01/01/2026
इंसानियत की तलाश में जयपुर की एक सच्ची कहानी…😰
दिनांक 28 दिसंबर 2025 को
मेरे साथी Imran Nazeer Khan को बिहार से उनके साथी Sarfaraz Nazeer का कॉल आता है। कॉल करने वाले बताते हैं कि जयपुर के पास रिंग रोड हाईवे पर एक भीषण सड़क हादसा हुआ है। हादसे में घायल व्यक्ति को गंभीर हालत में एसएमएस हॉस्पिटल, जयपुर के ट्रॉमा सेंटर ICU में भर्ती कराया गया है। घायल का नाम शमशेर आलम था, जो गया जिला, बिहार के रहने वाले थे।
शमशेर आलम साहब रोज़ी-रोटी के लिए बस में कंडक्टर/क्लीनर का काम करते थे। वे अपने परिवार—बीवी और बच्चों—के साथ अजमेर दरगाह ज़ियारत के लिए आए थे। वापसी के दौरान जयपुर के पास बस से उतरकर टायर देखने के दौरान एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी और चालक मौके से फरार हो गया। हादसे में उनके सिर और शरीर पर गहरी चोटें आईं।
इमरान भाई लगातार उनके अहल-ए-ख़ाना (परिजनों) के संपर्क में रहे। इलाज के दौरान जो भी ज़रूरत पड़ी, भरसक मदद की गई। शुरुआत में जब खून की ज़रूरत हुई, तो किसी तरह इंतज़ाम कर लिया गया।
लेकिन 31 दिसंबर 2025 को अस्पताल प्रशासन की तरफ़ से अर्जेंट AB पॉज़िटिव लाइव डोनर की माँग की गई 2 यूनिट ब्लड के लिए।
इसके लिए सोशल मीडिया पर अपील की गई, अलग-अलग ग्रुपों में पोस्ट डाली गई और कई लोगों को व्यक्तिगत तौर पर कॉल किए गए।
अफसोस की बात यह रही कि इतने बड़े शहर जयपुर में—जहाँ आए दिन बड़े-बड़े ब्लड डोनेशन कैंप लगते हैं—एक गरीब और परदेसी मुसाफ़िर के लिए एक भी लाइव रक्तदाता नहीं मिल पाया।
यह हमें सोचने पर मजबूर करता है—
क्या हमारे रक्तदान सिर्फ पोस्टर, बैनर और दिखावे तक ही सीमित रह गए हैं?
31 दिसंबर की रात किसी तरह बात बनी कि 1 जनवरी 2026 की सुबह अस्पताल जाकर खून दे दिया जाएगा।
लेकिन अल्लाह को कुछ और ही मंज़ूर था।
1 जनवरी 2026, सुबह लगभग 11 बजे
इमरान भाई का कॉल आता है—
शमशेर आलम साहब का इंतक़ाल हो चुका था।
बेशक ज़िंदगी और मौत का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है।
मगर इंसान होने के नाते दिल यह सवाल ज़रूर करता है—
अगर वक्त रहते खून मिल जाता, तो शायद एक कोशिश और हो सकती थी।
इसके बाद एक और इम्तिहान शुरू हुआ—
पोस्टमार्टम, काग़ज़ी कार्रवाई और जनाज़े की सुपुर्दगी।
परिवार परदेसी था, गरीब था, जयपुर में उनका कोई अपना नहीं था। उनके साथ एक 13-14 साल का नाबालिग बेटा भी था, जो खून देने के क़ाबिल नहीं था।
जब कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो इमरान नज़ीर भाई और मैं ख़ुद अस्पताल पहुँचे। हालात को समझा और मजबूरी में जयपुर के एक माननीय विधायक से संपर्क किया। प्रशासनिक देरी और स्थिति से उन्हें अवगत कराया गया।
इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई की और लगभग दोपहर 3 बजे तमाम काग़ज़ी कार्यवाही पूरी कर शमशेर आलम साहब का जनाज़ा उनके अहल-ए-ख़ाना के हवाले कर दिया गया और उन्हें उनके गांव जिला गया (बिहार) के लिए रवाना किया गया।
यह वाक़िआ सिर्फ़ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक सबक़ है।
जयपुर जैसे बड़े शहर में, जहाँ पढ़े-लिखे लोग हैं, तंजीमें हैं, राजनीतिक दल हैं—अगर एक गरीब परदेसी मुसाफ़िर को वक्त पर खून और सहारा नहीं मिल पाता, तो यह हमारे ज़मीर पर सवाल है।
शमशेर आलम साहब अपने घर के इकलौते कमाने वाले थे। उनके चार बच्चे हैं और परिवार की माली हालत बेहद कमज़ोर है। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि ट्रक की पहचान कर क्लेम की कार्रवाई की जाएगी, लेकिन तब तक उनके घर का चूल्हा कैसे जलेगा—यह हम सबको सोचना होगा।
इसलिए मेरी आप सभी से पुरख़ुलूस गुज़ारिश है—
दिखावटी ब्लड डोनेशन कैंपों से आगे बढ़िए।
जब अस्पताल से कॉल आए, जब किसी मजबूर और परदेसी परिवार को खून की ज़रूरत हो—तो आगे बढ़कर मदद कीजिए।
और अगर मुमकिन हो, तो शमशेर आलम साहब के अहल-ए-ख़ाना की माली मदद भी कीजिए।
₹1 हो या ₹500—अल्लाह नियत देखता है, रकम नहीं। आप इन दोनों बारकोड को स्कैन कर के मदद कर सकते है 2 बारकोड इस लिए दिए है अगर एक कि ट्रांजेक्शन लिमिट पूरी हो जाए तो दूसरे पर ट्रांसफर किया जा सके।
अल्लाह तआला मरहूम शमशेर आलम साहब की मग़फ़िरत फ़रमाए,
उनके घरवालों को सब्र-ए-जमील अता करे,
और हमें इंसानियत पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे।
आमीन।
—
अकरम ख़ान कायमखानी
(यह कहानी मैंने खुद देखी, सुनी और महसूस की — सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा और इंसानियत के लिए)
Aayisha Siddiqa EducationTrust Pappu Qureshi Pappu Qureshi Yunas Chopdar fans Mohammed Siraj