Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust

Shree Veetrag Param Poojya Sant Rahas Biharilal Memorial Trust This trust is a Seva project of GuruMaharaj ji, to implement the teaching of GuruMaharaj in world.

“भीतर का चाँद”एक आदमी संत कबीर के पास आया और बोला, “मुझे परमात्मा दिखा दो।”कबीर उसे गंगा किनारे ले गए। उन्होंने पानी में...
24/11/2025

“भीतर का चाँद”

एक आदमी संत कबीर के पास आया और बोला, “मुझे परमात्मा दिखा दो।”

कबीर उसे गंगा किनारे ले गए। उन्होंने पानी में पत्थर फेंका।
लहरें उठीं और फिर शांत हो गईं।

कबीर बोले,
“जब तक मन की लहरें अहंकार, गुस्सा और लालच उठती रहेंगी, परमात्मा का प्रतिबिंब नहीं दिखेगा।
चाँद हमेशा था, लेकिन पानी शांत होने पर ही दिखता है। परमात्मा भी ऐसा ही है, वह भीतर ही है।”

वह व्यक्ति समझ गया कि परमात्मा बाहर नहीं, मन की शांति में मिलता है।

परम पूज्य वीतराग संत श्री रहस बिहारीलाल जी फरमाते हैं "गुरु की आत्मा की धार अपने सारे शरीर पर डालो। सबेरे-शाम दस पन्द्रह...
04/10/2025

परम पूज्य वीतराग संत श्री रहस बिहारीलाल जी फरमाते हैं "गुरु की आत्मा की धार अपने सारे शरीर पर डालो। सबेरे-शाम दस पन्द्रह मिनट ऐसा करो। दुनिया के कामों से जब फुर्सत हो, गुरु की याद करो, उसके जीवन पर ध्यान दो। उसके रचित ग्रन्थों को पढ़ो। जिस प्रकार विद्या-गुरु बड़ी पुस्तकों को पढ़ाने के लिए छोटे नोट संग्रह कर देते हैं वैसे ही गुरु द्वारा निर्मित पुस्तकें सारे ग्रन्थों का ज्ञान देंगी। गुरु से प्रेम करो। ऐसा करो कि तुम और वे एक हो जाँय बस यही गुरु प्रणिधान है और इसी से बेड़ा पार हो जायेगा ।"



गुरु की आत्मा की धार में भीग जाना,
उनके जीवन को मन का दर्पण बनाना,
उनके वचनों को हृदय का नियम बनाना,
उनके प्रेम में स्वयं को विसर्जित कर देना
यही सच्चा गुरु प्रणिधान है,
और यही जीवन की संपूर्ण साधना का फल।

अकी़दत के गुलों से जब सजेगी पीर की झाँकी जमाना कह उठेगा ख़ूब है दिलगीर की झाँकी न जाने कितने दिल उल्फ़त भरे हो जाएँगे घायल...
04/08/2025

अकी़दत के गुलों से जब सजेगी पीर की झाँकी
जमाना कह उठेगा ख़ूब है दिलगीर की झाँकी
न जाने कितने दिल उल्फ़त भरे हो जाएँगे घायल
चलेगी जब फ़ैजाबों में नज़र की तीर की झाँकी
घटा रहमत की बनकर छायेगी हम गुनहगारों पर
जो लहरायी हवा में काकुले शबगीर की झाँकी
बर आयेगी तमन्ना दीद के उम्मीद वारों की
नज़र आयेगी जिस दम पीर के तसवीर की झाँकी
कहा करते थे अक्सर यह बिहारी मौज में आकर
मुझे देखो कि मैं भी खुद हूँ अपने पीर की झाँकी
ज़मी से आसमा तक सिलसिला क़ायम है पीरों का,
मिला दे जो खुदा से ये है उस जंजीर की झाँकी
ख़ुदा ख़ुश होगा बेशक और ख़ताएँ माफ कर देगा,
जो ‘‘बेकस’’ लाये पलकों पर सजाकर नीर की झाँकी।
दावर हुसेन ‘‘बेकस’’ जौनपुरी

