27/04/2026
नमस्ते, मैं डॉ. अनिल तांबी हूँ।
आज मैं आपसे अपने 35 साल के क्लिनिकल अनुभव और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में जो हम क्लिनिक में देखते हैं, उसके आधार पर कुछ बहुत ही गहरी और ज़रूरी बातें साझा करना चाहता हूँ। अक्सर मेरे पास जयपुर में लोग आते हैं, अपनी पारिवारिक उलझनों को लेकर, अपने बच्चों के व्यवहार को लेकर या फिर अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी में बढ़ती कड़वाहट को लेकर। हम अक्सर बीमारियों का इलाज तो दवाइयों या आधुनिक तकनीकों जैसे 'डीप टीएमएस' (Deep TMS) से कर लेते हैं, लेकिन मन के जो घाव और रिश्तों की जो गाँठें हैं, उन्हें खोलने के लिए हमें अपनी सोच और व्यवहार के 'एसओपी' (SOPs) यानी काम करने के तरीकों को बदलना होगा।
आज की यह चर्चा थोड़ी लम्बी होगी, लेकिन मेरा यकीन मानिए, अगर आप इसे पूरा पढ़ेंगे और समझेंगे, तो आप अपने घर के माहौल को पूरी तरह बदलने की ताकत रखेंगे।
1. 'मोह' और 'प्यार' का भ्रम: असली समस्या क्या है?
हमारे समाज में हम अक्सर 'मोह' (Attachment/Possession) और 'प्यार' (True Love) के बीच का अंतर भूल जाते हैं। जब हम क्लिनिक में परिवारों से बात करते हैं, तो हमें दिखता है कि ज़्यादातर झगड़ों की जड़ 'मेंटल पज़ेशन' (Mental Possession) यानी मानसिक कब्ज़ा है।
हम सोचते हैं कि हम अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन असल में वह अक्सर 'मोह' होता है। मोह क्या है? मोह आपको 'पकड़ना' सिखाता है—"यह मेरा बच्चा है, इसे मेरी बात माननी ही होगी", "यह मेरा पति है, इसे मेरे हिसाब से चलना होगा"। मोह में एक किस्म की 'पज़ेसिवनेस' होती है। माएँ अपने बेटों पर कब्ज़ा करना चाहती हैं, पति पत्नियों पर, और यहाँ तक कि बच्चे भी माँ-बाप पर कब्ज़ा जमाना चाहते हैं।
लेकिन प्यार बिल्कुल अलग है। प्यार 'छोड़ना' सिखाता है। प्यार कहता है कि मैं तुम्हारी परवाह करता हूँ, लेकिन तुम अपनी ज़िन्दगी अपनी मर्ज़ी से जीने के लिए आज़ाद हो। मोह में अगर सामने वाला आपकी बात न माने, तो आपको दुख होता है, गुस्सा आता है। प्यार में आप सामने वाले की खुशी में अपनी खुशी ढूँढते हैं।
अक्सर क्लिनिक में माएँ रोती हैं कि "डॉक्टर साहब, मैंने इसके लिए क्या-कुछ नहीं किया, और आज यह मेरी बात नहीं सुनता।" यहाँ समझने वाली बात यह है कि आपने जो किया, वह मोह की वजह से किया या प्यार की वजह से? अगर वह प्यार होता, तो आज आपको इतना दुख नहीं होता, क्योंकि प्यार में कोई शर्त नहीं होती। मोह हमेशा 'रिटर्न' माँगता है।
2. प्यार के चार खम्भे: एक क्लिनिकल नज़रिया
अगर हमें अपने रिश्तों को सुधारना है, तो हमें प्यार को चार हिस्सों में बाँटकर देखना होगा। अगर इनमें से एक भी गायब है, तो वह सच्चा प्यार नहीं है:
1. परवाह (Care): क्या आप वाकई सामने वाले की ज़रूरतों को समझते हैं? क्या आप उसकी मानसिक और शारीरिक सेहत का ख्याल रखते हैं?
