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30/07/2026
08/07/2026

VB-GRAM G के प्रस्तावित नियमों में बेनकाब होता मज़दूर-विरोधी चरित्र: डॉ. विक्रम सिंह

VB-GRAM G को लागू करने के नियमों पर एक सरसरी नज़र डालें तो इस कानून को लेकर हमारी सारी शंकाएँ सही साबित होती है। दरअसल ये नियम VB-GRAM G की असलियत को और साफ़ करते हैं; यह मनरेगा की तरह काम का अधिकार नहीं देता, बल्कि एक ऐसी रोज़गार योजना है जिसमें सारी शक्तियाँ केंद्र के पास हैं और ग्रामीण भारत में मज़दूरों की काम की माँग के अनुसार फंड देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

पूरे देश में ग्रामीण और खेत मज़दूरों तथा उनके संगठनों के भारी विरोध के बावजूद भाजपा-नीत केंद्र सरकार VB-GRAM G को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके तहत ग्रामीण विकास मंत्रालय ने VB-GRAM G को लागू करने के लिए नियमों का मसौदा जारी किया है। इस मसौदे में VB-GRAM G योजना के तहत मज़दूरी के भुगतान, बेरोज़गारी भत्ते, राज्यों को फंड आवंटन और योजना के क्रियान्वयन की निगरानी से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। नियमों का यह ड्राफ्ट 23 मई को जारी किया गया था और जनता से सुझाव व संशोधनों के लिए एक महीने का समय दिया गया था। इसके साथ ही यह अधिसूचना भी जारी की गई है कि 1 जुलाई से मनरेगा समाप्त हो जाएगा और इसके तहत होने वाले सभी कार्य VB-GRAM G के अंतर्गत किए जाएंगे। अर्थात, मनरेगा और VB-GRAM G के बीच जो संक्रमण काल (transition period) था, वह अब खत्म हुआ, समझें।

VB-GRAM G को लागू करने के नियमों पर एक सरसरी नज़र डालें तो इस कानून को लेकर हमारी सारी शंकाएँ सही साबित होती है। दरअसल ये नियम VB-GRAM G की असलियत को और साफ़ करते हैं; यह मनरेगा की तरह काम का अधिकार नहीं देता, बल्कि एक ऐसी रोज़गार योजना है जिसमें सारी शक्तियाँ केंद्र के पास हैं और ग्रामीण भारत में मज़दूरों की काम की माँग के अनुसार फंड देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। इन नियमों से ज्यादा स्पष्ट हो गया है कि VB-GRAM G मांग पर आधारित कानून नहीं है (मनरेगा की यही सबसे बड़ी खासियत थी जो इसे काम का अधिकार बनाती थी) और जनता को गुमराह करने के लिए इसमें किया गया 125 दिन का दावा बिलकुल ही झूठा है।

वित्त आयोग का फार्मूला और रोजगार गारंटी का टकराव: पहले हम VB-GRAM G में फण्ड के आवंटन को लेते हैं। नियम 396 (E) में कहा गया है कि केंद्र सरकार वस्तुनिष्ठ मापदंडों (normative allocations) के आधार पर, प्रत्येक राज्य के लिए फण्ड का मानक आवंटन निर्धारित करेगी। हालांकि यह कानून पहले ही 'मांग-आधारित' व्यवस्था से बदलकर 'फंड आवंटन-आधारित' व्यवस्था में बदल चुका है, जिसमें केंद्र सरकार केवल 60 प्रतिशत राशि का भुगतान करती है लेकिन यह नियम तो और ज्यादा समस्याग्रस्त है। नियम के अनुसार, "प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए प्रामाणिक आवंटन निर्धारित करने के प्रयोजनार्थ, केंद्रीय सरकार सोलहवें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित तथा भारत सरकार द्वारा स्वीकृत, राज्यों के बीच क्षैतिज हस्तांतरण हेतु प्रयुक्त वस्तुनिष्ठ मापदंडों को अंगीकार करेगी"

इसका मतलब है कि केंद्र सरकार 16वें वित्त आयोग के जरिये राज्यों में फण्ड का बंटवारा करेगी। गौरतलब है कि 16वें वित्त आयोग का हॉरिजॉन्टल डिवोल्यूशन (राज्यों के बीच फंड का बंटवारा) का फ़ॉर्मूला एक खास मकसद के लिए बनाया गया है। यह रोजगार गारंटी जैसे कार्यक्रम के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। रोजगार गारंटी कार्यक्रम का लक्ष्य प्रदेश के सभी ग्रामीण बेरोजगार परिवारों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाना है।

