जयजय श्रीश्यामाश्याम जी । भगवत कृपा । कृष्ण-प्रेम और राधा दास्य ।

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जयजय श्रीश्यामाश्याम जी । भगवत कृपा । कृष्ण-प्रेम और राधा दास्य । एक प्रयास विस्मृतियों के चिंतन का - अध्यात्म -धर्म - कर्म - भक्ति - भगवान को छुने का |
*उत्कण्ठा*

🙌🏼 आज श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी पाद के तिरोभाव महा-महोत्सव पर विशेष :::श्रीगौड़ीय षड् गोस्वामियों में श्री गोपालभट्ट गोस्वाम...
03/08/2026

🙌🏼 आज श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी पाद के तिरोभाव महा-महोत्सव पर विशेष :::

श्रीगौड़ीय षड् गोस्वामियों में श्री गोपालभट्ट गोस्वामी अन्यतम हैं।ब्रजलीला में आप श्री अंनग मञ्जरी हैं। *अनंगमंजरी ललिता देवी और विशेष रूप से विशाखा जी की अति प्रिया हैं।* गौरलीला में श्रीअनंगमंजरी श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी नाम से अवतरित हैं। कोई इन्हें श्रीगुणमञ्जरी भी कहते हैं-

अंनग मञ्जरी यासीत् साद्य गोपाल भटटक:।।
भटट गोस्वामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमञ्जरी।।

श्रीरंग क्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुण्डि ग्राम में श्री-सम्प्रदायी श्रीवैंकट भट्ट के घर संवत् 1557 में आपका आविभार्व हुआ।श्रीमन्महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्यदेव संवत् 1568 में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र में पधारे।वहां श्रीरंगनाथ दर्शन करके आप प्रेमाविष्ट हो उठे और नृत्य-पूर्वक नाम संकीर्तन करने लगे।श्रीवेंकटभटट जी ने श्रीमन्महाप्रभु के वहाँ दर्शन किए एंव उनके आजानुलम्बित परम भाव-माधुर्यमय विग्रह के दर्शन कर अति प्रभावित हुए।उनके चरणों में पड़कर उन्हें अपने घर भिक्षा करने की प्रार्थना की।प्रभु ने उन्हें परम वैष्णव जानकर उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।भिक्षा ग्रहण करने के बाद अनेक काल तक श्रीकृष्ण-कथा में दोनों भाव-विभोर हो उठे।

चातुर्मास्य आया, श्रीवैंकट जी ने श्रीमन्महाप्रभु के चरणों में विनम्र प्रार्थना क़ी - प्रभो ! आप कृपा कर चातुर्मास्य पर्यन्त मेरे घर में ही निवास कीजिये और श्रीकृष्ण-कथा कह कर मेरा निस्तार कीजिए।श्रीमन्महाप्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और चार मास वहाँ रहे। नित्य कावेरी स्नान, श्रीरंग दर्शन और प्रेमावेश में संकीर्तन गान करते।कोटि-कोटि लोग वहाँ श्रीमन्महाप्रभु के दर्शन कर श्रीकृष्णनाम-प्रेम में उन्मत्त हो उठे।

श्रीवैंकटभट्ट के घर में प्रभु-वास के समय श्रीगोपालभट्ट जी 11 वर्ष के बालक थे।उन दिनों इन्हें श्रीमन्महाप्रभु की हर प्रकार की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ।उनका उचिछष्ट प्रसाद भी इन्हें प्राप्त होता।श्रीमहाप्रभु जी भी श्रीगोपाल जी से अत्यधिक स्नेह करते।इस प्रकार इन्होंने उनकी असीम कृपा प्राप्त की।

भक्ति रत्नाकर से यह जाना जाता है कि श्रीमन्महाप्रभु की सेवा का इन्होंने सौभाग्य प्राप्त किया और प्रभु ने यह भी कृपादेश दिया कि गोपाल ! तुम श्रीवृन्दावन चले जाना।वहाँ श्रीरूप-सनातन के निकट रहकर भजन-साधन कर तुम्हें कृष्ण-प्राप्ति होगी।

श्रीमन्महाप्रभु के चले जाने के बाद श्रीगोपालभटट् जी ने पिता के छोटे भाई (चाचा जी) श्रीप्रबुद्ध जी(श्री प्रबोधानन्द जी)से दीक्षा ग्रहण की और शास्त्र अध्ययन करने लगे।कुछ दिन बाद श्रीप्रबुद्ध जी संसार से विरक्त होकर काशी चले गए।वे शंकरभाष्य से प्रभावित होकर मायावादी श्रीप्रकाशानंद सरस्वती नाम से प्रसिद्ध हुए।आगे चल कर उन्हीं का उद्धार कर श्रीमन्महाप्रभु जी ने पुनः श्रीप्रबोधानन्द नाम प्रदान कर उन्हेँ श्रीवृन्दावन जाने का आदेश दिया।

