28/03/2026
राजस्थान की धरा केवल रेत के धोरों और किलों की भव्यता के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहाँ की समृद्ध भाषा, संस्कृति और लोकजीवन भी इसकी पहचान हैं। इसी पहचान का सबसे सशक्त माध्यम है—राजस्थानी भाषा। यह भाषा सदियों से लोकगीतों, कहावतों, वीर-गाथाओं और दैनिक जन जीवन में रची-बसी है। फिर भी आज तक यह अपनी मान्यता के लिए संघर्ष कर रही है। राजस्थान की लता के रूप में प्रख्यात स्वर कोकिल सीमा जी मिश्रा की भावपूर्ण सुमधुर आवाज़ में “राजस्थानी भाषा पर सरकार करल्यों गौर” जैसे गीत इस संघर्ष की भावनात्मक अभिव्यक्ति हैं—जन-जन की पीड़ा,आशा और आक्रोश का संगम है। गीतकार अमृत राजस्थानी द्वारा लिखा गया यह गीत केवल शब्दों का समूह या संग्रह नहीं, बल्कि हर एक शब्द उस व्यक्ति की आवाज़ है जो अपनी मातृभाषा से प्रेम करता है। इसमें एक गहरी पीड़ा छिपी है कि जिस भाषा ने अनगिनत पीढ़ियों को जोड़ा, जिसने लोकसंस्कृति को जीवित रखा, वही आज उपेक्षा और राजनीति का शिकार है। गीत के शब्द मानो सरकार से प्रश्न करते हैं—क्या हमारी मोती से भी अनमोल भाषा इतनी कमजोर है कि उसे पहचान न मिले7? या फिर हमारी संस्कृति का महत्व कम आंका जा रहा है? राजस्थानी भाषा में ढेरों लोकगीत, दोहे और साहित्य रचे गए हैं। पाबूजी की फड़, ढोला-मारू जैसी अनेक अमर कथाएँ इसी भाषा की देन हैं। यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की आत्मा है। जब यह भाषा बोलने वाला व्यक्ति अपनी पहचान के लिए संघर्ष करता है, तो यह केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
गीत में आग्रह भी है और ललकार भी।आग्रह इस रूप में कि सरकार हमारी इस राजस्थानी मायड़ भाषा की महत्ता को समझे और इसे संवैधानिक मान्यता दे। ललकार इस रूप में कि यदि अनदेखी जारी रही, तो जन-आवाज़ और बुलंद होगी। यह गीत लोगों को एकजुट करने,उनमें जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से है। तथा दुनिया भर में प्रवास कर रहे राजस्थानी लोगों को जड़ों से जुड़ने का संदेश देता है एवं अपनी मायड़ भाषा को मान्यता दिलाने के लिए सशक्त रूप में प्रभावशाली तरीके से तन- मन- धन से आगे आने के लिए प्रेरित करने वाला है। आज के इस आधुनिक युग में,जब वैश्वीकरण के प्रभाव से कई क्षेत्रीय भाषाएँ विलुप्ति की कगार पर हैं,ऐसे में राजस्थानी भाषा का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह केवल राजस्थान की नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक धरोहर है।
अतः “राजस्थानी भाषा पर सरकार करल्यों गौर” एक भावनात्मक अपील है—सरकार से भी और समाज से भी। यह हमें याद दिलाता है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी जड़ें और हमारी विरासत है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो हम अपनी संस्कृति का एक अनमोल हिस्सा खो देंगे।
इसलिए अब समय आ गया है—राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और मान्यता दिलाने का।
अतः आप सभी राजस्थानी लोकगीत-संगीत प्रेमी प्रबुद्ध श्रोताओं,राजस्थान की सशक्त जागरूक जन- गण से हमारी बस एक विनती है राजस्थानी लोकगीत- संगीत और राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने में सशक्त जागरूक राजस्थानी की भूमिका निभाएं तथा इनके संरक्षण,संवर्धन एवं सृजन के लिए कृत संकल्पित स्वर माधुरी मल्टीमीडिया संग राजस्थानी लोक गीत-संगीत के अविरल प्रवाह में अवगाहन करे तथा स्वर माधुरी मल्टीमीडिया चैनल को सब्सक्राइब करते हुए,ऑडियो-वीडियो को लाइक और शेयर कर अपना स्नेह प्रदर्शित करें,और अपने अमूल्य सुझाव,मार्गदर्शन कमेंट्स में ज़रूर दें।आपका हर समर्थन हमारे लिए प्रेरणा है और हमारे राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवित रखने की एक अमूल्य भागीदारी भी।
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जय राजस्थान-जय राजस्थानी
आपका
शिव विनायक शर्मा
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