वित्त आयोग में राज्यों के लिए फण्ड के बंटवारे का आधार अलग रहता है जैसे किसी राज्य की पर कैपिटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP), सबसे अमीर राज्यों से कितनी कम है, जिन्हें 42.5 परसेंट से ज़्यादा वेटेज दिया जाता है। इसके बाद सबसे ज़्यादा वेटेज आबादी (17.5%) को दिया जाता है। इस सब मापदंडों का कानून के तहत काम मांगने वाले ग्रामीण मज़दूरों से कोई सम्बन्ध नहीं है। हम शुरू से ही कह रहे हैं कि इस तरह के बंटन का आधार केवक मज़दूरन द्वारा काम की मांग होनी चाहिए। यह संभव है कि छोटे राज्य, जहाँ सरकारें बेहतर ढंग से योजना लागू कर रही हों और मज़दूरों को अधिक काम दे रही हों, उन्हें अधिक आवंटन मिलना चाहिए ।

उदाहरण के लिए, दक्षिणी राज्यों की आबादी कम है, लेकिन वे सबसे ज़्यादा औसत काम के दिन सृजित कर रहे हैं। जैसे केरल में मनरेगा में वार्षिक औसत काम के दिन (लगभग 66) राष्ट्रीय औसत से बहुत ज़्यादा है। आबादी को अधिक वेटेज देने से केरल जैसे राज्यों के हिस्से में अपेक्षाकृत कम फंड आ सकता है।

हालांकि, मसौदा नियमों में यह कहा गया है कि अधिनियम के लागू होने के दूसरे वर्ष से मानक आवंटन का एक हिस्सा "प्रदर्शन मानदंडों" पर आधारित होगा। इसके मायने है कि बेहतर परफ़ॉर्मेंस के लिए आवंटन का एक हिस्सा "इनाम" के तौर पर दिया जाएगा। इसमें "मजदूरी का समय पर भुगतान", "सामाजिक लेखापरीक्षा आवश्यकताओं का अनुपालन", "कार्यों के पूर्ण होने का प्रतिशत" और "कोई अन्य प्रदर्शन-संबंधी संकेतक" शामिल हैं जिन्हें केंद्र अधिसूचित करेगा। इन सब मानकों का मज़दूरों जो कानून के केंद्र में होने चाहिए, से कोई लेना देना नहीं है। यह केवल राज्य सरकारों की उस कार्यक्षमता या अक्षमता को दर्शाता है, जिसे केंद्र सरकार अपने मानकों के आधार पर तय करती है, न कि काम की मांग का।

राज्यों के बीच फंड के बंटवारे के लिए बताई गई प्रक्रिया पूरी तरह से केंद्र की मर्ज़ी पर निर्भर है, और इसमें राज्यों की कोई भूमिका या प्रतिनिधित्व नहीं है। इससे राज्य केंद्र पर निर्भर हो जाएंगे, और इस प्रक्रिया का इस्तेमाल उन राज्यों के खिलाफ़ हथियार के तौर पर किया जा सकता है जो केंद्र के आदेशों का सख्ती से पालन नहीं करते या जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं।

125 दिनों के रोजगार का दावा: आंकड़ों में उजागर होती हकीकत: सरकार के अपने डेटा और प्रस्तावित फंड आवंटन के विश्लेषण से भी पता चलता है कि VB-GRAM G में हर परिवार को 125 दिनों के रोजगार गारंटी देने का दावा पूरी तरह से खोखला है। यह वादा न तो आर्थिक रूप से संभव है और न ही प्रशासनिक रूप से लागू किया जा सकता है। प्रस्तावित अंतरिम आवंटन के विश्लेषण से पता चलता है कि हर सक्रिय जॉब कार्ड के लिए, प्रस्तावित आवंटन के तहत जितने काम के दिन सृजित किए जा सकते हैं, वे वादे के मुताबिक 125 दिनों से बहुत कम हैं। किसी भी बड़े राज्य में प्रस्तावित आवंटन, वादे के मुताबिक मिलने वाले हक का आधा भी पूरा नहीं करता है। कई राज्यों में, आवंटन से 125 दिनों की गारंटी का बमुश्किल पांचवां हिस्सा ही पूरा हो पाएगा। उदाहरण के लिए हरयाणा के लिए केंद्र सरकार से 590 करोड़ रूपये आबंटन मिला है इसमें राज्य के हिस्से के 40% (393करोड़ रूपये ) जोड़ने पर यह कुल 984 करोड़ रूपये हो जाएगा। राज्य में 4.85 लाख सक्रिय जॉब कार्ड है जिनको केवल प्रति कार्यदिवस 882.94 रुपये के हिसाब से केवल 23 दिन का रोजगार मिल सकता है।