श्रीगोपालभटट् गौर-प्रेम में उन्मत्त हो श्रीवृन्दावन जाने के लिए उत्कण्ठित रहने लगे।दिन-रात हा गौर ! हा कृष्ण ! पुकार-पुकार कर वृन्दावन के लिए व्याकुल रहने लगे।अश्रु पुलकादि सात्त्विक भावों से विभूषित हो उठते।अन्त में अपने माता-पिता के देहावसान के बाद श्रीभटट् जी सब कुछ परित्याग कर वृन्दावन की ओर चल पड़े। यहाँ श्रीरूप-श्रीसनातन गोस्वामी के चरणों में आकर प्रणिपात किया।दोनों ने श्रीगोपाल को सप्रेम आंलिगन किया और अपने पास आश्रय दिया।

आप कुछ दिन श्रीराधाकुण्ड-श्यामकुण्ड के बीच केलि कदम्ब के नीचे वास करने के बाद जावट के पास किशोरी-कुण्ड पर भजन-साधन करते रहे।श्रीपाद रूप-सनातन ने नीलाचल में श्रीमन्महाप्रभु को पत्र द्वारा श्रीगोपालभट्ट जी के वृन्दावन आने की सूचना भेजी।श्रीमहाप्रभु जी अति प्रसन्न हुए एवं वहाँ से अपनी डोर, कोपीन, बहिर्वास व आसन श्रीगोपाल भट्ट के लिए प्रसाद रूप में भेजा जो आज भी श्रीराधारमण जी के मन्दिर में दर्शनीय हैं।

कुछ समय के बाद आप उत्तर-भारत में शुद्ध भक्ति का प्रचार-प्रसार करने के लिए यात्रा पर निकले।गण्डकी नदी पर एक दिन स्नान कर रहे थे।सूर्योपासना के लिए ज्यों ही आपने अञ्जलि में जल लिया तो एक अदभुत सुन्दर दामोदर शालिग्राम शिला आप की अञ्जलि में आ गई।इसी प्रकार दूसरी बार अञ्जलि में छोटी-बड़ी बारह शालिग्राम शिलाएँ आई।आप उन्हें लेकर ब्रज में लौट आए।यहाँ केशीघाट के निकट यमुना किनारे आप अति भाव-विभोर होकर शालिग्राम की पूजा करने लगे।

वृन्दावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृन्दावनस्थ तत्कालीन समस्त श्रीविग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण आदि भेंट किए। श्रीगोपाल भटट् जी को उसने वस्त्र-भूषण दिये, परन्तु श्रीशालिग्राम जी को कैसे वे धारण करायें।यह बात सोचते-सोचते आपको रात भर नींद नहीं आई।

*प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है। श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और श्रीराधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया।*

यही श्रीराधारमण लाल जी का विग्रह आज श्रीराधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है और इन्ही के साथ श्रीगोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख पूर्णिमा को शालिग्राम शिला से श्रीराधारमण जी प्रकट हुए।श्रीराधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी हैं। श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द "गोविन्द देव जी" के समान, वक्षस्थल "श्री गोपीनाथ" के समान तथा चरणकमल "मदनमोहन जी" के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है।

इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर एंव श्रीमन्महाप्रभु के भक्तिरस सिद्वान्तों के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक व्यक्तियों को दीक्षा-शिक्षा के द्वारा कृपापात्र बनाकर संवत् 1643 की श्रावण कृष्ण पञ्चमी अर्थात आज ही के दिन आप नित्य-लीला में प्रविष्ट हो गए।श्रीराधारमण घेरा में इनके परमाराध्य श्री श्रीराधारमण लाल जी के प्राकट्य-स्थल के पाश्र्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब उपलब्ध है।

सत्संग से क्या होता है ।१ - संत और भक्तों के आचरण प्रिय मालूम होते हैं और संतके आचरण एवं भक्तिकी प्राप्तिके लिये मन मचल ...
03/08/2026

सत्संग से क्या होता है ।
१ - संत और भक्तों के आचरण प्रिय मालूम होते हैं और संतके आचरण एवं भक्तिकी प्राप्तिके लिये मन मचल उठता है।

२ - भगवचर्चा, भगवद्गुणनाम कीर्तन, भगवद्गुणनाम श्रवण और भगवच्चिन्तन में मन लगता है।

३ - भगवान्के गुण, प्रभाव, रहस्य और प्रेमकी बातें सुननेसे तथा भजन करनेसे विषयासक्ति एवं भोगकामना का नाश होकर भगवान्में अनुरक्ति और भगवत्प्राप्ति की कामना होती है।

४-भोगोंसे सच्चा वैराग्य होता है, जिस से चित्त प्रमादशून्य, शान्त, प्रसन्न और ध्यानमय बन जाता है ।

५ - अन्तःकरणमें स्थित कामादि समस्त शत्रुओंका नाश होकर निर्भयता आदि दैवी सम्पदाके छब्बीस गुणोंकी उत्पत्ति तथा वृद्धि होती है।

६-अनुकूलता-प्रतिकूलता, राग- द्वेष, ममता - अहंकार और अज्ञानका नाश होता है।

७- स्वाभाविक ही तन, मन, धनसे संसारके जीवोंकी सेवा बनती है।

८ - सर्वत्र सब प्राणियोंमें सदा सर्वदा और सर्वथा भगवद्दर्शन होने लगते हैं।

९ - भगवान्का तत्त्वज्ञान होकर सनातन दिव्य आनन्द और परम शान्ति तथा दिव्य परम प्रेमकी प्राप्ति होती है।

