09/03/2026
खैराड़ प्रदेश : राजस्थान के आदिवासी वीरता की धरा
राजस्थान का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है और इस इतिहास के निर्माण में आदिवासी समाज की भूमिका सर्वोपरि रही है। राजस्थान के आदिवासी, जिन्हें प्रकृति का पुत्र कहा जाता है, प्राचीन काल से इस भूमि पर निवास करते आए हैं। इनमें प्रमुख रूप से मीणा और भील जनजातियाँ उल्लेखनीय हैं। इन जनजातियों ने न केवल इस क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपरा को समृद्ध किया, बल्कि अपनी वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-प्रेम से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
राजस्थान प्राचीन काल में कई उपक्षेत्रों में विभाजित था, जिनमें प्रमुख थे— मेवाड़, मारवाड़, मेरवाड़ा, ढूंढाड़, हाड़ौती और खैराड़। इन क्षेत्रों में खैराड़ प्रदेश अपनी विशेष पहचान और वीर परंपरा के लिए प्रसिद्ध रहा है।
खैराड़ नाम की उत्पत्ति
खैर वृक्ष की अधिकता के कारण इस क्षेत्र का नाम खैराड़ पड़ा। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से इसका विकास इस प्रकार माना जाता है—
खैर + राष्ट्र = खैराष्ट्र → खैराट → खैराड़
मीणा आदिवासियों की बहुलता के कारण यह क्षेत्र “मीणा खैराड़” के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।
भौगोलिक विस्तार
खैराड़ प्रदेश मुख्यतः बनास नदी के दोनों ओर फैले हुए भूभाग को कहा जाता है। इसके अंतर्गत कई महत्वपूर्ण गाँव और क्षेत्र आते हैं, जैसे—
लुहारी कला, उमर गाँव, सरस्या, गाड़ोली, ईटूड़ा, देवाखेड़ा, बासनी, टिकड़, गोमरगढ़, हिण्डोली, देवली का कुछ भाग, माण्डलगढ़ तथा जहाजपुर के आसपास का क्षेत्र।
इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने यहाँ के निवासियों को “सच्चे प्रकृति पुत्र” कहा है। उन्होंने उल्लेख किया है कि यहाँ के आदिवासी सम्मान देने वालों को सम्मान देने की गहरी भावना रखते हैं तथा वीरता और स्वाभिमान उनकी प्रमुख धरोहर है।
आदिवासी शक्ति का केंद्र
ब्रिटिश अधिकारी अर्सकीन के अनुसार राजस्थान में आदिवासियों के दो प्रमुख क्षेत्र थे—
छप्पन के पहाड़
खैराड़ प्रदेश
खैराड़ क्षेत्र पहाड़ी और आंशिक रूप से अनुत्पादक होने के कारण यहाँ के लोग आयुध्दजीवी थे। युद्ध और सैन्य सेवा ही उनकी प्रमुख जीविका का साधन रहा।
मध्यकालीन खैराड़
मध्यकाल में बनास नदी के दोनों ओर बसे खैराड़ प्रदेश में बरड़ गोत्रीय मीणा आदिवासियों का राज्य स्थापित था, जिसकी राजधानी गोमरगढ़ थी। बाद में यह क्षेत्र मेवाड़ राज्य के अधीन आ गया।
इतिहासकार श्यामलदास ने अपनी प्रसिद्ध कृति “वीर विनोद” में लिखा है कि मेवाड़ के जहाजपुर क्षेत्र (खैराड़) में मोठीस और पड़िहार मीणाओं की बहुलता थी।
मीणा समाज के बारह प्रसिद्ध मेवासियों में खैराड़ के पेमा पड़िहार और जोझों खोखर का विशेष स्थान माना जाता है।
मेवास और मेवासी
इतिहास में “मेवास” और “मेवासी” शब्दों का विशेष महत्व है।
मेवास उन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों को कहा जाता था जहाँ प्राकृतिक किलों की तरह बसे गढ़ होते थे। इन स्थानों तक पहुँचना बाहरी शासकों के लिए अत्यंत कठिन होता था।
मेवासी उस मेवास का अधिपति होता था, जो किसी भी शासक की अधीनता स्वीकार नहीं करता था और अपनी स्वतंत्र सत्ता तथा सैन्य शक्ति के बल पर शासन करता था। ऐसे मेवासियों को वश में करना राजाओं के लिए भी कठिन कार्य माना जाता था।
मुगल और मराठा काल की घटनाएँ
1584 के आसपास मेवाड़ के महाराणा प्रताप के भाई जगमाल, जो अकबर की सेवा में चले गए थे, को जहाजपुर परगना जागीर में मिला। इसके बाद इस क्षेत्र की सत्ता में परिवर्तन हुआ।
मराठा काल में एक घटना उल्लेखनीय है। जब महादजी सिंधिया के सैनिक जहाजपुर क्षेत्र में आए और उन्होंने मीणा सरदारों को सैनिक सहायता का भुगतान नहीं किया, तो मीणा सरदार ने चेतावनी दी—
“हम लेना भी जानते हैं।”