एक और श्रेष्ठ भावसेव्य-सेवक भाव से भी ऊँचा का एक भाव है-वह है- पिता पुत्र भाव। यदि गुरु का उत्तराधिकारी या खलीफा अपने को...
24/07/2025

एक और श्रेष्ठ भाव

सेव्य-सेवक भाव से भी ऊँचा का एक भाव है-

वह है- पिता पुत्र भाव।

यदि गुरु का उत्तराधिकारी या खलीफा अपने को सेवक नहीं बल्कि पुत्र समझता है और इसी निष्ठा से काम कर रहा है तो ऐसी दशा में मिलकियत का ख्याल रखना भी कोई गुनाह नहीं होता है, क्योंकि पुत्र पिता का ही तो दूसरा रूप है, उसी के सूक्ष्म अंशों को लेकर वह जन्मा है। हाँ! वह है, यह जुज है इतना ही अन्तर है।

श्री गुसाईं जी ने कहा है-"ईस्वर अंस जीव अविनासी"

जिस हद्द तक पुत्र पिता के मौजूद होते हुए उसकी कुल जायदाद का मालिक होता है उतना ही शिष्य गुरु के कामों का मालिक है।

गुरु के कदम-ब-कदम चलना और उसके जीवन को आदर्श बना कर उसी साँचे में अपने को ढालना शिष्य का कर्त्तव्य है। हम तो इस भाव को ही सबसे ऊँचा मानते हैं, इसमें कभी अपराध हो जाये तो भी भय नहीं है। गुरु के मिशन पूरा करने का संकल्प कर लो और उसमें भरसक यत्न करते हुए जीवन समाप्त कर डालो, यह सबसे सुगम मोक्ष का रास्ता है।

(परम् पूज्य श्री गुरु महाराज साहब)

कई बार पाप की पीड़ा मनुष्य को परमात्मा के पास पहुचाॅ देती है .....और पुन्य का अहंकार मनुष्य को परमात्मा से दूर कर देता ह...
22/07/2025

कई बार पाप की पीड़ा मनुष्य को परमात्मा के पास पहुचाॅ देती है .....
और पुन्य का अहंकार मनुष्य को परमात्मा से दूर कर देता है .....

22/07/2025

हे मेरे प्रियतम, मेरे गुरुदेव,
तुम्हारे बिना हर ऋतु सूनी है, हर पल अधूरा है।
मन भटका नहीं, बस तेरे ही इंतज़ार में ठहरा है,
जिस तरह बादल बरसें और प्यास बुझे,
वैसे ही तेरी कृपा बरसे और मेरी आत्मा तृप्त हो।

मैंने न सुख माँगा, न वैभव,
बस तेरी झलक की एक रेखा,
तेरे चरणों की रज का एक कण,
तेरी मौन उपस्थिति की एक साँझ माँगी है।

जो विरह की पीड़ा में बीते हैं वो पल,
उन्हें अब तेरे मिलन की छाँव मिल जाए।
हे मेरे सांवरे, हे मेरे सदगुरु,
इस आत्मा को फिर से अपने प्रेम में भिगा दो,
जैसे राधा बसी थी श्याम में, वैसे ही मैं तुझमें विलीन हो जाऊँ।

🙏

अगर भीतर से पुकार उठी है मिलने की, अगर आत्मा की प्यास अब और बर्दाश्त नहीं होती, तो फिर हर सांस को इश्क़ की आग में झोंक द...
20/07/2025

अगर भीतर से पुकार उठी है मिलने की, अगर आत्मा की प्यास अब और बर्दाश्त नहीं होती, तो फिर हर सांस को इश्क़ की आग में झोंक देना होगा। यह कोई साधारण मिलन नहीं, यह वह मिलने की राह है, जहाँ खुद को मिटाकर, खुदा में खुद को पाना होता है।

"इश्क़ वो आतिश है ‘ग़ालिब’ जो लगाए न लगे, और बुझाए न बुझे।”
यह इश्क़, आत्मा की वह अग्नि है, जो सुलगती रहे तो रूह रोशन होती है, और बुझ जाए तो जीवन खोखला।