१० - परम मधुर और परम आत्मीय अनन्त सौन्दर्य - माधुर्यके सागर भगवान्‌की परम सेवाके सामने मुक्ति भी तुच्छ प्रतीत होने लगती है।

ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਗੰਨੇ ਨੂੰ ਮਿੱਠਾਸ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਫਲ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ।ਸੋਨੇ ਨੂੰ ਚਮਕ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਖੁਸ਼ਬੂ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ।ਚੰਦਨ ਨੂੰ ਖੁਸ਼ਬੂ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਫੁ...
02/08/2026

ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਗੰਨੇ ਨੂੰ ਮਿੱਠਾਸ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਫਲ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ।
ਸੋਨੇ ਨੂੰ ਚਮਕ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਖੁਸ਼ਬੂ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ।
ਚੰਦਨ ਨੂੰ ਖੁਸ਼ਬੂ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਫੁੱਲ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ।
ਸਮੁੰਦਰ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ਾਲਤਾ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਮਿੱਠਾ ਪਾਣੀ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ।
ਨਦੀ ਨੂੰ ਮਿੱਠਾ ਪਾਣੀ ਦਿੱਤਾ, ਪਰ ਠਹਿਰਾਅ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ।
ਕਮਲ ਦੇ ਫੁੱਲ ਨੂੰ ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਉਸਨੂੰ ਚਿੱਕੜ ਵਿੱਚ ਖਿੜਾਇਆ।
ਸੂਰਜ ਨੂੰ ਰੌਸ਼ਨੀ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਠੰਢਕ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ।
ਚੰਦਰਮਾ ਨੂੰ ਠੰਢਕ ਦਿੱਤੀ, ਪਰ ਸੂਰਜ ਜਿੰਨੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ।

ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਿਰਜਣਹਾਰ ਨੇ ਹਰ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਵੀ ਕੁਝ ਗੁਣ ਦਿੱਤੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕੁਝ ਕਮੀ ਵੀ ਛੱਡੀ ਹੈ। ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਵਿਦਿਆ ਦਿੱਤੀ ਤਾਂ ਧਨ ਘੱਟ ਦਿੱਤਾ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਧਨ ਦਿੱਤਾ ਤਾਂ ਮਨ ਦੀ ਸ਼ਾਂਤੀ ਘੱਟ ਦਿੱਤੀ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਤਾਕਤ ਦਿੱਤੀ ਤਾਂ ਲੰਮੀ ਉਮਰ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ।

ਇਹ ਸਭ ਕੁਝ ਬਿਨਾਂ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਸ਼ਾਇਦ ਪਰਮਾਤਮਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਮਨੁੱਖ ਆਪਣੇ ਗੁਣਾਂ ਉੱਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਨਾ ਕਰੇ ਅਤੇ ਆਪਣੀਆਂ ਕਮੀਆਂ ਕਾਰਨ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਨਿਮਰ ਬਣਿਆ ਰਹੇ। ਅਭਾਵ ਹੀ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਧਰਤੀ ਨਾਲ ਜੋੜ ਕੇ ਰੱਖਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਿਮਰਤਾ ਸਿਖਾਉਂਦਾ ਹੈ।

ਇਸ ਲਈ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਜੋ ਕੁਝ ਵੀ ਮਿਲਿਆ ਹੈ, ਉਸ ਲਈ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਸ਼ੁਕਰਾਨਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਪਰ ਜੋ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ, ਜਿਸ ਦੀ ਕਮੀ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਲਈ ਵੀ ਉਸ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਕੇ ਧੰਨਵਾਦ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਕਿਉਂਕਿ ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਹਰ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਸ਼ੁਕਰਗੁਜ਼ਾਰ ਰਹਿਣਾ ਸਿੱਖ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਹੀ ਉਸ ਦਾ ਜੀਵਨ ਸੱਚੇ ਅਰਥਾਂ ਵਿੱਚ ਸੁਖੀ ਅਤੇ ਸੰਤੁਲਿਤ ਬਣਦਾ ਹੈ। 🙏

01/08/2026
भक्तिमति कृष्णमयी मीरा43-“जब मीरा ने पूछा — क्या श्याम सच में पत्थर के भीतर मुस्कुराते हैं?”“मूरत देखत मीरा, मन में उठे ...
19/07/2026

भक्तिमति कृष्णमयी मीरा
43-

“जब मीरा ने पूछा — क्या श्याम सच में पत्थर के भीतर मुस्कुराते हैं?”

“मूरत देखत मीरा, मन में उठे सवाल।
क्या मुस्कायो श्याम भी, पाषाण की यह चाल?”
मीरा जब मंदिर की मूर्ति को अपलक देखती है,
तो उसके भीतर यह सहज, मासूम प्रश्न उठता है —
क्या सचमुच श्याम इस पत्थर में मुस्कुरा रहे हैं?
या यह केवल उस भाव की अनुभूति है जो भक्त के भीतर जन्म लेता है?

