19/10/2024
पंडित नेहरू का चाँद
चंचल
आज भारत चाँद पर चहलकदमी कर रहा है , कभी उत्सुकता हुई यह जानने के लिए यह किसके दिमाग़ की उपज है ? इसी सवाल का उत्तर है यह लेख । जानना चाहिए , विशेष कर नयी पीढ़ी को ।
( यह लेख अमर उजाला में छप चुका है , लेख थोड़ा लंबा है लेकिन बहुत दिलचस्प है । )
जब सितुही में चाँद उतरता था
चंचल
चन्दा मामा आरे आव
बारे आव
नादिया किनारे आव
बेटवा के मुहाँ में घुड़ूक ।
गोद में लेटा चुलबुला लड़िका , दादी के गोद में , मुँह बाये , चंदा मामा के संगीत में मगन रहा , घुड़ूक के साथ सितुही भर दूध उसके मुँह में चला गया ।
“ घुड़क “ के साथ गीत में आये व्यवधान पर प्रतिवाद दर्ज कराने ले लिये लड़िका साँस अंदर खींचता , इसी खींच तान में दूध पेट में चला जाता । एक जमाने तक गाँव के बच्चों को इसी तरह दूध पिलाया जाता रहा है । संगीत और चंदा का यह रिश्ता जीवन से उठ कर लोक में गया , लोक से साहित्य सहित तमाम विधाओं में स्थापित हो गया । इंसानी सभ्यता में जब विकास को गति देने के लिये विज्ञान का हाथ थामना पड़ा तो विज्ञान की तमाम शाखाओं ने पृथ्वी से इतर अन्य ग्रहों की सतह पर होने हरकतों की खोज शुरू कर दी । भारत भी इस दौड़ में शामिल हो गया और सफलता भी हासिल कर ली । चन्द्रयान तीन का सफलता पूर्वक चाँद पर उतरना इसी खोज का एक पड़ाव है । भारत में इस यात्रा की कहानी बहुत दिलचस्प है -
“ 1942 , 9 अगस्त बंबई में कांग्रेस सम्मेलन आयोजित था । कांग्रेस समाजवादी यूसुफ़ मेहर अली बंबई के मेयर थे उन्हें कांग्रेस सम्मेलन का स्वागत करना था । सम्मेलन की पूर्व संध्या पर गाँधी ने लोगों से पूछा था , अंग्रेजों को भारत से जाने का एक नारा बताओ । कई लोगों ने सुझाव दिये लेकिन गाँधी जी को नहीं पसंद आया । यूसुफ़ मेहर अली ने सुझाया “ अंग्रेजों भारत छोड़ो “ और अंग्रेज़ी में “ क्विट इण्डिया “ । दिलचस्प बात ये है कि इसी नाम से मेहर अली साहब ने एक दिन पहले ही एक पुस्तिका पहले ही छपवा ली थी जिसे सम्मेलन में आये प्रतिनिधियों के बीच बाँटा जाना था । “ क्विट इण्डिया “ का एक प्रतीक चिह्न भी बनाया जा चुका था । बापू को दोनों पसंद आ गया और उन्होंने आमीन कह कर , अपनी सहमति ही नहीं दी , अपने भाषण के केंद्र में इसे रख लिया । उस रात गाँधी जी का ऐतिहासिक भाषण “ अंग्रेजों भारत छोड़ो “ के साथ आम जान से अपील की गई - “करो या मरो “
यह इतिहास है सब को मालूम है ।
असहयोग के इस आंदोलन को बार बार जेल के पड़ाव से गुजरना पड़ा है । लंबी जेल में दिन और रात भी परिस्तिथि गढ़ते रहे हैं , इतिहास इस हिस्से को छूने से परहेज़ करता आ रहा है । इस इतिहास के समानांतर जो कुछ अंदरूनी खाँचे में चला है बह इतिहास बोध है । जेल में लिखी गई कहानियाँ , कवितायें , दर्शन या व्याख्या इसी इतिहास बोध में आते हैं । क़ैदखाने के अपने आकाश में भी चाँद आया है । जेल ने बहुत कुछ दिया है , आज हम उन पर नाज करते हैं , एक से बढ़ कर एक किताबें आयी , वाक़यात दर्ज हुए , यातना के क़िस्से निकले , ये सब हमारी धरोहर है । चाँद भी यहीं से निकला जिस पर आज हम पहुँचे हैं । चाँद पर घूमता भारत का चन्द्रयान अपने होने का निशान छोड़ता जा रहा है , भारत का प्रतीक चिह्न अशोक स्तंभ और सत्यमेव जयते ।
अहमद नगर क़िले की जेल में जो क़ैद हैं , वे केवल कांग्रेसी या समाजवादी , सुराजी क़ैदी भर नहीं हैं सुराज की जंग के साथ विचारों की एक समानांतर धारा भी बही है । यहाँ जवाहर लाल नेहरु , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद , आचार्य नरेंद्र देव , बल्लभ भाई पटेल , गोविंद बल्लभ पंत वग़ैरह एक साथ क़ैद हैं । सब की एक अलग की पहचान है । जेल की ज़िंदगी बड़ी कमाल की होती है । चाँद कहाँ से आया वह वाक़या सुनिये