"जब तक तू खुद को देखता रहेगा, तू उसे नहीं देख पाएगा।"
यही अहं (नफ़्स) है जो परदे की तरह हमारे और सत्य के बीच खड़ा है। अगर सच्चे मिलने का शौक है, तो सबसे पहले खुद की हस्ती को मिटाना होगा, वही "जलाकर खुद नुमाई को..." वाली बात। खुद को ख़ुदा के आगे भस्म कर देना ही सच्ची इबादत है।

"मस्जिद मंदिर बहुत देखे, खुदा कहीं नहीं मिला;
जब दिल को टटोला, वहीँ बैठा मिला।"
सूफ़ी पथ में बाहरी प्रतीकों का सम्मान है, पर अंतिम सत्य भीतर की अनुभूति में है। किताबें, तस्बी, इबादतगाहें, ये सब केवल दरवाज़े हैं। भीतर का प्रेम, भीतर की तड़प, और भीतर की सच्चाई ही उस दरवाज़े को खोलती है।

"पीने दो इश्क़ की मय, नशा भी यही, होश भी यही।”
यह ‘शराब-ए-शौक’ कोई सांसारिक मादकता नहीं, बल्कि वह दिव्य रस है जिसमें पीने वाला खुद को भुला देता है, और खुदा को पा लेता है। जब यह प्रेम भीतर उतरता है, तो साधक न तो भूखा रहता है, न रोज़ा रखता है, न व्रत, वह हर समय उस दिव्यता में डूबा रहता है।

"ना कोई मुसलमान, ना कोई हिन्दू, हम सब इश्क़ के बन्दे हैं।"
सच्चा इश्क़ किसी दीवार को नहीं मानता। यहाँ ब्राह्मण या मुल्ला की पहचान नहीं चलती, यहाँ सिर्फ़ "मैं और तू" मिट जाते हैं, और जो बचता है, वही खुदा है। प्रेम ही एकमात्र मज़हब बन जाता है।

"जब मैं मिट गया, तभी तो वो मिला।"
‘अनल हक़’ का अर्थ है – मैं ही सत्य हूँ। यह कोई घमंड नहीं, बल्कि आत्मा की उस अवस्था की घोषणा है जब उसमें और परमात्मा में कोई अंतर नहीं रहता। यह तभी होता है जब seeker, खुद को पूरी तरह प्रेम में भुला देता है।

अगर वाकई शौक है मिलने का, तो तड़प को जीवन बना लो, हर सांस को इश्क़ बना दो, और हर क्षण को समर्पण।

"तू दरिया बन जा इश्क़ का, खुद-ब-खुद खुदा समंदर लगेगा।"

लौ लगती रहे, दिल जलता रहे, और seeker उसी राख से फिर फिर उठकर पुकारता रहे, अगर है शौक मिलने का, तो हरदम लौ लगाता जा।

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक गुरु महाराज साहब का संदेश पहुंचाना और युवा पीढ़ी को सत्संग से जोड...
18/05/2025

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक गुरु महाराज साहब का संदेश पहुंचाना और युवा पीढ़ी को सत्संग से जोड़ना है।।

विरह गीतरहस बिहारी आजा, बृज के सँविरया ।तुम्हरे दरश बिन तरसे नज़रिया ||मथुरा में जाइ बसे बहियाँ छुड़ाई के ।मैं बिरहन रोऊ...
08/05/2025

विरह गीत

रहस बिहारी आजा, बृज के सँविरया ।
तुम्हरे दरश बिन तरसे नज़रिया ||
मथुरा में जाइ बसे बहियाँ छुड़ाई के ।
मैं बिरहन रोऊँ अंसुआ बहाई के ।
बरसे नयन जैसे बरसे बदरिया ||
आये रितुराज प्यारे पिया तू भी आई जा ।
नयना दुखन लागे मुखड़ा दिखाई जा ।
कौन ओढ़ावे मोहे धानी रे चदरिया ||
लाओ रितुराज मोरे पिया को मनाई के ।
हूँगी मतवारी पिया रंग में नहाई के ।
झूमूंगी 'बेकल' जैसे राधे बवरिया ।।