मीरा अब संकेत रूप से चार वर्ष आठ महीने की हो चली थी।
उसके नेत्रों में अब पहले से अधिक ठहराव,
पहले से अधिक गंभीरता,
और कहीं-कहीं गहराई की ऐसी चमक थी
जैसे वह संसार से नहीं — श्याम के लोक से कोई छवि लाई हो।
वह अब प्रतिदिन मंदिर जाती थी —
ना दादी के कहने पर, ना नियमवश,
बल्कि स्वयं की पुकार पर।
सखियाँ अब पूजा में हँसी-ठिठोली करतीं,
कभी फूल उलझा देतीं,
कभी आरती को उल्टा पकड़ लेतीं —
पर मीरा,
अब हर भाव में एकांत ढूँढती थी।

एक संध्या, जब तुलसी के पास दीपक रखा गया,
मीरा चुपचाप मंदिर में प्रवेश कर गई।
कक्ष में कोई नहीं था,
सिर्फ वही…
और…
श्याम की मूर्ति।
मीरा उस मूरत को देखती रही —
माथे पर मोरपंख, अधरों पर मंद मुस्कान,
कंधे पर पीताम्बर, और बाँसुरी हाथों में।
वह छवि इतनी सुंदर थी
कि लगता — जैसे किसी स्वप्न को
साकार कर दिया गया हो।
पर मीरा का मन आज चंचल नहीं था,
वह भीतर से किसी प्रश्न में बँधा हुआ था।
धीरे-धीरे पास गई,
मूर्ति के सामने बैठ गई,
और एकटक देखने लगी।
उसके अधरों पर कोई ध्वनि नहीं थी,
पर हृदय में एक प्रश्न गूंज रहा था —

“श्याम…
क्या तुम इस मूर्ति में सच में हो?
क्या यह मुस्कान तुम्हारी है?
या मेरे मन की कल्पना?”
उसने अपनी छोटी-छोटी हथेलियाँ मूर्ति की ओर बढ़ाईं —
“तू बोलता क्यों नहीं?”
“तू हँसता क्यों नहीं?”
“जब सब कहते हैं कि भगवान मूर्ति में हैं,
तो क्या मैं भी यह मान लूँ?”
“पर श्याम,
क्या तुम पत्थर में वाकई मुस्कुराते हो?”
नीरवता में पूछती रही,
पाषाण क्यों न बोले।
मन सों कहत — तू ही है,
नेत्रन सों तो बोले।
मीरा ने मूर्ति के मुख की ओर देखा —
वहाँ मुस्कान थी,
पर स्थिर।
जैसे वर्षों से वैसी ही हो।
ना कम, ना अधिक।
मीरा उठ खड़ी हुई,
कंधे झुकाए,
दीवार से टिककर बोली —
“शायद यह सब झूठ है।
यह मूर्ति तो पत्थर की है,
इसमें कोई श्वास नहीं,
कोई ध्वनि नहीं।
तो मैं कैसे मान लूँ
कि तुम यहीं हो?”

उसी समय मंदिर के द्वार से एक संत आ रहे थे —
वह वही संत थे जिन्हें मीरा पहले भी फूलों और माला के समय देख चुकी थी।
उन्होंने मीरा की आँखों में वह प्रश्न पढ़ लिया।
मीरा ने धीरे से उनकी ओर देखा —
“बाबा, ये मूर्ति मुस्कुराती क्यों नहीं?
क्या श्याम इसमें हैं?”
साधु मुस्कराए —
“मीरा,
तू जो देख रही है,
वह सिर्फ एक छवि है —
पर जो तू महसूस कर रही है,
वही श्याम हैं।”

मीरा अचंभित —
“तो श्याम पत्थर में नहीं हैं?”
“बिलकुल नहीं!”
“तो फिर क्यों सब इन्हें पूजते हैं?”
“क्योंकि ये पत्थर नहीं हैं,
ये तुम्हारे भाव का दर्पण हैं।
श्याम वहाँ नहीं हैं,
जहाँ पत्थर है,
श्याम वहाँ हैं —
जहाँ प्रेम की दृष्टि है।”
मीरा ने फिर से मूर्ति की ओर देखा,
इस बार उसकी आँखों में प्रश्न नहीं था-
उत्सुकता थी।
कहीं गहराई से जानने की प्यास थी।
साधु ने कहा —
“एक दिन ऐसा आएगा
जब तू इसी मुस्कान में
अपने प्रश्न का उत्तर पा लेगी।
जब तेरा प्रेम इस हद तक जाएगा
कि तू मुस्कान नहीं पूछेगी,
बल्कि मुस्कान बन जाएगी।”

मीरा की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से मूर्ति की ओर देखा —
और कहा —
“तो मैं अब प्रतीक्षा करूँगी श्याम…
जब तुम स्वयं मेरे भीतर से बोलोगे।”
वह उठी,
दोनों हाथ जोड़े,
और पहली बार मूर्ति से कहा —
“तू अगर सच में है —
तो किसी दिन…
मेरे हृदय में मुस्कुरा देना।”

"क्या तू पाषाण में हँसता है?"

