13/09/2026
दिव्या की दिव्य शक्तियाँ!
दिव्या दीदी जी की पत्रकारिता में इन दिनों एक नई दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है—योगी जी को देखकर उनके मन की बात पढ़ लेने की शक्ति!
योगी जी इनको देख कर डर गए, नहीं दीदी बिल्कुल नहीं आप डरावनी थोड़ी ही हो जो वो डरेंगे.
रही मुस्कराहट की बात तो किसी ने कहा था की "smile is very dangerous" तो दीदी आपके चिल्लाने की तुरंत बाद कोई भी मुस्कराहट के साथ आपकी कुटिलता के भाव को देख सकता हैं.
दिव्या जी, एक दिन पहले आपका सवाल था कि छोटे पत्रकारों को रस्सी के घेरे में क्यों रखा जाता है। बस एक छोटी-सी जानकारी: सुरक्षा प्रोटोकॉल नाम की भी कोई चीज होती है। मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था किसी पत्रकार को छोटा-बड़ा बताने के लिए नहीं, सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखकर होती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक कार्यक्रम की सुरक्षा व्यवस्था को एक ही तराजू पर तौलना भी पत्रकारिता नहीं है।
और फिर आती है वह महान पत्रकारिता की डिग्री वाली दलील।
उत्तर प्रदेश में हजारों पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री है। क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी के पास उतनी ही कुर्सियाँ लगा दी जाएँ? 😄
वहाँ बैठे कई पत्रकार आपसे वर्षों वरिष्ठ हैं। सवाल डिग्री का नहीं, मौके, मर्यादा और पत्रकारिता के विवेक का है।
जहाँ तक मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता का सवाल है, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री के मिनट-टू-मिनट कार्यक्रम का अपना प्रोटोकॉल होता है। ऐसे में आखिरी क्षण में टोका-टोकी को लेकर बनाई गई पूरी कहानी को देखकर लगता है कि घटना छोटी थी, लेकिन नैरेटिव की दिव्य शक्ति बहुत बड़ी थी।
अब आते है आपकी निष्पक्षता पर,
राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामना, अखिलेश यादव को जन्मदिन की शुभकामना—बिल्कुल दीजिए, हो सकता है दीदी ये वाली पोस्ट डिलीट अब कर दे इसलिए स्क्रीनशॉट्स लगा दिया हूँ, इसमें कोई समस्या नहीं की अखिलेश यादव संसद में बोलें तो शेर की तरह दहाड़ने वाला विशेषण भी दीजिए। पर अपने को निष्पक्षता वाली बात मत बोलिए, समाजवादी पार्टी के नए पोस्टर बॉय लक्ष्मण यादव और आप वाले संजय सिंह से आपके अति मधुर संवाद आपकी निष्पक्षता की गवाही दे रहे है,
लेकिन फिर उसी सोशल मीडिया पर यह दावा भी कि हम पूरी तरह निष्पक्ष हैं, हमारा किसी राजनीतिक विचारधारा से कोई झुकाव नहीं है, तो पाठक को सवाल पूछने का अधिकार तो दीजिए।
निष्पक्षता का दावा करने से निष्पक्षता सिद्ध नहीं होती, आपकी पूरी सार्वजनिक पत्रकारिता देखकर पाठक खुद निष्कर्ष निकालता है।
और सबसे मजेदार बात—योगी आदित्यनाथ जी को डराने की कहानी!
योगी जी को सवालों से डरने वाला बताने से पहले उनके सार्वजनिक इंटरव्यू और राजनीतिक जीवन का इतिहास देख लेना चाहिए। वामपंथी पत्रकारिता के आप लोगो के भगवान एनडीटीवी वाले प्रणव रॉय, the print वाले शेखर गुप्ता या अंजुम साहेब के वाले सारे इंटरव्यू इंटरनेट पर भरे पड़े है योगी जी कठिन से कठिन मुद्दों पर खुलकर जवाब दिए हैं। जिन्हें आपके ही पसंदीदा पत्रकार अक्सर सपाट, बेबाक और बिना लाग-लपेट बोलने वाला नेता बताते रहे हैं, उन्हीं योगी जी के बारे में अचानक यह नैरेटिव कि वे एक सवाल से डर गए—कुछ जमता नहीं।
योगी जी निडर थे। निडर हैं। निडर रहेंगे।
उनकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि उन्हें अपनी बात कहने के लिए किसी पत्रकार से डरने की जरूरत नहीं है और किसी पत्रकार को अपनी बात कहने से रोककर अपनी राजनीति चलाने की भी जरूरत नहीं है।
बाकी दिव्या जी की दिव्य शक्तियाँ अपनी जगह हैं।
वह मुस्कुराहट पढ़ सकती हैं, मन पढ़ सकती हैं, डर पढ़ सकती हैं और शायद मुख्यमंत्री के मिनट-टू-मिनट कार्यक्रम में भी छिपी राजनीतिक साजिश पढ़ सकती हैं।
हम साधारण लोग हैं।
हम तो बस इतना जानते हैं—पत्रकार सवाल पूछे, नेता जवाब दे और दोनों के बीच का फैसला वीडियो देखने वाला दर्शक करे।
न कि पत्रकार खुद सवाल भी बनाए, फैसला भी सुनाए और फिर अपनी ही कहानी को पत्रकारिता का प्रमाणपत्र भी दे दे। 😄