सर्वोदय आश्रम - Sarvodaya Ashram

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सर्वोदय आश्रम - Sarvodaya Ashram Sarvodaya Ashram: A Gandhian-inspired voluntary organization located in Hardoi district, U.P. Ashram has developed two famous models. com

Non Profit Organisation:
Sarvodaya Ashram works in thematic areas like Agriculture development, Women Empowerment, Education, Health, Animal Welfare, Policy Advocacy and Employment Generation. The Ashram has carried out various projects in different districts of Uttar Pradesh with the objective of serving the neediest people. One, the reclamation of sodic land, which was adopted by The World Bank,

and second Udaan, to impart quality alternative education to out-of-school adolescent girls through innovative ways. Its learning’s are adopted in KGBB schools. Vision:

The upliftment of the poorest of poor through Gandhian ideology

Currently working in Hardoi, Barabanki, Raebareli, Bahraich and Lakhempur districts of Uttar Pradesh, Ashram got experience of working in 46 districts of central Uttar Pradesh, under NREGS program & in 25 Districts of Uttar Pradesh under Land Reformation program. Sarvodaya Ashram is executing many projects like Day schools, Residential senior secondary school for schedule caste Girls, Residential Primary School, accelerated learning program – Udaan, Sure Start, Equine Welfare Program, Child Labor School, Innovation In Upper Primary Eduction, Aids control program, Power With In, Diversified Agriculture Program, Sodic land Reclamation Program, Khushhali program and program to provide jobs to households under MNAREGA etc. Current programs are supported by national and international agencies of repute like State Govts, Govt of India, CARE, Kusuma Foundation, Mamta, The Brooke Hospital of Animals etc. For more information you can reach us at sashram @ rediffmail .

22/01/2026

सर्वोदय आश्रम के कार्यों को आप तक पहुँचाने के लिए कुछ वीडियो प्रस्तुत हैं।

यह वीडियो ‘उड़ान’ कार्यक्रम का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करता है

क्रमशः

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भारतीय गणतंत्र की स्वतंत्रता के बाद देश की सबसे बड़ी समस्या विभाजन के फलस्वरूप छिन्न-भिन्न हुई संपत्तियाँ नहीं थीं, बल्क...
17/01/2026

भारतीय गणतंत्र की स्वतंत्रता के बाद देश की सबसे बड़ी समस्या विभाजन के फलस्वरूप छिन्न-भिन्न हुई संपत्तियाँ नहीं थीं, बल्कि जमींदार और आम भारतीय के बीच संपत्ति का असमान बँटवारा था। मध्य प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में तो यह टकराव इतना तीखा हो गया कि कम्युनिस्टों के लिए संघर्ष को हिंसा की ओर मोड़ना आसान साधन बन गया। ऐसे समय में 1951 में साधक संत विनोबा भावे ने भूमि समस्या के समाधान की हिंसक राह तलाश रहे लोगों के बीच जाने का फैसला किया और मार्च में महाराष्ट्र के पवनार से निकलकर अशांत तेलंगाना क्षेत्र में 339 मील की सर्वोदय यात्रा आरंभ की- यह संदेश लेकर कि परिवर्तन की ताकत हिंसा नहीं, अहिंसा, संवाद और न्याय हैं।

इसी वर्ष 1 मई (मजदूर दिवस) को हरदोई के थमरवा गाँव में जन्मे एक बच्चे ने, सत्तर के दशक तक आते-आते, विनोबा की विचारधारा को केवल विचार के रूप में नहीं, जीवन-मार्ग के रूप में अपनाया। यही बच्चे आगे चलकर सर्वोदय आश्रम के संस्थापक —श्री रमेश भाई— बने। विनोबा के भूदान आंदोलन ने उन्हें भूमि-समस्या की जड़ दिखायी, लेकिन हरदोई की धरती ने उन्हें इसका व्यावहारिक समाधान सिखाया। रमेश भाई ने देखा कि उपजाऊ जमीनों का भूदान कराकर उन्हें निचले तबके में बाँट देना जितना कठिन है, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि गाँवों की ऊसर/उसार पड़ी बेकार जमीन का क्या होगा, जो समाज के हिस्से में तो है, पर उपयोग में नहीं।

