Shree chandisa rao samaj

Shree chandisa rao samaj श्री चण्डीसा राव समाज भगवती चण्डी आश्रम ट्रस्ट जालोर

शक्ति सिंह पुत्र श्रवण सिंह राव निवासी सुराणा जो कल तारीख 16 मई 2025 को दोपहर 2:00 बजे घर से बिना बताए निकल गया था तो अभ...
18/05/2025

शक्ति सिंह पुत्र श्रवण सिंह राव निवासी सुराणा जो कल तारीख 16 मई 2025 को दोपहर 2:00 बजे घर से बिना बताए निकल गया था तो अभी तक मिला नहीं है यह बच्चा जिस किसी भाई को दिखे तो मेरे इस नंबर पर तुरंत संपर्क करें आपकी बड़ी मेहरबानी होगी धन्यवाद 9928065300, 9460458335, 9929436643

Congratulations 🎉 brijesh barot (AIR-507 UPSC CSE 2024)
22/04/2025

Congratulations 🎉 brijesh barot (AIR-507 UPSC CSE 2024)

बिहार के गया को पितृ तीर्थ कहा जाता है. यहां पिंडदान करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि गया में भ...
19/02/2025

बिहार के गया को पितृ तीर्थ कहा जाता है. यहां पिंडदान करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृ देवता के रूप में विराजमान रहते हैं |

गया जी के महत्व की वजहें:

गया को विष्णु की नगरी और मोक्ष की भूमि कहा जाता है.
गरुड़ पुराण के मुताबिक, गया जाने के लिए घर से निकले हर कदम पितरों को स्वर्ग की ओर ले जाने की सीढ़ी बनाते हैं. मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से 108 कुलों और 7 पीढ़ियों का उद्धार होता है.
गया में श्राद्ध कर्म और तर्पण विधि करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है. गया में पिंडदान करने से आत्मा को शांति मिलती है. गया में पिंडदान करने से पितरों को इस संसार से मुक्ति मिलती है.

गया जी से जुड़ी पौराणिक कथा:
मान्यता है कि गया भस्मासुर के वंशज गयासुर की देह पर बसा हुआ स्थान है.
गयासुर ने कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था.
गयासुर ने देवताओं को अपना शरीर यज्ञ के लिए दान कर दिया था.

••••••प्रयाग महात्म्य••••√•प्रयाग, जिसे प्रयागराज या इलाहाबाद के नाम से भी जाना जात••••••प्रयाग महात्म्य••••√•प्रयाग, जि...
08/02/2025

••••••प्रयाग महात्म्य••••

√•प्रयाग, जिसे प्रयागराज या इलाहाबाद के नाम से भी जाना जात
••••••प्रयाग महात्म्य••••

√•प्रयाग, जिसे प्रयागराज या इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पौराणिक कथाओं और प्राचीन संस्कृत साहित्य में एक अत्यंत पूजनीय स्थान रखता है। पवित्र नदियों गंगा (गंगा), यमुना और पौराणिक सरस्वती के सेगम पर स्थित, इसे अक्सर "तीर्थराज" यानी तीर्थ स्थलों का राजा कहा जाता है। प्रयाग का महत्व प्राचीन वेदों से लेकर पुराणों और महान महाकाव्यों तक कई संस्कृत ग्रंथों में प्रतिध्वनित होता है।

"प्रयागस्य पवेशाद्वै पापं नश्यतिः तत्क्षणात्।"

√• प्रयाग में प्रवेश मात्र से ही समस्त पाप कर्म का नाश हो जाता है।

√•प्रयाग को ब्रह्मवैवर्त पुराण में तीर्थराज कहा गया है

√•सभ्यता के आरंभ से ही यह ऋषियों की तपोभूमि रही है।

√•यहां सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद प्रथम यज्ञ किया था। इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवान श्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ माधव रूप में विराजमान हैं। भगवान के यहाँ बारह स्वरूप विध्यमान हैं। जिन्हें द्वादश माधव कहा जाता है।

√•प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है। यहीं सरस्वती नदी गुप्त रूप से संगम में मिलती है, अतः ये त्रिवेणी संगम कहलाता है, जहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ का आयोजन होता है।

√•प्रयाग सोम, वरूण तथा प्रजापति की जन्मस्थली है। प्रयाग का वर्णन वैदिक तथा बौद्ध शास्त्रों के पौराणिक पात्रों के सन्दर्भ में भी रहा है। यह महान ऋषि भारद्वाज, ऋषि दुर्वासा तथा ऋषि पन्ना की ज्ञानस्थली थी। ऋषि भारद्वाज यहां लगभग 5000 ई०पू० में निवास करते हुए 10000 से अधिक शिष्यों को पढ़ाया। सागर मंथन से प्राप्त अमृत कलश से छलककर अमृत की बूंद यहां गिरी थी। इस घटना के पश्चात यहां कुंभका आयोजन होता चला आ रहा है जिसमें जप, तप, यज्ञ, हवन और सत्संग की धारा बहती है।

