17/02/2024
आइंस्टीन द्वारा अनुत्तरित निरपेक्ष सत्य (Absolute truth) के संदर्भ में.......
दुनिया में दो तरह के द्रव्य हैं एक निष्क्रिय दूसरे सक्रिय। *सक्रिय द्रव्य* का अर्थ है - जो स्थान परिवर्तन कर सकते हैं, अर्थात् गतिमान हो सकते हैं। परिवर्तित हो सकते हैं, तथा गतिरहितता अर्थात् स्थिति को प्राप्त हो सकते हैं। *निष्क्रिय* पदार्थों का अस्तित्व केवल वह केवल निरपेक्ष स्वरूप ही होता है। जबकि सक्रिय द्रव्य निरपेक्ष के साथ-साथ सापेक्षिक भी हैं। सक्रिय द्रव्यों की सक्रियता या तो निष्क्रिय द्रव्यों के सापेक्ष ही उद्घाटित होती है अथवा सार्वभौमिक अॉब्जर्वर (सर्वज्ञ) को ग्राह्य हो सकती है।
जबकि सक्रिय और निष्क्रिय दोनों द्रव्यों की निरपेक्षता इंद्रिय गम्य नहीं है, क्योंकि द्रव्य का निरपेक्ष स्वरूप मात्र *सत्* है और सत् इंद्रिय अगोचर है। जबकि असत् इंद्रिय अगोचर और इंद्रिय गोचर दोनों हो सकता है। असत् अर्थात् जो परिवर्तित होता है।
इस माॅडल के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
1. सक्रिय द्रव्यों का स्थान परिवर्तन का बोध कराने वाला कोई न कोई एक स्थान सूचक द्रव्य होगा। उसे *आकाश द्रव्य* कहा जा सकता है।
2. स्थान परिवर्तन प्रक्रिया में गति का हेतुक (स्थिति से गति में सहायक) भी आवश्यक है अतः कोई एक कोई गति हेतुक निष्क्रिय द्रव्य भी होगा। जैन दर्शन में इसे *धर्म द्रव्य* नाम दिया गया है।
3. स्थान परिवर्तन प्रक्रिया में गति के अंत में स्थिति (गति उपरांत रुकने में सहायक) भी आवश्यक है अतः कोई एक स्थिति हेतुक निष्क्रिय द्रव्य भी होगा। जिसे जैन दर्शन में *अधर्म द्रव्य* नाम दिया गया है।
4. चूंकि परिवर्तन समयांतर सहित ही हो सकता है अतः सक्रिय द्रव्यों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन *काल द्रव्य* के सापेक्ष होगा।
5. जैन दर्शन में *जीव और पुद्गल (जड़)* की गणना सक्रिय द्रव्यों में होती है। जिनका *असत् पक्ष* जो इंद्रिय गोचर हो सकता है, वह शुद्ध पुद्गल अथवा जीव की पौद्गलिक अवस्था में ही संभव है।
6. इस प्रकार विश्व कुल छह प्रकार के द्रव्यों से मिलकर बना हुआ माना जा सकता है -... 1.जीव, 2.पुद्गल, 3.धर्म, 4.अधर्म, 5.आकाश, और 6.काल।
यह विचार जैन दर्शन को समझते हुए उत्पन्न हुए।
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