यहीं से सर्वोदय आश्रम का काम विनोबा-परंपरा का नया विस्तार बना। आश्रम उनके लिए सिर्फ एक संस्था नहीं था, बल्कि एक जीवित प्रयोगशाला था, जहाँ “भूदान” का अर्थ कागज़ी दान से आगे बढ़कर श्रम, सहभागिता और स्वामित्व की सामूहिक संस्कृति बनता था। आश्रम में योजनाएँ मेज पर नहीं, खेत की मेड़ पर बनती थीं, गाँव की बैठक, पंचायत का चबूतरा, मजदूर की हथेलियों की दरारें, यही उनकी फाइलें थीं। यहाँ “लाभार्थी” कम और साथी, सहभागी, श्रमसहयोगी जैसे शब्द ज्यादा सच थे।

रमेश भाई ने भूदान को दानदाता-केंद्रित नहीं रहने दिया; उन्होंने इसे परिश्रमदाता-केंद्रित बनाया। उनका विचार साफ था, ऊसर भूमि को सुधार कर, उसे उन्हीं लोगों के नाम किया जाए जो पीढ़ियों से खेतों में मजदूरी करते आए हैं। इसीलिए उन्होंने जनपद हरदोई में एक मुहिम शुरू की: ऊसर भूमि का उपचार, फिर उसका आवंटन, और यह सब भूमिहीनों की सहभागिता से। सर्वोदय आश्रम ने इस काम में तकनीकी सलाह से ज्यादा जन-संगठन किया: गाँव-गाँव लोगों को जोड़ना, उन्हें भरोसा दिलाना कि यह जमीन “सरकारी कृपा” नहीं, उनकी मेहनत से उपजी उनकी संपत्ति बनेगी; श्रमदान-दल बनाना; बैठकों की मर्यादा और निर्णय-प्रक्रिया गढ़ना; और हिसाब-किताब को पारदर्शी रखना।

जब राज्य सरकार के सहयोग से ऊसर सुधार की योजना बनी और अधिकारियों ने उपचारित भूमि उद्योगपतियों को देने का प्रस्ताव रखा, तब रमेश भाई का सर्वोदय-संकल्प निर्णायक रूप से सामने आया। उन्होंने बड़ी स्पष्टता और दृढ़ता से सहयोग देने से मना कर दिया, यहाँ तक कि प्रदेश के मुख्य सचिव के सामने भी। उनका कहना था: यह जमीन उद्योगपतियों को नहीं, भूमिहीन मजदूरों को स्वामित्व सहित मिले; सुधार-कार्य उन्हीं के सहयोग से हो; और लाभ भी उन्हीं को पहुँचे। अंततः अधिकारियों को झुकना पड़ा और रमेश भाई की बात माननी पड़ी।

इस कार्यक्रम के तहत जनपद में हजारों हेक्टेयर ऊसर भूमि उपचारित की गई और भूमिहीन मजदूरों को आवंटित की गई। लेकिन यह केवल खेती का प्रोजेक्ट नहीं था—यह सम्मान और सुरक्षा का पुनर्वितरण था। जमीन का पट्टा सिर्फ कागज़ नहीं रहा; वह गाँव के भीतर व्यक्ति की पहचान, उसकी आवाज़ और उसके भविष्य का आधार बना। यही कारण रहा कि भूमि सुधार का यह मॉडल “हरदोई मॉडल” के नाम से जाना गया और प्रदेश के 25 से अधिक जनपदों में सफलतापूर्वक लागू भी हुआ।

सर्वोदय आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वह व्यक्तियों को नायक बनाकर नहीं, समूहों को सक्षम बनाकर काम करता था। आश्रम ने हर सफलता को पद्धति में ढाला और हर कठिनाई को सीख में - और इस तरह ऊसर जमीन के साथ-साथ लोगों के भीतर बैठी निराशा भी उपचारित होती चली गई।

यही सर्वोदय की पहचान बनी: जमीन का सुधार नहीं, जीवन का उत्थान।

क्रमशः
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आश्रम की एक खास पहचान उसके ऊसर सुधार कार्यक्रम से बनी, जिसकी शुरुआत 1985 में हुई। उस समय ऊसर और बंजर जमीन को लेकर किसानो...
14/01/2026

