12/03/2026
भगवान् की असीम दया का फल (पोस्ट 1) ------ भगवान् की दया के विषय में एक कहानी सुनी जाती है | इस कहानी में विशेष रहस्य है | कहानी इस प्रकार है ---
एक संन्यासी महात्मा थे, वे एक बार किसी गृहस्थ के यहाँ भिक्षा के लिये गये | उसके दरवाजे पर आवाज दी – ‘नारायण हरि’ | गृहस्थ घर के भीतर था | वह बाहर आया और हाथ जोड़कर उनके चरणों में गिर गया तथा रोने लगा | महात्मा ने पूछा – तुम क्यों रोते हो ? गृहस्थ बोला – महाराज | मेरे समान संसार में कोई दु:खी नहीं है, कोई दरिद्र नहीं है | मैं इतना गरीब और दु:खी हूँ कि मैं क्या कहूँ |
मेरे रोने का कारण यह है कि आप हमारे घर आये और ‘नारायण हरि’ कहकर भिक्षा के लिये प्रेरणा दी किन्तु महाराज | मैं क्या कहूँ, मेरे घर वाले तीन दिन से भूखे हैं, खाने के लिये घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है | शहर के लोगों ने बड़ी मदद की, उधार रुपया भी दिया | देने वाले लोग कितना दें, तीन दिन से हम सब भूखे हैं | हमारे समान कोई गरीब, अनाथ, दरिद्र, भूखा नहीं है | तब उस महात्मा ने कहा कि तुम्हारे समान संसार में कोई धनी नहीं है, तुम चाहो तो सबको मालामाल कर सकते हो | रंक को भी धनी बना सकते हो, दरिद्र की भी दरिद्रता मिटाकर उन्हें एकदम धनी बना सकते हो, ऐसी तुम्हारी सामर्थ्य है | उस गृहस्थ ने कहा – ‘महाराज ! मेरी न कोई सामर्थ्य है, न कोई करामात | न मेरे पास रुपया है | आप कैसी बात कह रहे हैं | मेरी समझ में बात नहीं आती | आप कहते हैं – तुन्हारे समान कोई धनी नहीं है, महाराज ! मैं समझता हूँ कि मेरे समान कोई दरिद्र नहीं है, कोई गरीब नहीं है, कोई अनाथ नहीं है आप बिलकुल विपरीत बात कह रहे हैं | महात्मा ने कहा – देखो, तुम्हारे घर में यह क्या है ? गृहस्थ बोला – सिल-लोढा है | महात्मा ने लोढे को उठाया और बोले – ‘यह क्या है ?’ गृहस्थ बोला – यह पत्थर है | महाराज बोले हम इसे पत्थर नहीं मानते | गृहस्थ बोला – आप माने चाहे न माने ! आप कहें तो मैं हजारों आदमियों से कहलवा दूँ कि यह पत्थर है |
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शेष आगामी पोस्ट में |
श्रद्धेय श्रीजयदयाल गोयन्दका जी की पुस्तक *उपदेशप्रद कहानियाँ* पुस्तक कोड ६८० द्वारा प्रकाशित गीताप्रेस, गोरखपुर से |
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