√•वैदिक उत्पत्ति: ऋग्वेद परिषद में प्रयाग और उससे जुड़ी तीर्थयात्रा प्रथाओं का सबसे पहला उल्लेख है। इससे पता चलता है कि वैदिक परंपरा के प्रारंभिक चरणों में भी प्रयाग की पवित्रता को मान्यता दी गई थी।

√•पुराण (पौराणिक कथाओं और ब्रह्माण्ड विज्ञान से परिपूर्ण प्राचीन हिन्दू ग्रंथ) प्रयाग के विषय में किंवदंतियों और प्रतीकात्मकता का समृद्ध ताना-बाना प्रस्तुत करते हैं।

√•मत्स्य पुराणः प्रयाग को उस स्थान के रूप में चित्रित करता है जहाँ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने महाप्रलय के बाद पहला बलिदान (यज्ञ) दिया था, जिससे यह स्थान पवित्र हो गया। यहाँ एक प्रासंगिक श्लोक है:

"प्रयागे तु महादेव यज्ञं यज्ञपतिर्यौ।
तत्रापश्यत् स्वयं ब्रह्मा तीर्थराजं जग्गुरुम् ॥"

√•अर्थात् "प्रयाग में, यज्ञों के स्वामी महेश्वर [शिव] ने एक वार यज्ञ किया था। वहाँ, ब्रह्मा ने स्वयं तीर्थों के राजा, संपूर्ण जगत के गुरु को देखा।"

√•अग्नि पुराण और अन्य पुराण प्रयाग के बारे में विस्तार से बताते हैं, इसे एक ऐसा स्थान बताते हैं जहाँ तीर्थयात्री, पुजारी और विक्रेता एकत्रित होते हैं, यह आध्यात्मिक साधकों, अनुष्ठानिक कार्यों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का जीवंत संगम है। त्रिवेणी संगम (तीन नदियों का संगम) पर अनुष्ठान स्रान को कई पुराणों में मुक्ति और शुद्धि के मार्ग के रूप में वर्णित किया गया है।

√•प्रतिष्ठित हिंदू महाकाव्यों, रामायण और महाभारत ने भी प्रयाग को अपनी कथाओं में शामिल किया है।

√•रामायणः रामायण में प्रयाग का उल्लेख ऋषि भारद्वाज के पौराणिक आश्रम के स्थान के रूप में किया गया है। इसी आश्रम में भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान ऋषि का आशीर्वाद लिया था।

√•महाभारतः महाभारत में कई संदर्भों में प्रयाग के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। महाकाव्य में शुभ समय पर प्रयाग में स्नान करने से अपार आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति का वर्णन है।

"तीर्थाणि पुण्यान्यकाशेऽन्तर्दिवि स्थिता ।
तानि सर्वाणि गंगायां प्रयागे च विशेषतः ॥"

√•अर्थात् “यहां तक कि वे पवित्र स्थान जो स्वर्ग में या स्वर्ग और पृथ्वी के बीच मौजूद हैं, वे गंगा में पाए जा सकते हैं, विशेष रूप से प्रयाग में।"

√•प्रयाग की शक्तिः प्रतीकवाद और महत्व संस्कृत ग्रंथों में प्रयाग का वर्णन गहन प्रतीकात्मकता को उजागर करता है:

√•पवित्र और अपवित्र का संगमः प्रयाग एक सीमांत स्थान का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ दिव्य और सांसारिक जुड़ते हैं। नदियों का संगम विभिन्न मार्गों, परंपराओं और जीवन के पहलुओं के मिलन बिंदु का प्रतीक है।

√•शुद्धिकरण और नवीनीकरणः त्रिवेणी संगम में स्त्रान का अनुष्ठान पापों के शुद्धिकरण, नकारात्मकता को धोने और आध्यात्मिक नवीनीकरण का प्रतीक है।

√•लौकिक महत्वः सरस्वती नदी की गुप्त उपस्थिति पवित्रता की एक और परत जोड़ती है, जो बुद्धि, ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है।

√•हिंदू परंपरा की चेतना में गहराई से समाया प्रयाग आज भी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल वना हुआ है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथ इस पवित्र स्थान का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं, जो आस्था, अनुष्ठान और ईश्वर की खोज की शक्ति का एक कालातीत प्रमाण है।

जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया।वह दौड़ी−...
09/06/2024

जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया।

वह दौड़ी−दौड़ी ओघड़दानी शंकर के पास गयीं और कहने लगीं−”भगवन्! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पसीजता। कम−से−कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।”

महादेव ने हँसते हुए कहा- “शुभे! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?”

