदखाने के अपने आकाश में भी चाँद आया है । जेल ने बहुत कुछ दिया है , आज हम उन पर नाज करते हैं , एक से बढ़ कर एक किताबें आयी , वाक़यात दर्ज हुए , यातना के क़िस्से निकले , ये सब हमारी धरोहर है । चाँद भी यहीं से निकला जिस पर आज हम पहुँचे हैं । चाँद पर घूमता भारत का चन्द्रयान अपने होने का निशान छोड़ता जा रहा है , भारत का प्रतीक चिह्न अशोक स्तंभ और सत्यमेव जयते ।
अहमद नगर क़िले की जेल में जो क़ैद हैं , वे केवल कांग्रेसी या समाजवादी , सुराजी क़ैदी भर नहीं हैं सुराज की जंग के साथ विचारों की एक समानांतर धारा भी बही है । यहाँ जवाहर लाल नेहरु , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद , आचार्य नरेंद्र देव , बल्लभ भाई पटेल , गोविंद बल्लभ पंत वग़ैरह एक साथ क़ैद हैं । सब की एक अलग की पहचान है । जेल की ज़िंदगी बड़ी कमाल की होती है । चाँद कहाँ से आया वह वाक़या सुनिये
पंडित नेहरु की आदत थी , रात खाना खाने के बाद बैरक के सामने मैदान में घूमते थे , लौट कर काफ़ी बनाते थे , अपने अजीज आचार्य नरेंद्र देव के साथ देर रात तक बतियाते थे । मौलाना अबुल कलाम की आदत थी , खाना खाने के बाद , वे चीनी फाँकते थे और सो जाते थे । अमूमन इस चीनी का बंदोबस्त मौलाना जी दिन में कर लिया करते थे , जिस दिन भूल जाते , वे आचार्य नरेंद्र देव और पंडित नेहरु के वार्तालाप की सघनता का फ़ायदा उठाते और आहिस्ता से पंडित नेहरू की बची हुई चीनी मार दिया करते । एक रात घपला हो गया । उस रात जब चाँद खुल कर खिला था , पंडित नेहरु देर तक घूमते रह गये । यह चाँद की दिलकशी थी जिसने पंडित नेहरू को बैरक में जाने , काफ़ी बनाने और अपने दोस्त से बतियाने को लंबे समय तक रोके रखा । बैरक में चाँद तो था नहीं , दिलकशी रही भी होगी तो अलग अलग की रही होगी , लेकिन मौलाना अबुल कलाम की दिलकशी चीनी पर टिकी हुई थी । पंडित नेहरु की वापसी का इंतज़ार दो लोग कर रहे थे , एक आचार्य जी , दूसरे मौलाना जी । गो कि दोनों की बेसब्री अलग अलग रही । मौलाना से नहीं रहा गया तो उन्होंने चीनी की समस्या आचार्य जी के सामने रखी । आचार्य जी ने कहा नेहरू जी के पास चीनी है , ले लीजिये । मौलाना ने आशंका जतायी , पंडित नेहरू ग़ुस्सा होंगे ! आचार्य जी का विनोदी स्वभाव दार्शनिक मुद्रा में बोले - तलब और ग़ुस्से में ग़ुस्से को आसानी से मारा जा सकता है लेकिन तलब तो चित्त की एक प्रवृत्ति है उसे मारने के लिये , उसकी पूर्ति करनी ज़रूरी होता है , शैव दर्शन तो यही कहता है ।
- फिर आप सम्भाल लीजियेगा !
मौलाना ने गदोरी पर चीनी उलट लिये और बढ़े अपने बिस्तर की तरफ़ इतने में पंडित नेहरू वापस आते दिखे । मामला यही फँस गया । पंडित नेहरु लपके काफ़ी बनाने के लिये , लेकिन डिब्बे से चीनी ग़ायब । पंडित नेहरु अनुशासन को लेकर बहुत संजीदा रहे , चीनी न पाकर ग़ुस्सा हो गये - किसने लिया चीनी ? उधर मौलाना साहब ने हड़बड़ी में चीनी मुँह में डाल तो लिये लेकिन उसे चबायें कैसे ? चुनाचे चद्दर ओढ़ कर लंबे हो लिये । किसी ने मजाक किया - चीनी सौ गई , और मौलाना की और इशारा कर दिया । पंडित नेहरू ने मौलाना की चादर खींचा तो मौलाना उठ बैठे लेकिन मुँह में चीनी । आचार्य जी उठ कर मौलाना के पास गये और पंडित नेहरू को अपरिग्रह की दार्शनिक महत्ता की याद दिलाने लगे । पंडित नेहरु जोर से हंसे - फाँकिये मौलाना , आराम से फाँकिये , गलती आपकी नहीं है , मेरी भी नहीं कि देर से वापस आया , बदमासी उस चाँद की है जिसने हमे सम्मोहित कर रखा था ।
सागर सिंह ( बनारस के मशहूर वकील जो लंबे सामय तक आचार्य नरेंद्र देव की सोहबत में रहे ) आचार्य नरेंद्र देव से सुनी इस कथा को बताते हुए यह भी बताया कि उस रात आचार्य नरेंद्र देव और पंडित नेहरु के बीच हुई बतकही के केंद्र में चंद्रमाँ ही रहा ।
