06/03/2025
*गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर -*
आज श्री श्री रवि शंकर का नाम जन-जन को परिचित हैं ।
इनका जन्म 13 मई 1956 को इनके नानाजी के पापनसम् नामक गाँव में हुआ, जो कि तमिलनाडु राज्य में है ।
वह ऐसा समय था जब पारंपारिक पूजा-पाठ के बीच योग व ज्ञान की शाखा विलुप्त सी थी । धर्म का बोलबाला था मानवीय मूल्य की बात नहीं होती थी ।
घुँघराले बाल, दमकता सांवला चेहरा, चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान । इनके बचपन के खेल भी भजन गाना, प्रकृति से जुड़ी हुई गतिविधि, पूजा करना आदि से जुड़े होते थे । मधुरता, सौम्यता बचपन से ही थी । इस नन्हें बालक ने जब चार वर्ष की उम्र में ही भगवद् गीता के विविध अध्याय के श्लोक सुनाकर अपने शिक्षक को आश्चर्य में डाल दिया था । माता-पिता भी अपनी इस प्रतिभाशाली, अनोखे व्यक्तित्व वाली संतान की सजगता व वात्सल्य भाव से परवरिश कर रहे थे । बालक के प्रश्न भी पिता को चकित करते रहते थे । आध्यात्मिक रहस्यों के प्रति प्रश्न हुआ करते थे । यह बालक बार-बार कहता था, "मेरा परिवार तो सब जगह हैं । लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं । अपने दोस्तों से भी वे इसी प्रकार की बात कहते थे , स्कूल में । उन्हें कोई भी अपरिचित नहीं लगता था ।
युवा रवि शंकर दूसरों से अलग तो थे फिर भी सबसे कैसे मिल-जुल कर रहना है यह भलिभाँति जानते थे, उन्हें सब लोग प्रिय थे । विज्ञान के विद्यार्थी थे पर संगीत में भी उनकी रुचि थी । कविता भी लिखते थे । विज्ञान के स्नातक की डिग्री उन्होंने प्राप्त की, केवल अपनी माता को प्रसन्न करने के लिए । नौकरी के इंटरव्ह्यू के लिए गये तो थे पर गंगातट पर ऋषिकेश आश्रम पर समय बिता कर बैंगलोर लौटे थे । ध्यान-मेडिटेशन की तरफ ही झुकाव था ।
युवा रवि शंकर को आध्यात्मिक गुरु, साधु, संत का संग भाने लगा । इसी दौरान उन्हें ऋषिकेश से महर्षि महेश योगी जी का निमंत्रण प्राप्त हुआ जो कि ध्यान की तकनिक के लिए जाने जाते थे ।
महर्षि जी के साथ रवि शंकर जी देश-विदेश में यात्राएँ की, बहुत से आध्यात्मिक कार्यों में भाग लिया । उन्हें लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं यह विचार बार-बार आता रहता था । कुछ निर्णय लेने से पहले उन्होंने देव्रहा बाबा से मिलना तय किया । एक दिन संध्या समय नाविक को साथ लें वे गंगा तट पर बनी कुटिया बाबा की तक पहुँचे । बाबा ने उन्हें भेट में एक तरबूज़ दिया कहा कि, "पानी को बहते रहना चाहिए । यदि वह रुकता है, तो वह सड़ जाता है । सत्संग को भी बहना चाहिए क्योंकि सत्संग कृपा को दुनिया में बिखेरता है ।" महर्षि जी का साथ छोड़ना कठिन निर्णय रहा फिर भी रवि शंकर ने अपना अलग मार्ग चुन कर कार्य करना आरंभ किया ।
एक रात हुबली स्टेशन पर खड़े रवि शंकर के हाथ में दो टिकट थी । एक बैंगलोर जाने वाली ट्रेन की और एक सोलापुर जाने वाली ट्रेन की । बैंगलोर महर्षि जी के कार्य से संबंधित यात्रा के लिए थी और दूसरी उनके निजी प्रकल्प की । 175 बच्चों के लिए स्कूल, छात्रालय शुरु करने का । यह उनके पिता के निजी मकान से शुरु हुआ । फिर एक सज्जन ने जो विदेश जा रहे थे, उन्हें अपना मकान स्कूल के लिए सौंपा । बयालीस वर्ष पहले (13 नवंबर 1980) इस प्रकार वेद विज्ञान महा विद्यापीठ स्थापित हुआ । अब यह विद्यापीठ बैंगलोर आश्रम में स्थित है ।
समय बितता गया । *5 मार्च 1982 में वे कर्नाटक के शिमोगा स्थान के पास भद्रावती नदी के किनारे दस दिन का मौन रखते हुए ध्यान कर रहे थे, वहीं वैश्विक सोऽहम की ध्वनि उनके भीतर जागी, सांसों की विशिष्ट लय के साथ । सुदर्शन क्रिया !! दिव्यता का सौम्य मौन संवाद है !! रवि शंकर ने शिमोगा गाँव के लोगों से अपने अनुभव की बात की । बैंगलोर लौट कर जयानगर के आनंदमयी हॉल में दो दिन का कोर्स आयोजित किया जिसका नाम था 'आओ, स्वयं से मुलाकात करो !'*