पंडित नेहरु की आदत थी , रात खाना खाने के बाद बैरक के सामने मैदान में घूमते थे , लौट कर काफ़ी बनाते थे , अपने अजीज आचार्य नरेंद्र देव के साथ देर रात तक बतियाते थे । मौलाना अबुल कलाम की आदत थी , खाना खाने के बाद , वे चीनी फाँकते थे और सो जाते थे । अमूमन इस चीनी का बंदोबस्त मौलाना जी दिन में कर लिया करते थे , जिस दिन भूल जाते , वे आचार्य नरेंद्र देव और पंडित नेहरु के वार्तालाप की सघनता का फ़ायदा उठाते और आहिस्ता से पंडित नेहरू की बची हुई चीनी मार दिया करते । एक रात घपला हो गया । उस रात जब चाँद खुल कर खिला था , पंडित नेहरु देर तक घूमते रह गये । यह चाँद की दिलकशी थी जिसने पंडित नेहरू को बैरक में जाने , काफ़ी बनाने और अपने दोस्त से बतियाने को लंबे समय तक रोके रखा । बैरक में चाँद तो था नहीं , दिलकशी रही भी होगी तो अलग अलग की रही होगी , लेकिन मौलाना अबुल कलाम की दिलकशी चीनी पर टिकी हुई थी । पंडित नेहरु की वापसी का इंतज़ार दो लोग कर रहे थे , एक आचार्य जी , दूसरे मौलाना जी । गो कि दोनों की बेसब्री अलग अलग रही । मौलाना से नहीं रहा गया तो उन्होंने चीनी की समस्या आचार्य जी के सामने रखी । आचार्य जी ने कहा नेहरू जी के पास चीनी है , ले लीजिये । मौलाना ने आशंका जतायी , पंडित नेहरू ग़ुस्सा होंगे ! आचार्य जी का विनोदी स्वभाव दार्शनिक मुद्रा में बोले - तलब और ग़ुस्से में ग़ुस्से को आसानी से मारा जा सकता है लेकिन तलब तो चित्त की एक प्रवृत्ति है उसे मारने के लिये , उसकी पूर्ति करनी ज़रूरी होता है , शैव दर्शन तो यही कहता है ।
- फिर आप सम्भाल लीजियेगा !
मौलाना ने गदोरी पर चीनी उलट लिये और बढ़े अपने बिस्तर की तरफ़ इतने में पंडित नेहरू वापस आते दिखे । मामला यही फँस गया । पंडित नेहरु लपके काफ़ी बनाने के लिये , लेकिन डिब्बे से चीनी ग़ायब । पंडित नेहरु अनुशासन को लेकर बहुत संजीदा रहे , चीनी न पाकर ग़ुस्सा हो गये - किसने लिया चीनी ? उधर मौलाना साहब ने हड़बड़ी में चीनी मुँह में डाल तो लिये लेकिन उसे चबायें कैसे ? चुनाचे चद्दर ओढ़ कर लंबे हो लिये । किसी ने मजाक किया - चीनी सौ गई , और मौलाना की और इशारा कर दिया । पंडित नेहरू ने मौलाना की चादर खींचा तो मौलाना उठ बैठे लेकिन मुँह में चीनी । आचार्य जी उठ कर मौलाना के पास गये और पंडित नेहरू को अपरिग्रह की दार्शनिक महत्ता की याद दिलाने लगे । पंडित नेहरु जोर से हंसे - फाँकिये मौलाना , आराम से फाँकिये , गलती आपकी नहीं है , मेरी भी नहीं कि देर से वापस आया , बदमासी उस चाँद की है जिसने हमे सम्मोहित कर रखा था ।
सागर सिंह ( बनारस के मशहूर वकील जो लंबे सामय तक आचार्य नरेंद्र देव की सोहबत में रहे ) आचार्य नरेंद्र देव से सुनी इस कथा को बताते हुए यह भी बताया कि उस रात आचार्य नरेंद्र देव और पंडित नेहरु के बीच हुई बतकही के केंद्र में चंद्रमाँ ही रहा ।
“ चन्द्रमा ब्रह्मांड में एक ग्रह है , साहित्य में सौन्दर्य है , ज्योतिष में गणन का एक आवश्यक इकाई है , आयुर्वेद में विकार और निर्विकार का साधक तत्व है । मानव मनोविज्ञान में मन का संचारी भाव । “
इसे ( चन्द्रमा को ) छुआ जा सकता है ? पृथ्वी से इसकी दूरी नापी जा सकती है ? “ डिस्कवरी आफ इण्डिया “ ( दुनिया की मशहूर किताबों में से एक ) में ये सवाल उठे हैं , अहमद नगर क़िले की जेल में 1080 दिन कटे , इन मनीषियों ने अपने अपने सवाल लेकर बाहर निकले थे , उनमें पंडित नेहरु के अनगिनत सवालों में से एक सवाल चन्द्रमा का भी था । आजादी के बाद भाभा और विक्रम सारा भाई जैसे भौतिकी के माहिर लोगों को पंडित नेहरु ने लगाया । 62 में संस्था बनी , 69 में श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इसरो को उकसाया और हम चाँद को छू बैठे ।