माँ भवानी अचरज से बोलीं- “तो क्या आपके भक्तों को उद्रपूर्ति के लिए भोजन को आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?”

श्री शिव जी ने कहा- “परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।”

भगवान शंकर के आदेश को देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली- ”बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?”

“अवश्य" भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगा कर उपक्रम करने लगे।

भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया- "बेटा! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।”

भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे।

तभी आवाज सुनाई दी- "वत्स! तुम कहाँ जा रहे हो?"

भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं।
माता बोलीं- "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।"

प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा- "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शाँत करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैला कर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।"

पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा- "मैं सर्वशक्ति मान हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।"
भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में शिर झुकाया और कहा- "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन−दुखियों के लिए लगाता रहे और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।"

पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई।
त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुसकराते हुए कहा- "भद्रे, मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परंतु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।"

14/10/2023

नवरात्र २०२३ की तैयारी

14/10/2023
https://youtu.be/ho2uizcRfSI?si=Ufuw9iYVYKTBwD4q
06/10/2023

https://youtu.be/ho2uizcRfSI?si=Ufuw9iYVYKTBwD4q

ज्वाला देवी यात्रा पार्ट :-3 Jwala Devi Yatra चन्द बरदाई जन्म जयंती महोत्सव कार्यक्रम ्वालादेवी यात्रा Jwala Devi Yatra चन्द बरद.....

https://youtu.be/cH5NUnfNOLg?si=2ibUpKJp15SAVG9J
02/10/2023

https://youtu.be/cH5NUnfNOLg?si=2ibUpKJp15SAVG9J

ज्वालादेवी यात्रा Jwala Devi Yatra चन्द बरदाई जन्म जयंती महोत्सव िन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के कविवर चंदबरदाई जन्....

दसमहाविद्या_शाबरमन्त्रसाधना।।        साधना विधि:- साधक स्नान करके आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जा...
03/09/2023

दसमहाविद्या_शाबरमन्त्रसाधना।।

साधना विधि:- साधक स्नान करके आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएँ। माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें।

शापोद्धार मंत्र का एक माला जप करें-

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा॥

अब उत्कीलन मंत्र का एक माला जप करें-

ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं मंत्र चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा॥

ध्यान मंत्र:-
खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

दसमहाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र-

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं दसगुणात्मिकायै चामुंडायै प्रसीद प्रसीद दुर्गादेव्यै नमः॥

जब ध्यान हो जाये तब दस महाविद्या सायुज्य नवार्ण मंत्र का नित्य 11 माला जाप 9 दिन रात्रिकालीन समय मे उत्तर मुखी बैठकर करे,आसन वस्त्र लाल रंग के हो।फोटो मे दुर्गा सप्तशती मंत्र दे रहा हु उसका कॉपी बनवाकर यंत्र को स्थापित करे और मंत्र जप रुद्राक्ष माला से कर सकते हैं।इससे साधना के बाद नवार्ण मंत्र और दस महाविद्या मंत्रो में पुर्ण सफलता प्राप्त होती है।

साथ मे काली तंत्र का एक विधान है जिसे आप इस साधना को करने के बाद करे तो महाकाली जी का आशिर्वाद विशेष रुप से प्राप्त होता है।

22 अक्षर का श्री दक्षिण काली मंत्र -

।। ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं स्वाहा।।

विनियोग- अस्य श्री दक्षिण मंत्रस्य भैरव ऋषी: उस्णिक छंद : दक्षिण कलिका देवता क्रीं बीजं ह्रुं शक्ति : क्रीं कीलकम ममाभिस्ट सिध्यथर्ये जपे विनियोग :।

ऋषयादी न्यास -

ॐ भैरव ऋषये नमः शिरसि।
उष्णिक छंद्से नमः मुखे।
दक्षिण कलिका देवताये नमः ह्रदि।
क्रीं बीजाय नमः गुहे।
ह्रूं शक्तये नमः पादयो।
क्रीं किलकाय नमः नाभौ।
विनियोगाय नमः सर्वांगे।

करन्यास -

ॐ क्रां अन्गुष्ठाभ्याम नमः।
ॐ क्रीं तर्जनीभ्याम नमः।
ॐ क्रूं मध्यमाभ्याम नमः।
ॐ क्रें अनामिकाभ्याम नम:।
ॐ क्रों कनिष्ठकाभ्याम नमः।
ॐ क्र: करतल कर्पुश्थाभ्याम नमः।

