15/01/2026
परमात्मा निराकार, नित्य शुद्ध, सर्वव्यापक और सर्वद्रष्टा शुद्ध चेतना है। वह शरीर, विकार और कर्म-बंधन से परे रहते हुए भी समस्त सृष्टि में व्याप्त है। जब साधक इस सत्य को हृदय में धारण कर लेता है, तब उसका कर्म आसक्ति-रहित होकर पूजा बन जाता है और जीवन यज्ञ का स्वरूप धारण कर लेता है।
ईशावास्य उपनिषद् का यह मंत्र— “स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्…”—परमात्मा के निराकार, शुद्ध और सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यंत गहन वर्णन करता है। इसमें कहा गया है कि परमात्मा सबको व्याप्त करके स्थित है और दिव्य प्रकाश-स्वरूप है। वह अकाय है, अर्थात् शरीररहित है; इसलिए उसमें न घाव हैं, न नसें, न किसी प्रकार के विकार। वह नित्य शुद्ध है और पाप कर्म उसे स्पर्श नहीं कर सकते। वह सर्वद्रष्टा है, मनों के भीतर के भावों को जानने वाला है, सबको घेरे हुए है और फिर भी किसी से बँधा नहीं। वह स्वयंभू है—अपनी ही शक्ति से स्थित—और अनादि काल से उसने सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ को यथायोग्य व्यवस्था में रचा है। यही भाव भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के वचनों में प्रतिध्वनित होता है— “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्” (4.6), अर्थात् अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी वही समस्त प्राणियों का ईश्वर है, तथा “न मां कर्माणि लिम्पन्ति” (4.14) यह स्पष्ट करता है कि कर्मों में स्थित होकर भी वह उनसे लिप्त नहीं होता—यही अपापविद्धम् का तात्पर्य है। उपनिषद् का “अस्नाविरं” यह संकेत करता है कि ईश्वर स्थूल देह और जैविक संरचना से परे है; कठोपनिषद् भी कहता है कि उसी के प्रकाश से सूर्य, चंद्र और समस्त जगत प्रकाशित होता है। यही सत्य सूफ़ी संत अपने शब्दों में व्यक्त करते हैं—हज़रत अली का कथन कि उन्होंने हर वस्तु में खुदा को पहले, साथ और बाद में देखा, और बुल्ले शाह का यह भाव कि जो दिल के भीतर झाँक ले, वह खुदा से अलग नहीं रह सकता। मंत्र में आया “कविर्मनीषी” यह बताता है कि परमात्मा केवल सृष्टिकर्ता ही नहीं, परम ज्ञानस्वरूप भी है; वह हर देह में स्थित साक्षी है, जैसा कि गीता कहती है— “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत” (13.3)। सूफ़ी परंपरा भी इसी सत्य को दोहराती है कि खुदा दूर नहीं, वह रग-ए-जान से भी अधिक निकट है। इस प्रकार यह मंत्र हमें यह बोध कराता है कि परमात्मा न बाहर खोजने की वस्तु है, न किसी रूप में बाँधने योग्य; वह शुद्ध चेतना है—सर्वव्यापक, सर्वद्रष्टा और स्वयं में पूर्ण—और इसी दृष्टि से जीना ही मुक्ति का मार्ग है।