12/10/2025
जब शिक्षक पढ़ाना भूल गए
सच तो यह है कि हमारे देश में शिक्षक कम तनख्वाह पाते हैं — और अच्छे शिक्षकों की कमी भी उसी वजह से है।
पर इस पूरी व्यवस्था का सबसे ज़्यादा नुक़सान बच्चों को हो रहा है।
अब पढ़ाना एक सेवा या जुनून नहीं रहा, बल्कि बहुतों के लिए आख़िरी विकल्प बन गया है।
कई शिक्षक अब बच्चों या माता-पिता को ही दोष देने लगे हैं — “बच्चे सुनते नहीं”, “माता-पिता ध्यान नहीं देते”, “अब तो बच्चों को डांट भी नहीं सकते।”
पर असली अनुशासन मारना नहीं, समझना होता है।
बच्चों को नीचा दिखाना, मज़ाक उड़ाना या उनकी परेशानी पर उन्हें दोष देना — ये सब संवेदना की कमी दिखाता है, जो एक शिक्षक में सबसे ज़रूरी गुण होना चाहिए।
जब शिक्षक अपनी ज़िम्मेदारी से बचकर बच्चों और माता-पिता को दोष देने लगते हैं, तो शिक्षा का असली उद्देश्य ही हार जाता है।
हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो पढ़ाना चाहते हैं — इसलिए नहीं कि उन्हें कुछ और नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि उन्हें इससे बड़ा काम कोई और नहीं मिला।
शिक्षा तब नहीं हारती जब बच्चे गलती करते हैं,
वो तब हारती है जब बड़े लोग अपनी ज़िम्मेदारी भूल जाते हैं।