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स्वदेश विकास संस्थान - उद्देश्य, अभियान और पहल

स्वदेश विकास संस्थान का सृजन दो ऐसी बातों को ध्यान में रखकर किया गया, जिनके समाधान के लिए यदि आज से प्रयास नहीं किये गये तो स्थिति बहुत ही विकट हो जाएगी।

पहली बात यह थी कि, आज हमारे देश को आजाद हुए दस दशक भी पूरे नहीं हुए और स्थिति यह है कि देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम को 15 अगस्त और 26 जनवरी का पर्याय माना जाने लगा है। देश की युवा पीढी आजादी के महासंघर्ष को नित भूलती जा रही है। आजादी के लिए संघर्षरत महापुरूषों पर व्यंग्य बनना और तंज कसना किसी चुटकुले के मजे लेने जैसा हो गया है। स्थिति पर अब भी नियंत्रण नहीं किया गया तो संभवतः हम आजादी, महापुरूषों के बलिदान और महापुरूषों के सम्मान को खो देंगे।

उक्त विचार पर मंथन करते हुए संस्थान ने युवा पीढी को आजादी और बलिदान की कीमत बताने के लिए, युवा पीढी में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र के प्रति प्रेम के भाव जाग्रत करने के लिए महापुरूषों का जीवन वृतांत देशभक्ति के गीतों के साथ विद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों के बीच जाकर प्रस्तुत करना तय किया। देशभक्ति, देशप्रेम और राष्ट्र के प्रति सम्मान जागृति के इस पुनीत यज्ञ में संस्था स्वर सरिता के कलाकारों ने अपनी गायन कला के माध्यम से आहुति देने का संकल्प लिया और स्वदेश विकास संस्थान के साथ मिलकर दिनांक 26 जनवरी 2018 से देशभक्ति के तराने अभियान का शुभारम्भ न्यू सिटी कान्वेंट हायर सेकण्डरी स्कूल, इन्दौर से किया।

दूसरी बात यह थी कि, समाज में शिक्षित वर्ग बेरोजगारी की मार की पीड़ा सह रहा है। एक समय था जब पूरा देश और सरकारें समाज को शिक्षित करने हेतु प्रयासरत थी और आज जब समाज का बड़ा हिस्सा शिक्षित है तो वह बेरोजगारी की मार सह रहा है और सरकार इसका हल कौशल विकास में ढूंढ रही है। कौशल विकास इसका हल तो है, पर यह ज्यादा जरूरी है कि कौशल विकास कब और किसमें किया जाए ? हमारा मानना है कि कौशल विकास की बात यदि कक्षा 6टी से 12वीं के विद्यार्थियों के मध्य की जाए और उनके अध्ययन के साथ कौशल उन्नयन की कक्षा भी लगाई जाए या उस ओर ध्यान दिया जाए तो हमारे देश में व्यक्ति शिक्षित तो होगा ही साथ में कौशल उन्मुक्त होने के कारण बेरोजगार नहीं होगा। आज स्थिति यह है कि पोस्ट ग्रेजुएट किया व्यक्ति कौशल या स्किल नहीं होने के कारण किसी भी तरह की नौकरी करना चाहता है, बस नौकरी। चाहें वह चपरासी की हो या केशियर की। हम किसी को बड़ा छोटा नहीं कहते, पर कोई काम यदि किसी की शिक्षा के अनुरूप ना हो, तो उसकी शिक्षा का कोई महत्व नहीं रह जाता है।