22/10/2025
हक़ है! मगर कहने दो
अफ़्फ़ान नोमानी
झारखंड के गोड्डा जिला में, जहाँ जल, जंगल, जमीन व लहराते हरियाली का है संगम और बच्चे बुनते है सपना, बसा था परसा गांव.
अल्पसंख्यक उच्च विद्यालय से परसा गांव की पहचान जहाँ से न जाने कितने सेकड़ों - हजारों छात्रों को दी देश व विश्व पटल पर पहचान. उसी परसा गांव के निवासी थे गोल्ड मेडलिस्ट हिदायत अली सर. प्रोजेक्ट कन्या विद्यालय के प्रधानाचार्य पद पर आसीन हिदायत सर का नाम ही उनकी पहचान था - हिदायत यानी सही राह दिखानें वाला.
दिल में हजारों बच्चों का बचपन, मृदुभाषी, हसमुख चेहरों से दिलों को जोड़ने वाले, प्रतिभा के धनी, अपने नाम हिदायत - यानी मार्गदर्शन करने वाला, समाज को सही राह दिखानें वाला, समाज की बेहतरी व परिवर्तनशील विचार के हामी, जिससे समाज बदलें...... लेकिन हिंसक समाज ने उन्हें ही निगल लिया.
जमीन को लेकर शुरू हुई आपसी विवाद ने ऐसा उग्र रूप लिया कि उनके अपने ही चाचा व सम्बन्धी ने पीट -पीट कर मार डाला. भीड़ में एक शिक्षक की सांसे थम गई और समाज चुपचाप तमाशा देखता रहा. बीबी अपने पति को बांहों में भरकर चिल्लाते रही लेकिन मरे हुवे उदासीन समाज व प्रशासन ने तत्परता नहीं दिखाई.
दीनी व दुनियावी इल्म का प्रचार - प्रसार करने वाला गांव का इससे पहले नैतिक पतन पहले कभी नहीं देखा गया था. जहाँ एक शिक्षक की हत्या कर दी गई और पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा स्तर पर किसी जनप्रतिनिधि का दोषी के खिलाफ कड़ी करवाई व फ़ास्ट ट्रैक अदालती करवाई के तहत पीड़ित परिवार को न्याय दिलवाने की बयान सामने नही आया है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारा समाज कितना उदासीन हो चुका है?
देश के भविष्य बच्चों को शिक्षा रूपी रौशनी देने वाला प्रकाशरूपी शिक्षक हिदायत सर जैसा दीपक को बुझा दिया गया लेकिन हमारी अंतरात्मा इतनी सुन्न हो गई है कि हम उनके पीड़ित परिवार के न्याय के लिए भी खड़े नहीं हो पा रहे है?
राजनीतिक मुद्दों पर सड़कों पर मशाल लिए आवाज़ उठाने वाले गय्यूर नोज़वानों की खामुशी अफ़सोसजनक है.
एक राजनीतिक मुद्दों पर गर्म खून का मुज़ाहिरा पेश करने वाले समाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं का खून एक शिक्षक की हत्या पर ठंडा क्यों है?
माना कि आपसी जमीनी विवाद वर्षों से था तो क्या किसी की हत्या कर देना उचित है?
आपसी विवाद कहकर एक भाई शिक्षक की हत्या दूसरे भाई हॉस्पिटल में जिंदगी व मौत के बीच सांसे ले रहा है, को अनसुनी कर देना, दर्शाता है कि हमारे अंदर की इंसानियत मर चुकी है.
समाज की उदासीनता, हत्या पर खामुशी..... एक हिंसक समाज बनने की ओर अग्रसर है जिसके जिम्मेदार हम सब है.
इस लेख में अंकित कई बात बहुत कड़वी जरूर है जिससे किसी को तकलीफ हुई तो माज़रत लेकिन हिदायत सर के न्याय के लिए समर्पित है. बात हक़ है! मगर कहने दो.