आश्रम की एक खास पहचान उसके ऊसर सुधार कार्यक्रम से बनी, जिसकी शुरुआत 1985 में हुई। उस समय ऊसर और बंजर जमीन को लेकर किसानों में निराशा थी और खेती से उम्मीदें कम होती जा रही थीं। ऐसे दौर में आश्रम ने SPWD की मदद से पहल की और शुरुआत में पड़ोस के दो गांवों में किसानों को उनकी ही जमीन पर ऊसर सुधार के लिए प्रेरित किया। यह केवल तकनीकी काम नहीं था, बल्कि किसानों का भरोसा जीतकर उन्हें साथ जोड़ने और लगातार मार्गदर्शन देने का प्रयास था। परिणाम सामने आए तो यह पहल अभूतपूर्व रूप से सफल साबित हुई।

इस सफलता के बाद कार्यक्रम का विस्तार तेजी से हुआ। पहले यह काम 12 जिलों तक पहुंचा और फिर अन्य 12 जिलों में फैलकर कुल 24 जिलों में लागू हुआ। देखते ही देखते यह एक आंदोलन बन गया, क्योंकि किसान अपने अनुभव साझा करने लगे और गांवों में भरोसा बढ़ता चला गया। कार्यक्रम की बढ़ती प्रभावशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने इसकी समीक्षा की। समीक्षा के दौरान इसकी सफलता और संभावनाओं को समझकर इसके बड़े विस्तार के लिए वर्ल्ड बैंक को प्रस्ताव भेजा गया। प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और फिर सरकार ने पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर ऊसर सुधार का कार्यक्रम चलाया।

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा असर गांवों की जिंदगी में दिखा। ऊसर जमीन सुधरी तो खेती लौटी, काम बढ़ा और आमदनी के रास्ते खुले। कई गांवों में सचमुच खुशहाली का माहौल बनने लगा और अनगिनत घरों में दो वक्त रोटी की व्यवस्था मजबूत हुई। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों में नहीं, लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस हुआ।

कार्यक्रम की सफलता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनी। इसे दुनिया में “हरदोई पैटर्न” के रूप में जाना गया और बाद में इसी पैटर्न से श्रीलंका ने भी अपनी जमीन सुधारने का काम किया। यह कार्यक्रम उस वर्ष वर्ल्ड बैंक का दुनिया का तीसरा सबसे सफल कार्यक्रम माना गया। अंततः यह सफलता सरकार, ग्रामीण जन, सर्वोदय आश्रम और दानदाता संस्था, सभी के सहयोग और समन्वय से संभव हुई, और आज भी यह सामूहिक प्रयास की एक प्रेरक मिसाल है।

क्रमशः
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आज से लगभग 40 साल पहले समाज तमाम तरह की कुरीतियों, अंधविश्वासों और भेदभाव की जकड़न में दबा हुआ था। ऐसे माहौल में भी आश्र...
13/01/2026

आज से लगभग 40 साल पहले समाज तमाम तरह की कुरीतियों, अंधविश्वासों और भेदभाव की जकड़न में दबा हुआ था। ऐसे माहौल में भी आश्रम ने अपने मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उसने आसान रास्ता चुनने के बजाय लोगों की सोच और जीवन-व्यवहार में बदलाव लाने का कठिन लेकिन जरूरी काम किया - समाज को भीतर से जागरूक करने का प्रयास किया।

इस बदलाव की प्रक्रिया सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रही। आश्रम ने पदयात्राओं के जरिए गाँव-गाँव जाकर सीधे संवाद कायम किया, सहभोज के माध्यम से जाति-भेद और छुआछूत जैसी दीवारों को तोड़ने का संदेश दिया, और श्रमदान के जरिए लोगों में बराबरी, सहभागिता और जिम्मेदारी का भाव जगाया। साथ ही विचार-गोष्ठियों के कार्यक्रम लगातार होते रहे, जिनमें समाज की समस्याओं पर खुलकर चर्चा हुई और समाधान के रास्ते तलाशे गए। क्षेत्र में निरंतर विचार-प्रचार का व्यापक कार्य चला, जिससे धीरे-धीरे जागरूक, विचारवान और कर्मठ कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम तैयार हुई - ऐसी टीम जो सिर्फ बात नहीं करती थी, काम करके उदाहरण भी पेश करती थी।