पाषाण में तू हँसत काहे, मीरा पुछत बात।
मूरत देखत नयन भराए, सजीव लागे छात।।
भाव बिनु मूरत न बोले, प्रेम बिनु प्रभु दूर।
नेत्रन सों जो देखे पीर, सो पावै नंदकिशोर।।
मन में उठे अधीर सवाल, तू कह क्यूँ न आयो?
श्याम रह्यो चुपचाप सदा, पर अंतर मुस्कायो।।
मीरा भटके भाव लिए, उत्तर पायो मौन।
प्रेम कहे – "मैं पास हूँ", पाषाण सों क्यों कौन?

उस दिन के बाद मीरा ने प्रतिदिन मंदिर जाना नहीं छोड़ा,
लेकिन अब वह मूर्ति से सवाल नहीं करती थी —
वह बैठती थी,
नेत्र मूंद लेती थी,
और शांति से उस मुस्कान की प्रतीक्षा करती थी,
जो अब कहीं बाहर नहीं —
भीतर से ही प्रकट होनी थी।

मीरा अब संकेत रूप से चार वर्ष दस महीने की हो चुकी थी।

मूरत तू बिनु बोलत नाहीं, पर भाव सों कहि जात।
नेत्रन भीतर झाँके कोई, तज दे संसय-घात।।
तेरा अधर न हँसे सदा, पर मन में हूक उठे।
श्याम अगर तू मौन रहे, तो मीरा कैसे टूटे?
मैंने पूछा दीप तले, तू बोलेगा कब मुझसे?
मौन तेरा उत्तर बन के, छू गया लहर तुझसे।।
जो देखा बाहर शून्य-सा, वही भीतर भर आया।
प्रेम बिना पाषाण रहा, प्रेम सों तू लहराया।।
श्याम! तू न मूर्ति में था, तू तो मेरे रोष में था।
मीरा हँसी न मांग रही, मीरा स्वयं अब हँसी बना।

सो जा मीरा, अब तू खोजे, वह मुस्कान अनंत।
पाषाण में जो झलक रही, अब मन में हो संत।
श्वासों में स्वर बाँध लिया, अब नयन रहे मौन।
श्याम तूझमें ही बसा है, प्रेम बने जो कौन।

चुपचाप जो भाव बहे, वही मूरत की बात।
शब्द नहीं, स्पंदन कहे — तू ही है प्रभु की जात।
मंदिर अब अंतर हुआ, मीरा अब साक्षी।
श्याम वहाँ मुस्काते हैं, जहाँ प्रेम है साची।

क्रमशः

*श्रीजगन्नाथ अष्टकम हिंदी अर्थ के साथ*कदाचित् कालिन्दी_तटविपिन_सङ्गीतकरवो मुदाभीरीनारी_वदनकमलास्वादमधुपः ।रमाशम्भुब्रह्म...
16/07/2026

*श्रीजगन्नाथ अष्टकम हिंदी अर्थ के साथ*

कदाचित् कालिन्दी_तटविपिन_सङ्गीतकरवो
मुदाभीरीनारी_वदनकमलास्वादमधुपः ।
रमाशम्भुब्रह्मा मरपतिगणेशार्चितपदो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥१॥

अर्थ
हे प्रभु ! आप कदाचित जब अति आनंदित होते है,तब कालिंदी तट के निकुंजों में मधुर वेणु नाद द्वारा सभी का मन अपनी ओर आकर्षित करने लगते हो, वह सब गोपबाल ओर गोपिकाये ऐसे आपकी ओर मोहित हो जाते है जैसे भंवरा कमल पुष्प के मकरंद पर मोहित रहता है, आपके चरण कमलो को जोकि लक्ष्मी जी, ब्रह्मा,शिव,गणपति ओर देवराज इंद्र द्वारा भी सेवित है ऐसे जगन्नाथ महाप्रभु मेरे पथप्रदर्शक हो,मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूळं नेत्रान्ते सहचर_कटाख्यं विदधते ।
सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥२॥

अर्थ
आपके बाए हस्त में बांसुरी है और शीश पर मयूर पिच्छ तथा कमर में पीत वस्त्र बंधा हुआ है, आप अपने कटाक्ष नेत्रों से तिरछी निगाहो से अपने प्रेमी भक्तो को निहार कर आनंद प्रदान कर रहे है, और अपनी लीलाओ का जो की वृन्दावन में आपने की उनका स्मरण करवा रहे है और स्वयं भी लीलाओ का आनंद ले रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बनकर मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नील शिखरे
वसनप्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रामध्यस्थः सकल सुरसेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥३॥

अर्थ
हे मधुसूदन ! विशाल सागर के किनारे, सूंदर नीलांचल पर्वत के शिखरों से घिरे अति रमणीय स्वर्णिम आभा वाले श्री पूरी धाम में आप अपने बलशाली भ्राता बलभद्र जी और आप दोनों के मध्य बहन सुभद्रा जी के साथ विध्यमान होकर सभी दिव्य आत्माओ, भक्तो और संतो को अपनी कृपा दृष्टि का रसपान करवा रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथपर्दशक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

