Dev shakti sanatan mahasangh

Dev shakti sanatan mahasangh Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Dev shakti sanatan mahasangh, Community Organization, India Gate.

हमारा उद्देश्य विश्व में सनातन हिंदू धर्म का विस्तार, और दुनिया भर में हिंदू भाई बहनो की समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु हमारा योगदान सुनिश्चित करना व लोगों को अपने योगदान हेतु प्रेरित करना है

“क्या समाज की वास्तविक शक्ति श्रेष्ठता में नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग में है?”आपका क्या विचार है? #भारत  #विश्वगुरुभारत  #...
06/09/2026

“क्या समाज की वास्तविक शक्ति श्रेष्ठता में नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग में है?”
आपका क्या विचार है?
#भारत #विश्वगुरुभारत #सोनेकीचिड़िया #भारतीयसंस्कृति #सनातनसंस्कृति #गुणऔरकर्म #सामाजिकएकता #वसुधैवकुटुम्बकम्

28/06/2026

'हार के आगे ही जीत है' – यह बात अक्सर सुनने को मिल जाती है। अब प्रश्न उठता है कि– 'क्या जीत का रास्ता हार से होकर जाता है?', 'क्या हार जीत का मार्ग प्रशस्त करती है?', 'क्या हार को जीत मान लिया जाय?', 'क्या हार होने पर हार से सबक लेकर जीत जाने के लिए कोशिश करनी चाहिए? याकि 'हार-जीत से परे अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होना चाहिए?' इस तरह के कई और भी प्रश्न हो सकते हैं। परन्तु, बात केवल प्रश्न की नहीं है, कुछ और भी है जिसे जानना-समझना जरूरी है। पहले प्रश्न को ही ले लें तो यह जरूरी नहीं कि हर जीत का रास्ता हार के गलियारे से होकर ही जाता हो। इसी प्रकार से प्रत्येक हार जीत का ही मार्ग प्रशस्त करती हो, यह भी निश्चित नहीं। हार को जीत मानना तो कुछ अधिक ही दार्शनिक (प्रेमी, पागल और फकीर के लिए उपयुक्त) हो जायेगा – 'प्रेम वह व्यवहार है जो जीत माने हार को/ तलवार की भी धार पर चलना सिखा दे यार को' (कवि दिनेश सिंह)। हार से सबक लेकर जीत जाने के लिए कोशिश करने में कोई बुराई नहीं। प्रसिद्ध साहित्यकार सोहनलाल द्विवेदी जी कहते भी हैं कि– 'लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।' द्विवेदी जी कोशिश के महत्व को रेखांकित तो करते हैं, किन्तु यह भी कह देते हैं कि 'कोशिश' करने वाले की हार नहीं होती है। यानी कि जीत होगी भी कि नहीं, इस पर वह कुछ कहते ही नहीं दिखते। वह मेहनत करने और विश्वास एवं उत्साह बनाये रखने का मूल मन्त्र जरूर देते हैं, कुछ इस तरह से –

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम

संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम

कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

सफल होना एक कला है; असफल होना उससे भी बड़ी कला है। सफल होने पर कर्ता को अक्सर अपनी अच्छाइयाँ ही दिखाई देती हैं, कमियों पर तो उसकी नज़र ही नहीं जा पाती। किन्तु, असफल होने पर कर्ता सदैव दोहरे अनुभव से गुज़रता है– वह अपनी अच्छाइयों और कमियों को जाँचता-परखता है और यथा-शक्ति उनमें सुधार भी करता है। इस दृष्टि से तो असफलता (हार) सफलता (जीत) से बड़ी कला हुई? कला एक साधन तो हो सकती है, साध्य कभी नहीं। इसलिए यहाँ पर असफलता साधन-भर है और सफलता साध्य। इस साधन और साध्य के बीच की दूरी को तय करने के लिए, अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए दृढ़ इच्छा-शक्ति, सूझ-बूझ, कठोर परिश्रम एवं लगन भी बेहद जरूरी है। यह सब होने पर हो सकता है कि कर्ता को जय-जयकार का अनुभव हो जाय और उसकी हार न हो। अब प्रश्न उठता है कि- 'फिर जीत का क्या?' भगवद्गीता कहती है कि 'हार-जीत से परे जाकर' अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, कर्म के बिना तो शरीर-निर्वाह भी नहीं हो सकता –

