जयजय श्रीश्यामाश्याम जी । भगवत कृपा । कृष्ण-प्रेम और राधा दास्य ।

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जयजय श्रीश्यामाश्याम जी । भगवत कृपा । कृष्ण-प्रेम और राधा दास्य । एक प्रयास विस्मृतियों के चिंतन का - अध्यात्म -धर्म - कर्म - भक्ति - भगवान को छुने का |
*उत्कण्ठा*

17/04/2026
*श्रीभक्त नामावली*हमसों इन साधुन सों पंगति।जिनको लेत दुःख छूटत, सुख लूटत तिन संगति ।।अग्रदास नाभादि सखी ये, सबै राम सीता...
01/04/2026

*श्रीभक्त नामावली*

हमसों इन साधुन सों पंगति।
जिनको लेत दुःख छूटत, सुख लूटत तिन संगति ।।

अग्रदास नाभादि सखी ये, सबै राम सीता की।
सूर मदनमोहन नरसी अली, तस्कर नवनीता की।।

मुख्य महंत काम रति गणपति, अज महेस नारायण।
सुर नर असुर मुनि पक्षी पशु, जे हरि भक्ति परायण।।

माधोदास गुसाईं तुलसी, कृष्णदास परमानन्द।
विष्णुपुरी श्रीधर मधुसूदन, पीपा गुरु रामानन्द ।।

वाल्मीकि नारद अगस्त्य शुक, व्यास सूत कुल हीना।
शबरी स्वपच वशिष्ठ विदुर, विदुरानी प्रेम प्रवीणा ||

अलि भगवान् मुरारि रसिक, श्यामानन्द रंका बंका।
रामदास चीधर निष्किंचन, सम्हन भक्त निसंका ।।

गोपी गोप द्रोपदी कुंती, आदि पांडवा ऊधो।
विष्णु स्वामी निम्बार्क माधो, रामानुज मग सूधो ।।

लाखा अंगद् भक्त महाजन, गोविन्द नन्द प्रबोधा।
दास मुरारि प्रेमनिधि विठ्ठलदास, मथुरिया योधा ।।

लालाचारज धनुरदास, कूरेश भाव रस भीजे।
ज्ञानदेव गुरु शिष्य त्रिलोचन, पटतर को कहि दीजे ।।

लालमती सीता प्रभुता, झाली गोपाली बाई।
सुत विष दियौ पूजि सिलपिल्ले, भक्ति रसीली पाई।।

पदमावती चरण को चारन्, कवि जयदेव जसीलौ।
चिंतामणि चिदरूप लखायो, बिल्वमंगलहिं रसिलौ।।

पृथ्वीराज खेमाल चतुर्भुज, राम रसिक रस रासा।
आसकरण मधुकर जयमल नृप, हरिदास जन दासा ।।

केशवभट्ट श्रीभट्ट नारायण, भट्ट गदाधर भट्टा।
विठ्ठलनाथ वल्लभाचारज, ब्रज के गूजरजट्टा ।।

सेना धना कबीरा नामा, कूबा सदन कसाई।
बारमुखी रैदास सभा में, सही न श्याम हंसाई।।

नित्यानन्द अद्वैत महाप्रभु, शची सुवन चैतन्या।
भट्ट गोपाल रघुनाथ जीव, अरु मधु गुसांई धन्या ।।

चित्रकेतु प्रह्लाद विभीषण, बलि गृह बाजे बावन।
जामवन्त हनुमन्त गीध गुह, किये राम जे पावन ।।

रूप सनातन भज वृन्दावन, तजि दारा सुत सम्पत्ति।
व्यासदास हरिवंश गोसाई, दिन दुलराई दम्पति ।।

प्रीति प्रतीति प्रसाद साधु सों, इन्हें इष्ट गुरु जानो।
तजि ऐश्वर्य मरजाद वेद की, इनके हाथ बिकानौ ।।