कृपापारावारो सजलजलदोश्रेणिरुचिरो
रमावाणीरामः स्फुरदमलपद्मेख्यण सुख।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥४॥

अर्थ
जगन्नाथ स्वामी दया और कृपा के अथाह सागर है, उनका रूप ऐसा है जैसे जलयुक्त काले बादलो की गहन श्रंखला हो, अर्थात अपनी कृपा की वृष्टि करने वाले मेघो के जैसे है, आप श्री लक्ष्मी और सरस्वती को देने वाले भण्डार है, अर्थात आप अपनी कृपा से लक्ष्मी और सरस्वती प्रदान करते है,आपका मुख चंद्र पूर्ण खिले हुए उस कमल पुष्प के समान है जिसमे कोई दाग नहीं है अर्थात पूर्ण आभायुक्त खिले हुए पुण्डरीक के जैसा आपका मुखकमल है, आप देवताओ और साधु संतो द्वारा पूजित है, और उपनिषद भी आपके गुणों का वर्णन करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

रथारूढो गच्छन्पथि मिलितभूदेवपटलैः
स्तुति प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धुसुतया
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥५॥

अर्थ
हे आनंदस्वरूप ! जब आप रथयात्रा के दौरान रथ में विराजमान होकर जनसाधारण के मध्य उपस्थित होते हे तो अनेको ब्राह्मणो,संतो,साधुओ और भक्तो द्वारा आपकी स्तुति वाचन, मंत्रो द्वारा स्तुति सुनकर प्रसन्नचित भगवान् अपने प्रेमियों को बहुत ही प्रेम से निहारते हे,अर्थात अपना प्रेम वर्षण करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी लक्ष्मी जी सहित जोकि सागर मंथन से उत्पन्न सागर पुत्री है मेरे पथप्रदर्शक बने और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |

परंब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो
निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि ।
रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसुखो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥६॥

अर्थ
जगन्नाथ स्वामी आप ब्रह्मा के शीश के मुकुटमणि है, और आपके नेत्र कुमुदिनी की पूर्ण खिली हुयी पंखुड़ियों के समान आभा युक्त है, आप नीलांचल पर्वत पर रहने वाले है, आपके चरणकमल अनंत देव अर्थात शेषनाग जी के मस्तक पर विराजमान है, आप मधुर प्रेम रस से सराबोर हो रहे है जैसे ही आप श्रीराधा जी को आलिंगन करते है, जैसे कमल किसी सरोवर में आनंद पता है,ऐसे ही श्री जी का हृदय आपके आनंद को बढ़ाने वाला सरोवर है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक और शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं
न याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥७॥

अर्थ
हे मधुसूदन ! मैं न तो राज्य की कामना करता हूँ, ना ही स्वर्ण,आभूषण,कनक माणिक एवं वैभव की कामना कर रहा हूँ, न ही लक्ष्मी जी के समान सुन्दर पत्नी की अभिलाषा से प्रार्थना कर रहा हूँ, मैं तो केवल यही चाहता हूँ की प्रमथ पति (भगवान् शिव) हर काल में जिन के गुण का कीर्तन श्रवण करते है वही जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बने एवं शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥८॥

अर्थ
हे देवो के स्वामी, आप अपनी संसार की दुस्तर माया जोकि मुझे भौतिक सुख साधनो और स्वार्थ साधनो की आकांक्षा के लिए अपनी ओर घसीट रहे है, अर्थात अपनी ओर लालायित कर रहे है, उनसे मेरी रक्षा कीजिये, हे यदुपति ! आप मुझे मेरे पाप कर्मो के गहरे ओर विशाल सागर से पार कीजिये जिसका कोई किनारा नहीं नज़र आता है, आप दीं दुखियो के एकमात्र सहारा हो, जिस ने अपने आपको आपके चरण कमलो में समर्पित कर दिया हो, जो इस संसार में भटककर गिर पड़ा हो, जिसे इस संसार सागर में कोई ठिकाना न हो, उसे केवल आप ही अपना सकते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

आप सभी का दिन शुभ हो

16/07/2026

*आज भगवान श्रीजगन्नाथ जी की रथ यात्रा की सभी मित्रों को बहुत-बहुत बधाई !!*

श्री जगन्नाथ पुरी धाम में वर्ष में एक बार रथयात्रा की प्रथा है। इस यात्रा में रथ पर आरूढ़ हो भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर में वार्षिक भ्रमण पर जाते हैं और वहीं पन्द्रह दिन निवास करते हैं। नीलाचल क्षेत्र प्रतिनिधित्व करता है श्री द्वारिकापुरी का और गुण्डिचा प्रतिनिधित्व करता है श्रीवृन्दावन का। महाप्रभु श्रीराधारानी के भाव से भावित स्वयं ही प्रत्येक वर्ष रथयात्रा के समय अपने निज परिकर के साथ गुण्डिचा मन्दिर का मार्जन करते , इस भाव से कि विरही कृष्ण बहुत अन्तराल के पश्चात वृन्दावन पधार रहे हैं.........।

