25/08/2026
क्या कोई एक्स्ट्रा-मैरिटल रिश्ता भी “हेल्दी” हो सकता है?
कभी-कभी ज़िंदगी में ऐसे रिश्ते बन जाते हैं, जिनका कोई भविष्य तय नहीं होता।
न शादी का वादा, न तलाक की बात, न साथ रहने की ज़िद।
बस एक समझ—
जहाँ तक रास्ता साथ जाता है, वहाँ तक साथ चलेंगे।
वह आदमी अपनी पत्नी से प्यार करता हो सकता है।
लेकिन शायद वह रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों, ऑफिस के दबाव, घर की परेशानियों और हर समय कुछ साबित करने की थकान से टूट चुका है।
उसे कोई ऐसा चाहिए जो उसे सुने, बिना किसी अपेक्षा के।
और वह औरत भी किसी की पत्नी है, किसी की बहू है, किसी की माँ है।
उसकी भी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं।
लेकिन शायद बहुत समय से किसी ने उससे प्यार से बात नहीं की।
किसी ने उसकी तारीफ़ नहीं की।
किसी ने नहीं पूछा—
“तुम कैसी हो?”
परिवार के बीच रहते हुए भी उसके भीतर की औरत कहीं बहुत पीछे छूट गई।
फिर दो ऐसे लोग मिलते हैं, जो अपनी-अपनी ज़िंदगी में किसी न किसी रूप में अधूरे और अकेले हैं।
वे रोज़ बात नहीं करते।
हर वक्त साथ रहने की ज़िद नहीं करते।
कोई अधिकार जताने की कोशिश नहीं करते।
लेकिन जब बात होती है, तो मन हल्का हो जाता है।
कभी-कभी इंसान को किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत होती है जिसके सामने वह पति, पत्नी, माँ, पिता, कर्मचारी या जिम्मेदार इंसान नहीं—सिर्फ एक इंसान बनकर रह सके।
शायद इसी वजह से ऐसे रिश्ते कुछ लोगों को सुकून देते हैं।
लेकिन एक सच यह भी है कि—
जो रिश्ता किसी और के भरोसे और अधिकार के पीछे छिपकर चलता है, उसमें भावनात्मक सुकून के साथ किसी और के विश्वास के टूटने का दर्द भी जुड़ा हो सकता है।
इसलिए हर रिश्ता सिर्फ इस बात से “सही” या “गलत” नहीं हो जाता कि उसमें प्यार है या सुकून।
कभी-कभी असली सवाल यह होता है—
क्या इस रिश्ते में किसी को धोखा दिए बिना, किसी की गरिमा और भावनाओं को चोट पहुँचाए बिना, ईमानदारी से जिया जा सकता है?
रिश्ते जटिल होते हैं।
इंसान उससे भी ज्यादा जटिल।
हर कहानी के पीछे सिर्फ गलत और सही नहीं होते—
कभी-कभी अकेलापन, अधूरी भावनाएँ, जरूरतें और बहुत सारी अनकही बातें भी होती हैं।