लेकिन उस चाँद का क्या हुआ ? जो चाँदी की कटोरी लिये “ बचवा के मुहवा में घुटूक “ सुनाता खड़ा है । उस चाँद पर भी बात हुई होगी जो अहमद नगर क़िले की जेल के एक टुकड़े मुक्ताकास में उस रात निकला था जिसने उस क़ैदी को अपनी और आकर्षित किया था , जो सुराज के बाद भारत का पहला प्रधान मंत्री बना । क्या उसी दिन उसने यह फ़ैसला कर लिया था कि चाँद को छुआ जा स्कता है ? उस रात भारतीय वांगमय का प्रचंड विद्वान् आचार्य नरेंद्र देव ने मण्डन मिश्र और शंकराचार्य के बीच हुए शास्त्रार्थ का ज़िक्र किया होगा जिसने भारतीय मानस की सोच को पलट कर रख दिया ? द्वैत और अद्वैत के बीच का द्वन्द उठाया गया होगा ? ४२ दिन चले इस शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र और शंकराचार्य दोनों पराजित हुए थे , इस पराजय में चन्द्रमा भी था ? जवाब में वह कथा भी खुली होगी जिसमे मण्डन मिश्र की पत्नी भारती जो निर्णायक की भूमिका निभा रही थी , मण्डन मिश्र के पराजय का निर्णय सुनाते हुए , भारती ने शंकराचार्य को चुनौती दी थी - मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिणी हूँ , आपने मण्डन मिश्र को आधा ही पराजित किया है , अब आपको उनकी अर्धांगिनी से शास्त्रार्थ करना होगा । शंकराचार्य और भारती के बीच इक्कीस दिन शास्त्रार्थ चला था , भारती पराजय के मुहाने पर थी उसी समय भारती की सहेली चंचला ने भारती को उकसाया था - सखी ! यह सन्यासी है , गृहस्थ जीवन से कत्तई अनभिज्ञ , शंकराचार्य से गृहस्थ जीवन के अबसे उत्तम संस्कार , “काम कला “ संतानोपत्ति पर प्रश्न पूछिये । भारती ने यही प्रश्न पूछा था - क्या चन्द्रमा “ काम इच्छा “ को प्रभावित करता है ? संतानोपत्ति की क्रिया में चन्द्रमा उत्तेजक कारक बनता है ? शंकराचार्य ने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा था - देवी ! हम सन्यासी हैं , इस प्रश्न का उत्तर हम नहीं दे सकते , हम अपनी पराजय स्वीकार करते हैं । मैथिल बाला भारती हंसी थी - - तुम्हारे पराजय में ही तुम्हारी जीत है सन्यासी ! ले जाओ हमारे पति मण्डन मिश्र को अपना शिष्य बना कर ।
शंकराचार्य ने अपनी पराजय को फिर स्वीकारते हुए , भारती से समय माँगा - देवी ! तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने आऊँगा , तब तक मण्डन मिश्र तुम्हारे साथ ही रहेंगे ।
कथा आगे चलती है । किस तरह शंकराचार्य एक मृत राजा की देह में “ परकाया प्रवेश “ के सहारे दूसरे शरीर में रह कर , काम क्रिया की अनुभूति प्राप्त करते हैं और लौट कर भारती के प्रश्न का उत्तर देते हैं । अहमद नगर क़िले की जेल में यह कथा अनेकों रूपों में चली होगी ।
चन्द्रमा जेरे बहस हुआ होगा ? क्या जेल की बैरक में यह कथा सुनी गई होगी ? क्या “ इण्डिया विन्स फ़्रीडम “ का लेखक मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जो इस्लाम के प्रचंड विद्वान् भी थे , चीनी फाँकने के बाद , चाँद और इस्लाम के तवारीख़ी जुड़ाव को नये सिरे से सोचा होगा ? मुस्लिम लीग ने अपने झंडे पर चाँद रख कर देश के बँटवारे का प्रस्ताव रखा होगा ? क्या पंडित गोविंद बल्लभ पंत दायी तरफ़ मुड़ते हुए , “चन्द्रमा मनसो जातश्च , “ बुदबुदाते हुए कृष्ण कथा के रचैता वेदव्यास से पूछा होगा -
यह कृष्ण और कनुप्रिया माह है ।
दूनो आसमान में खेल रहे थे , बदरी औ बदरा , अचानक किस मधुवन में जा छिपे कि , परिदों तक को पता नही । घुग्घू गला फुला - फुला कर , तब से बेताब है - कहाँ हो , कहाँ हो !!