2. सम्मान (Respect): यह सबसे ज़रूरी है। क्या आप अपने पार्टनर या बच्चे की अलग सोच का सम्मान करते हैं? अगर उनका विचार आपसे अलग है, तो क्या आप उन्हें 'गलत' या 'बदतमीज़' करार दे देते हैं?
3. ज़िम्मेदारी (Responsibility): एक-दूसरे के प्रति आपकी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं? क्या आप उन्हें बोझ समझकर पूरा कर रहे हैं या दिल से?
4. ज्ञान (Knowledge): क्या आप सामने वाले को गहराई से जानते हैं? उसकी पसंद, उसके डर, उसकी उम्मीदें?
मोह में हम अक्सर सम्मान खो देते हैं। मैंने देखा है कि मोह के चक्कर में माएँ अपने बच्चों की बदतमीज़ियाँ भी सह लेती हैं। बच्चा गाली दे रहा है, लेकिन माँ फिर भी उसे परांठे खिला रही है। यह प्यार नहीं है, यह मोह है। प्यार होता, तो आप उसे सिखाते कि "बेटा, मैं तुम्हारी केयर करती हूँ, लेकिन अगर तुम मेरा सम्मान नहीं करोगे, तो मैं यह बर्दाश्त नहीं करूँगी।" प्यार में अनुशासन (Discipline) होता है, मोह में सिर्फ़ अंधी भावनाएँ होती हैं।
3. पैरेंटिंग: बच्चों की रचनात्मकता के दुश्मन—आलोचना और रिमाइंडर्स
आजकल के माता-पिता बहुत परेशान हैं कि बच्चे 'स्क्रीन एडिक्ट' हो रहे हैं या पढ़ाई नहीं कर रहे। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे घरों का माहौल कैसा है?
पैरेंटिंग के मामले में दो चीज़ें ऐसी हैं जो बच्चों की मानसिक सेहत और उनकी रचनात्मकता (Creativity) को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं:
पहला है लगातार रिमाइंडर्स (Constant Reminders): "ब्रश कर लिया?", "दूध पी लो", "सीधे बैठो", "होमवर्क किया?"। हम बच्चों को रोबोट बना देते हैं। उन्हें खुद सोचने का मौका ही नहीं देते। जब हम लगातार टोकते हैं, तो बच्चे का दिमाग 'रिबेल' (Rebel) मोड में चला जाता है। वह सोचना बंद कर देता है और सिर्फ़ आपकी आवाज़ को 'इग्नोर' करना सीख जाता है।
दूसरा है आलोचना (Criticism): "तुमसे कुछ नहीं होगा", "तुम नालायक ही रहोगे", "पड़ोसी के बच्चे को देखो"। ये शब्द बच्चे के सबकॉन्शियस माइंड में घर कर जाते हैं। वह मान लेता है कि वह वाकई बुरा है।
जयपुर के मेरे अनुभव में, मैंने देखा है कि माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाएँ बच्चों पर थोपते हैं। अगर बच्चा कुछ अलग करना चाहता है, तो उसे दबा दिया जाता है। हमें बच्चों में 'जिज्ञासा' (Curiosity) पैदा करनी चाहिए, न कि उन पर नियम थोपने चाहिए। अगर बच्चा बारिश में नहाना चाहता है, तो उसे नहाने दीजिए। हम डरते हैं कि वह बीमार हो जाएगा, लेकिन असल में हम अपनी 'कम्फर्ट ज़ोन' को बचा रहे होते हैं। उसे ज़िन्दगी को महसूस करने दीजिए।
4. सांस्कृतिक बेड़ियाँ और 'शर्म' का बोझ
हम अक्सर उन आदतों को ढोते रहते हैं जो हमें अपने पूर्वजों से मिली हैं। इसे हम 'फैमिली ऑफ ओरिजिन' (Family of Origin) कहते हैं। हमारे दादा-परदादा की सोच, उनकी पसंद-नापसंद, उनके डर—सब हमारे जीन्स और हमारे व्यवहार में समाए हुए हैं।
भारतीय समाज में 'शर्म' का बहुत बड़ा रोल है। "बड़ों के सामने मत बोलो", "चाहे वह गलत हों, चुप रहो"। यह सोच हमें सच बोलने से रोकती है। अगर कोई बड़ा गलत कर रहा है, तो भी हम उसे नहीं टोकते क्योंकि "संस्कार" आड़े आ जाते हैं। लेकिन क्या गलत को सहना संस्कार है?
