17/01/2026
भारतीय गणतंत्र की स्वतंत्रता के बाद देश की सबसे बड़ी समस्या विभाजन के फलस्वरूप छिन्न-भिन्न हुई संपत्तियाँ नहीं थीं, बल्कि जमींदार और आम भारतीय के बीच संपत्ति का असमान बँटवारा था। मध्य प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में तो यह टकराव इतना तीखा हो गया कि कम्युनिस्टों के लिए संघर्ष को हिंसा की ओर मोड़ना आसान साधन बन गया। ऐसे समय में 1951 में साधक संत विनोबा भावे ने भूमि समस्या के समाधान की हिंसक राह तलाश रहे लोगों के बीच जाने का फैसला किया और मार्च में महाराष्ट्र के पवनार से निकलकर अशांत तेलंगाना क्षेत्र में 339 मील की सर्वोदय यात्रा आरंभ की- यह संदेश लेकर कि परिवर्तन की ताकत हिंसा नहीं, अहिंसा, संवाद और न्याय हैं।
इसी वर्ष 1 मई (मजदूर दिवस) को हरदोई के थमरवा गाँव में जन्मे एक बच्चे ने, सत्तर के दशक तक आते-आते, विनोबा की विचारधारा को केवल विचार के रूप में नहीं, जीवन-मार्ग के रूप में अपनाया। यही बच्चे आगे चलकर सर्वोदय आश्रम के संस्थापक —श्री रमेश भाई— बने। विनोबा के भूदान आंदोलन ने उन्हें भूमि-समस्या की जड़ दिखायी, लेकिन हरदोई की धरती ने उन्हें इसका व्यावहारिक समाधान सिखाया। रमेश भाई ने देखा कि उपजाऊ जमीनों का भूदान कराकर उन्हें निचले तबके में बाँट देना जितना कठिन है, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि गाँवों की ऊसर/उसार पड़ी बेकार जमीन का क्या होगा, जो समाज के हिस्से में तो है, पर उपयोग में नहीं।
यहीं से सर्वोदय आश्रम का काम विनोबा-परंपरा का नया विस्तार बना। आश्रम उनके लिए सिर्फ एक संस्था नहीं था, बल्कि एक जीवित प्रयोगशाला था, जहाँ “भूदान” का अर्थ कागज़ी दान से आगे बढ़कर श्रम, सहभागिता और स्वामित्व की सामूहिक संस्कृति बनता था। आश्रम में योजनाएँ मेज पर नहीं, खेत की मेड़ पर बनती थीं, गाँव की बैठक, पंचायत का चबूतरा, मजदूर की हथेलियों की दरारें, यही उनकी फाइलें थीं। यहाँ “लाभार्थी” कम और साथी, सहभागी, श्रमसहयोगी जैसे शब्द ज्यादा सच थे।
रमेश भाई ने भूदान को दानदाता-केंद्रित नहीं रहने दिया; उन्होंने इसे परिश्रमदाता-केंद्रित बनाया। उनका विचार साफ था, ऊसर भूमि को सुधार कर, उसे उन्हीं लोगों के नाम किया जाए जो पीढ़ियों से खेतों में मजदूरी करते आए हैं। इसीलिए उन्होंने जनपद हरदोई में एक मुहिम शुरू की: ऊसर भूमि का उपचार, फिर उसका आवंटन, और यह सब भूमिहीनों की सहभागिता से। सर्वोदय आश्रम ने इस काम में तकनीकी सलाह से ज्यादा जन-संगठन किया: गाँव-गाँव लोगों को जोड़ना, उन्हें भरोसा दिलाना कि यह जमीन “सरकारी कृपा” नहीं, उनकी मेहनत से उपजी उनकी संपत्ति बनेगी; श्रमदान-दल बनाना; बैठकों की मर्यादा और निर्णय-प्रक्रिया गढ़ना; और हिसाब-किताब को पारदर्शी रखना।
जब राज्य सरकार के सहयोग से ऊसर सुधार की योजना बनी और अधिकारियों ने उपचारित भूमि उद्योगपतियों को देने का प्रस्ताव रखा, तब रमेश भाई का सर्वोदय-संकल्प निर्णायक रूप से सामने आया। उन्होंने बड़ी स्पष्टता और दृढ़ता से सहयोग देने से मना कर दिया, यहाँ तक कि प्रदेश के मुख्य सचिव के सामने भी। उनका कहना था: यह जमीन उद्योगपतियों को नहीं, भूमिहीन मजदूरों को स्वामित्व सहित मिले; सुधार-कार्य उन्हीं के सहयोग से हो; और लाभ भी उन्हीं को पहुँचे। अंततः अधिकारियों को झुकना पड़ा और रमेश भाई की बात माननी पड़ी।
इस कार्यक्रम के तहत जनपद में हजारों हेक्टेयर ऊसर भूमि उपचारित की गई और भूमिहीन मजदूरों को आवंटित की गई। लेकिन यह केवल खेती का प्रोजेक्ट नहीं था—यह सम्मान और सुरक्षा का पुनर्वितरण था। जमीन का पट्टा सिर्फ कागज़ नहीं रहा; वह गाँव के भीतर व्यक्ति की पहचान, उसकी आवाज़ और उसके भविष्य का आधार बना। यही कारण रहा कि भूमि सुधार का यह मॉडल “हरदोई मॉडल” के नाम से जाना गया और प्रदेश के 25 से अधिक जनपदों में सफलतापूर्वक लागू भी हुआ।
सर्वोदय आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वह व्यक्तियों को नायक बनाकर नहीं, समूहों को सक्षम बनाकर काम करता था। आश्रम ने हर सफलता को पद्धति में ढाला और हर कठिनाई को सीख में - और इस तरह ऊसर जमीन के साथ-साथ लोगों के भीतर बैठी निराशा भी उपचारित होती चली गई।
यही सर्वोदय की पहचान बनी: जमीन का सुधार नहीं, जीवन का उत्थान।
क्रमशः
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