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।

शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।

भक्त के लिए भक्ति श्रेष्ठ है, ज्ञानी के लिए ज्ञान श्रेष्ठ है और कर्मयोगी के लिए कर्म श्रेष्ठ है। इससे तो यही हुआ कि 'श्रेष्ठ' की प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है। हार-जीत तो अपनी जगह हैं। अब प्रश्न उठता है कि यदि तात्विक दृष्टि से हार का विलोम जीत नहीं हो सकता (द्विवेदी जी की कविता के संदर्भ में), तो क्या श्रेष्ठता जीत का पर्याय हो सकती है? आलोचक-विचारक इस प्रश्न पर मौन भी हो सकते हैं। मौन होना कोई बुरी बात तो नहीं। किन्तु, भावक के मन में यह प्रश्न तो उठेगा ही कि आखिर क्यों हार-जीत "नहीं आते कार (लकीर) के भीतर/ निराकार जपते हरि हर हर" (रावण-सीता संवाद) और क्यों कृष्ण-अर्जुन संवाद इस श्लोक में 'कर्म करना श्रेष्ठ है' कहकर इतिश्री कर लेता है। कृष्ण तो जगद्गुरु हैं– 'कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम!' वह तो सब जानते हैं। कहीं वह हार-जीत की सीमाओं की ओर तो इशारा नहीं कर रहे? जैसे वह कह रहे हों– हार-जीत से तो राग-द्वेष उपजता है, दुःख-सुख उपजता है; इससे आनंद नहीं मिलने वाला। आनंद तो हार-जीत से परे जाकर कर्म करते रहने में है– निष्काम कर्म।

प्रश्न यह भी है कि कृष्ण जैसा गुरु सबको कहाँ मिलता है। फिर तो प्रश्न यह भी होगा कि अर्जुन जैसा शिष्य भी सबको कहाँ मिलता है। पर सच तो यह है कि खोजने से सब मिल जाता है; कोशिश करने से सब कुछ संभव है। संभव है तो प्रगति है। मनुष्य प्रगति करना चाहता है– उसकी यह प्रगति आंतरिक भी हो सकती है और बाह्य भी। किन्तु, प्रगति ऐसे ही नहीं होती। प्रगति-पथ पर संघर्ष और सृजन दोनों साथ-साथ चलते हैं। कभी-कभी तो संघर्ष इतना कठिन हो जाता है कि कर्ता को महसूस होने लगता है कि वह असहाय है, कमजोर है, शक्तिहीन है और इसलिए वह सार्थक सृजन नहीं कर सकता, अपने लक्ष्य को भेद नहीं सकता, अपने श्रेष्ठ को प्राप्त नहीं कर सकता– जबकि सच कुछ और ही होता है। सच तो यह है कि इस ब्रह्मांड में कोई भी असहाय, कमजोर, शक्तिहीन नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी-सी है कि वह अपने आपको पहचान ले कि उसके भीतर भी शक्ति है, उत्साह है, उमंग है, विद्या है, ज्ञान है, शील है, गुण है, धर्म है और वह अपनी हार को जीत में और जीत को आनंद में बदलने की सामर्थ्य रखता है। तब निश्चय ही वह अपनी समस्त शक्तियों को संगठित कर उनका ठीक से प्रयोग करते हुए अपने मार्ग पर प्रशस्त हो सकेगा। आज दुनियाँ में ऐसे तमाम लोग हैं जिन्होंने अपने आपको पहचाना, अपनी शक्तियों को पहचाना और अपने सत्कर्मों के बल पर बेहद सफल हुए। कभी लियोनार्डो द विन्ची को एक चित्र बनाने में वर्षों लगे थे, कभी डार्विन पिता की नजर में आलसी हुआ करते थे, कभी स्वामी विवेकानंद नरेन्द्र हुआ करते थे, कभी होंडा इंटरव्यू में निराश हुए थे, कभी रामानुजम बारहवीं में फेल हुए थे, कभी अब्दुल कलाम साहब अखबार बेचा करते थे, कभी नरेन्द्र मोदी चाय बेंचते थे, कभी टॉम क्रूज को 14 साल में 15 स्कूल बदलने पड़े थे, कभी मिस्टर बीन अपने साथियों के बीच मजाक का पात्र बने थे आदि– किन्तु, इन जैसे तमाम लोगों ने कभी हार नहीं मानी और इतिहास रच दिया। ऐसी विशिष्ट विभूतियों ने यह साबित कर दिया कि हार के आगे ही जीत है और जीत के आगे आनंद। आप इसे परमानंद भी कह सकते हैं, मुझे कोई आपत्ति नहीं।