हमें अपनी सोच को आधुनिक बनाना होगा। पुराने रीति-रिवाज तब तक अच्छे हैं जब तक वे समाज को जोड़ते हैं, लेकिन अगर वे रिश्तों में ज़हर घोल रहे हैं, तो उन्हें बदलने का साहस हमें दिखाना होगा। हमें 'चौधराहट' और 'पावर' के पीछे भागने वाले कल्चर से निकलकर 'इन्सानियत' और 'तर्क' (Logic) वाले कल्चर की तरफ बढ़ना होगा।
5. खुशी की तलाश और दिमाग का विज्ञान
हम अक्सर खुशी को चीज़ों में ढूँढते हैं—बड़ी गाड़ी (BMW), महंगा फोन (iPhone), ब्रांडेड जूते (Nike)। हम सोचते हैं कि ये चीज़ें हमें खुश करेंगी। लेकिन यह खुशी सिर्फ़ कुछ घंटों या दिनों की होती है।
वैज्ञानिक तौर पर देखें, तो खुशी हमारे दिमाग के 'हार्मोन' (Hormones) से जुड़ी है। जब हम किसी की मदद करते हैं या कुछ नया सीखते हैं, तो हमारे दिमाग में 'डोपामाइन' और 'सेरोटोनिन' जैसे अच्छे हार्मोन रिलीज़ होते हैं। लेकिन जब हम गुस्से में होते हैं या किसी के बारे में बुरा सोचते हैं, तो 'कोर्टिसोल' (Stress Hormone) का लेवल बढ़ जाता है, जो हमारे शरीर को अंदर से बीमार करता है।
खुशी का संबंध इस बात से नहीं है कि आप महल में रह रहे हैं या झोंपड़ी में। खुशी का संबंध आपकी 'सोच' से है। अगर आपकी सोच सकारात्मक है, तो आप हर हाल में स्वर्ग बना लेंगे। लेकिन अगर आपकी सोच में ज़हर है, तो आप करोड़ों की दौलत के बीच भी नर्क में रहेंगे।
6. लक्ष्य निर्धारण (Goal Setting): रिश्तों की एसओपी
ज़िन्दगी में जैसे हम बिज़नेस के लिए प्लान बनाते हैं, वैसे ही परिवार के लिए भी गोल सेट करने चाहिए। अक्सर झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि हमारे पास कोई साझा लक्ष्य (Shared Goals) नहीं होता।
पति-पत्नी को बैठकर बात करनी चाहिए कि अगले 5 साल में हम अपने परिवार को कहाँ देखना चाहते हैं? हम अपने बच्चों को कौन-सी वैल्यूज़ देना चाहते हैं? सिर्फ़ "पढ़ाई करो" कहना काफी नहीं है। हमें उन्हें यह सिखाना होगा कि 'इन्सान' कैसे बनना है।
एक और बड़ी समस्या है—'अफेयर्स' (Affairs)। अक्सर लोग बाहर खुशी ढूँढते हैं क्योंकि वे घर में संतुष्ट नहीं होते। अगर घर में संवाद (Communication), सम्मान और शारीरिक-मानसिक संतुष्टि हो, तो किसी को बाहर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। हम अक्सर अपने पार्टनर की कमियों को देखते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि हमने उन्हें कितना समय और प्यार दिया है।
7. आने वाली पीढ़ी के लिए हमारा योगदान
मैं अक्सर सोचता हूँ कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जा रहे हैं? सिर्फ़ बैंक बैलेंस और ज़मीन-जायदाद? नहीं, वह सबसे कम ज़रूरी चीज़ें हैं। सबसे ज़रूरी है 'जीवन जीने की कला' और 'मानसिक मज़बूती'।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि गलतियों से कैसे सीखना है। हमें उन्हें यह यकीन दिलाना होगा कि वे अपनी सोच से अपनी तकदीर बदल सकते हैं। उन्हें आलोचना के बजाय प्रोत्साहन दीजिए। उन्हें बताइए कि 'इमोशनल इंटेलिजेंस' किताबी ज्ञान से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
निष्कर्ष: बदलाव की शुरुआत आपसे है
मेरे प्यारे दोस्तों, यह सब बातें सुनने में शायद सरल लगें, लेकिन इन्हें अपनी ज़िन्दगी में उतारना एक तपस्या है। हमें अपने 'अहंकार' (Ego) को छोड़ना होगा। हमें यह मानना होगा कि हम भी गलत हो सकते हैं।
अगर आज आपका घर क्लेश का अड्डा बना हुआ है, तो एक बार रुककर सोचिए—क्या आप वहाँ 'मोह' की पकड़ मज़बूत कर रहे हैं या 'प्यार' की खुशबू फैला रहे हैं? क्या आप सिर्फ़ टोकने वाले माता-पिता हैं या समझने वाले दोस्त?