विरही श्रीकृष्ण का एक अन्तराल के पश्चात वृन्दावन धाम पधारना ही रथयात्रा का अन्तरंग कारण है।

नंदीघोष नामक रथ 45.6 फीट ऊंचा होता है जिसमें भगवान श्रीजगन्नाथ सवार होते हैं। तालध्वज नामक रथ 45 फीट ऊंचा होता है जिसमें श्री बलभद्र सवार होते हैं। दर्पदलन नामक रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है जिसमें देवी सुभद्रा सवार होती हैं।

ये रथ बड़े ही विशाल होते हैं तथा इन्हें रथ में सवार देव के सांकेतिक रंगों के अनुसार ही सजाया जाता है। देवों को लाने के लिए इन रथों को मंदिर के बाहर एक परंपरा के अनुसार ही खड़ा किया जाता जिसे पहंडी बीजे कहते हैं।

राजा स्वर्णिम झाडू से सफाई करता है। केवल तभी रथों को खींचा जाता है। ये तीनों देव गुंडिचा मंदिर में सात दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर इसी तरह से उन्हें वापस उनके मुख्य श्री मंदिर में लाया जाता है। इस प्रकार नौ दिनों तक चलने वाला इस रथ महोत्सव का विश्राम होता है।

रथयात्रा में अंतर्निहित एक भाव यह भी है कि मन्दिर में हिंदुओं के अतिरिक्त किसी का भी प्रवेश नहीं है और ठाकुर का नाम है जगन्नाथ । तो यह अपने नाम को सिद्ध करते हुए आज रथ पर बैठकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं जिससे सभी जाति वर्ग के लोग इनका वर्ष में कम से कम एक बार दर्शन करके आनन्दित हो सके और उनका जगन्नाथ नाम सार्थक हो सके।

श्रीजगन्नाथ जी की रथ यात्रा के विषय में कहा गया है कि -

'रथे चागमनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते'

अर्थात् रथ में विराजमान भगवान जगन्नाथ जी का दर्शन करके मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता।

आज प्रभु की इस दिव्य मधुर रसमयी लीला महोत्सव को हमारा शत-शत प्रणाम !!

भक्तिमति कृष्णमयी मीरा 10“नाम की लहर – मीरा के मन में गूँजता श्याम”रटन सों रच्यो अंतस में, नाम सों गूँजे प्राण।श्याम बसा...
14/06/2026

भक्तिमति कृष्णमयी मीरा
10

“नाम की लहर – मीरा के मन में गूँजता श्याम”

रटन सों रच्यो अंतस में, नाम सों गूँजे प्राण।
श्याम बसा ज्यों साँस में, बोले नामन धाम।।

मीरा ने एक बार ‘श्याम’ कहा,
और अब वही नाम उनके अंतस की साँसों में बस गया।
अब उनका मन, शब्द, दृष्टि, स्पर्श —
सब में बस एक ही नाम गूँजने लगा: श्याम!

अब हर समय मीरा ‘श्याम… श्याम…’ दोहराती रहती थीं।
कभी धीमे से गुनगुनातीं,
कभी खेलते-खेलते भी वही उच्चारण।

वो अब बोलना नहीं सीख रहीं,
बल्कि एक ही शब्द को
हर क्रिया में भावमय बना रहीं थीं।

दासी कहती —
“रानी जी, ये बालिका अब बाकी शब्दों में नहीं उलझती।
जो भी पूछो, उत्तर ‘श्याम’ ही देती है।”

माँ मुस्कुरातीं —
"अब तो उसका नाम, काम, सब श्याम हो गया है।"

मीरा अब हर बात में कहती बस ‘श्याम’ का प्यारा नाम,
ना माँ पुकारे तब भी बोले — “श्याम… श्याम… श्याम…”
गुड़िया लिए बैठी रहे, पर पुकारे ‘मोहन प्यारे’,
दीपक के संग भी बोले, “श्याम तुम्हीं उजियारे।”

ना रोये, ना माँगे कुछ, बस नाम में ही हँसती,
नाम सिखाया किसी ने नहीं, वो जन्मों की रट थी बसती।
श्याम अब न केवल नाम था, अब साँसों का गीत,
मीरा की हर धड़कन बोले — ‘श्याम’ ही है मीत।

“श्याम नाम की बनी रटन…”

श्याम नाम की बनी रटन,
मीरा बोले हर क्षण।
नींद में भी जपती धुन,
जैसे बंसी रचे हर पुन।
गुड़िया हिलाए – श्याम कहे,
दासी चिढ़ाए – श्याम सहे।
माँ पूछे – "क्या चाहिए?"
उत्तर मिले – "श्याम आईये!"
अब नहीं बाकी कोई बात,
मीरा का बस ‘श्याम’ है साथ।

अब मीरा के जीवन में नाम और स्वरूप एक हो चुके थे।
"श्याम" अब केवल उच्चारण नहीं,
एक आत्मिक अनुभूति बन चुका था।

मीरा अब उस अवस्था में थीं
जहाँ बच्चे चीजें पहचानते हैं,
मीरा आत्म-स्वरूप पहचान रही थीं।