श्रीस्वामी हरिदास हमारे, विपुल विहारिणी दासी।
नागरि नवल माधुरी वल्लभ, नित्य विहार उपासी ।।

भूत भविष्य लोक चौदह में, भये होएं हरि प्यारे।
तिन-तिन सों व्यवहार हमारो, अभिमानिन ते न्यारे ।।

तानसेन अकबर करमैति, मीरा करमा बाई।
रत्नावती मीर माधो, रसखान रीति रस गाई।।

"भगवतरसिक" रसिक परिकर करि, सादर भोजन पावै।
ऊंचो कुल आचार अनादर, देखि ध्यान नहिं आवै।।

।।श्रीहरिः।।गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्करार विन्दे न पदार विन्दम् , मुखार विन्दे विनिवेश यन्तम् । वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम्...
01/04/2026

।।श्रीहरिः।।

गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्

करार विन्दे न पदार विन्दम् , मुखार विन्दे विनिवेश यन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम् , बालम् मुकुंदम् मनसा स्मरामि ॥ १ ॥

वट वृक्ष के पत्तो पर विश्राम करते हुए, कमल के समान कोमल पैरो को, कमल के समान हस्त से पकड़कर, अपने कमलरूपी मुख में धारण किया है, मैं उस बाल स्वरुप भगवान श्री कृष्ण को मन में धारण करता हूं ॥ १ ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २ ॥

हे नाथ, मेरी जिह्वा सदैव केवल आपके विभिन्न नामो (कृष्ण, गोविन्द, दामोदर, माधव ….) का अमृतमय रसपान करती रहे ॥ २ ॥

विक्रेतु कामा किल गोप कन्या, मुरारि – पदार्पित – चित्त – वृति ।
दध्यादिकम् मोहवशाद वोचद्, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३ ॥

गोपिकाये दूध, दही, माखन बेचने की इच्छा से घर से चली तो है, किन्तु उनका चित्त बालमुकुन्द (मुरारि) के चरणारविन्द में इस प्रकार समर्पित हो गया है कि, प्रेम वश अपनी सुध – बुध भूलकर “दही लो दही” के स्थान पर जोर – जोर से गोविन्द, दामोदर, माधव आदि पुकारने लगी है ॥ ३

गृहे गृहे गोप वधु कदम्बा, सर्वे मिलित्व समवाप्य योगम् ।
पुण्यानी नामानि पठन्ति नित्यम्, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४ ॥

घर – घर में गोपिकाएँ विभिन्न अवसरों पर एकत्र होकर, एक साथ मिलकर, सदैव इसी उत्तमोतम, पुण्यमय, श्री कृष्ण के नाम का स्मरण करती है, गोविन्द, दामोदर, माधव ॥ ४ ॥

सुखम् शयाना निलये निजेपि, नामानि विष्णो प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितम् तनमय – ताम व्रजन्ति, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५ ॥

साधारण मनुष्य अपने घर पर आराम करते हुए भी, भगवान श्री कृष्ण के इन नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण करता है, वह निश्चित रूप से ही, भगवान के स्वरुप को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

जिह्वे सदैवम् भज सुंदरानी, नामानि कृष्णस्य मनोहरानी ।
समस्त भक्तार्ति विनाशनानि, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६ ॥

हे जिह्वा, तू भगवान श्री कृष्ण के सुन्दर और मनोहर इन्हीं नामो, गोविन्द, दामोदर, माधव का स्मरण कर, जो भक्तों की समस्त बाधाओं का नाश करने वाले हैं ॥ ६ ॥

सुखावसाने इदमेव सारम्, दुःखावसाने इद्मेव गेयम् ।
देहावसाने इदमेव जाप्यं, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७ ॥

सुख के अन्त में यही सार है, दुःख के अन्त में यही गाने योग्य है, और शरीर का अन्त होने के समय यही जपने योग्य है, हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ॥ ७ ॥

