Bwise WGSAT -NGO to Empower

Bwise WGSAT -NGO to Empower NGO is registered with an objective to reach out to more and more underprivileged and needy part of the society .

Who have been striving and far from basic need and hygiene . It is in line with our Facebook group "Women Ghar Se Asma Tak""Power of 52000"

10/08/2026

"""""असम बाढ़
हम सब साथ हैं """

धन्यवाद भैया, हम,ngo इसमें,योगदान दे पाया
हम सामग्री जुटा रहे थे पर उपयुक्त ,ऑथेंटिक सोर्स मिसिंग था,जैसे ही आपका ज्ञात हुआ, बस फिर तो नई ड्राइव से और सामान जुटा लिया
भैया इसमें शालीमार टाउनशिल रहवासियों का बहुत योगदान है
जयहिंद
वंदेमातरम्

भैया हम निरंतर सामान एकत्र करते हैं कभी भी आप ऐसा इनिशिएटिव ले,आप जरूर आदेश दे

डॉ सृष्टि पीटी
Bwise WGSAT -NGO to Empower

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सावन सोमवार 🌿🔱शिव जी को एक ग्लास दूध अर्पित कीजिए…और साथ ही साथ एक ग्लास दूध किसी जरूरतमंद के लिए भी लेकर जाइए। 🥛❤️क्यों...
10/08/2026

सावन सोमवार 🌿🔱

शिव जी को एक ग्लास दूध अर्पित कीजिए…
और साथ ही साथ एक ग्लास दूध किसी जरूरतमंद के लिए भी लेकर जाइए। 🥛❤️

क्योंकि भगवान को चढ़ाया हुआ दूध आपकी आस्था है,
और किसी जरूरतमंद को दिया हुआ दूध आपकी सेवा।

जब आस्था के साथ सेवा जुड़ती है,
तो भगवान का आशीर्वाद भी कई गुना होकर लौटता है। 🙏

हर हर महादेव 🔱
सेवा ही सच्ची शिव भक्ति है। 🌿

*आज रात तक*जल्दी से अपने घर का* सामान टटोले*🌊 *असम बाढ़* — आइए, साथ खड़े हों 🤝असम आज बाढ़ की गंभीर परिस्थिति से गुजर रहा...
09/08/2026

*आज रात तक
*जल्दी से अपने घर का* सामान टटोले*

🌊 *असम बाढ़* — आइए, साथ खड़े हों 🤝

असम आज बाढ़ की गंभीर परिस्थिति से गुजर रहा है।
ऐसे समय में हमारा छोटा-सा सहयोग भी किसी परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकता है।

आइए, सहयोग • सेवा • समर्पण से अपनत्व का रंग घोलें। ❤️

🙏 राहत सामग्री दें।
🙏 जरूरतमंदों तक मदद पहुँचाएँ।

हम सब साथ हैं।
असम के साथ हैं।
मानवता के साथ हैं। 🇮🇳

📦 क्या दे सकते हैं?

खाने-पीने की चीज़ें

चावल, आटा, दाल

पोहा, सूजी, दलिया

बिस्कुट

नमकीन/भुना चना

पैक्ड/सीलबंद खाने की सामग्री

ORS के पैकेट

साफ़ पैक्ड पीने का पानी

👕 कपड़े

साफ़, धुले हुए अच्छे हालत के कपड़े

बच्चों के कपड़े

महिलाओं के कपड़े

पुरुषों के कपड़े

साड़ी/सलवार-कुर्ता

तौलिया, चादर, कंबल

बच्चों के डायपर

🧼 स्वच्छता सामग्री

साबुन

टूथब्रश और टूथपेस्ट

सैनिटरी पैड

शैम्पू/छोटे पैक

सैनिटाइज़र

मास्क

टॉर्च और बैटरी

👶 बच्चों के लिए

बेबी फूड/सीरियल

डायपर

बच्चों के कपड़े

दूध पाउडर — केवल यदि स्थानीय राहत एजेंसी इसकी आवश्यकता बताए

❤️ सबसे महत्वपूर्ण सामग्री नई या साफ़, सूखी, उपयोग योग्य और अच्छी तरह पैक की हुई दें। गीले, फटे या इस्तेमाल के लायक न रहे सामान को राहत सामग्री में न दें।

एक छोटा पैकेट भी किसी के लिए बड़ी राहत हो सकता है।
सामर्थ्य के अनुसार दें—मात्रा नहीं, भावना महत्वपूर्ण है।

आज रात तक सामग्री जमा करें।

सादर आभार
डॉ सृष्टि पीटी
📍 PT-7, Shalimar Township
हम सब साथ हैं। 🤝

09/08/2026

देश का गर्व
सभी आज से शुरू कीजियेगा🙏🏻🙏🏻🙏🏻🇮🇳

चिंता नहीं… चीता है!चिंता चीता है।दौड़ता हुआ, हाँफता हुआ,हर दिन हमारे पीछे पड़ा हुआ चीता!सुबह आँख खुलते ही—चिंता।रात आँख...
09/08/2026

चिंता नहीं… चीता है!

