19/01/2026
मेडिकल कॉलेजों में पीजी सीटें बढ़ीं, लेकिन डॉक्टर बनने का सपना अमीरों तक सीमित क्यों?
इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि देश में PG मेडिकल सीटें तो तेज़ी से बढ़ रही हैं, लेकिन हज़ारों सीटें हर साल खाली रह जा रही हैं।
2021 में जहाँ 11,629 सीटें खाली थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,619 पहुँच गई है।
यह कमी प्रतिभा की नहीं है, बल्कि नीति की विफलता है।
सरकार ने 2020 से 2025 के बीच PG सीटें 40,858 से बढ़ाकर 62,584 कर दीं, लेकिन ज़्यादातर बढ़ोतरी निजी मेडिकल कॉलेजों में हुई। इन कॉलेजों की फीस करोड़ों रुपये तक पहुँच चुकी है। नतीजा यह कि सीटें तो हैं, पर उन्हें लेने की औक़ात बहुत कम छात्रों की है।
कड़वा सच यह है कि इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान गरीब SC, ST और OBC छात्रों को हो रहा है।
कट-ऑफ कई श्रेणियों में शून्य प्रतिशत तक घटा दिया गया, लेकिन इसका लाभ उन छात्रों को नहीं मिला जिनके पास पैसा नहीं है। मेरिट होने के बावजूद आर्थिक रूप से कमज़ोर बहुजन छात्र निजी कॉलेजों की फीस नहीं भर पाते, जबकि कम अंक लाने वाले लेकिन धनवान उम्मीदवार PG सीट हासिल कर लेते हैं।
कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सबसे ज़्यादा सीटें खाली हैं — वहीं निजी मेडिकल शिक्षा सबसे महंगी भी है। यह साबित करता है कि समस्या प्रवेश परीक्षा की नहीं, बल्कि निजीकरण और मुनाफ़ाखोरी की है।
डॉक्टरों की कमी का रोना रोने वाला सिस्टम आज यह सच्चाई छिपा रहा है कि:
➡️ सीटें हैं, पर ग़रीबों के लिए नहीं
➡️ कट-ऑफ घटा, पर फीस बढ़ी
➡️ आरक्षण है, पर महँगी पढ़ाई से एससी ,एसटी और ओबीसी की पहुँच नहीं
अगर PG मेडिकल शिक्षा को सच में लोकतांत्रिक बनाना है, तो
निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस पर सख़्त नियंत्रण,
सरकारी PG सीटों में भारी बढ़ोतरी,
और SC–ST–OBC के लिए प्रभावी वित्तीय समर्थन अनिवार्य है।
वरना यह व्यवस्था डॉक्टर नहीं, बल्कि चिकित्सा बाज़ार के ग्राहक तैयार करती रहेगी।