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स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को मंगलमय हार्दिक शुभकामनाएँ।राजस्थान की माटी में रची-बसा लोकगीत-संगीतलोकनृत्य,लोककला, लोकपरंप...
15/08/2026

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को मंगलमय हार्दिक शुभकामनाएँ।
राजस्थान की माटी में रची-बसा लोकगीत-संगीत
लोकनृत्य,लोककला, लोकपरंपराएँ और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत केवल हमारी पहचान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर हैं।
इस पावन स्वतंत्रता दिवस पर,राजस्थानी लोकगीत-संगीत,लोक कला एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित उन सभी लोक कलाकारों, शिल्पकारों, लोकगायकों और संस्कृति साधकों को मैं नमन करती हूँ, जो अपनी कला और परंपराओं के माध्यम से राजस्थान की गौरवशाली विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रख रहे हैं।
आइए, आज हम संकल्प लें कि स्वतंत्रता के साथ अपनी संस्कृति की स्वतंत्र पहचान को भी सुरक्षित रखेंगे, अपनी लोक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँगे और भारतीय संस्कृति के रंगों को विश्व पटल पर और अधिक गौरव प्रदान करेंगे।
माटी की खुशबू, लोककला का रंग और तिरंगे का सम्मान
यही हमारी पहचान,यही हमारे राजस्थान का अभिमान।
🇮🇳 जय हिंद 🇮🇳
वंदे मातरम्
जै जै राजस्थान- जै राजस्थानी

सीमा मिश्रा
लोक गायिका
संस्थापक/अध्यक्ष
(सीमा मिश्रा राजस्थान लोकसंगीत- कला अकादमी)

https://youtu.be/gDlBlKBjCB8?si=4IXRVh8jVWriN9bdजय राजस्थान - जय राजस्थानी “पीव लड़ै सीमा पर कागा, कह दीजे संदेस रे...प्...
03/05/2026

