15/01/2025
धर्म [ भाग 1 ]
मनुष्य जिस परिवार मे जन्म लेता है उस परिवार की मान्यताओं के अनुसार परिवार के सभी सदस्यों द्वारा पालन किए जा रहे पारम्परिक निति-नियम रिति-रिवाज संस्कार व अन्य सेवाकिय और सामाजिक क्रिया-कलाप आदि को सरलता से धर्म समझकर अगिंकार करना उसके लिए सहज सरल व स्वाभाविक होता है।
मनुष्य संपुर्ण जीवन इस प्रकार की मान्यताओं को धर्म समझकर पालन करता रहता है तथा साम, दाम, दण्ड, भेद की निति अपनाकर कर दुसरों से भी अपने कथित धर्म का पालन करवाने का प्रयत्न करता है, तथा सनातन भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं का पालन करने वाले लोगों को छोड़कर विश्व मे अधिकतर लोग ऐसा कृत्य करते हुए घोर हिसां करने से भी पीछे नहीं हटते और मजे की बात है कि इस प्रकार की हिंसा को धार्मिक रूप देने का पुरा प्रयास अधिकतर मनुष्य करते रहते हैं।
किंतु सबसे बडा प्रश्न यह है कि
धर्म क्या है ???
धर्म का वास्तविक रूप क्या है ???
धर्म के निति नियम क्या हैं ???
धर्म की रूपरेखा क्या है ???
धर्म की परिभाषा क्या है ???
प्रत्येक व्यक्ति स्वयं के जीवन काल मे अपनी स्वयं की बुद्धि क्षमता तथा अपनी आर्थिक व सामाजिक स्थिति के अनुसार धर्म को समझकर उसका पालन करता है, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति की धर्म की अपनी अलग ही परिभाषा होती है, इसलिए पृथ्वी पर अनेकाधिक धर्म संप्रदाय व संगठनों के चलते इन कथित धर्म संप्रदायों व संगठनों मे निति भेदानुसार विरोधाभास सहज व स्वाभाविक होता है, किन्तु एक ही धर्म संप्रदाय को मानने वाले अलग अलग व्यक्ति भी अपने धर्म तथा धार्मिक गुरु का अपने स्वभानुसार मुल्यांकन करके अपने दृष्टिकोण से उसको देखकर व समझकर अपनी सुविधानुसार अलग अलग प्रकार से एक ही धर्म का पालन करते हैं।
इसलिए ही धर्म का पालन करने वाले व्यक्तियों मे भी भारी मतभेद होने के कारण उस संप्रदाय विशेष की अनेक परस्पर विरोधी शाखाओं का निर्माण धर्म के नाम पर हो जाता है, तथा जो धर्म संप्रदाय मनुष्य मे आपसी प्रेम सदभाव तथा भाईचारे का संदेश देता है उसी संप्रदाय विशेष मे विभाजन पर विभाजन होते चले जाते हैं।
क्या यही धर्म है ???
आज के आधुनिक युग मे भी जब एक ओर हर प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएं तथा साधनों के विकसित होने के कारण व वर्तमान वैश्विक परिवेश के कारण मनुष्य अपने आपको कितना भी शिक्षित अथवा जाग्रत समझे किन्तु प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य धर्म के नाम पर एक मत नही हो पाया है, वास्तविक रूपसे धर्म के नाम पर एक मत होना असंभव है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण तथा मुल्यांकन क्षमता अलग अलग होने के कारण एक ही स्थान पर एकत्र समूह के व्यक्ति एक ही घटना के साक्षी होते हुए भी अपनी क्षमतानुसार घटना अथवा परिस्थिति का मुल्यांकन करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप एक ही घटना के साक्षी मनुष्य उस घटना का विवरण अलग अलग प्रकार से ही देते हैं, और मनुष्य की इसी मुल्यांकन क्षमता के दायरे मे धर्म भी आ जाता है तथा मनुष्य मे मुल्यांकन करने की जो क्षमता है वास्तविक रूप से यही मनुष्य की परम स्वतंत्रता तथा अमूल्य शक्ति भी है।
तथा इस स्वतंत्रता तथा शक्ति के परिणाम स्वरूप ही मनुष्य मे वैचारिक विरोधाभास व मतभेद उत्पन्न होते हैं इसमे सामाजिक तथा व्यक्तिगत विरोधाभास व मतभेदों का समाधान तो समयानुसार हो ही जाता है, किन्तु कथित रूपसे एक बार सामने आने के पश्चात धार्मिक विरोधाभास व मतभेदों का समाधान