अगले ही दिन मीणाओं ने मराठों की रसद काट दी। परिणामस्वरूप मराठों को भुगतान करने के लिए विवश होना पड़ा।
ब्रिटिश अधिकारी का विवरण
1809 में मराठा सेना से संबंधित अधिकारी Mr. Brrautan ने अपने पत्रों में खैराड़ के मीणाओं का वर्णन करते हुए लिखा—
खैराड़ (जहाजपुर) के मीणा सैनिक तीर-धनुष और कटार जैसे हथियार लिए हुए थे। उनकी पगड़ियाँ ऊँची बंधी होती थीं और उनके शीर्ष पर बोज़ा पक्षी के पंख लगे होते थे। उन्होंने अपने रीति-रिवाजों के अनुसार सम्मानपूर्वक अभिवादन किया।
1662 का विद्रोह
मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के समय 1662 में खैराड़ क्षेत्र के मीणाओं ने विद्रोह किया। इस विद्रोह को शांत करने के लिए 1667 में मीणा सरदार पीथा को जहाजपुर क्षेत्र के जाड़ोली गाँव की स्वतंत्र जागीर दी गई।
1851 का खैराड़ विद्रोह
1851 में अंग्रेजों की नई राजस्व व्यवस्था के विरोध में जहाजपुर (खैराड़) के मीणाओं ने भुवाना पटेल और गोकुल पटेल के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
मीणाओं का मानना था कि वे स्वतंत्र हैं और केवल मेवाड़ महाराणा की प्रतीकात्मक सत्ता स्वीकार करते हैं। अंग्रेजों और रियासती शासकों द्वारा किए जा रहे शोषण और अवैध वसूली के विरुद्ध उन्होंने विद्रोह कर दिया।
उदयपुर राज्य की सेना, शाहपुरा, बनेड़ा, बिजोलिया, भेसरोड़, जहाजपुर और माण्डलगढ़ के जागीरदारों की सेनाओं के साथ मिलकर विद्रोह को दबाने पहुँची। उन्होंने छोटी लुहारी और बड़ी लुहारी गाँवों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया।
इसके बाद मीणाओं ने मनोहरगढ़ और देवखेड़ा की पहाड़ियों में मोर्चा संभाला। इस संघर्ष में आसपास के क्षेत्रों से लगभग 5000 मीणा योद्धा सहायता के लिए पहुँचे।
युद्ध में मीणाओं ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया और रियासती सेनाओं के 57 सैनिक मारे गए। अंततः सरकारी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा।
1857 की क्रांति में योगदान
1857 की क्रांति के समय जब तात्या टोपे खैराड़ क्षेत्र में आए, तब यहाँ के मीणा आदिवासियों ने उन्हें पूर्ण सहयोग दिया। कई युद्धों में अंग्रेजों को पराजित करने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सैन्य परंपरा
इस क्षेत्र में सेना में भर्ती होना एक परंपरा रही है। 19वीं शताब्दी में बलदेवा मीणा (बलदेव सिंह) ने लगभग 3000 मीणाओं को सेना में भर्ती कराया। इसके बदले मेवाड़ महाराणा ने उन्हें सम्मान और पुरस्कार देने की घोषणा की।
जब महाराणा ने उन्हें 3000 चाँदी के सिक्के देने की बात कही, तो बलदेवा मीणा ने कहा—
“यदि देना ही चाहते हो तो मेरी कौम का पुराना सम्मान ‘सिंह’ उपनाम वापस दे दो।”
इसके बाद महाराणा ने आदेश जारी कर मीणा समाज को “सिंह” उपनाम पुनः प्रदान किया।
विश्व युद्ध और आज़ाद हिंद फौज
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भी खैराड़ क्षेत्र के अनेक मीणा सैनिकों ने भाग लिया। कई सैनिकों को वीरता पुरस्कार प्राप्त हुए।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिंद फौज में भी इस क्षेत्र के कई सैनिक शामिल थे। बताया जाता है कि नेताजी के चालक भी उमर गाँव के थे।
आज भी इस क्षेत्र के गाड़ोली, लुहारी, बासनी और उमर जैसे गाँवों से बड़ी संख्या में लोग भारतीय सेना में सेवा कर रहे हैं। अकेले उमर गाँव से लगभग 7000 लोग सेना में भर्ती हो चुके हैं, जो अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है।
निष्कर्ष
खैराड़ प्रदेश राजस्थान की आदिवासी वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता-प्रेम का जीवंत प्रतीक रहा है। यहाँ के मीणा और भील आदिवासियों ने सदैव अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया तथा अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए निरंतर युद्ध किया।
निस्संदेह खैराड़ प्रदेश को राजस्थान की आदिवासी वीरभूमि कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।