https://youtu.be/gDlBlKBjCB8?si=4IXRVh8jVWriN9bd
जय राजस्थान - जय राजस्थानी
“पीव लड़ै सीमा पर कागा, कह दीजे संदेस रे...
प्रेम,विरह,त्याग, प्रतीक्षा,और देशभक्ति का अद्वितीय संगम”
राजस्थानी लोक संस्कृति और गीत अपनी सरलता और गहन भावनात्मकता के लिए प्रसिद्ध है। लोकगीतों में जीवन की सच्चाइयाँ, मानवीय संवेदनाएँ और सामाजिक मूल्य अत्यंत सहज रूप में अभिव्यक्त होते हैं। “पीव लड़ै सीमा पर कागा, कह दीजे संदेस रे” राजस्थान के प्रख्यात गीतकार, संगीतकार स्वर्गीय निर्मल मिश्र द्वारा रचित एवं भारत में सर्वाधिक गरिमामय लोकगीत गाने वाली लोक गायिका,भारत की लोक गीत साम्राज्ञी,कोकिल कंठी मरु कोकिला सीमा जी मिश्रा की सुमधुर आवाज़ में स्वरबद्ध ऐसा ही एक मार्मिक लोकगीत है, जिसमें एक स्त्री के हृदय की वेदना,उसके प्रेम की गहराई और देशभक्ति की भावना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह गीत केवल एक व्यक्तिगत विरह कथा नहीं, बल्कि उन असंख्य परिवारों की प्रतिनिधि आवाज़ है, जिनके प्रियजन देश की रक्षा हेतु सीमाओं पर तैनात रहते हैं।
इस गीत की मूल भावना विरह से आरंभ होती है। “पीव” अर्थात प्रियतम या पति, जो सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है, उससे दूर रहकर नायिका गहरे अकेलेपन और पीड़ा का अनुभव करती है। भारतीय नारी के लिए उसका पति केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे में उससे दूरी न केवल शारीरिक, बल्कि भावनात्मक शून्यता भी उत्पन्न करती है। गीत की पंक्तियों में यह विरह अत्यंत स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी रूप में प्रकट होता है। नायिका का मन हर पल अपने प्रिय की याद में डूबा रहता है—वह उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है, उसकी सुरक्षा की चिंता करती है और उसके बिना अपने जीवन को अधूरा महसूस करती है।
परंतु इस गीत की विशेषता यह है कि यह केवल विरह की करुण कथा बनकर नहीं रह जाता। इसके भीतर देशभक्ति की प्रबल धारा भी प्रवाहित होती है। नायिका अपने प्रिय के कर्तव्य को समझती है और उसे उस पर अडिग रहने के लिए अपने जीवनसाथी का मनोबल भी बढ़ाती है।और उस पर गर्व करती है। वह यह जानती है कि उसका पति केवल उसका नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का रक्षक है। यही कारण है कि वह उसे वापस बुलाने की इच्छा नहीं करती, बल्कि उसकी कुशलता की कामना करती है। यहाँ प्रेम स्वार्थ से ऊपर उठकर त्याग और समर्पण का रूप ले लेता है। यह भाव राजस्थानी संस्कृति की उस परंपरा को दर्शाता है, जहाँ व्यक्तिगत सुख से अधिक महत्व कर्तव्य और राष्ट्रधर्म को दिया जाता है।
गीत में “कागा” अर्थात कौए का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय लोकपरंपरा में कौए को संदेशवाहक के रूप में देखा जाता है। जब नायिका अपने मन की व्यथा किसी से कह नहीं पाती, तब वह प्रकृति के इस छोटे से जीव को अपना माध्यम बनाती है। वह कौए से विनती करती है कि वह उड़कर उसके प्रिय तक उसका संदेश पहुँचा दे। यह दृश्य अत्यंत भावपूर्ण और प्रतीकात्मक है। यहाँ कौआ केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि आशा, विश्वास और भावनाओं का वाहक बन जाता है। यह प्रसंग हमें उस शाश्वत काव्य परंपरा की भी याद दिलाता है, जिसमें प्रकृति को संदेशवाहक बनाया गया है, जैसे मेघदूत में यक्ष अपने संदेश को बादल के माध्यम से अपनी प्रिया तक पहुँचाता है।
इस गीत में नायिका की मनःस्थिति अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित की गई है। वह एक ओर अपने प्रिय की याद में व्याकुल है, तो दूसरी ओर उसके कर्तव्य पर गर्व भी करती है। यह द्वंद्व ही इस गीत को और अधिक मार्मिक बनाता है। उसकी आँखों में आँसू हैं, परंतु उन आँसुओं में कमजोरी नहीं, बल्कि प्रेम और शक्ति दोनों का संगम है। वह अपने प्रिय की प्रतीक्षा करती है, पर साथ ही उसके साहस और वीरता के लिए प्रार्थना भी करती है।
“पीव लड़ै सीमा पर” गीत का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि यह समाज में सैनिकों और उनके परिवारों के त्याग को उजागर करता है। जब कोई सैनिक सीमा पर देश की रक्षा करता है, तो उसके पीछे उसका पूरा परिवार त्याग और कठिनाइयों का सामना करता है। यह गीत उसी अनदेखे त्याग को हमें यह समझने में सहायता करता है कि देशभक्ति केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि उन घरों में भी जीवित रहती है, जहाँ लोग अपने प्रियजनों की अनुपस्थिति में भी गर्व और धैर्य के साथ जीवन जीते हैं।
भाषा की दृष्टि से यह गीत अत्यंत सरल, सहज और लोकजीवन के निकट है। इसमें किसी प्रकार की जटिलता नहीं है, फिर भी इसकी भावनात्मक गहराई अद्भुत है। यही लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता होती है—वे सीधे हृदय से निकलते हैं और श्रोता के हृदय तक पहुँचते हैं। इस गीत की सरलता ही इसकी शक्ति है, जो इसे हर वर्ग के लोगों के लिए सुलभ और प्रभावशाली बनाती है। “पीव लड़ै सीमा पर कागा, कह दीजे संदेस रे” केवल एक गीत नहीं, बल्कि प्रेम विरह,त्याग,प्रतीक्षा और देशभक्ति की एक अमर जीवंत गाथा है।
अतः आप सभी राजस्थानी लोकगीत-संगीत प्रेमी प्रबुद्ध श्रोताओं से हमारी बस एक विनती है गरिमामय राजस्थानी लोकगीत- संगीत के संरक्षण संवर्धन और सृजन के लिए कृत संकल्पित स्वर माधुरी मल्टीमीडिया संग राजस्थानी लोक गीत-संगीत के अविरल प्रवाह में अवगाहन करे तथा स्वर माधुरी मल्टीमीडिया चैनल एवं सीमा मिश्रा जी के आधिकारिक यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करते हुए,ऑडियो-वीडियो को लाइक और शेयर कर अपना स्नेह प्रदर्शित करें,और अपने अमूल्य सुझाव,मार्गदर्शन कमेंट्स में ज़रूर दें।आपका हर समर्थन हमारे लिए प्रेरणा है और हमारे राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवित रखने की एक अमूल्य भागीदारी भी।
आपका साथ ही हमारी ताकत है

जय राजस्थान-जय राजस्थानी

आपका
शिव विनायक शर्मा
निदेशक
स्वर माधुरी मल्टीमीडिया एलएलपी
+91 9521799988

03/05/2026
12/04/2026

भारत की अनमोल पार्श्व गायिका, पद्मविभूषण से सम्मानित आशा भोसले जी का निधन संगीत जगत में एक अपूरणीय क्षति है। उनकी आवाज़ ने न केवल भारतीय सिनेमा को सजाया, बल्कि दुनिया भर में भारतीय संगीत को एक नई पहचान दी। आशा जी की गायकी में वह विशेष समर्पण और भावनाएँ थीं, जो हर गीत में एक नयी ज़िंदगी भर देती थीं।
उनके गीतों में रोमांस, दर्द, उल्लास और हर भावना का अद्भुत मिश्रण था। चाहे वह "प्यारी प्यारी सूरतों वाले" हो या "चला जाए", उनकी आवाज़ ने हर दिल में जगह बनाई। आशा जी के द्वारा गाए गए गीतों की धुनों को हमेशा याद किया जाएगा और उनकी गायकी हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगी।
हम सब उनके योगदान के प्रति कृतज्ञ हैं।
ईश्वर पवित्र दिवंगत आत्मा (आशा जी) को अपने श्री चरणों में दिव्य स्थान दें, भावपूर्ण श्रद्धांजलि, सादर नमन 💐 🙏