*आज सुदर्शन क्रिया आर्ट ऑफ लिविंग संस्था का अभिन्न भाग है । आज सुदर्शन क्रिया के बारे में कई वैज्ञानिक संशोधन हो चुके हैं व देश-विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं में छप चुके हैं । सुदर्शन क्रिया न केवल तनाव से मुक्ति दिलाती बल्कि शरीर की रोग- प्रतिरोध क्षमता को विकसित करती है । जीवन जीने की कला कोर्स के ज्ञान-बिंदु समझ कर लोग, वर्तमान में रहना, विचारों में संतुलन बनाये रखना, व्यावहारिक जगत में वार्तालाप की कुशलता, संबंधों में मधुरता बनाना, अपनी कार्यक्षमता को विकसित करना सीखते हैं । और सही अर्थों में जीवन का आनंद ले पाते हैं । जीवन एक उत्सव बन जाता है ।*
आर्ट ऑफ लिविंग स्वयंसेवक आधारित संस्था हैं और इसके स्वयंसेवकों की मिसाल कार्पोरेट जगत में अक्सर दी जाती रही है । आर्ट ऑफ लिविंग संस्था सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक कई प्रकार के कार्य-कलाप व योजनाओं द्वारा करोडों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला चुकी है । 42 वर्षों में 45 करोड़ लोग जीवन जीने की कला कार्यक्रमों से लाभान्वित हुए हैं ।
आर्ट ऑफ लिविंग वेद-विज्ञान व आयुर्वेद को भी बढ़ावा दे रही है । इस क्षेत्र में एक अग्रणी संस्था हैं । *180* देशों में विश्वव्यापी स्तर पर मानवीय मूल्यों के लिए व अन्य सामाजिक सेवा योजनाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर विश्व शांति, मानव जीवन उत्थान के लिए यह संस्था बड़ा योगदान दे रही है ।
आपसी मतभेदों पर कुशल वार्तालाप से दोनों पक्षों के बीच समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना व उस पर सहमति बनाने के लिए श्री श्री रवि शंकर जी एक जाना-माना नाम है । विश्व स्तर पर आतंकवाद, नक्सलवाद, आतंरिक युद्ध या दो देशों के बीच के मतभेद सभी में श्री श्री रवि शंकर जी ने कुशल मध्यस्थता निभायी है । भारत में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम मंदिर केस जो कि वर्षों से चल रहा था, का जो फैसला सुनाया व दो धर्मों की संस्थाओं के बीच मतभेद पर सहमती बनी उसके पीछे श्री श्री रवि शंकर जी की वर्षों की अनथक मध्यस्थता का बड़ा योगदान रहा है । सुप्रीम कोर्ट ने उनके सुझावों के आधार पर ही फैसला सुनाया यह भी सर्व विदित तथ्य है । उनके कार्य को सराहते हुए कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें प्राप्त हो चुके है । भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्मविभूषण पुरस्कार से 2016 में सम्मानित किया गया है ।
श्री श्री रवि शंकर आध्यात्मिक नेता व मानवतावादी हैं; अत: इनके प्रवचन अध्यात्म, मानवता व विश्वैक्य के लिए भाव पर आधारित रहे हैं । प्रेम केवल एक भावना नहीं है, आपका अस्तित्व है । राग, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ आदि प्रेम के विकृत रूप ही हैं । मूलत: आनंद ही हमारा स्वभाव है । यह तथ्य इनके प्रवचनों में अच्छे से समझाया गया है । अपने मन को समझना, मन में उठने वाली भावनाओं की लहरें व उनके प्रति सजगता, सुंदर जीवन के सूत्र, मधुर संबन्धों के रहस्य, मन का स्वभाव, हमारे जीवन के स्रोत, साधकों को समझाने के लिए अंतरंग ज्ञान सूत्र, कर्म और पुनर्जन्म, देश व समाज का पुनर्नवन कैसे हो, मैनेजमेंट जगत के लिए मंत्र, त्योहार, सामाजिक प्रथाओं का गूढ़ अर्थ आदि विषयों पर भी सरल भाषा में श्री श्री रविशंकर जी ने कई प्रवचन दिए और लोगों को सोच की नयी दिशा दी।
