Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust

Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust This trust is a Seva project of GuruMaharaj ji, to implement the teaching of GuruMaharaj in world.

परमात्मा निराकार, नित्य शुद्ध, सर्वव्यापक और सर्वद्रष्टा शुद्ध चेतना है। वह शरीर, विकार और कर्म-बंधन से परे रहते हुए भी ...
15/01/2026

परमात्मा निराकार, नित्य शुद्ध, सर्वव्यापक और सर्वद्रष्टा शुद्ध चेतना है। वह शरीर, विकार और कर्म-बंधन से परे रहते हुए भी समस्त सृष्टि में व्याप्त है। जब साधक इस सत्य को हृदय में धारण कर लेता है, तब उसका कर्म आसक्ति-रहित होकर पूजा बन जाता है और जीवन यज्ञ का स्वरूप धारण कर लेता है।

ईशावास्य उपनिषद् का यह मंत्र— “स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्…”—परमात्मा के निराकार, शुद्ध और सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यंत गहन वर्णन करता है। इसमें कहा गया है कि परमात्मा सबको व्याप्त करके स्थित है और दिव्य प्रकाश-स्वरूप है। वह अकाय है, अर्थात् शरीररहित है; इसलिए उसमें न घाव हैं, न नसें, न किसी प्रकार के विकार। वह नित्य शुद्ध है और पाप कर्म उसे स्पर्श नहीं कर सकते। वह सर्वद्रष्टा है, मनों के भीतर के भावों को जानने वाला है, सबको घेरे हुए है और फिर भी किसी से बँधा नहीं। वह स्वयंभू है—अपनी ही शक्ति से स्थित—और अनादि काल से उसने सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ को यथायोग्य व्यवस्था में रचा है। यही भाव भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के वचनों में प्रतिध्वनित होता है— “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्” (4.6), अर्थात् अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी वही समस्त प्राणियों का ईश्वर है, तथा “न मां कर्माणि लिम्पन्ति” (4.14) यह स्पष्ट करता है कि कर्मों में स्थित होकर भी वह उनसे लिप्त नहीं होता—यही अपापविद्धम् का तात्पर्य है। उपनिषद् का “अस्नाविरं” यह संकेत करता है कि ईश्वर स्थूल देह और जैविक संरचना से परे है; कठोपनिषद् भी कहता है कि उसी के प्रकाश से सूर्य, चंद्र और समस्त जगत प्रकाशित होता है। यही सत्य सूफ़ी संत अपने शब्दों में व्यक्त करते हैं—हज़रत अली का कथन कि उन्होंने हर वस्तु में खुदा को पहले, साथ और बाद में देखा, और बुल्ले शाह का यह भाव कि जो दिल के भीतर झाँक ले, वह खुदा से अलग नहीं रह सकता। मंत्र में आया “कविर्मनीषी” यह बताता है कि परमात्मा केवल सृष्टिकर्ता ही नहीं, परम ज्ञानस्वरूप भी है; वह हर देह में स्थित साक्षी है, जैसा कि गीता कहती है— “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत” (13.3)। सूफ़ी परंपरा भी इसी सत्य को दोहराती है कि खुदा दूर नहीं, वह रग-ए-जान से भी अधिक निकट है। इस प्रकार यह मंत्र हमें यह बोध कराता है कि परमात्मा न बाहर खोजने की वस्तु है, न किसी रूप में बाँधने योग्य; वह शुद्ध चेतना है—सर्वव्यापक, सर्वद्रष्टा और स्वयं में पूर्ण—और इसी दृष्टि से जीना ही मुक्ति का मार्ग है।

साधना को छिपाकर करने का रहस्य( परम पूज्य रहस बिहारीलाल जी का संवार) साधक :महाराज जी! आपने कहा कि विभीषण की तरह अपने को छ...
08/01/2026

साधना को छिपाकर करने का रहस्य( परम पूज्य रहस बिहारीलाल जी का संवार)

साधक :
महाराज जी! आपने कहा कि विभीषण की तरह अपने को छिपाकर साधना करनी चाहिए।
पर राम के नाम में भला छिपाने जैसा क्या है?

गुरु :
सुनो। भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है।
जहाँ साधना का प्रदर्शन शुरू होता है, वहीं अहंकार धीरे-धीरे प्रवेश कर जाता है।
इसी कारण सच्चे संत अपने को छिपाकर रखते हैं और अपनी साधना को प्रकट नहीं करते।

साधक :
तो क्या यही कारण है कि कई महापुरुष प्रचार से दूर रहते हैं?

गुरु :
हाँ। तुम अपने दादा गुरु महात्मा रामचन्द्र की परंपरा जानते ही हो।
हमारे यहाँ भण्डारों में जो लोग दरी-बिछावन पर नीचे बैठे रहते हैं, उन्हें लोग साधारण समझ लेते हैं।
पर वास्तव में वे भीतर से ऊँचे संत होते हैं।
बिना गुरु-आज्ञा के वे प्रचार के क्षेत्र में नहीं उतरते, क्योंकि प्रचार से अहंकार जाग सकता है।

साधक :
इसी कारण आप हृदय में प्रकाश का ध्यान बताते हैं?

गुरु :
बिलकुल।
हृदय में प्रकाश का ध्यान इसलिए बताया जाता है कि साधना भीतर ही भीतर गहरी होती जाए और अहंकार को सिर उठाने का अवसर न मिले।
जहाँ भीतर का प्रकाश बढ़ता है, वहाँ “मैं” अपने आप घटने लगता है।

साधक :
क्या छिपी हुई साधना का कोई उदाहरण है?