ह्रद्यादी षडंग न्यास -

ॐ क्रां ह्रदयाय नमः।
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ क्रूं शिखाये वष्ट।
ॐ क्रे कवचाय ह्रुं।
ॐ क्रों नेत्रत्रयाय वौष्ट।
ॐ क्र: अस्त्राय फट।

वर्णमाला न्यास -

ॐ अं आं इं ईं ऊं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं नामो ह्रदि।
ॐ एं ऐं ओं औं अं अ: कं खं गं घं दक्षभुजे।
ॐ ञं चं छं जं झं गं थं ठं ड ढ नमो वामभुजे।
ॐ ण तं थं दं धं नं पं फं लं भं नमो दक्ष पादे।
ॐ मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षम नमो वामपादे।

इस न्यास के बाद नी चे दिए गए न्यास करे-

ॐ क्रीं नमः भ्रमरन्ध्रे।
ॐ क्रीं नमः भ्रूमध्ये।
ॐ क्रीं नमः ललाटे।
ॐ ह्रीं नमः नाभो।
ॐ ह्रीं नमः गृह्ये।
ॐ ह्रुं नमः वक्ते।
ॐ ह्रुं नमः गुवर्गे।

ध्यान मंत्र -

।। ॐ स्धशीचछन्नसिर: कृपणंभयं हस्तेवरम बिभ्रती धोरास्याम सिर्शाम स्त्रजा सुरुचिरामुन्मुक्त केशावलिम ||

स्रुकास्रुक प्रव्हाम स्मशान निल्याम श्रुतयो: रावालंकृति श्रुतयो: सवालंकृतिम श्यामांगी कृतमेख्लाम शवकरेदेवीभजे कालिकाम ।।

इस तरह से ध्यान करके नीचे कर्म से दिये 10 महाविद्याओं के किसी एक मंत्र सिद्धि के लिए 9 दिन रात्रि काल मे नियमित 11 माला जप करें।

सोरठा

ॐ सोऽहं सिद्ध की काया, तीसरा नेत्र त्रिकुटी ठहराया । गगण मण्डल में अनहद बाजा।
वहाँ देखा शिवजी बैठा, गुरु हुकम से भितरी बैठा, शुन्य में ध्यान गोरख दिठा।
यही ध्यान तपे महेशा, यही ध्यान ब्रह्माजी लाग्या, यही ध्यान विष्णु की माया।
ॐ कैलाश गिरि से आई पार्वती देवी, जाकै सन्मुख बैठे गोरक्ष योगी
देवी ने जब किया आदेश । नहीं लिया आदेश, नहीं दिया उपदेश ।
सती मन में क्रोध समाई, देखु गोरख अपने माही,
नौ दरवाजे खुले कपाट, दशवे द्वारे अग्नि प्रजाले, जलने लगी तो पार पछताई।
राखी राखी गोरख राखी, मैं हूँ तेरी चेली, संसार सृष्टि की हूँ मैं माई ।
कहो शिव-शंकर स्वामीजी, गोरख योगी कौन है दिठा ।
यह तो योगी सबमें विरला, तिसका कौन विचार ।
हम नहीं जानत, अपनी करणी आप ही जानी । गोरख देखे सत्य की दृष्टि ।
दृष्टि देख कर मन भया उनमन, तब गोरख कली बिच कहाया ।
हम तो योगी गुरुमुख बोली, सिद्धों का मर्म न जाने कोई ।
कहो पार्वती देवीजी अपनी शक्ति कौन-कौन समाई।
तब सती ने शक्ति की खेल दिखाई, दश महाविध्या की प्रगटली ज्योति।

प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली

ॐ निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत-सार, तत-सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम-ज्योत, परम-ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली ॐ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहिनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी । जिह्वा ज्वाला दन्त काली । मद्यमांस कारी श्मशान की राणी । मांस खाये रक्त पीवे । भस्मन्ती माई जहां पाई तहां लगाई। सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगन, नागों की नागन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ॐ काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली ।

मंत्र - क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।

द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा तोतला प्रगटली

ॐ आदि योग अनादि माया जहाँ पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया । ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कापलि, जहाँ पर ब्रह्मा-विष्णु-महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खड्ग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा । नीली काया पीली जटा, काली दन्त में जिह्वा दबाया । घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा । पंच मुख करे हां हां ऽऽकारा, डाकिनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया । चण्डी तारा फिरे ब्रह्माण्डी तुम तो हों तीन लोक की जननी ।