हालाँकि वर्ष 2025 और 2026 के पहले पाँच महीनों में उत्पन्न काम के दिनों की तुलना यह दिखाती है कि अधिकांश राज्यों में रोजगार सृजन में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह गिरावट विशेष रूप से बड़े ग्रामीण राज्यों में अधिक गंभीर है। जनवरी से मई 2026 के दौरान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में 2025 की तुलना में उत्पन्न व्यक्ति-दिवसों में भारी कमी दर्ज की गई। कुल मिलाकर जनवरी से जून महीने के बीच काम के दिनो में औसतन 29.62% से लेकर 46.71% तक की कमी आई है।

राष्ट्रीय संचालन समिति: शक्तियों का केंद्रीकरण और राज्यों की उपेक्षा: प्रस्तावित नियमों में एक राष्ट्रीय स्तरीय संचालन समिति (National Level Steering Committee Rules, 2026) के गठन का प्रावधान है जो पूरी पूरी तरह से केंद्रीयकृत और एक नौकरशाही निकाय है जिसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व न्यूनतम होता है। यह कमिटी स्टैंडर्ड, गाइडलाइन, कन्वर्जेंस, फ्रेमवर्क, मॉनिटरिंग सिस्टम और इम्प्लीमेंटेशन के लिए डिजिटल और जियोस्पेशियल इंफ्रास्ट्रक्चर तय करने जैसे कामों के अलावा, "राज्यों को नॉर्मेटिव एलोकेशन (मानक आवंटन) से जुड़े फ़ैसलों के लिए सिफ़ारिश" भी करेगी। शक्तियों का इस तरह का केंद्रीकरण एक अत्यधिक केंद्रीकृत ढांचा बनाता है और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को कमजोर करता है।

16 सदस्यों वाली इस कमिटी के प्रमुख केंद्रीय ग्रामीण विकास विभाग के सचिव होंगे और इसमें केंद्र द्वारा नॉमिनेट किए गए राज्य सरकारों के केवल पाँच प्रतिनिधि शामिल होंगे। देखने की बात तो यह है कि राज्य VB-GRAM G में लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा दे रहे हैं, फिर भी उनके साथ बहुत अन्यायपूर्ण व्यवहार करते हुए उनको प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।

इसमें मज़दूरों या उनके संगठनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं हैं। गौरतलब है कि अभी तक मनरेगा में कुल मज़दूरों का 8 प्रतिशत ST और 17 प्रतिशत SC हैं, और 50 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ हैं लेकिन इनसे जुड़े किसी भी मंत्रालय का प्रतिनिधित्व इस कमिटी में नहीं है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और महिला मंत्रालय को इसमें शामिल नहीं किया गया है जबकि इसमें पंचायती राज मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा का कायाकल्प विभाग, पेयजल और स्वच्छता विभाग, कृषि और किसान कल्याण विभाग, भूमि संसाधन विभाग, राष्ट्रीय सूचना-विज्ञान केंद्र के प्रतिनिधि शामिल होंगे। अधिकार-आधारित रोज़गार कार्यक्रम को लागू करने और उसकी निगरानी का काम सिर्फ़ नौकरशाही पर नहीं छोड़ा जा सकता; इसके लिए उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना ज़रूरी है, जिनके जीवन और आजीविका पर इसके फ़ैसलों का सीधा असर पड़ता है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय परिषद के गठन का भी प्रावधान है जिसमें गैर-सरकारी" सदस्य और ST, SC तथा महिलाओं आदि के प्रतिनिधि शामिल हैं। दिक्कत यह है कि इस परिषद के पास कोई अधिकार नहीं है। यह केवल सिफारिशें कर सकती है जिन्हें संसद के समक्ष रखा जाएगा, लेकिन ये बाध्यकारी नहीं हैं।

अतिरिक्त खर्च का बोझ राज्यों को दंडित करने की व्यवस्था: नियम 4(3) में प्रावधान है कि " किसी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र द्वारा अपने मानक आवंटन से अधिक किया गया कोई भी व्यय अधिनियम की धारा 22 की उप-धारा (5) के तहत राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।" राज्यों द्वारा ज्यादा काम के दिन उपलब्ध करवाने के लिए राज्यों द्वारा किये गए प्रयासों पर खर्च को "अतिरिक्त खर्च" कहना ही VB-GRAM G के मज़दूर विरोधी चरित्र को बताता है। सिर्फ़ इसलिए कि काम की मांग पहले से तय आवंटन से ज़्यादा है, मज़दूरों को रोज़गार के उनके कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। मज़दूरों की मांग के अनुसार योजना को लागू करने के लिए राज्यों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