किसी भी प्रकार से
किसी भी रूप मे
किसी भी परिस्थिति मे
सदियों के पश्चात भी असंभव ही होता है।
इसी कारण इस परम शान्त पृथ्वी पर
धर्म के नाम पर
शान्ति के नाम पर
प्रेम के नाम पर
भाइचारे के नाम पर
सत्य के नाम पर
करूणा के नाम पर
सदभाव के नाम पर
कल्याण के नाम पर
अहिंसा के नाम पर
परमात्मा के नाम पर
नयी नयी विचारधाराओं संप्रदायों का जन्म होता रहता है तथा सभी नित नवीन आकर्षक सूत्रों के सहारे
धर्म के नाम पर अधर्म
शान्ति के नाम पर अशांति
प्रेम के नाम पर घृणा
भाईचारे के नाम पर छल कपट
सत्य के नाम पर असत्य
करूणा के नाम पर शोषण
सदभाव के नाम पर वैमनस्य
कल्याण के नाम पर स्वार्थसिद्धि
अहिंसा के नाम पर हिसां तथा परमात्मा के नाम पर पाखण्ड करके अपना आर्थिक विकास ही करते रहते हैं, तथा धर्म मे आर्थिक बात आत्मकल्याण और मोक्ष से भी महत्वपूर्ण हो जाती है इस कारण लोभी लालची कामी व स्वार्थी तत्त्व भी खुलेआम एक दुसरे की सार्वजनिक रूप से टीका टिप्पणी करते रहते हैं व भोले भाले लोगों को आध्यात्मिक रूप से मुर्ख बनाकर उनका आर्थिक शोषण करते रहते हैं।
और वास्तविक रूप से सोचने और चिंतन मनन करने वाली गंभीर बात यह है कि मनुष्य को मनुष्य से जोडने की बात करने वाला धर्म अकारण ही मनुष्य को मनुष्य के विरुद्ध खडा करने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा देता है, और धार्मिक मतभेद मनुष्य को मनुष्य का घोर शत्रु बनाकर आमने सामने संघर्ष करने के लिए खड़ा कर देते हैं, और धार्मिक मतभेद मनुष्य को मनुष्य के प्रति घोर हिंसक बना देते हैं।
मनुष्य के इस पृथ्वी पर उत्पन्न होने से लेकर आज के वर्तमान आधुनिक समय तक पृथ्वी पर विश्व विजेता बनने के लिए सैकडों युद्ध हुए तथा उन भीषण युद्धों मे करोड़ों लोग मृत्यु को प्राप्त हुए पृथ्वी पर अधिकार के लिए हजारों भयंकर युद्ध हुए हैं तथा करोडों लोग मारे गए हैं, पृथ्वी पर इसके किसी प्रदेश के लिए लाखों युद्ध हो चुके हैं तथा करोड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं, पृथ्वी पर इसके किसी भूभाग के लिए लाखों बार संघर्ष हुए हैं, पृथ्वी पर इसके किसी खेत खलिहान हेतु भी लाखों लोगों ने अपना बलिदान दिया है, पृथ्वी पर इसके किसी टुकड़े के लिए आज भी निरंतर वर्चस्व की लडाई चल ही रही है, इस पृथ्वी पर प्राचीन काल से आज पर्यंत स्त्रियों पर अधिकार जमाने के लिए भी करोड़ों लोगों ने अपने प्राणों से हाथ धोए हैं, और धन प्राप्ति हेतु भी करोड़ों लोगों ने जान गँवाई है किन्तु पृथ्वी के इतिहास में इस प्रकार की आज तक की हुई हिसां मे कुल जितने लोगों ने अपनी जान गँवाई है उससे कई गुना अधिक लोगों ने धर्म के नाम पर निरंतर हो रही हिंसा मे अपने प्राण गवाएं है।
सुक्षमता से यदि अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि परम् शान्ति और परम कल्याण का संदेश देने वाले धर्म के कारण ही आज मनुष्य अशांत व्यग्र तथा निरंतर तनावग्रस्त है, और हर मनुष्य का धर्म शान्ति का और परम कल्याण का संदेश दे रहा है, पृथ्वी का प्रत्येक धर्मग्रंथ शान्ति का संदेश दे रहा है, तथा पृथ्वी पर हर मनुष्य अपने धर्मग्रंथ को हाथ में थामे हुए तनावग्रस्त है, व्यग्र है, अशांत है, आखिर क्यों ?????
क्रमशः
स्वामी सहजानन्द गिरि जी महाराज।
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