यह विरह गीत एक अद्भुत भावनात्मक रचना है, यह रचना पूज्य बेकल साहब ने अपने गुरु के लिए लिखी है। वह अपने प्रियतम श्री गुरुदेव से मिलन की आकांक्षा लिए, हर क्षण तड़पती रहती है। गीत की शुरुआत "रहस बिहारी आजा, बृज के सँविरया" से होती है, जहाँ वह ब्रज के लीलाधर को याद करते हुए उन्हें पुनः ब्रज लौट आने की पुकार करती है। यह पुकार हृदय की गहराइयों से निकली हुई करुण रागिनी है। आँखें कृष्ण के दर्शन को तरस रही हैं — नयन प्रतीक्षा में सूख चुके हैं, और मन व्याकुल है।

कृष्ण के मथुरा चले जाने का प्रसंग केवल भौतिक दूरी नहीं, आत्मिक बिछोह का प्रतीक है। "मथुरा में जाइ बसे बहियाँ छुड़ाई के" पंक्ति यह संकेत देती है कि कृष्ण अब उस दुनिया में हैं जहाँ राधा की पहुँच नहीं। वह विरहिणी बनकर रो रही है — आँसुओं के साथ उसकी पुकार बह रही है। "मैं बिरहन रोऊँ अंसुआ बहाई के" — यह वाक्य मानो हर उस आत्मा की पुकार है जो अपने आराध्य से बिछुड़ गई है। जब गुरु देव अपने गुरु महाराज की कृपा से उनमें मिल उनके ही लोक के निवासी बन गए तो अब हम भक्तों का क्या होगा। हमसे मिलने क्या गुरु देव आएंगे।

यह विरह ब्रह्म और जीव के बिछोह का भाव है। जब कोई सच्चा प्रेमी अपने प्रियतम से दूर हो जाता है, तब उसके लिए समय ठहर जाता है, ऋतुएँ सूनी लगती हैं और जीवन का रस फीका हो जाता है। जब वह कहती है "बरसे नयन जैसे बरसे बदरिया", तो यह आँसुओं की नदियों का चित्रण है — एक ऐसा दर्द जो केवल प्रेम में डूबा हुआ हृदय ही अनुभव कर सकता है।

ऋतु बदल चुकी है — वसंत आ गया है। लेकिन इस सुहावने मौसम में भी जीव का मन उदास है। "आये रितुराज प्यारे पिया तू भी आई जा" — यहाँ जीव आत्मा ऋतुराज से प्रार्थना करती है कि जैसे वह आ गया है, वैसे ही उसका प्रियतम भी लौट आए। यह अनुरोध प्रकृति से है, ब्रह्मांड से है। "नयना दुखन लागे मुखड़ा दिखाई जा" — राधा की आँखें अब उस चेहरे के बिना व्यथित हैं, जिसके बिना उसका जीवन अधूरा है।

"कौन ओढ़ावे मोहे धानी रे चदरिया" — यहाँ चदरिया एक प्रतीक बन जाती है उस प्रेम की, उस सुरक्षा की, जो केवल प्रियतम से ही मिलती है। वह अब खुद को अकेला महसूस करती है, जैसे जीवन में रंग ही नहीं रहे। ऋतुराज से वह फिर निवेदन करती है — "लाओ रितुराज मोरे पिया को मनाई के", क्योंकि उसे विश्वास है कि ऋतु ही वह माध्यम बन सकती है जिससे वह अपने पिया को लौटा सके।

"हूँगी मतवारी पिया रंग में नहाई के" — यह पंक्ति प्रेम की पूर्णता की प्रतीक है। वह कहती है कि जब उसका प्रिय आएगा, तो वह उसके रंग में पूरी तरह रंग जाएगी। यह आत्मसमर्पण है, यह भक्ति की पराकाष्ठा है। "झूमूंगी 'बेकल' जैसे राधे बवरिया" — वह राधा की तरह बावरी बन जाना चाहती है, उसी प्रेम में, उसी अनुराग में।

यह गीत केवल एक विरहिणी की कथा नहीं है, यह भक्ति और प्रेम की चरम सीमा है। राधा के माध्यम से कवि ‘बेकल’ ने आत्मा की पीड़ा को स्वर दिया है। यह गीत शुद्ध भक्ति की अभिव्यक्ति है, जहाँ प्रेम ईश्वर से भी बड़ा अनुभव बन जाता है।