चिंता चीता है।
दौड़ता हुआ, हाँफता हुआ,
हर दिन हमारे पीछे पड़ा हुआ चीता!

सुबह आँख खुलते ही—चिंता।
रात आँख बंद करते ही—चिंता।
दिनचर्या में चिंता,
रात की शय्या पर चिंता।

कभी कल की चिंता,
कभी आज की चिंता,
कभी उस बात की चिंता जो हुई ही नहीं,
और कभी उस बात की चिंता कि
“अभी तक चिंता क्यों नहीं हुई?”

हद तो तब है जब
सामने वाला भी चिंता नहीं कर रहा हो,
तो हमें उसकी चिंता होने लगती है!

अरे भाई… चिंता करने की भी तो कोई सीमा हो!

यह हमारे मन का वह घोड़ा बन गई है
जो बिना लगाम के इधर-उधर दौड़ता रहता है—
ढूँढता रहता है…
कुछ ऐसा, जिसकी चिंता की जा सके।

हमने चिंता को चारों दिशाओं से आवाज़ देकर बुला रखा है—
पूर्व से चिंता,
पश्चिम से चिंता,
उत्तर से चिंता,
दक्षिण से चिंता…

और फिर सारी चिंताओं को
अपने मन के एक छोटे-से कमरे में
कंसंट्रेट करके रख लिया है!

हमारा मन भी क्या करे?
वह अब खुशी को ढूँढना भूल गया है,
चिंता को ढूँढने का आदी हो गया है।

चिंता एक चुंबक है।
और हमारा मन…
चिंताओं को खींचता हुआ लोहा!

---

कभी सोचिए…

सूखी-बंजर धरती पर जब बारिश की पहली बूंद गिरती है,
तो मिट्टी उसे कितनी तृप्ति से पीती है।

वैसे ही हमारे जीवन में
जब कोई खुशी की बूंद आती है,
हम उसे कुछ क्षण ही महसूस कर पाते हैं
और फिर उसे चिंता की गर्म हवा
भाप बनाकर उड़ा देती है।

लेकिन चिंता?

उसके काले बादल
पूरे जीवन हमारे आसपास मंडराते रहते हैं।

और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि
इनमें से बहुत-सी चिंताएँ
कभी वास्तविक होने वाली ही नहीं होतीं।

हम कल्पनाओं में भविष्य के दुख जीते रहते हैं
और वर्तमान की खुशियों को
बिना जिए ही खो देते हैं।

यानी जीवन तो आज है,
लेकिन हम रोज़
कल की मृत्युशय्या पर लेटे हुए हैं।

---

चिंता हमारे भीतर की ऊर्जा खाती है।

हमारा समय,
हमारी ताकत,
हमारा ध्यान,
हमारी नींद,
हमारी मुस्कान,
हमारी रचनात्मकता…

धीरे-धीरे सब कुछ चूसती जाती है।

छोटी-छोटी बातों पर पसीना बहाना ही है,
तो क्यों न किसान बन जाएँ?

देश की मिट्टी के लिए पसीना बहाएँ।
किसी पौधे के लिए पसीना बहाएँ।
किसी जरूरतमंद का हाथ पकड़ने में पसीना बहाएँ।
किसी बच्चे की फीस भरने में पसीना बहाएँ।
किसी भूखे के लिए रोटी जुटाने में पसीना बहाएँ।

पसीना बहाना ही है,
तो ऐसी जगह बहाएँ
जहाँ उससे किसी का जीवन सींचा जाए।

---

और यह दुनियादारी भी बड़ी अजीब चीज़ है!

बाज़ार में चिंताएँ बिकती हैं—
तुलना के नाम पर,
प्रतिष्ठा के नाम पर,
दिखावे के नाम पर,
निंदा के नाम पर,
“लोग क्या कहेंगे” के नाम पर।

हम बड़े प्रेम से उन्हें खरीदकर
अपने घर ले आते हैं।

लेकिन पता है?

उन्हें घर लाते-लाते
हम अपने भीतर का सर्वस्व बेच आते हैं।

सराहना किसी की होती नहीं,
निंदा हमारी जुबान पर रहती है।

अच्छाई दिखाई नहीं देती,
क्योंकि आँखों पर
नकारात्मकता का चश्मा चढ़ा होता है।

किसी की मुस्कान से ज्यादा
उसकी कमी दिखाई देती है।

किसी की सफलता देखकर
प्रेरणा लेने से पहले
हम उसके पीछे कारण ढूँढने लगते हैं।

और फिर कहते हैं—
“आजकल जमाना ही खराब है!”

