04/02/2022
मंदिरों के शहर जम्मू में आप सभी का स्वागत है मंदिरों की श्रंखला में आज एक ऐसे मंदिर से आपको रूबरू कराना चाहते हैं! जो पूरे भारतवर्ष में एकमात्र मंदिर है और ऐसी प्राचीन मूर्तियां कहीं नहीं हैं!
गदाधारी मंदिर सन 1837 महाराजा गुलाब सिंह के समय का बन्ना हुआ मंदिर है जिसे महाराजा गुलाब सिंह के पुत्र महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 5 वर्ष की उम्र में स्थापित करवाया गया!इस मंदिर की बहुत सी मान्यताएं हैं! मंदिर में गदाधारी जी की प्रतिमा उत्तिष्ठ रूप में है और गदाधारी जी के चार हाथ है और एक हाथ में गधा है, दूसरे में चक्कर है, तीसरे में पदम / कमल का फूल है, और चौथे में शंख है, प्रतिमा में आप मां लक्ष्मी को भी उत्तिष्ठ रूप में देख सकते हैं! मंदिर में गदाधार जी की प्रतिमा के चरणों मैं गरुड़ विराजमान है!जो गदाधार जी की सवारी है!इस मंदिर में माथा टेकने मात्र से ही आपका बुरा चाहने वाले का विनाश होता है! मंदिरों के शिखर से ही मंदिर की पहचान होती है! परंतु गदाधार मंदिर में शिखर क्यों नहीं है! एक समय की बात है,जब राजा आम समाजिक लोगों के लिए दरबार सजा था( दरबारे आम )उस समय राजा अमर प्रताप सिंह के पैरों में मंदिर के शिखर की छाया पड़ी उस समय वह बड़े आश्चर्यचकित हुए, कि जिस मंदिर की हम पूजा करते हैं उस मंदिर का शिखर इस तरह बहुत अपमानजनक बात है! उस समय उन्होंने आदेश दिया मंदिरके शिखर को हटा दिया जाए! यह मंदिर महाराजा गुलाब सिंह ने रानियों के लिए बनाया था! रानी राजाकी मंडी से होते हुए नेरी गली से होते हुए एक गुप्त द्वार से मंदिर के अंदर आती थी! और पूजा करने के बाद नेरी गली से होते हुए राजा की मंडी जाती थी! एक हिंदू राजा था जो आज पाकिस्तान का इलाका है,उस समय उस राजा ने गदाधार जी की मूर्तियों का आर्डर दिया था! जो राजस्थान से आने वाली थी! मंदिर बनाने से थोड़े समय पहले राजा के स्वपन में गदाधार जी आई और उन्होंने कहा था यहां मेरा मंदिर मत बनाओ मेरे दरबार बंद रहेंगे क्योंकि आने वाले सैकड़ों वर्षो में सनातन धर्म यहां से समाप्त हो जाएगा! इसलिए मेरी मूर्तियां दूसरी जगह जाने दो( जम्मू मे) उस समय जब यहां से रथ जा रहे थे! तब स्थान में जहा मंदिर है,उस के पास आकर हाथी घोड़े अचानक रुक गए और बैठ गे! तब यह मंदिर यहां पर स्थापित किया गया! इतनी भव्य और प्राचीन गदाधारजी की प्रतिमा बहुत ही आकर्षित है! 1 गया नामक राक्षस था बहुत ही भयानक और शक्तिशाली उसे ब्रह्मा जी का वरदान था! वह 20 कोस में फैला था! एक समय विष्णु जी ने गया को बोला मुझे एक पवित्र पावन जगह चाहिए यज्ञ करने के लिए!उस समय गया ने कहा मेरी पीठ पर यज्ञ कीजिए इससे पावन पवित्र जगह कहा होगी! तब विष्णु जी ने गया की पीठ पर यज्ञ किया अग्नि से उसका शरीर सुकड़ता गया और 5 कोस का हो गया! लोग मोक्ष की प्राप्ति के लिए गया जी जाते हैं! परंतु मोक्ष के रूप में गदाधार जी यहां विराजमान है! मंदिर की ऐसी मान्यता है,की मंदिर में आने मात्र से ही और गदाधर जी के दर्शन करने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। मंदिर में परिक्रमा करते समय मंदिर के पीछे एक दरवाजा है,जहां से रानियां मंदिर में आती थी और पूजा करती थी!
ऐसे प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर में आए और मंदिर की शोभा बढ़ाएं! मंदिरों में श्रद्धालुओं के आने से ही मंदिर की पहचान होती है!
जय गदाधारी जी