प्रेम में विरह की पीड़ा अमूल्य होती है। वह आत्मा को परिपक्व बनाती है। जब आत्मा अपने प्रियतम से बिछुड़ती है, तभी उसमें मिलने की तीव्र लालसा जन्म लेती है। यही विरह उसे आगे बढ़ाता है, उसे शुद्ध करता है।

इस गीत में शब्द नहीं, भाव बोलते हैं। हृदय के सूक्ष्म कंपन इस गीत में गूंजते हैं। यह विरह कोई साधारण दर्द नहीं — यह वह पुल है जो प्रेम को परिपूर्णता की ओर ले जाता है। यही विरह एक दिन मिलन का द्वार खोलता है।

पूज्य ‘बेकल’ साहब की यह रचना एक सजीव चित्र है, उस प्रेम का जो आत्मा और परमात्मा के बीच होता है। यह विरह आत्मा को जलाता नहीं, बल्कि उसे तपाकर दिव्यता देता है। यही इस गीत की सबसे सुंदर बात है।

05/05/2025

"जेहि विधि कपट कुरंग संग, धाइ चले श्री राम ।"

जिस प्रकार मृग (माया मृग या मारीच रूपी स्वर्ण मृग) के छल (कपट) में आकर श्रीराम उसके पीछे दौड़ पड़े।

यहाँ माया के प्रतीक स्वर्ण मृग को "कपट कुरंग" कहा गया है अर्थात वह मृग, जो दिखने में अत्यंत मोहक था परन्तु उसका रूप छली था। यह संसार की माया का प्रतीक है, जो देखने में सुंदर लगती है, परंतु अंततः दुःख का कारण बनती है।

श्रीराम जैसे परब्रह्म परमात्मा भी जब लीला करते हैं तो माया की लीला में ऐसे प्रवृत्त होते हैं जैसे वे स्वयं भी उसमें बंधे हों। यह लीला नरलीला के रूप में मानी जाती है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।"
(गीता 2.45)
"हे अर्जुन! तुम त्रिगुणमयी माया से परे हो जाओ।"

यहाँ कपट कुरंग उसी त्रिगुणमयी माया का प्रतीक है, जिसे साधारण जीव समझ नहीं पाते और उसके पीछे दौड़ते रहते हैं।

अब देखिए माया के आगे कहां पहुंचना है हम सबको, बहुत बड़ी बात है, बहुत सुंदर मां की स्पष्ट करी गई है।

"सोइ छवि सीता राखि उर, रटत रहति हरि नाम ॥"

उसी श्रीराम की छवि को सीता जी ने हृदय में स्थापित किया और हर समय उनका नाम जपती रहीं।

यहाँ पर बताया गया है कि जब श्रीराम मायामृग के पीछे गए, तब सीता जी को एकाकी रहना पड़ा। परंतु उन्होंने अपने मन को चंचल नहीं होने दिया, उन्होंने श्रीराम की छवि को हृदय में दृढ़ता से धारण कर लिया और निरंतर "हरि नाम" का स्मरण करती रहीं।

यह भक्ति की पराकाष्ठा है, जब बाहर का दृश्य राम विहीन हो, तब भी भीतर का हृदय राममय बना रहे।
यही बात परम पूज्य चतुर्भुजलीन चौधरी साहब कहते है, तुम संसार में रहो पर संसार तुम्हारे अंदर न रहे।

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।"
(गीता 18.65)
"मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो।"

सीता जी न सिर्फ मन में श्रीराम को बसाया, बल्कि उनका नामस्मरण करते हुए उन्हें ही अपने आराध्य और जीवन का आश्रय बना लिया।

सीख:
यह संसार माया के छल कपट से भरा हुआ है, जो "स्वर्ण मृग" की भाँति सुंदर प्रतीत होता है लेकिन अंत में दुखद होता है।