– आचार्य शिवम्

07/06/2026

दिमाग त्वरित आनंद (instant gratification) की ओर भागता है, और इसी में हमारा सबसे कीमती संसाधन, समय, बर्बाद होता है। चलिए इसे थोड़ा और स्पष्ट करते हैं और समाधान की ओर बढ़ते हैं।

---

🧠 समस्या क्या है?

1. दिमाग का डिज़ाइन ही ऐसा है

हमारा दिमाग खतरे से बचने और आनंद की ओर दौड़ने के लिए विकसित हुआ है। यह हर वक्त "तुरंत अच्छा महसूस हो" वाली चीजें तलाशता है — जैसे:

मोबाइल स्क्रॉल करना

यूट्यूब, सोशल मीडिया

फालतू बातचीत या कल्पनाएँ

बार-बार काम बदलना

2. लेकिन ये आनंद “क्षणिक” होता है, संतोष नहीं देता

ये त्वरित आनंद हमें कुछ देर के लिए अच्छा महसूस कराता है, लेकिन बाद में एक खालीपन या अपराधबोध छोड़ जाता है —

> “मैंने फिर से समय बर्बाद कर दिया…”
“मैंने जो ठाना था, वो नहीं कर पाया…”

---

🔄 समाधान: कैसे अपने दिमाग को प्रशिक्षित करें?

🧭 1. तत्काल और दीर्घकालीन आनंद के बीच फर्क समझिए

तात्कालिक आनंद = स्वादिष्ट लेकिन अस्वास्थ्यकर भोजन जैसा है।

दीर्घकालिक आनंद = वो है जो आपको संतोष, आत्मगौरव और स्थायी शांति देता है — जैसे कोई स्किल सीखना, लक्ष्य पूरा करना, किसी गहराई से किया गया काम।

🧘‍♂️ 2. “डोपामिन डाइट” या डिजिटल डिटॉक्स का अभ्यास करें

रोज़ 1–2 घंटे नो मोबाइल, नो इंटरनेट समय रखें।

उस समय केवल पढ़ना, लिखना, सोच विचार, या रचनात्मक कार्य करें।

🧩 3. दिमाग को ‘प्रशिक्षित’ करें फोकस में रहने के लिए

Pomodoro Method: 25 मिनट बिना रुके काम करें, फिर 5 मिनट ब्रेक। ये तकनीक दिमाग को अनुशासित करने में मदद करती है।

दिन की शुरुआत में सबसे कठिन/महत्वपूर्ण कार्य पहले करें (Eat That Frog तकनीक)।

🗓 4. दिनचर्या में Structure लाएं

सुबह उठने का, काम करने का, आराम करने का एक निश्चित क्रम रखें। इससे दिमाग को “भटकने की छूट” कम मिलेगी।

---

💡 एक विचार: त्वरित आनंद से ऊपर उठने के लिए “अर्थ” की आवश्यकता होती है

> जब काम में “उद्देश्य” जुड़ जाता है, तब आनंद नहीं, अर्थ प्राथमिक बनता है।
और “अर्थपूर्ण काम” ही हमें गहरी संतुष्टि देता है।

---

🔚 निष्कर्ष

दिमाग की यह चंचलता स्वाभाविक है, लेकिन इसे मास्टर किया जा सकता है।

आनंद की जगह उद्देश्य चुनें, छोटे-छोटे एक्शन लें, और खु

18/05/2026

जो भी जीवन मे दुख नहीं चाहते वो प्रतिदिन अपने परिवार के साथ बैठकर एक घंटे भगवान की कथा कहें और सुने परिवार के जितने सदस्य है एक दिन कोई कहे बाकी सुने जरूरत के अनुसार दूसरा भी कह सकता है लेकिन हर दूसरे दिन दूसरे व्यक्ति की पारी होनी चाहिए कथा कहने की

Address

India Gate

Telephone

+917390057539

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Dev shakti sanatan mahasangh posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Dev shakti sanatan mahasangh:

Shortcuts

Share