भारत के प्राचीन ग्रंथ इशाव्यासा उपनिषद, केन उपनिषद, कठोपनिषद, योगसार उपनिषद, अष्टावक्र गीता, नारद भक्ति सूत्र, भगवद् गीता, पतंजली योग सूत्र तथा विज्ञान भैरव, स्पंदकारिका जैसे रहस्यों को इन्होंने बहुत सरल भाषा में अपने प्रवचनों व ज्ञान सत्र द्वारा समझाया है । जिनसे सामान्य लोगों ने भी इस ज्ञान को अच्छे से ग्रहण किया व अपनाया है । मुरुगन रहस्य के प्रवचनों के द्वारा लोगों ने दैनिक जीवन में इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति व क्रिया शक्ति का समन्वय स्थापित कर जीवन की गुणवत्ता को कैसे सुधारे यह समझा है ।
मानवीय मूल्यों के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना 1997 में जेनेवा में हुई । जीवन के सभी आयामों में मानवीय मूल्य स्थान पायें, ये इस संस्था का उद्देश्य है । सरकार, बहुआयामी संस्थाएँ, एन.जी.ओ., कार्पोरेशन्स और व्यक्तिगत सभी स्तर मिल कर कार्य करते हैं इस संस्था में । इसके द्वारा ग्रामीण विकास, जैविक खेती, मानसिक आघात मुक्ति, शांति के लिए प्रयास, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, नशे की लत लग चुके लोगों का रूपान्तरण आदि सेवा योजनाएँ चलायी जा रही हैं व सकारात्मक बदलाव ला रही हैं ।
आपदा प्रबंधन, नदियों का पुनर्जीवन आदि भी कई कार्यक्रम व योजनाएँ आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा चलायी जा रही हैं ।
जीवन जीने की कला के भी कई तनाव-मुक्ति कार्यक्रम - कोर्सेस चलाये जा रहे हैं जो मुख्य बिंदु सुदर्शन क्रिया पर आधारित हैं । जैसे :- जीवन जीने की कला (आनंद अनुभूति शिबिर) भाग-1 तथा भाग 2 ; सहज समाधि ध्यान, दिव्य समाज का निर्माण (नया नाम स्व व राष्ट्र के लिए गतिमानता), विज्ञान भैरव, संयम, ब्लेसिंग (आशीर्वाद), युवा नेतृत्व शिक्षक प्रशिक्षण (वाय.एल.टी.पी.), श्री श्री योग भाग 1 व भाग 2, कार्पोरेट एक्जेक्यूटिव्ह कार्यक्रम आदि । बच्चों के लिए भी प्रज्ञा योग, उत्कर्ष योग, मेधा योग कार्यक्रम है । युवाओं के लिए युवा सशक्ति करण कोर्स है (येस+) । जेल संबंधित कार्यक्रम भी है । समय की आवश्यकतानुसार नित नये कोर्स आर्ट ऑफ लिविंग में लाये जा रहे हैं । इन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर आर्ट ऑफ लिविंग के शिक्षक बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं ।
समय के साथ चलना भी आर्ट ऑफ लिविंग की विशेषता रही है । कोरोना काल के बाद से बहुत सारे कोर्स अब ऑन लाइन सिखाये जा रहे हैं । श्री श्री यूनिवर्सिटी के छात्रों की परीक्षा, परीक्षा परिणाम, डिग्री वितरण, व नये सत्र व पाठ्यक्रम का आरंभ ऑन लाइन हुआ । बिल्कुल विलंब नहीं हुआ । समय की मांग के अनुसार आत्म-निर्भर भारत संबंधित आर्ट ऑफ लिविंग कई योजनाओं से जुड़ा हुआ है । किसानों को व छोटे व्यवसायों को प्रोत्साहन दे रहा है व मदद कर रहा है । रोजगार हेतु कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रहा है । स्वदेशी ऐप एलिमेंटस् का निर्माण भी किया गया है ।
इन सभी कार्यों, योजनाओं के प्रेरणा-स्रोत श्री श्री रवि शंकर जी है ।
कोरोना काल के दौरान कई महीनों तक रोज दोपहर व संध्या को श्री श्री ने ऑन लाइन ध्यान कई सोशल मिडिया जैसे यू ट्यूब, फेस बुक आदि पर प्रतिदिन कराये और लोगों को अपने स्रोत से जुड़ना सिखाया, सरल शब्दों में तनाव मुक्त रहना सिखाया जिसका लाभ सभी वर्गों के लोगों ने उठाया । युक्रेन में छिड़े युद्ध के दौरान इन्होंने *I Stand for Peace (आय स्टैंड फॉर पीस)* पहल का आरंभ किया । आर्ट ऑफ लिविंग हमेशा से ही कला, संगीत, संस्कृति को बढ़ावा देता रहा है । आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा इस संदर्भ में कई अभूतपूर्व कार्यक्रम आयोजित किये गये ।
संदीप गोयल
फैकल्टी आर्ट ऑफ लिविंग
हांसी 9416388500