जमाना नहीं,
कहीं-कहीं हमारा चश्मा भी तो साफ करने की जरूरत है!

---

तो आइए…

आज चिंता के उस चीते को
थोड़ा आराम देते हैं।

आज किसी के साथ आधी रोटी बाँटते हैं।

सोचिए—
आप थाली लेकर खड़े हैं,
आपके पीछे कोई और भूखा खड़ा है
और भोजन समाप्त होने वाला है…

तो क्यों न अपनी थाली का
आधा हिस्सा उसके साथ बाँट लें?

देखिएगा…

उस दिन पेट शायद आधा भरेगा,
लेकिन मन पूरा भर जाएगा।

किसी का हाथ पकड़कर देखिए,
किसी की बात सुनकर देखिए,
किसी को बिना कारण धन्यवाद देकर देखिए,
किसी पेड़ को पानी देकर देखिए,
किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाकर देखिए।

फिर महसूस कीजिए—

चिंता की जगह जब करुणा आती है,
तो मन में कैसी शांति उतरती है।

---

जीवन का आधार कोई बहुत बड़ा भविष्य नहीं है।

जीवन का आधार है—आज का दिन।

हर दिन नई उमंग है।
नया अवसर है।
नया अपनापन है।
बारिश में भीगने की नई तृप्ति है।
सर्द हवाओं को महसूस करने का नया आनंद है।
किसी के साथ बैठकर मुस्कुराने का नया कारण है।

तो क्यों न आज
चिंता को नहीं,
जीवन को चुनें?

क्यों न अपने मन से कहें—

“बस! बहुत दौड़ लिया चिंता के पीछे।
अब थोड़ा जीवन के पीछे दौड़ते हैं।”

क्योंकि याद रखिए—

चिंता को हम चारों तरफ से आवाज़ देकर बुलाते हैं,
और वह चीते की तरह दौड़ी चली आती है।

लेकिन खुशी?

खुशी को बुलाना नहीं पड़ता…
उसे बस जगह देनी पड़ती है।

और अंत में एक छोटा-सा आशीर्वाद—

ईश्वर करे हमारे मन में
चिंताओं के चीते कम हों,
और जीवन के छोटे-छोटे हिरण
स्वच्छंद दौड़ते रहें।

हमारी आँखें निंदा नहीं, अच्छाई देखें।
हमारे हाथ शिकायत नहीं, सहयोग करें।
हमारा पसीना चिंता में नहीं, कर्म में बहे।
और हमारी साँसें मृत्यु की चिंता में नहीं,
जीवन की सुंदरता में चलें।

चिंता… चिंता… चिंता…
चीता… चीता… चीता…
अब बस!

आज जीते हैं।
पूरी तरह जीते हैं। 🌱❤️चिंता को अगर कोई हरा सकता है,
तो वह है—हमारी माफी।

खुद को माफ करने की क्षमता…
और दूसरों को भी दिल से माफ कर देने का साहस।

क्योंकि जिस क्षण हम
पुरानी गलतियों का बोझ,
पुराने रिश्तों की कसक,
पुरानी बातों की गाँठ
और अपने ही प्रति की गई कठोरता
को छोड़ देते हैं—

उसी क्षण चिंता पीछे हटने लगती है।

माफी केवल किसी दूसरे को मुक्त करना नहीं है,
माफी तो अपने भीतर को मुक्त करना है।

और जब मन क्षमा के भाव से हल्का होता है,
तभी भीतर छुपी हुई आत्मशक्ति
नवजीवन का स्पर्श पाती है,
नवस्फुरित होती है,
और जीवन का नवशृंगार करती है।

इसलिए आज
खुद से भी कहिए—

“जो हो गया, उसे मैं स्वीकार करता/करती हूँ।
जिसे बदल नहीं सकता/सकती, उसे छोड़ता/छोड़ती हूँ।
और जिसे माफ कर सकता/सकती हूँ, उसे दिल से माफ करता/करती हूँ।”

शायद यही वह क्षण है
जब चिंता का चीता थमता है
और भीतर का जीवन
फिर से दौड़ने लगता है। 🌱

— डॉ. सृष्टि सारफ सिसोदिया
साभार, सविनय

09/08/2026

Bwise Social Welfare Society, your dedication to helping others is truly inspiring! Vandna Bhardwaj ji

🙏बाढ़ पीड़ितों की सेवा 🙏
“आपकी छोटी-सी मदद, किसी बाढ़ पीड़ित के जीवन में बड़ी राहत बन सकती.
हाल ही में बलसाड़ शहर में आई बाढ़ में तबाह हुए घरों को थोड़ी सी मदद करने का प्रयास किया। सभी दानदाताओं का हृदय से शुक्रिया।

07/08/2026
07/08/2026
07/08/2026

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