29/12/2025
Kanjiswami Songadh
Vitragvani
सोनगढ़ के आज सुबह 29.12.2025 पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी का 'नाटक समयसार' पर CD प्रवचन का सारांश दिया गया है:
*1. सम्यग्दर्शन की असली पहचान: "विपरीत मान्यता का टूटना"*
• भाई! सम्यग्दर्शन क्या है? यह राग और विकल्प से जुदा पड़कर आत्मा की पवित्र दशा को प्रगट करना है।
• जो यह मानता है कि "मैंने किया," "राग मेरा है," "शरीर मेरा है," यह सब तो विपरीत अभिप्राय है, यह मिथ्याभाव है।
• अनादि काल से जीव शरीर, धन, कुटुंब और विषय भोग में सुख मानता आ रहा है, लेकिन धर्मी को इन सबसे 'विरक्त भाव' होता है। उसे पता है कि इनमें सुख नहीं है, सुख तो आत्मा के अतीन्द्रिय आनंद में है।
*2. भेदज्ञान की "करवत" (आरी) और "छेनी"*
• आहा! बनारसीदासजी कहते हैं कि "भेदज्ञान आरे" से आत्मा और कर्म की धारा को भिन्न-भिन्न कर दो।
• जैसे बढ़ई लकड़ी को काटता है, वैसे ही 'प्रज्ञा छेनी' (बुद्धि की तीक्ष्ण छेनी) को अंतर में डालना है। "ऐसी बुद्धि छेनी घट माहि डार दीनी है"।
• यह छेनी कैसी है? यह 'परम पैनी' (बहुत तीखी) है। यह स्वभाव और विभाव की संधि को शोध लेती है, उन्हें अलग-अलग कर देती है।
*3. दो धाराएं: ज्ञान धारा और कर्म धारा*
• अंदर दो धाराएं बह रही हैं। एक है 'चेतन आनंद स्वभाव धारा' (ज्ञान धारा) और दूसरी है 'कर्म धारा' (राग और विकल्प की धारा)।
• ज्ञानी जीव इन दोनों को 'भिन्न-भिन्न चर्चे' यानी जुदा-जुदा जानता है। वह जानता है कि राग तो अज्ञानमय है, जड़ है; और मैं तो ज्ञान सुधारस (अमृत) से भीना हुआ हूँ,।
• राग में एकता करना मिथ्यात्व है, और राग से भिन्न पड़कर अपने स्वरूप में लीन होना ही धर्म है।
*4. "एक समय" का चमत्कार*
• देखो! यह सब काम कितनी देर का है? "ऐसी सब क्रिया एक समय बीच कीनी है",।
• जिस समय जीव ने राग से अपनी रुचि हटाई और 'सुधा सिंधु' (ज्ञान के सागर) भगवान आत्मा में मग्न हुआ, उसी एक समय में मिथ्यात्व का नाश हो जाता है और सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है।
• बाहर की दौड़-धूप, पूजा-पाठ या शुभ राग में धर्म नहीं है, धर्म तो आत्मा के शांत रस को पकड़ने में है।
*5. अपना ईश्वर अपने में ही है*
• सम्यग्दृष्टि ज्ञानी को "अपना ईश्वर अपने में दिखता है"।
• दुनिया क्या कहेगी, जगत क्या मानेगा, इसकी परवाह ज्ञानी नहीं करता। जगत को कर्ता मानना या ईश्वर को कर्ता मानना तो मिथ्या है।
• जब जीव अपने 'विश्वनाथ' (त्रिलोकीनाथ) स्वरूप को पहचान लेता है, तो कर्म-भ्रम का खजाना खाली होकर मोक्ष का मार्ग खुल जाता है,।
*6. सारांश -*
• जैसे लोहे की छेनी लोहे या पत्थर के दो टुकड़े कर देती है, वैसे ही सुबुद्धि (सम्यक ज्ञान) रूपी छेनी जड़ और चेतन को भिन्न कर देती है।
• राग को अपना मानना अज्ञान है। राग से भिन्न पड़कर, पूर्ण समाधि लेकर, परम शांति को प्राप्त करना ही इस नाटक समयसार का अधिकार है,।
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अंतिम बात:* भाई! यह 'जैन' होने का अर्थ क्या है? जो अज्ञान और राग को जीतने के लिए सावधान हो गया है, जिसने अपने अंतर में भेदज्ञान की छेनी उतार ली है, वही सच्चा जैन है,।