सीमा मिश्रा
संस्थापक/अध्यक्ष
(सीमा मिश्रा राजस्थान लोक संगीत- कला अकादमी)

31/03/2026

28/03/2026

राजस्थान की धरा केवल रेत के धोरों और किलों की भव्यता के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहाँ की समृद्ध भाषा, संस्कृति और लोकजीवन भी इसकी पहचान हैं। इसी पहचान का सबसे सशक्त माध्यम है—राजस्थानी भाषा। यह भाषा सदियों से लोकगीतों, कहावतों, वीर-गाथाओं और दैनिक जन जीवन में रची-बसी है। फिर भी आज तक यह अपनी मान्यता के लिए संघर्ष कर रही है। राजस्थान की लता के रूप में प्रख्यात स्वर कोकिल सीमा जी मिश्रा की भावपूर्ण सुमधुर आवाज़ में “राजस्थानी भाषा पर सरकार करल्यों गौर” जैसे गीत इस संघर्ष की भावनात्मक अभिव्यक्ति हैं—जन-जन की पीड़ा,आशा और आक्रोश का संगम है। गीतकार अमृत राजस्थानी द्वारा लिखा गया यह गीत केवल शब्दों का समूह या संग्रह नहीं, बल्कि हर एक शब्द उस व्यक्ति की आवाज़ है जो अपनी मातृभाषा से प्रेम करता है। इसमें एक गहरी पीड़ा छिपी है कि जिस भाषा ने अनगिनत पीढ़ियों को जोड़ा, जिसने लोकसंस्कृति को जीवित रखा, वही आज उपेक्षा और राजनीति का शिकार है। गीत के शब्द मानो सरकार से प्रश्न करते हैं—क्या हमारी मोती से भी अनमोल भाषा इतनी कमजोर है कि उसे पहचान न मिले7? या फिर हमारी संस्कृति का महत्व कम आंका जा रहा है? राजस्थानी भाषा में ढेरों लोकगीत, दोहे और साहित्य रचे गए हैं। पाबूजी की फड़, ढोला-मारू जैसी अनेक अमर कथाएँ इसी भाषा की देन हैं। यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की आत्मा है। जब यह भाषा बोलने वाला व्यक्ति अपनी पहचान के लिए संघर्ष करता है, तो यह केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है।
गीत में आग्रह भी है और ललकार भी।आग्रह इस रूप में कि सरकार हमारी इस राजस्थानी मायड़ भाषा की महत्ता को समझे और इसे संवैधानिक मान्यता दे। ललकार इस रूप में कि यदि अनदेखी जारी रही, तो जन-आवाज़ और बुलंद होगी। यह गीत लोगों को एकजुट करने,उनमें जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से है। तथा दुनिया भर में प्रवास कर रहे राजस्थानी लोगों को जड़ों से जुड़ने का संदेश देता है एवं अपनी मायड़ भाषा को मान्यता दिलाने के लिए सशक्त रूप में प्रभावशाली तरीके से तन- मन- धन से आगे आने के लिए प्रेरित करने वाला है। आज के इस आधुनिक युग में,जब वैश्वीकरण के प्रभाव से कई क्षेत्रीय भाषाएँ विलुप्ति की कगार पर हैं,ऐसे में राजस्थानी भाषा का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह केवल राजस्थान की नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक धरोहर है।
अतः “राजस्थानी भाषा पर सरकार करल्यों गौर” एक भावनात्मक अपील है—सरकार से भी और समाज से भी। यह हमें याद दिलाता है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी जड़ें और हमारी विरासत है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो हम अपनी संस्कृति का एक अनमोल हिस्सा खो देंगे।
इसलिए अब समय आ गया है—राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और मान्यता दिलाने का।
अतः आप सभी राजस्थानी लोकगीत-संगीत प्रेमी प्रबुद्ध श्रोताओं,राजस्थान की सशक्त जागरूक जन- गण से हमारी बस एक विनती है राजस्थानी लोकगीत- संगीत और राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने में सशक्त जागरूक राजस्थानी की भूमिका निभाएं तथा इनके संरक्षण,संवर्धन एवं सृजन के लिए कृत संकल्पित स्वर माधुरी मल्टीमीडिया संग राजस्थानी लोक गीत-संगीत के अविरल प्रवाह में अवगाहन करे तथा स्वर माधुरी मल्टीमीडिया चैनल को सब्सक्राइब करते हुए,ऑडियो-वीडियो को लाइक और शेयर कर अपना स्नेह प्रदर्शित करें,और अपने अमूल्य सुझाव,मार्गदर्शन कमेंट्स में ज़रूर दें।आपका हर समर्थन हमारे लिए प्रेरणा है और हमारे राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवित रखने की एक अमूल्य भागीदारी भी।
आपका साथ ही हमारी ताकत है।
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