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02/08/2026

Chaurotia Hospital Dr.V.K.CHAUROTIA MD Psychiatrist Hanumangarh Town

हमारी एकता ही हमारी शक्ति है...🤝🤝🤝🤝🤝
31/05/2026

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19/01/2026

मेडिकल कॉलेजों में पीजी सीटें बढ़ीं, लेकिन डॉक्टर बनने का सपना अमीरों तक सीमित क्यों?

इंडियन एक्सप्रेस की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि देश में PG मेडिकल सीटें तो तेज़ी से बढ़ रही हैं, लेकिन हज़ारों सीटें हर साल खाली रह जा रही हैं।
2021 में जहाँ 11,629 सीटें खाली थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,619 पहुँच गई है।

यह कमी प्रतिभा की नहीं है, बल्कि नीति की विफलता है।
सरकार ने 2020 से 2025 के बीच PG सीटें 40,858 से बढ़ाकर 62,584 कर दीं, लेकिन ज़्यादातर बढ़ोतरी निजी मेडिकल कॉलेजों में हुई। इन कॉलेजों की फीस करोड़ों रुपये तक पहुँच चुकी है। नतीजा यह कि सीटें तो हैं, पर उन्हें लेने की औक़ात बहुत कम छात्रों की है।
कड़वा सच यह है कि इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान गरीब SC, ST और OBC छात्रों को हो रहा है।
कट-ऑफ कई श्रेणियों में शून्य प्रतिशत तक घटा दिया गया, लेकिन इसका लाभ उन छात्रों को नहीं मिला जिनके पास पैसा नहीं है। मेरिट होने के बावजूद आर्थिक रूप से कमज़ोर बहुजन छात्र निजी कॉलेजों की फीस नहीं भर पाते, जबकि कम अंक लाने वाले लेकिन धनवान उम्मीदवार PG सीट हासिल कर लेते हैं।
कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सबसे ज़्यादा सीटें खाली हैं — वहीं निजी मेडिकल शिक्षा सबसे महंगी भी है। यह साबित करता है कि समस्या प्रवेश परीक्षा की नहीं, बल्कि निजीकरण और मुनाफ़ाखोरी की है।

डॉक्टरों की कमी का रोना रोने वाला सिस्टम आज यह सच्चाई छिपा रहा है कि:
➡️ सीटें हैं, पर ग़रीबों के लिए नहीं
➡️ कट-ऑफ घटा, पर फीस बढ़ी
➡️ आरक्षण है, पर महँगी पढ़ाई से एससी ,एसटी और ओबीसी की पहुँच नहीं
अगर PG मेडिकल शिक्षा को सच में लोकतांत्रिक बनाना है, तो
निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस पर सख़्त नियंत्रण,
सरकारी PG सीटों में भारी बढ़ोतरी,
और SC–ST–OBC के लिए प्रभावी वित्तीय समर्थन अनिवार्य है।
वरना यह व्यवस्था डॉक्टर नहीं, बल्कि चिकित्सा बाज़ार के ग्राहक तैयार करती रहेगी।

आज हम जिस संविधान को हाथ में लेकर गर्व महसूस करते हैं, वह दरअसल भारत के इतिहास में सबसे बड़ी विचार-क्रांति का नाम है। यह...
26/11/2025

आज हम जिस संविधान को हाथ में लेकर गर्व महसूस करते हैं, वह दरअसल भारत के इतिहास में सबसे बड़ी विचार-क्रांति का नाम है। यह केवल नियमों और धाराओं का संग्रह नहीं यह उस सपने का पहला मसौदा है जिसमें सदियों से दबे-कुचले लोगों को पहली बार बराबरी की सांस लेने का अधिकार मिला। संविधान दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की ताकत कागज़ में नहीं, बल्कि उन संघर्षों में है जिनसे यह व्यवस्था बनी।

बाबासाहेब अम्बेडकर ने संविधान नहीं लिखा उन्होंने भारत का भविष्य लिखा। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि देश किसी एक धर्म, जाति या सत्ता का उपनिवेश न बने, बल्कि हर नागरिक का घर बने। वे जानते थे कि आज़ादी का असली अर्थ सिर्फ़ अंग्रेज़ों का जाना नहीं होता, असली आज़ादी तब आती है जब समाज अपने ही लोगों पर अत्याचार करना बंद करे। इसलिए उन्होंने बराबरी, न्याय, बंधुता और समानता को केवल विचार नहीं, व्यवस्था का आधार बनाया।

आज कुछ समूह संविधान से इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि यह किताब उन्हें मनमानी करने से रोकती है। उन्हें डर इसलिए लगता है क्योंकि यह हर नागरिक को बराबरी देती है, और बराबरी उन्हें कभी पसंद नहीं आई। संविधान उन्हें अपनी नफरत, भेदभाव और सत्ता-लोलुपता पर रोक लगाता दिखाई देता है इसीलिए वे इसके अस्तित्व से चिढ़ते हैं। लेकिन सच यह है कि संविधान कमजोर नहीं पड़ेगा; कमजोर वे लोग पड़ेंगे जिन्हें न्याय और समानता से तकलीफ़ है।

आज जब समाज में नफ़रत के नाम पर फैसले किए जाते हैं, जब जाति और धर्म हमारी सोच को बाँटने की कोशिश करते हैं तो यह संविधान को चुनौती नहीं, बल्कि अम्बेडकर के पूरे दर्शन को चुनौती है। संविधान हमें बताता है कि शक्ति मतगणना से नहीं, मूल्यों से तय होती है। जो लोग संविधान पर हमला करते हैं, वे असल में उस भारत पर वार कर रहे होते हैं जिसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने खून से सींचा था।

भारत अगर मजबूत है तो किसी सत्ता या व्यक्ति की वजह से नहीं—बल्कि इसलिए कि यहां एक ऐसी किताब है, जो राजा को भी नागरिक के बराबर खड़ा कर देती है। यही लोकतंत्र की असली रीढ़ है। संविधान दिवस सिर्फ मनाने का दिन नहीं; यह खुद से पूछने का दिन है क्या हम उस भारत के योग्य नागरिक हैं जिसे अम्बेडकर ने अपने सपनों में देखा था? अगर जवाब “हाँ” है, तो संविधान की रक्षा एक कर्तव्य नहीं, एक प्रतिज्ञा बन जाती है। copy by Ravi chaurotia

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