गुरु :
एक कथा सुनो।
एक दम्पत्ति था। पति कभी राम का नाम ज़ुबान पर नहीं लाता था। उसकी पत्नी बड़ी धार्मिक और भक्त थी।
वह चाहती थी कि उसका पति भी ईश्वर-भक्त बने। उसने कई बार समझाया, पर पति चुप ही रहता।

साधक :
फिर क्या हुआ?

गुरु :
एक रात पति नींद में बड़बड़ा रहा था। अनायास उसके मुख से “राम” शब्द निकल गया।
पत्नी जाग रही थी। राम नाम सुनते ही वह अत्यन्त प्रसन्न हो गई। उसने पति को जगाया नहीं।
सुबह उठकर उसने विशेष पूजा की, पड़ोस में प्रसाद बाँटा और बहुत आनंदित दिखाई देने लगी।

साधक :
पति ने इसका कारण पूछा?

गुरु :
हाँ। पति ने पूछा—
“आज तुम इतनी खुश क्यों हो?”
पत्नी ने कहा—
“आज मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं। कल रात आपके मुख से राम नाम सुनकर मैं अपने को धन्य समझ रही हूँ।”

साधक :
इस पर पति ने क्या कहा?

गुरु :
यह सुनते ही पति जैसे जड़ हो गया।
चिन्तित होकर बोला—
“क्या! मेरे मुख से राम नाम निकल गया? यह तो बहुत बुरा हुआ।
जिस राम को मैं जीवन भर अपने भीतर छिपाकर रखे था, वह सोते समय बाहर आ गया।
अब जब मेरे भीतर से राम ही निकल गया, तो फिर बचा ही क्या?”

साधक :
इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है?

गुरु :
यही कि सच्ची साधना और भक्ति प्रदर्शन से नहीं, गुप्तता से बलवान होती है।
जो भीतर सुरक्षित रहता है, वही अमूल्य होता है।
नाम को बाहर दिखाने से नहीं, भीतर छिपाकर रखने से उसकी शक्ति बढ़ती है।

आनन्द का स्रोत बाह्य जगत में नहीं, बल्कि अपने ही भीतर है। परम पूज्य वीतराग सन्त रहस बिहारी लाल जी कहते है —कि आनन्द का उ...
06/01/2026

आनन्द का स्रोत बाह्य जगत में नहीं, बल्कि अपने ही भीतर है।

परम पूज्य वीतराग सन्त रहस बिहारी लाल जी कहते है —कि आनन्द का उद्गम स्थान स्वयं आत्मा है—मानव जीवन के गूढ़ सत्य को उद्घाटित करता है। आत्मा स्वभाव से ही शुद्ध, बुद्ध और आनन्दमय है, परन्तु मल (अविद्या), विक्षेप (चंचलता) और आवरण (अहंकार व वासनाएँ) के कारण उसका स्वच्छ प्रकाश हमारे अन्तःकरण और इन्द्रियों तक नहीं पहुँच पाता। इसी कारण मनुष्य बाहरी विषयों में सुख खोजता फिरता है और क्षणिक आनन्द को ही स्थायी मान बैठता है। उपनिषद स्पष्ट कहते हैं—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तैत्तिरीय उपनिषद), अर्थात ब्रह्म ही आनन्द है; जो ब्रह्म को जान लेता है, वही सच्चे आनन्द को प्राप्त होता है।

जब तक मन की मलिनता और चंचलता बनी रहती है, तब तक आत्मानन्द का अनुभव नहीं हो सकता। संतवाणी इसी ओर संकेत करती है—कबीर साहब कहते हैं, “मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेऊँ सहज स्वरूप।” सूफ़ी फकीर भी यही रहस्य समझाते हैं; रूमी फरमाते हैं, “तू बाहर जिसे ढूँढ रहा है, वह तेरे भीतर ही छिपा है।” अर्थात जिस आनन्द और प्रेम की तलाश हम संसार में करते हैं, वह हमारे अपने हृदय में विराजमान है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति” (18.61), यानी ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित है। जब ईश्वर भीतर है, तो आनन्द भी भीतर ही होगा।

अतः साधना का वास्तविक अर्थ बाहर कुछ पाने की चेष्टा नहीं, बल्कि भीतर जमी हुई परतों को हटाना है। जैसे बादल हटते ही सूर्य का प्रकाश स्वयं प्रकट हो जाता है, वैसे ही मल, विक्षेप और आवरण दूर होते ही आत्मा का आनन्द स्वतः प्रकाशित हो उठता है। गीता इसी आत्मस्थित अवस्था को कर्मयोग और ज्ञानयोग का लक्ष्य बताती है—“सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्” (6.21), अर्थात वह परम सुख इन्द्रियों से परे है और बुद्धि द्वारा अनुभूत होता है। संतों और सूफ़ियों का यही एक स्वर है कि शांति, प्रेम और आनन्द बाहर नहीं, भीतर लौटने से मिलते हैं। जब मन निर्मल हो जाता है, तब आत्मा का स्वाभाविक आनन्द हमारे जीवन में सहज रूप से बहने लगता है—और वही सच्ची मुक्ति है।

ॐ शांति शांति शांति

Address

Jaunpur Police Line Area
222002

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust:

Shortcuts

Share