आश्रम की प्रतिबद्धता विशेष रूप से गरीब और वंचित आदमी की लड़ाई में दिखाई दी। वह उनकी समस्याओं के साथ खड़ा रहा, उनके अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करता रहा और न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करता रहा। जरूरतमंदों की आवाज को न सिर्फ स्थानीय स्तर पर उठाया गया, बल्कि उसे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुँचाने का भी लगातार प्रयास किया गया - ताकि उनकी पीड़ा, उनकी मांगें और उनके हक की बात सत्ता और नीति-निर्माण के स्तर तक सुनी जा सके। इस तरह आश्रम एक संस्था भर नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की एक जीवंत धारा बनकर सामने आया।

क्रमशः
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सामूहिक जीवनआश्रम का प्रारंभिक जीवन श्रमाधारित सामूहिकता का सशक्त उदाहरण था। छप्परों में रहकर कार्यकर्ताओं ने सीमित साधन...
12/01/2026

सामूहिक जीवन

आश्रम का प्रारंभिक जीवन श्रमाधारित सामूहिकता का सशक्त उदाहरण था। छप्परों में रहकर कार्यकर्ताओं ने सीमित साधनों में जीवन यापन करना सीखा और समाज सेवा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया। सीमित साधनों में साझा श्रम और साझा निर्णयों ने आपसी सहयोग व समानता की भावना को निरंतर मजबूत किया। इस अनुशासित और पारदर्शी जीवन शैली ने आसपास के ग्रामीण समाज में विश्वास और अपनापन पैदा किया।

जब कार्यकारी महिलाएँ आश्रम में रहने लगीं, तो यह भरोसा और गहरा हुआ। अभिभावकों ने देखा कि आश्रम न केवल सुरक्षित है, बल्कि श्रम, नैतिक मूल्यों और आत्मनिर्भरता पर आधारित सम्मानजनक जीवन की शिक्षा भी देता है। इसी विश्वास ने आगे चलकर बालिकाओं के छात्रावास की नींव रखी, जहाँ शिक्षा के साथ-साथ श्रम और चरित्र निर्माण पर विशेष बल दिया गया। सर्वोदय आश्रम का यह अनुभव बताता है कि जब जीवन, विचार और श्रम एक हो जाते हैं, तब परिवर्तन आदेश से नहीं, उदाहरण से होता है - और समाज स्वयं बदलने लगता है।

क्रमशः

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आश्रम की स्थापना1981 में सर्वोदय आश्रम की स्थापना एक सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि जनआकांक्षा का परिणाम थी। विनोबा जी के न...
11/01/2026

आश्रम की स्थापना

1981 में सर्वोदय आश्रम की स्थापना एक सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि जनआकांक्षा का परिणाम थी। विनोबा जी के निर्वाण के बाद तेरह दिन की पदयात्रा के दौरान ग्रामवासियों ने इस स्थान पर आश्रम बनाने का आग्रह किया। यह आग्रह ग्रामीण समाज के विश्वास और आशा का प्रतीक था। 1983 में इस भूमि पर आकर रहना शुरू किया गया। संसाधन सीमित थे, लेकिन संकल्प असीम। छप्परों से शुरू हुई यह यात्रा आज समाज परिवर्तन का केंद्र बन चुकी है।

क्रमशः

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संस्था परिचयसर्वोदय आश्रम स्वर्गीय रमेश भाई के विजन उनके पराक्रम का मूर्त रूप है। वो विचार, क्रिया,परिश्रम से इसे बहुत आ...
10/01/2026

संस्था परिचय

सर्वोदय आश्रम स्वर्गीय रमेश भाई के विजन उनके पराक्रम का मूर्त रूप है। वो विचार, क्रिया,परिश्रम से इसे बहुत आगे ले गए।आज उनके साथ आरंभ से जुड़ी , उनके नेतृत्व में विश्वास रखने वाली टीम आश्रम की संचालक है।

आश्रम के संस्थापक रमेश भाई 1971 (पोस्ट ग्रेजुएशन) के बाद सर्वोदय आंदोलन में आ गए थे।

इससे पूर्व वो गांव की कुरीतियों का सक्रिय विरोध करने,कविता लिखना आरंभ करने एवं एक विद्यालय की स्थापना करके विख्यात हो चुके थे।

रमेश भाई व उनकी टीम ने 1975-77 तक पाटिल कमेटी में काम किया। इस अर्धशासकीय कमेटी ने गरीबों को किन तरीकों से जमीन मिले वो पैटर्न विकसित करने व उन्हें जमीन दिलाने का प्रदेश भर में काम किया।

क्रमशः

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Address

Sikanderpur, Tandiyawan
Hardoi
241001

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