02/09/2026
इंदौर में आज सुबह से फिर विकास आया...
एक ओर जहां पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है और पौधारोपण पर जोर दिया जा रहा है, वहीं भानगढ़ रोड स्थित नगर निगम कैंपस से प्रकृति के विनाश की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। विकास के नाम पर यहां एक घने और हरे-भरे क्षेत्र को उजाड़ने की तैयारी कर ली गई है।
*500 पेड़ों पर मंडरा रहा है खतरा*
भानगढ़ रोड स्थित ट्रीटमेंट प्लांट के पास बने इस नगर निगम कैंपस में वर्तमान में करीब 500 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के विशाल पेड़ मौजूद हैं। पूरा क्षेत्र नीम, पीपल, कबीट, अशोक, शीशम, अमरूद, जाम, जामुन, बेर, विलायती इमली और गुलमोहर जैसे पेड़ों से आच्छादित है। यहां प्रस्तावित स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के लिए पहले ही कई पेड़ों को काटा जा चुका है। अब इसी परिसर में पानी की टंकी का निर्माण होना है, जिसके लिए जहां मृदा परीक्षण किया गया है, वहां प्रस्तावित पानी की टंकी के घेरे में ही 25 से ज्यादा पुराने और विशाल पेड़ आ रहे हैं।
विकास के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की बलि दिए जाने को लेकर यहां के लोगों में गहरी चिंता व्यक्त की है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर मिलने वाला विकास अंतत: नुकसानदायक ही सिद्ध होगा। एक साथ सैकड़ों पेड़ों का कटना क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र को पूरी तरह बिगाड़ सकता है।
*जमीन का खेल*
इस पूरे मामले में बताया जा रहा है कि ट्रीटमेंट प्लांट और निगम कैंपस के पीछे की जमीन कुछ रसूखदारों ने खरीद रखी है। इस जमीन का मामला काफी समय तक चर्चा में रहा था, जब यह जमीन बिल्डर जयेश पाटीदार के पास थी। उसके बाद यह जमीन एक मंत्री के करीबी द्वारा खरीदी गई थी और उसके बाद पुन: यह जमीन जयेश पाटीदार और उनकी टीम के पास आ गई है, जिसे डेवलप किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि इस जमीन के ऊंचे भाव लेने के लिए निगम की जमीन पर निगम के पैसे से स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स और पानी की टंकी का निर्माण कराया जा रहा है, ताकि डेवलपमेंट दिखाकर माल कमाया जा सके। इस पूरे मामले में एक एमआईसी सदस्य जोर-शोर से इस कार्य में लगे हैं।
*अनसुलझे सवाल*
विकास की इस दौड़ में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
- क्या स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स या पानी की टंकी के लिए किसी ऐसी जगह का चयन नहीं किया जा सकता था जहां कम पेड़ों को नुकसान पहुंचे?
- क्या इन विशाल पेड़ों को काटने के बजाय उन्हें ट्रांसप्लांट करने की कोई योजना है?
अब देखना यह है कि पर्यावरण की इस पुकार को प्रशासन सुनता है या विकास के नाम पर यह मिनी जंगल इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।