09/08/2025
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पर घासी समाज की परंपरा – भुना जोन्हर अर्पण
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन कोल्हान क्षेत्र का घासी (मुखी) समाज अपने इष्ट देव और पूर्वजों को “भुना हुआ जोन्हर” (भुना चना या अनाज) अर्पित करता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि समाज की ऐतिहासिक पहचान और पूर्वजों के प्रति सम्मान को भी दर्शाती है।
विवरण
समय:
श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा (रक्षाबंधन के आसपास का दिन)
विधि:
प्रातः स्नान के बाद घर के आंगन या पूजा स्थल की सफाई की जाती है।
जोन्हर (चना या धान का दाना) को भूनकर तैयार किया जाता है।
इसे पत्तल, दोना या पीतल/तांबे की थाली में रखा जाता है।
सबसे पहले इष्ट देव (ग्राम देवता या कुल देवता) को अर्पित किया जाता है।
इसके बाद पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए जल और भुना जोन्हर अर्पित किया जाता है।
अर्पण के बाद परिवारजन इसे आपस में प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।
महत्व:
मान्यता है कि इस दिन पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
भुना जोन्हर अर्पण करना समृद्धि, सुख-शांति और अच्छी फसल के लिए शुभ माना जाता है।
यह समाज में एकता और पारिवारिक जुड़ाव का अवसर भी है।
लोककथा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
घासी समाज की यह परंपरा उनके कृषक और पशुपालक जीवन से जुड़ी है। पुराने समय में श्रावण महीने में खेतों में रोपाई का काम पूरा हो जाता था और गांवों में वर्षा के बीच थोड़ा विश्राम का समय आता था। समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्वजों ने अपने इष्ट देव को धन्यवाद देने और पूर्वजों को याद करने के लिए यह दिन तय किया।
लोककथा के अनुसार, प्राचीन समय में घासी समाज के एक गांव में अकाल पड़ा। वर्षा कम हुई और खेतों में फसल नहीं उगी। तब गांव के एक बुजुर्ग ने सपना देखा कि अगर श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन इष्ट देव को भुना जोन्हर और जल अर्पित किया जाए, तो वर्षा और फसल दोनों अच्छी होंगी। अगले वर्ष जब समाज ने यह परंपरा निभाई, तो भरपूर वर्षा हुई और खेत सोने की तरह लहलहा उठे। तब से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है।
यह रस्म केवल पूजा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने, पूर्वजों के आशीर्वाद को याद रखने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति सिखाने का माध्यम है।