“ चन्द्रमा ब्रह्मांड में एक ग्रह है , साहित्य में सौन्दर्य है , ज्योतिष में गणन का एक आवश्यक इकाई है , आयुर्वेद में विकार और निर्विकार का साधक तत्व है । मानव मनोविज्ञान में मन का संचारी भाव । “
इसे ( चन्द्रमा को ) छुआ जा सकता है ? पृथ्वी से इसकी दूरी नापी जा सकती है ? “ डिस्कवरी आफ इण्डिया “ ( दुनिया की मशहूर किताबों में से एक ) में ये सवाल उठे हैं , अहमद नगर क़िले की जेल में 1080 दिन कटे , इन मनीषियों ने अपने अपने सवाल लेकर बाहर निकले थे , उनमें पंडित नेहरु के अनगिनत सवालों में से एक सवाल चन्द्रमा का भी था । आजादी के बाद भाभा और विक्रम सारा भाई जैसे भौतिकी के माहिर लोगों को पंडित नेहरु ने लगाया । 62 में संस्था बनी , 69 में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इसरो को उकसाया और हम चाँद को छू बैठे ।
लेकिन उस चाँद का क्या हुआ ? जो चाँदी की कटोरी लिये “ बचवा के मुहवा में घुटूक “ सुनाता खड़ा है । उस चाँद पर भी बात हुई होगी जो अहमद नगर क़िले की जेल के एक टुकड़े मुक्ताकास में उस रात निकला था जिसने उस क़ैदी को अपनी और आकर्षित किया था , जो सुराज के बाद भारत का पहला प्रधान मंत्री बना । क्या उसी दिन उसने यह फ़ैसला कर लिया था कि चाँद को छुआ जा स्कता है ? उस रात भारतीय वांगमय का प्रचंड विद्वान् आचार्य नरेंद्र देव ने मण्डन मिश्र और शंकराचार्य के बीच हुए शास्त्रार्थ का ज़िक्र किया होगा जिसने भारतीय मानस की सोच को पलट कर रख दिया ? द्वैत और अद्वैत के बीच का द्वन्द उठाया गया होगा ? ४२ दिन चले इस शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र और शंकराचार्य दोनों पराजित हुए थे , इस पराजय में चन्द्रमा भी था ? जवाब में वह कथा भी खुली होगी जिसमे मण्डन मिश्र की पत्नी भारती जो निर्णायक की भूमिका निभा रही थी , मण्डन मिश्र के पराजय का निर्णय सुनाते हुए , भारती ने शंकराचार्य को चुनौती दी थी - मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिणी हूँ , आपने मण्डन मिश्र को आधा ही पराजित किया है , अब आपको उनकी अर्धांगिनी से शास्त्रार्थ करना होगा । शंकराचार्य और भारती के बीच इक्कीस दिन शास्त्रार्थ चला था , भारती पराजय के मुहाने पर थी उसी समय भारती की सहेली चंचला ने भारती को उकसाया था - सखी ! यह सन्यासी है , गृहस्थ जीवन से कत्तई अनभिज्ञ , शंकराचार्य से गृहस्थ जीवन के अबसे उत्तम संस्कार , “काम कला “ संतानोपत्ति पर प्रश्न पूछिये । भारती ने यही प्रश्न पूछा था - क्या चन्द्रमा “ काम इच्छा “ को प्रभावित करता है ? संतानोपत्ति की क्रिया में चन्द्रमा उत्तेजक कारक बनता है ? शंकराचार्य ने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा था - देवी ! हम सन्यासी हैं , इस प्रश्न का उत्तर हम नहीं दे सकते , हम अपनी पराजय स्वीकार करते हैं । मैथिल बाला भारती हंसी थी - - तुम्हारे पराजय में ही तुम्हारी जीत है सन्यासी ! ले जाओ हमारे पति मण्डन मिश्र को अपना शिष्य बना कर ।
शंकराचार्य ने अपनी पराजय को फिर स्वीकारते हुए , भारती से समय माँगा - देवी ! तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने आऊँगा , तब तक मण्डन मिश्र तुम्हारे साथ ही रहेंगे ।
कथा आगे चलती है । किस तरह शंकराचार्य एक मृत राजा की देह में “ परकाया प्रवेश “ के सहारे दूसरे शरीर में रह कर , काम क्रिया की अनुभूति प्राप्त करते हैं और लौट कर भारती के प्रश्न का उत्तर देते हैं । अहमद नगर क़िले की जेल में यह कथा अनेकों रूपों में चली होगी ।