धूप की चंपई चादर यहीं रह गयी । गुलैची हँस रही है - ख़ैर , खून , खांसी , ख़ुशी , बैर , प्रीति , मद पान । रहिमन दाबे ना दबे , जाने सकल जहान ॥ चंपई रंग का चरित्र ही चुग़लई करना है - चिंता मत करो ! यहीं कहीं हैं किसी अलका पूरी में , बग़ैर बरसे नही जाँयगे । पंडित मातादीन मुह ऊपर उठा कर ताकते हैं - अकाल काल है , बरसा का कोई भी योग नही । लम्मरदार खैनी ठोंकते हैं -
- मातादीन ! बदरी फुआ कि नाम नाँय लेता? सरम लगती है , उढरि गई रहीं ? अपने ही बिरादरी में तो गई रही । तू दुबे ऊ उपधिया । घी अड़ान त खिचड़ी में गिरा ।
माता दीन तमतमा गए लेकिन का करते ।
पंडित बड़े लाल टुकड़ा जोड़ते हैं - हर काल में औरत का एक हिस्सा परहेज़ में डाला जायगा । उसका नाम भुलाया जायगा , लेकिन बोलना ही पड़ेगा । व्यास जैसा कथाकार राधा नाम से चिढ़ते हैं । राधा के कृष्ण प्यार से या राधा की उस उम्र से जो कृष्ण से बड़ी है ? पूरे भागवत में राधा का ज़िक्र नही करते , लेकिन एक जगह करना ही पड़ाता है ।
रात की चाँदनी में यमुना तट । बालू की ढीह पर रासलीला चल रही है , अचानक कृष्ण ओझल हो गये । कहाँ गये कृष्ण ? इस तलाश में बालू ढूह से उतरते पैरों के निशान देखे गये । बालू ने चुग़ली कर दिया - जाने वाले दो हैं एक तो कृष्ण है , पैरों के निशान से कमल का आकार बनता है , कमलाकर इधर से गया है , लेकिन दूसरा कौन है जिसकी केवल एड़ियों के निशान है ? यानी दूसरा अपना पूरा भार कृष्ण पर डाल रखा है । व्यास इस वर्णन में संयम खो देते हैं , मुह से राधे का ज़िक्र आ ही जाता है । पकड़े जाते हैं दोनो । राधा ने पूछा था बालू से क्यों किया चुग़ली ? श्राप देती हूँ , तुम दो कण, मिल कर एक नही हो पाओगे ! बालू ने तथास्तु कह कर कृष्ण को याद दिलाया - देवकी नंदन ! तुम भूल गये ? जब तुम्हारे पैदा होते ही , तुम्हारे पिता बासुदेव तुम्हें सियाह रात में उठाए नंद बाबा के घर गोकुल की ओर जा रहे थे , हमने कहा था - बासुदेव ! जो तुम्हारे गोद में है यह अवतार है , अत्याचारी का नाश कर शांति स्थापित करने आ रहा है जमुना ने चालाकी किया , उफान मार कर देवकी नंदन के पैर छू लिए , लेकिन हम तो बेवस थे , मन ही मन कहा था जाओ यसोदा की गोद में , आओगे कभी जमुना किनारे , आज पकड़ लिया लिया न ! जमुना साक्षी है व्यास अवचेतन , बे मन से ही सही , राधा का नाम लेना पड़ा । यह मिथक कथा है ।
व्यास काल में भी कई राधे है , कर्ण को पालनेवाली सूत माँ भी राधे है । लेकिन जमुना तट पर किस राधे का ज़िक्र है सब जानते हैं ।
पंडित नेहरु जीते जी मिथक बन गये थे । जन जन में
- वो कौन सा चाँद है जिसने यमुना किनारे चल रहे रास लीला से कृष्ण के राधा के साथ निकल जाने की चुग़ली की है ?
विज्ञान के बहाने साहित्य के सौन्दर्य को नहीं मिटाया जा सकता । इन तीनो सवालों का हल -
“ सितुही का चाँद “ बता रहा है
Chanchal Bhu