e-KYC की बाध्यता: करोड़ों मज़दूरों से काम से हक़ छीनने का औजार: ड्राफ़्ट नियम (397 ई) के अनुसार, VB-GRAM G के तहत केवल उन्हीं मनरेगा जॉब कार्ड को मान्य माना जाएगा जिन्हें e-KYC के ज़रिए रिन्यू और वेरिफ़ाई किया गया है। यह एक गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि बड़ी संख्या में मज़दूर e-KYC की सख़्त तकनीकी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाए हैं। हम जानते है कि आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम (APBS) को अनिवार्य किए जाने के बाद से, मज़दूरों को स्पेलिंग की गलतियों, डेटा में अंतर, बैकएंड तकनीकी समस्याओं आदि के कारण आधार/e-KYC की प्रक्रिया पूरी करने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। e-KYC वेरिफ़िकेशन में इन नाकामियों के कारण देश भर में बड़ी संख्या में जॉब कार्ड रद्द कर दिए गए हैं। इसका मतलब यह है कि करोड़ों मज़दूर जिनका e-KYC वेरिफ़िकेशन नहीं हुआ है, VB-GRAM G के तहत काम के हक़ से महरूम हो जायेंगे।

इन नियमों के अनुसार काम न मिलने, मज़दूरी के भुगतान में देरी, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक खामियों और मज़दूरों के अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर एक स्वतंत्र लोकपाल (ओम्बड्समैन) की व्यवस्था की जाएगी। लोकपाल स्वतंत्र पर काम करेगा और इसके पास बाध्यकारी सिफारिशें करने का अधिकार होगा। हमने पहले भी देखा है कि भ्रष्टाचार से लड़ने और जवाबदेही तय करने में सोशल ऑडिट की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है इसलिए सोशल ऑडिट का काम करने लिए एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था होनी चाहिए। सोशल ऑडिट के नतीजों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए और समीक्षा व जवाबदेही के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं के सामने पेश किया जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, VB-GRAM G के ये नियम साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि यह मनरेगा की जगह लेने वाला कोई मज़बूत अधिकार-आधारित कानून नहीं, बल्कि एक सीमित, केंद्रीकृत और आवंटन-आधारित योजना है, जिसमें मज़दूरों की काम की मांग, उनकी भागीदारी और उनके अधिकारों की बजाय केंद्र सरकार की मर्ज़ी, नौकरशाही नियंत्रण और तयशुदा बजटीय सीमाओं को प्राथमिकता दी गई है। यह ढांचा न केवल ग्रामीण रोज़गार की कानूनी गारंटी को कमजोर करता है, बल्कि राज्यों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी चोट करता है। ऐसे समय में जब ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी, विस्थापन और आर्थिक असुरक्षा बढ़ रही है, रोजगार गारंटी को कमजोर करना करोड़ों खेत मज़दूरों और गरीब परिवारों की आजीविका पर सीधा हमला है। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि इन नियमों और पूरे VB-GRAM G ढांचे का व्यापक जनप्रतिरोध खड़ा किया जाए, मनरेगा के अधिकार-आधारित स्वरूप की रक्षा की जाए, और यह सुनिश्चित किया जाए कि ग्रामीण रोज़गार का सवाल किसी सरकारी कृपा का नहीं, बल्कि मज़दूरों के कानूनी और लोकतांत्रिक अधिकार का प्रश्न बना रहे।

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राजस्थान खेत और ग्रामीण मजदूर यूनियन राज्य कमेटी की मीटिंग किसान भवन हनुमानगढ़ में साथी दुर्गा स्वामी की अध्यक्षता में संपन्न हुई मीटिंग में केंद्रीय कमेटी से इंचार्ज डॉक्टर विक्रम सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया का बेहतरीन मांग आधारित रोजगार कानून मनरेगा को खत्म कर भाजपा सरकार पूरे देश में 1 जुलाई से वीबी राम जी को लागू कर रही है जिसके तहत पूरे गरीबों का मांग आधारित काम मंदिर का समाप्त हो रहा है इसलिए देश भर में खेत और ग्रामीण मजदूर 1 जुलाई को #काला दिवस के रूप में मनाएंगे !राजस्थान में इसी दिन राजस्थान खेत और ग्रामीण मजदूर यूनियन पंचायत समिति मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर मनरेगा की बहाली के लिए ज्ञापन देगी प्रदेश भर में किसान मजदूर व आमजन विरोधी केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ राजस्थान खेत और ग्रामीण मजदूर यूनियन व्यापक अभियान चलाएगी !तथा 10 अगस्त को जेल भरो आंदोलन के तहत पूरे प्रदेश में व्यापक स्तर पर गिरफ्तारियां देंगे

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