मंत्र - ॐ ह्रीं स्त्रीं फट्,
ॐ ऐं ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्।

तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटली

ॐ निरञ्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्याः उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवधर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद । तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश । हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश । त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी । इडा पिंगला सुषम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी । उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला । योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता ।

मंत्र श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं श्रीं कएईल ह्रीं हसकहल ह्रीं सकल ह्रीं सोः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ।

चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटली

ॐ आदि ज्योति अनादि ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत परम ज्योति मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रातः समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी । बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्नपूर्णी दूध पूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया । चौदह भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार । योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता ।

मंत्र - ह्रीं

पञ्चम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटली

सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया । काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द सूर में उपजी सुष्मनी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लिन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या । पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी । देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी । चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ट जती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने भाखी । छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्टन्ते आपो आप, जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे । काल ना खाये ।

मंत्र श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्रवैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा।

षष्टम ज्योति भैरवी प्रगटली

ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटा, गले में माला मुण्डन की । अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खंजर कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवें पाताल, सातवें पाताल मध्ये परम-तत्त्व परम-तत्त्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल-भैरवी, त्रिपुर- भैरवी, समपत-प्रदा-भैरवी, कौलेश- भैरवी, सिद्धा-भैरवी, विध्वंशिनी-भैरवी, चैतन्य-भैरवी, कमेश्वरी-भैरवी, षटकुटा-भैरवी, नित्या-भैरवी, जपा-अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मन्त्र मत्स्येन्द्रनाथजी को सदा शिव ने कहायी । ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी अनन्त कोट सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हटे काल जंजाल भैरवी मन्त्र बैकुण्ठ वासा । अमर लोक में हुवा निवासा ।

मंत्र - ॐ ह्सैं ह्स्क्ल्रीं ह्स्त्रौः

सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटली

ॐ पाताल निरंजन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आये, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावन्ती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार आई थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि । डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी । जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाजा जीया आकाश तेरा होये । धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ आप भयी अतीत ।

मंत्र- ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा ।

अष्टम ज्योति बगलामुखी प्रगटली

ॐ सौ सौ दुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला । संहासन पीले ऊपर कौन बसे । सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी । कच्ची-बच्ची-काक-कूतिया-स्वान-चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुद्-गर मार, शत्रु हृदय पर सवार तिसकी जिह्वा खिच्चै बाला । बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटण धरणी, अनन्त कोट सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्दसुर फिरे खण्डे खण्डे । बाला बगलामुखी नमो नमस्कार ।

मंत्र - ॐ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भन-बाणाय धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात् ।

नवम ज्योति मातंगी प्रगटली

ॐ शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार, ओंकार मे शक्ति, शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशि अमीरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया। बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत्त मुद्राधारी, उद गुग्गल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी। बूँद मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते। ॐ मातंगी, सुंदरी, रूपवन्ती, धनवन्ती, धनदाती, अन्नपूर्णी, अन्नदाती, मातंगी जाप मन्त्र जपे काल का तुम काल को खाये । तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरखनाथजी करे ।

मंत्र - ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।

दसवीं ज्योति कमला प्रगटली

ॐ अयोनि शंकर ॐकार रूप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप । हाथ में सोने का कलश, मुख से अभय मुद्रा । श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा । देवी देवत्या ने किया जय ॐकार। कमला देवी पूजो केशर, पान, सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्र कमलों का किया हवन । कहे गोरख, मन्त्र जपो जाप जपो ऋद्धि-सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान । जिसकी तीन लोक में भया मान । कमला देवी के चरण कमल को आदेश।

मंत्र : ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाहा ।
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो । सिद्ध योग मर्म जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका । योगी योग नित्य करे प्रातः उसे वरद भुवनेश्वरी माता । सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी । जोगी खड दर्शन को
कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी । नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी । ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी । पाताल जोगन (कुंडलिनी) गगन को चढ़ी, जहां पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी । आलस मोड़े, निद्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावन्ती करें । हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे । जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे । जो दसविद्या का सुमिरण करे । पाप पुण्य से न्यारा रहे । योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवरते । मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जाये । इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया । अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अचलगढ़ पर्वत पर बैठ श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथजी ने पढ़ कर सुनाया।

ये दसों महाविध्याओं के शाबर मंत्र है जो सर्व पाप-ताप को हरने की क्षमता रखते है । फोटो के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जला कर आप इसका कम से कम 5 पाठ नवरात्र में रोज 9 दिन तक करने से अवश्य आपकी समस्याओं का समाधान होगा।

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