20/07/2025
अगर भीतर से पुकार उठी है मिलने की, अगर आत्मा की प्यास अब और बर्दाश्त नहीं होती, तो फिर हर सांस को इश्क़ की आग में झोंक देना होगा। यह कोई साधारण मिलन नहीं, यह वह मिलने की राह है, जहाँ खुद को मिटाकर, खुदा में खुद को पाना होता है।
"इश्क़ वो आतिश है ‘ग़ालिब’ जो लगाए न लगे, और बुझाए न बुझे।”
यह इश्क़, आत्मा की वह अग्नि है, जो सुलगती रहे तो रूह रोशन होती है, और बुझ जाए तो जीवन खोखला।
"जब तक तू खुद को देखता रहेगा, तू उसे नहीं देख पाएगा।"
यही अहं (नफ़्स) है जो परदे की तरह हमारे और सत्य के बीच खड़ा है। अगर सच्चे मिलने का शौक है, तो सबसे पहले खुद की हस्ती को मिटाना होगा, वही "जलाकर खुद नुमाई को..." वाली बात। खुद को ख़ुदा के आगे भस्म कर देना ही सच्ची इबादत है।
"मस्जिद मंदिर बहुत देखे, खुदा कहीं नहीं मिला;
जब दिल को टटोला, वहीँ बैठा मिला।"
सूफ़ी पथ में बाहरी प्रतीकों का सम्मान है, पर अंतिम सत्य भीतर की अनुभूति में है। किताबें, तस्बी, इबादतगाहें, ये सब केवल दरवाज़े हैं। भीतर का प्रेम, भीतर की तड़प, और भीतर की सच्चाई ही उस दरवाज़े को खोलती है।
"पीने दो इश्क़ की मय, नशा भी यही, होश भी यही।”
यह ‘शराब-ए-शौक’ कोई सांसारिक मादकता नहीं, बल्कि वह दिव्य रस है जिसमें पीने वाला खुद को भुला देता है, और खुदा को पा लेता है। जब यह प्रेम भीतर उतरता है, तो साधक न तो भूखा रहता है, न रोज़ा रखता है, न व्रत, वह हर समय उस दिव्यता में डूबा रहता है।
"ना कोई मुसलमान, ना कोई हिन्दू, हम सब इश्क़ के बन्दे हैं।"
सच्चा इश्क़ किसी दीवार को नहीं मानता। यहाँ ब्राह्मण या मुल्ला की पहचान नहीं चलती, यहाँ सिर्फ़ "मैं और तू" मिट जाते हैं, और जो बचता है, वही खुदा है। प्रेम ही एकमात्र मज़हब बन जाता है।
"जब मैं मिट गया, तभी तो वो मिला।"
‘अनल हक़’ का अर्थ है – मैं ही सत्य हूँ। यह कोई घमंड नहीं, बल्कि आत्मा की उस अवस्था की घोषणा है जब उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रहता। यह तभी होता है जब seeker, खुद को पूरी तरह प्रेम में भुला देता है।
अगर वाकई शौक है मिलने का, तो तड़प को जीवन बना लो, हर सांस को इश्क़ बना दो, और हर क्षण को समर्पण।
"तू दरिया बन जा इश्क़ का, खुद-ब-खुद खुदा समंदर लगेगा।"
लौ लगती रहे, दिल जलता रहे, और seeker उसी राख से फिर फिर उठकर पुकारता रहे, अगर है शौक मिलने का, तो हरदम लौ लगाता जा।