24/12/2025
_*।। चाणक्य नीति ।।*_
*चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनम्।*
*चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः।।*
अर्थात् इस चराचर जगत् में लक्ष्मी ( धन ) चलायमान है अर्थात लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती, नष्ट हो जाती है, प्राण भी नाशवान हैं, जीवन और यौवन भी नष्ट होने वाले हैं, इस चराचर संसार में एकमात्र धर्म ही स्थिर है।
धन-सम्पत्ति मनुष्य के पास सदा नहीं रहती, उसके कर्मों के अनुसार आती-जाती है। जिस मनुष्य ने जीवन धारण किया है, उसका मरना भी आवश्यक है, इसीलिए प्राणों को स्थिर नहीं कहा जा सकता। मनुष्य का यौवन सदा स्थिर रहने वाली वस्तु नहीं, बुढ़ापा यौवन का क्षय है, परंतु धर्म ऐसा तत्त्व है जिसका नाश नहीं होता। मनुष्य की मृत्यु के बाद भी धर्म ही उसका साथ देता है। शास्त्र की भी मान्यता है कि आते भी हम अकेले हैं और जाते भी अकेले ही हैं, लेकिन धर्म हमेशा साथ रहता है। आचार्य के अनुसार जो हमेशा साथ रहने वाला है उसकी ओर मनुष्य को ध्यान देना चाहिए।