भगवान की लीला भी इस माया के भीतर ही होती है, परंतु वे माया से परे हैं।

एक सच्चा भक्त, जैसे कि सीता जी, चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, अपने आराध्य की छवि को हृदय में बसाकर, हरि नाम का जप करता हुआ, संसार की माया से बच सकता है।

नाम स्मरण ही सबसे सरल और श्रेष्ठ साधन है — जैसा कि गीता और भक्ति परंपरा दोनों में प्रतिपादित है।

04/05/2025

परम पूज्य वीतराग संत श्री रहस बिहारी लाला जी साहब फरमाते हैं

गुरु के द्वारा बताये गये साधन में साधक को(किसी भी स्थिति में, गुरु के पर्दा करने की बाद की स्थिती में भी) किसी प्रकार का परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है। उसी साधन को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से कल्याण होगा।

गुरु आत्मा की उस शक्ति का नाम है जो अन्धकार से हमें प्रकाश में लाती है, ज्ञान प्रदान करती है और वही हमारे कल्याण हेतु शरीर धारण करती है। आत्मा अमर है, सर्वव्यापी है। उससे गुरु आदेशानुसार शक्ति लेकर सदैव कल्याण होगा। शरीर न रहने पर उसके ज्ञान में कोई कमी नहीं होती।

परम पूज्य की बातें उनपिषदों में लिखित बातों से पूर्ण रूप से मिलती हैं, क्योंकि आप गुरु महाराज से मिल के उन्हीं के एक instrument बन गए हैं। आप सिद्धान्त और व्यवहार में इस बात को मानते है कि उनका अपना कुछ है ही नहीं जो कुछ है वह गुरु महाराज का ही है।

श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) में कहा गया है

"यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥"

जिस शिष्य को देवता (ईश्वर) में जितनी भक्ति है, उतनी ही भक्ति अपने गुरु में भी है, उसी महात्मा के लिए उपनिषदों का रहस्य प्रकाशित होता है।

गुरु द्वारा दिए गए साधन या मार्ग में परिवर्तन करना यह दर्शाता है कि शिष्य में गुरु के प्रति पूर्ण विश्वास नहीं है। जबकि उपनिषदों का स्पष्ट निर्देश है कि श्रद्धा और भक्ति से ही ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु का मार्ग ईश्वर की आज्ञा जैसा होता है—उसे ज्यों का त्यों अपनाना ही कल्याण का कारण है।

छांदोग्य उपनिषद (6.8.7):
"तत्त्वमसि श्वेतकेतु"
(तू वही है — ब्रह्म ही तेरा स्वरूप है। उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद, जहाँ श्वेतकेतु को आत्मा का ज्ञान गुरु उद्दालक से मिलता है। लेकिन यह ज्ञान आत्मा के सत्यस्वरूप को जानने पर निर्भर करता है, गुरु के शरीर पर नहीं।)

गुरु का शरीर नहीं रहने पर भी जो “तत्त्व” उन्होंने सिखाया, वह ब्रह्म है—अपरिवर्तनीय और सर्वत्र व्याप्त। गुरु आत्मा की वह शक्ति हैं जो 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' — अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। वह शक्ति शरीर तक सीमित नहीं है।

कठ उपनिषद (2.18):
"न जायते म्रियते वा कदाचित्..."
(आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, आत्मा अमर है, आध्यात्मिक ज्ञान/ऊर्जा नष्ट नहीं होता)

गुरु रूप आत्मा अमर है। उनके शरीर के जाने से उनकी शिक्षाओं या उनके ज्ञान की महत्ता समाप्त नहीं होती। उन्होंने जो शक्ति दी, वह आध्यात्मिक ऊर्जा है, जो सदा विद्यमान रहती है। उनके निर्देश शाश्वत हैं, अजर अमर हैं।

सीख:
1. गुरु का दिया मार्ग श्रद्धा और विश्वास से ही सिद्ध होता है।
2. गुरु आत्मा की वह प्रकाश स्वरूप शक्ति हैं जो साक्षात ब्रह्म के निर्देश पर कार्य करती है।
3. उनके देहत्याग के बाद भी, उनकी शिक्षाएँ और आशीर्वाद उसी प्रभाव में कार्य करते हैं, जैसे उनके रहते थे।

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