श्री कृष्ण राधावर गोकुलेश, गोपाल गोवर्धन – नाथ विष्णो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८ ॥

हे जिह्वा तू इन्हीं अमृतमय नामों का रसपान कर, श्री कृष्ण ,अतिप्रिय राधारानी, गोकुल के स्वामी गोपाल, गोवर्धननाथ, श्री विष्णु, गोविन्द, दामोदर, और माधव ॥ ८ ॥

जिह्वे रसज्ञे मधुर – प्रियात्वं, सत्यम हितम् त्वां परं वदामि ।
आवर्णयेता मधुराक्षराणि, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९ ॥


हे जिह्वा, तुझे विभिन्न प्रकार के मिष्ठान प्रिय है, जो कि स्वाद में भिन्न – भिन्न है। मैं तुझे एक परम् सत्य कहता हूँ, जो की तेरे परम हित में है। केवल प्रभु के इन्हीं मधुर (मीठे) , अमृतमय नामों का रसास्वादन कर, गोविन्द , दामोदर , माधव ॥ ९ ॥

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे, समागते दण्ड – धरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या , गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १० ॥

हे जिह्वा, मेरी तुझसे यही प्रार्थना है, जब मेरा अंत समय आए, उस समय सम्पूर्ण समर्पण से इन्हीं मधुर नामों लेना , गोविन्द , दामोदर , माधव ॥ १० ॥

श्री नाथ विश्वेश्वर विश्व मूर्ते,श्री देवकी – नन्दन दैत्य – शत्रो ।
जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव, गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११ ॥

हे प्रभु , सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी , विश्व के स्वरुप , देवकी नन्दन , दैत्यों के शत्रु , मेरी जिह्वा सदैव आपके अमृतमय नामों गोविन्द , दामोदर , माधव का रसपान करती है ॥ ११ ॥

राधारमण सदा हमको प्यारे रहेंहम उन्हीं के रहें वो हमारे रहें
13/02/2026

राधारमण सदा हमको प्यारे रहें
हम उन्हीं के रहें वो हमारे रहें

श्रीवृन्दावन शत बयालीस लीला✍️श्रीहित ध्रुवदास जू की बानीभाषा दोहा पदावलीमति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।सिंधु अगम जि...
12/02/2026

श्रीवृन्दावन शत बयालीस लीला
✍️श्रीहित ध्रुवदास जू की बानी

भाषा दोहा पदावली
मति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।
सिंधु अगम जिहिं पार नहिं, कैसैं सीप समात।।113।।
या मन के अवलंब हित, कीन्हौ आहि उपाइ।
वृंदावन रस कहन में , मति कबहूँ उरझाइ।।114।।
सोलह सै ध्रुव छ्यासिया, पून्यौ अगहन मास।
यह प्रबंध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास।।115।।
दोहा वृंदाविपिन के , इकसत षोडस आहि।
जौ चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि।।116।।

श्रीवृन्दावन शत बयालीस लीला✍️श्रीहित ध्रुवदास जू की बानीभाषा दोहा पदावलीप्रेम सिंधु वृंदाविपिन, जाकौ अंत न आदि।जहाँ कलोल...
12/02/2026

श्रीवृन्दावन शत बयालीस लीला
✍️श्रीहित ध्रुवदास जू की बानी

भाषा दोहा पदावली
प्रेम सिंधु वृंदाविपिन, जाकौ अंत न आदि।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किसोर अनादि।।109।।
न्यारौ चौदह लोक ते, वृंदावन निजु भौन।
तहाँ न कबहुँ लगत है, महाप्रलय की पौन।।110।।
महिमा वृंदा विपिन की, कहि न सकत मम जीह।
जाके रसना द्वै सहस, तिन हूँ काढ़ी लीह।।111।।
एती मति मोपै कहाँ, सोभा निधि वनराज।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज।।112।।

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