महिलाएं अपनी सास श्वसुर को यह कह कर बेइज्जत करती है कि जब मैं ब्याह हो कर आई तो मेरा सम्मान नहीं किया, सास अपनी बड़ी बहु या छोटी बहु को ज्यादा तवज्जो देती है, जबकि इनके रोटी पानी की व्यवस्था मैं करती हूं। जबकि सास या श्वसुर की विवशता होती है कि वो सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश में किसी को भी साथ नहीं ले पाते, बल्कि सभी बहुएं उसकी दुश्मन हो जाती है।
याद रखना, इस दौर से तुमको भी गुजरना है। आज भले ही तुमको लग रहा होगा कि मुझे किसी की जरूरत नहीं है, तुम्हारी बच्चे सब देख रहे हैं, बहुएं भी देखेंगी। वही तुमको मिलेगा। यही संसार का नियम है। और जो अकेलापन तुम्हारी सास या श्वसुर आज झेल रहे हैं, तुमको भी झेलना होगा। आज भले ही लगता हो कि हम झेल लेगें, लेकिन यह वक़्त बतायेगा और तब तुम्हें अपना किया याद आएगा। पछतावा होगा, लेकिन वक्त निकल चुका होगा।। बुजूर्गों का सम्मान कीजिये, तब ही बच्चे बहु तुम्हारा सम्मान करेगें। वर्ना तुम लोग बहुत गंदे समय बर्दाश्त करने के लिए तैयार रहिये। परिवार और परिजनों के प्रति नफरत और घृणा तुमको पतन पर ले जायेगी।
पुरानी बातों को ignore कीजिए, सब मिलजुल कर रहो, एक दूसरे की खराब बातों की उपेक्षा कीजिए, भूल जाओ अच्छी बातों को याद रखिये, यह मत भूलिए परिवार परिवार होता है, भले ही वो देवयानी हो या जिठानी हो, सास हो या श्वसुर, सभी से बना कर हंसता खेलता रिश्ता बना कर रखो..बच्चे वहीं से सबक लेगें, वर्ना आपके दोनों तीनों बच्चे भी उसी नफरत से जियेगें, जिस नफरत को तुम लोगों ने जन्म दिया है।।
ज़िन्दगी बहुत छोटी है। इसे कड़वाहट और पुराने दुखों में मत बिताइए। आज ही अपने परिवार के साथ बैठिए, बिना किसी शिकायत के, बिना किसी ताने के। सिर्फ़ सुनिए। जब आप सुनना शुरू करेंगे, तो आधी समस्याएँ अपने आप खत्म हो जाएँगी।
मैं क्लिनिक में हर रोज़ लोगों को टूटे हुए देखता हूँ, और मेरा यकीन मानिए, ज़्यादातर का इलाज दवाई नहीं, सिर्फ़ थोड़ी-सी समझ और नज़रिया बदलना है। हम जयपुर को मानसिक तौर पर स्वस्थ बनाने का जो सपना देखते हैं, उसकी शुरुआत आपके घर से होती है।
स्वस्थ रहें, खुश रहें और अपनों को सिर्फ़ प्यार दें, मोह नहीं।
आपका अपना,
डॉ. अनिल तांबी
(मनोचिकित्सक, जयपुर)