चन्द्रमा जेरे बहस हुआ होगा ? क्या जेल की बैरक में यह कथा सुनी गई होगी ? क्या “ इण्डिया विन्स फ़्रीडम “ का लेखक मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जो इस्लाम के प्रचंड विद्वान् भी थे , चीनी फाँकने के बाद , चाँद और इस्लाम के तवारीख़ी जुड़ाव को नये सिरे से सोचा होगा ? मुस्लिम लीग ने अपने झंडे पर चाँद रख कर देश के बँटवारे का प्रस्ताव रखा होगा ? क्या पंडित गोविंद बल्लभ पंत दायी तरफ़ मुड़ते हुए , “चन्द्रमा मनसो जातश्च , “ बुदबुदाते हुए कृष्ण कथा के रचैता वेदव्यास से पूछा होगा -
यह कृष्ण और कनुप्रिया माह है ।
दूनो आसमान में खेल रहे थे , बदरी औ बदरा , अचानक किस मधुवन में जा छिपे कि , परिदों तक को पता नही । घुग्घू गला फुला - फुला कर , तब से बेताब है - कहाँ हो , कहाँ हो !!
धूप की चंपई चादर यहीं रह गयी । गुलैची हँस रही है - ख़ैर , खून , खांसी , ख़ुशी , बैर , प्रीति , मद पान । रहिमन दाबे ना दबे , जाने सकल जहान ॥ चंपई रंग का चरित्र ही चुग़लई करना है - चिंता मत करो ! यहीं कहीं हैं किसी अलका पूरी में , बग़ैर बरसे नही जाँयगे । पंडित मातादीन मुह ऊपर उठा कर ताकते हैं - अकाल काल है , बरसा का कोई भी योग नही । लम्मरदार खैनी ठोंकते हैं -
- मातादीन ! बदरी फुआ कि नाम नाँय लेता? सरम लगती है , उढरि गई रहीं ? अपने ही बिरादरी में तो गई रही । तू दुबे ऊ उपधिया । घी अड़ान त खिचड़ी में गिरा ।
माता दीन तमतमा गए लेकिन का करते ।
पंडित बड़े लाल टुकड़ा जोड़ते हैं - हर काल में औरत का एक हिस्सा परहेज़ में डाला जायगा । उसका नाम भुलाया जायगा , लेकिन बोलना ही पड़ेगा । व्यास जैसा कथाकार राधा नाम से चिढ़ते हैं । राधा के कृष्ण प्यार से या राधा की उस उम्र से जो कृष्ण से बड़ी है ? पूरे भागवत में राधा का ज़िक्र नही करते , लेकिन एक जगह करना ही पड़ाता है ।
रात की चाँदनी में यमुना तट । बालू की ढीह पर रासलीला चल रही है , अचानक कृष्ण ओझल हो गये । कहाँ गये कृष्ण ? इस तलाश में बालू ढूह से उतरते पैरों के निशान देखे गये । बालू ने चुग़ली कर दिया - जाने वाले दो हैं एक तो कृष्ण है , पैरों के निशान से कमल का आकार बनता है , कमलाकर इधर से गया है , लेकिन दूसरा कौन है जिसकी केवल एड़ियों के निशान है ? यानी दूसरा अपना पूरा भार कृष्ण पर डाल रखा है । व्यास इस वर्णन में संयम खो देते हैं , मुह से राधे का ज़िक्र आ ही जाता है । पकड़े जाते हैं दोनो । राधा ने पूछा था बालू से क्यों किया चुग़ली ? श्राप देती हूँ , तुम दो कण, मिल कर एक नही हो पाओगे ! बालू ने तथास्तु कह कर कृष्ण को याद दिलाया - देवकी नंदन ! तुम भूल गये ? जब तुम्हारे पैदा होते ही , तुम्हारे पिता बासुदेव तुम्हें सियाह रात में उठाए नंद बाबा के घर गोकुल की ओर जा रहे थे , हमने कहा था - बासुदेव ! जो तुम्हारे गोद में है यह अवतार है , अत्याचारी का नाश कर शांति स्थापित करने आ रहा है जमुना ने चालाकी किया , उफान मार कर देवकी नंदन के पैर छू लिए , लेकिन हम तो बेवस थे , मन ही मन कहा था जाओ यसोदा की गोद में , आओगे कभी जमुना किनारे , आज पकड़ लिया लिया न ! जमुना साक्षी है व्यास अवचेतन , बे मन से ही सही , राधा का नाम लेना पड़ा । यह मिथक कथा है ।
व्यास काल में भी कई राधे है , कर्ण को पालनेवाली सूत माँ भी राधे है । लेकिन जमुना तट पर किस राधे का ज़िक्र है सब जानते हैं ।
पंडित नेहरु जीते जी मिथक बन गये थे । जन जन में
- वो कौन सा चाँद है जिसने यमुना किनारे चल रहे रास लीला से कृष्ण के राधा के साथ निकल जाने की चुग़ली की है ?
विज्ञान के बहाने साहित्य के सौन्दर्य को नहीं मिटाया जा सकता । इन तीनो सवालों का हल -
“ सितुही का चाँद “ बता रहा है
Chanchal Bhu

Address

Jaunpur
222125

Telephone

05453243153

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Samtaghar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share