यह "श्याम रटन" कोई जप नहीं था —
यह था जन्मों का अनुभव,
जो अब भाषा के रूप में बाहर आया।

क्रमश:

भक्तिमति कृष्णमयी मीरा11-“श्याम की मूरत से प्रथम साक्षात्कार”“नयन जुड़ावत नाथ छवि, उर बीच उठ्यो सनेह।बालि मन भावे मूरतो,...
14/06/2026

भक्तिमति कृष्णमयी मीरा
11-

“श्याम की मूरत से प्रथम साक्षात्कार”

“नयन जुड़ावत नाथ छवि, उर बीच उठ्यो सनेह।
बालि मन भावे मूरतो, रंग में भीगो नेह।”

मीरा ने पहली बार किसी मंदिर में श्रीकृष्ण की प्रतिमा को देखा।
वह छवि इतनी मधुर, इतनी शीतल थी कि उनके मन में प्रेम की एक रसधारा बह निकली।
वह रंगों और रूप से नहीं, भाव से भीग उठीं।

एक सुहानी संध्या थी। सूर्य अपनी अंतिम किरणों से धरती को छू रहा था।
मीरा की दादी ने छोटी मीरा को आलते में रंगे अपने हाथों में उठाया और कहा,
“आ चल लाली, आज तुझे ठाकुरजी के दर्शन कराऊँ।”
छोटी सी मीरा, फूलों जैसी कोमल, उत्सुकता भरे नयनों से चारों ओर देख रही थी।

रास्ते भर वो दादी से पूछती —
“श्याम कहाँ रहते हैं?”
“क्या वो मुझसे बात करेंगे?”
दादी मुस्करातीं और कहतीं — “रहते तो मंदिर में हैं, पर बस मन वालों के संग चलते हैं।”

मंदिर एकदम छोटा सा था — कच्ची मिट्टी की दीवारें, दीपों की हल्की लौ, तुलसी का गमकता पौधा।
घंटी की टनटन सुनते ही मीरा का हृदय जैसे काँप उठा।

दादी ने मीरा को गोद से उठाकर श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष खड़ा किया —
और वही क्षण था... वही अमृत क्षण...
जब मीरा की नन्हीं आँखों ने उस सौंदर्य को देखा जो किसी युग की कल्पना से परे था।

छोटे मुकुटधारी, मुरलीधर, पीतांबर पहने श्रीकृष्ण...
बिलकुल वैसे ही जैसे मीरा ने माँ की लोरी में सुना था।

मीरा का मन थम गया,
उसके नेत्र स्थिर हो गए,
हाथ जुड़ गए,
होठों पर न कोई मुस्कान थी, न कोई सवाल —
बस शांति थी... गहन प्रेम था।
मीरा ने एक टक देखा और धीरे से बोली —
“श्याम... मेरा…”

दादी आश्चर्य से भरकर देखती रह गईं।
मीरा वहीं ज़मीन पर बैठ गई और एकटक बस श्याम को देखती रही।
सारी दुनिया, राजघराना, खिलौने, कहानियाँ — सब उस पल से गायब हो चुके थे।
अब बस एक ही नाम था — गिरधर गोपाल।

मीरा के मन में मानो पिछले जन्मों की स्मृतियाँ जाग उठी थीं।
वह नन्ही बालिका अब कोई सामान्य बाल नहीं रही —
उसका मन, उसकी आत्मा — श्रीकृष्ण की छवि में समा चुकी थी।

‘सो जा मीरा, पलकें मूँद ले, श्याम तुझसे मिलने आएंगे।
बंसी की मीठी तान सुनाकर, धीरे से मन को बहलाएंगे।
नीले घोड़े पर बैठ के आयेंगे, पाँवों में घुंघरू सजाएँगे।
तेरे सपनों की रथ में बैठा, प्रेम की लोरी गाएंगे।

तेरी निंदिया चुरा के लेंगे, माखन की डली संग लाएँगे।
श्याम सजीवन साँझ बिछाकर, झूला चाँद पे झुलाएँगे।
तेरे मन की गहराई में, रंग प्रेम के बरसाएंगे।
सो जा मीरा, अब साँवरे तुझको, अपने गले लगाएंगे।

श्याम रूप की देखी छाया, मन जैसे हरषायो रे।
चुपके चुपके नैन झुकाए, अंतर गूंज्यो गायो रे।
घुँघराली वेणी मोहन की, मन में रस बरसाए रे।
कंचन जैसे चरण दिखाई, बालि मीरा लहराए रे।

पहली बार छवि देखी री, जीवन बन गयो गीत।
हर हरिधुन में हर्ष छलक्यो, प्रेम भयो नव मीत।
मुख ना बोले, हिय पुकारे, “श्याम अब आओ रे।”
मंदिर की वह मूरत बन गी, नित जीवन छायो रे।

गुंज उठी लोरी मम माई, थारे लाला आयो रे।
रंग बिरंगे फूल चढ़े, मीरा मन अर्पायो रे।
श्याम तोरे दरस को प्यासे, नयनों से नीर बहायो रे।
छोटे बालक रूप में मीरा, शुद्ध हृदय लुटायो रे।’
क्रमश:

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